Thursday, May 25, 2017

या ख़ुदा तूने अता फिर कर दिया रमज़ान है...


फ़िरदौस ख़ान
मरहबा सद मरहबा आमदे-रमज़ान है
खिल उठे मुरझाए दिल, ताज़ा हुआ ईमान है
हम गुनाहगारों पे ये कितना बड़ा अहसान है
या ख़ुदा तूने अता फिर कर दिया रमज़ान है...
माहे-रमज़ान इबादत, नेकियों और रौनक़ का महीना है. यह हिजरी कैलेंडर का नौवां महीना होता है. इस्लाम के मुताबिक़ अल्लाह ने अपने बंदों पर पांच चीज़ें फ़र्ज क़ी हैं, जिनमें कलमा, नमाज़, रोज़ा, हज और ज़कात शामिल है. रोज़े का फ़र्ज़ अदा करने का मौक़ा रमज़ान में आता है. कहा जाता है कि रमज़ान में हर नेकी का सवाब 70 नेकियों के बराबर होता है और इस महीने में इबादत करने पर 70 गुना सवाब हासिल होता है. इसी मुबारक माह में अल्लाह ने हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर क़ु़रआन नाज़िल किया था. यह भी कहा जाता है कि इस महीने में अल्लाह शैतान को क़ैद कर देता है.

इबादत
रमज़ान से पहले मस्जिदों में रंग-रोग़न का काम पूरा कर लिया जाता है. मस्जिदों में शामियाने लग जाते हैं. रमज़ान का चांद देखने के साथ ही इशा की नमाज़ के बाद तरावीह पढ़ने का सिलसिला शुरू हो जाता है. रमज़ान के महीने में जमात के साथ क़ियामुल्लैल (रात को नमाज़ पढ़ना) करने को 'तरावीह' कहते हैं. इसका वक्त रात में इशा की नमाज़ के बाद फ़ज्र की नमाज़ से पहले तक है. हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने रमज़ान में क़ियामुल्लैल में बेहद दिलचस्पी ली. आपने फ़रमाया कि ''जिसने ईमान के साथ और अज्र व सवाब (पुण्य) हासिल करने की नीयत से रमज़ान में क़ियामुल्लैल किया, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाएंगे.''उन्होंने फ़रमाया कि ''यह ऐसा महीना है कि इसका पहला हिस्सा अल्लाह की रहमत है, दरमियानी हिस्सा मग़फ़िरत है और आख़िरी हिस्सा जहन्नुम की आग से छुटकारा है.'' रमज़ान के तीसरे हिस्से को अशरा भी कहा जाता है. आपने फ़रमाया कि ''रमज़ान के आख़िरी अशरे की ताक़ (विषम) रातों में लैलतुल क़द्र की तलाश करो.'' लैलतुल क़द्र को शबे-क़द्र भी कहा जाता है. शबे-क़द्र के बारे में क़ुरआन में कहा गया है कि यह हज़ार रातों से बेहतर है, यानि इस रात में इबादत करने का सवाब एक हज़ार रातों की इबादत के बराबर है. मुसलमान रमज़ान की 21, 23, 25, 27 और 29 तारीख़ को पूरी रात इबादत करते हैं.

ख़ुशनूदी ख़ान कहती हैं- इस महीने में क़ुरआन नाज़िल हुआ, इसलिए रमज़ान बहुत ख़ास है. हर मुसलमान के लिए यह महीना मुक़द्दस और आला है. हमें इस महीने की अहमियत को समझते हुए ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त इबादत में गुज़ारना चाहिए. वैसे भी रमज़ान में हर नेकी और इबादत का सवाब साल के दूसरे महीनों से ज़्यादा ही मिलता है. वे कहती हैं कि शबे-क़द्र को उनके ख़नदान के सभी लोग रातभर जागते हैं. मर्द इबादत के लिए मस्जिदों में चले जाते हैं और औरतें घर पर इबादत करती हैं.

वहीं, ज़ुबैर कहते हैं कि काम की वजह से पांचों वक़्त क़ी नमाज़ नहीं हो पाती, लेकिन रमज़ान में उनकी कोशिश रहती है कि नमाज़ और रोज़ा क़ायम हो सके. दोस्तों के साथ मस्जिद में जाकर तरावीह पढ़ने की बात ही कुछ और है. इस महीने की रौनक़ों को देखकर कायनात की ख़ूबसूरती का अहसास होता है. रमज़ान हमें नेकियां और इबादत करने का सबक़ देता है और हमें अल्लाह के क़रीब करता है.

ज़ायक़ा
माहे-रमज़ान में हर तरफ़ ज़ायक़ेदार व्यंजनों की भरमार रहती है. रमज़ान का ज़िक्र लज़ीज़ व्यंजनों के बग़ैर मुकम्मल नहीं होता. रमज़ान का ख़ास व्यंजन हैं फैनी, सेवइयां और खजला. सुबह सहरी के वक़्त फ़ैनी को दूध में भिगोकर खाया जाता है. इसी तरह सेवइयों को दूध और मावे के साथ पकाया जाता है. फिर इसमें चीनी और सूखे मेवे मिलाकर परोसा जाता है. इसके अलावा मीठी डबल रोटी भी सहरी का एक ख़ास व्यंजन है. ख़ास तरह की यह मीठी डबल रोटी अमूमन रमज़ान में ही ज़्यादा देखने को मिलती है.

इफ़्तार के पकवानों की फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है. अमूमन रोज़ा खजूर के साथ खोला जाता है. दिनभर के रोज़े के बाद शिकंजी और तरह-तरह के शर्बत गले को तर करते हैं. फलों का चाट इफ़्तार के खाने का एक अहम हिस्सा है. ताज़े फलों की चाट रोज़े के बाद ताज़गी का अहसास तो कराती ही है, साथ ही यह पौष्टिक तत्वों से भी भरपूर होती है. इसके अलावा ज़ायक़ेदार पकौड़ियां और तले मसालेदार चने भी रोज़ेदारों की पसंद में शामिल हैं. खाने में बिरयानी, नहारी, क़ौरमा, क़ीमा, नरगिसी कोफ़्ते, सींक कबाब और गोश्त से बने दूसरे लज़ीज़ व्यंजन शामिल रहते हैं. इन्हें रोटी या नान के साथ खाया जाता है. रुमाली रोटी भी इनके ज़ायके को और बढ़ा देती है. इसके अलावा बाकरखानी भी रमज़ान में ख़ूब खाई जाती है. यह एक बड़े बिस्कुट जैसी होती है और इसे क़ोरमे के साथ खाया जाता है. बिरयानी में हैदराबादी बिरयानी और मुरादाबादी बिरयानी का जवाब नहीं. मीठे में ज़र्दा, शाही टुकड़े, फिरनी और हलवा-परांठा दस्तरख़ान पर की शोभा बढ़ाते हैं.
ज़ीनत कहती हैं कि रमज़ान में यूं तो दिन में ज़्यादा काम नहीं होता, लेकिन सहरी के वक़्त और शाम को काम बढ़ जाता है. इफ़्तार के लिए खाना तो घर में ही तैयार होता है, लेकिन रोटियों की जगह हम बाहर से नान या रुमाली रोटियां मंगाना ज़्यादा पसंद करते हैं.
रमज़ान में रोटी बनाने वालों का काम बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है. दिल्ली में जामा मस्जिद के पास रोटी बनाने वालों की कई दुकानें हैं. यहां तरह-तरह की रोटियां बनाई जाती हैं, जैसे रुमाली रोटी, नान, बेसनी रोटी आदि. अमूमन इस इलाके क़े होटल वाले भी इन्हीं से रोटियां मंगाते हैं.

हदीस
जो साहिबे-हैसियत हैं, रमज़ान में उनके घरों में लंबे-चौड़े दस्तरख़्वान लगते हैं. इफ़्तार और सहरी में लज़ीज़ चीज़ें हुआ करती हैं, लेकिन जो ग़रीब हैं, वो इन नेअमतों से महरूम रह जाते हैं. हमें चाहिए कि हम अपने उन रिश्तेदारों और पड़ौसियों के घर भी इफ़्तार और सहरी के लिए कुछ चीज़ें भेजें, जिनके दस्तरख़्वान कुशादा नहीं होते. ये हमारे हुज़ूर हज़रत मुहम्‍मद सल्‍लललाहू अलैहिवसल्‍लम का फ़रमान है. 
आप (सल्‍लललाहू अलैहिवसल्‍लम) फ़रमाते हैं- रमज़ान सब्र का महीना है यानी रोज़ा रखने में कुछ तकलीफ़ हो, तो इस बर्दाश्‍त करें. फिर आपने कहा कि रमज़ान ग़म बांटने का महीना है यानी ग़रीबों के साथ अच्‍छा बर्ताव किया जाए. अगर दस चीज़ें अपने रोज़ा इफ़्तार के लिए लाए हैं, तो दो-चार चीज़ें ग़रीबों के लिए भी लाएं.
यानी अपने इफ़्तार और सहरी के खाने में ग़रीबों का भी ख़्याल रखें. अगर आपका पड़ौसी ग़रीब है, तो उसका ख़ासतौर पर ख़्याल रखें कि कहीं ऐसा न हो कि हम तो ख़ूब पेट भर कर खा रहे हैं और हमारा पड़ौसी थोड़ा खाकर सो रहा है.

ख़रीददारी
रमज़ान में बाज़ार की रौनक़ को चार चांद लग जाते हैं. रमज़ान में दिल्ली के मीना बाज़ार की रौनक़ के तो क्या कहने. दुकानों पर चमचमाते ज़री वाले व अन्य वैरायटी के कपड़े, नक़्क़ाशी वाले पारंपरिक बर्तन और इत्र की महक के बीच ख़रीददारी करती औरतें, साथ में चहकते बच्चे. रमज़ान में तरह-तरह का नया सामान बाज़ार में आने लगता है. लोग रमज़ान में ही ईद की ख़रीददारी शुरू कर देते हैं. आधी रात तक बाज़ार सजते हैं. इस दौरान सबसे ज़्यादा कपड़ों की ख़रीददारी होती है. दर्ज़ियों का काम बढ़ जाता है. इसलिए लोग ख़ासकर महिलाएं ईद से पहले ही कपड़े सिलवा लेना चाहती हैं. अलविदा जुमे को भी नये कपड़े पहनकर नमाज़ पढ़ने का दस्तूर है. हर बार नये डिज़ाइनों के कपड़े बाज़ार में आते हैं. नेट, शिफ़ौन, जॉरजेट पर कुन्दन वर्क, सिक्वेंस वर्क, रेशम वर्क और मोतियों का काम महिलाओं को ख़ासा आकर्षित करता है. दिल्ली व अन्य शहरों के बाज़ारों में कोलकाता, सूरत और मुंबई के कपड़ों की धूम रहती है. इसके अलावा सदाबहार चिकन का काम भी ख़ूब पसंद किया जाता है। पुरानी दिल्ली के कपड़ा व्यापारी शाकिर अली कहते हैं कि बाज़ार में जिस चीज़ का मांग बढ़ने लगती है हम उसे ही मंगवाना शुरू कर देते हैं. ईद के महीने में शादी-ब्याह भी ज़्यादा होते हैं. इसलिए माहे-रमज़ान में शादी की शॉपिंग भी जमकर होती है. शादियों में आज भी पारंपरिक पहनावे ग़रारे को ख़ासा पसंद किया जाता है.

चूड़ियों और मेहंदी के बिना ईद की ख़रीददारी अधूरी है. रंग-बिरंगी चूड़ियां सदियों से औरतों को लुभाती रही हैं. चूड़ियों के बग़ैर सिंगार पूरा नहीं होता. बाज़ार में तरह-तरह की चूड़ियों की बहार है, जिनमें कांच की चूड़ियां, लाख की चूड़ियां, सोने-चांदी की चूड़िया, और मेटल की चूड़ियां शामिल हैं. सोने की चूड़ियां तो अमीर तबक़े तक ही सीमित हैं. ख़ास बात यह भी है कि आज भी महिलाओं को पारंपरिक कांच की रंग-बिरंगी चूड़ियां ही ज़्यादा आकर्षित करती हैं. बाज़ार में कांच की नगों वाली चूड़ियों की भी ख़ासी मांग है. कॉलेज जाने वाली लड़कियां और कामकाजी महिलाएं मेटल और प्लास्टिक की चूड़ियां ज़्यादा पसंद करती हैं, क्योंकि यह कम आवाज़ करती हैं और टूटती भी नहीं हैं, जबकि कांच की नाज़ुक चूड़ियां ज़्यादा दिनों तक हाथ में नहीं टिक पातीं.

इसके अलावा मस्जिदों के पास लगने वाली हाटें भी रमज़ान की रौनक़ को और बढ़ा देती हैं. इत्र, लोबान और अगरबत्तियों से महक माहौल को सुगंधित कर देती है. इत्र जन्नतुल-फ़िरदौस, बेला, गुलाब, चमेली और हिना का ख़ूब पसंद किया जाता है. रमज़ान में मिस्वाक से दांत साफ़ करना सुन्नत माना जाता है. इसलिए इसकी मांग भी बढ़ जाती है. रमज़ान में टोपियों की बिक्री भी ख़ूब होती है. पहले लोग लखनवी दुपल्ली टोपी ज्यादा पसंद करते थे, लेकिन अब टोपियों की नई वैरायटी पेश की जा रही हैं. अब तो लोग विभिन्न राज्यों की संस्कृतियों से सराबोर पारंपरिक टोपी भी पसंद कर रहे हैं. इसके अलावा अरबी रुमाल भी ख़ूब बिक रहे हैं. रमज़ान के मौक़े पर इस्लामी साहित्य, तक़रीरों, नअत, हम्द,क़व्वालियों की कैसेट सीटी और डीवीडी की मांग बढ़ जाती है.

यूं तो दुनियाभर में ख़ासकर इस्लामी देशों में रमज़ान बहुत अक़ीदत के साथ मनाया जाता है, लेकिन हिन्दुस्तान की बात ही कुछ और है. विभिन्न संस्कृतियों के देश भारत में मुसलमानों के अलावा ग़ैर मुस्लिम लोग भी रोज़े रखते हैं. कंवर सिंह का कहना है कि वे पिछले कई सालों से रमज़ान में रोज़े रखते आ रहे हैं. रमज़ान के दौरान वे सुबह सूरज निकलने के बाद से सूरज छुपने तक कुछ नहीं खाते. उन्हें विश्वास है कि अल्लाह उनके रोज़ों को ज़रूर क़ुबूल करेगा. भारत देश की यही महानता है कि यहां सभी धर्मों के लोग मिलजुल कर त्योहार मनाते हैं. यही जज़्बात गंगा-जमुनी तहज़ीब को बरक़रार रखते हैं.

Monday, May 8, 2017

ठंडा पानी और बर्फ़...

सब इंसानों की बुनियादी ज़रूरतें एक जैसी ही हैं... लेकिन सबके पास अपनी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने के साधन नहीं हैं... दुनिया में कितने ही लोग ऐसे हैं, जिनके पास ज़रूरत से ज़्यादा, यहां तक कि बेहिसाब चीज़ें हैं... बहुत से लोग ऐसे हैं, जिनके पास अपनी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने लाय़क भी चीज़ें नहीं हैं... वे महरूम रह जाते हैं... अगर हम एक-दूसरे की मदद करें, इंसान के नाते... ये मानकर कि ये हम पर फ़र्ज़ है, और सामने वाले का ये हक़ है... तो इसमें कोई दो राय नहीं कि इससे जहां हमें दिली सुकून मिलेगा, वहीं सामने वाले की ज़रूरत पूरी हो जाएगी... ऐसा करके हम किसी पर कोई अहसान नहीं करेंगे, बल्कि ये सामने वाला का ही अपनापन होगा कि वो हमारी मदद को क़ुबूल करके हमें ख़ुशी देगा...

बात किसी को रुपये-पैसे की मदद या कोई क़ीमती चीज़ देने की नहीं है... हम अपनी हैसियत के हिसाब से जो कर सकते हैं, वो हमें करना ही चाहिए... मिसाल के तौर पर...

हमारे घर के पास एक सरकारी स्कूल है... अकसर उसका नल ख़राब रहता है... स्कूल में पीने साफ़ पानी का भी कोई इंतज़ाम नहीं है... पानी की जो टंकी है, उसकी भी सफ़ाई नहीं होती... तपती गरमी के मौसम में बच्चों को बहुत परेशानी होती है... हमने अपने घर के आगे सड़क पर एक नल लगवाया... पहले घर के अंदर नल लगा था, लेकिन उसमें रेत आने लगा था, कई बार ठीक कराने के बावजूद जब रेत आना बंद नहीं हुआ, तो उसे बंद करवाकर बाहर नल लगवा लिया... आसपास से बहुत लोग पानी भरने आते थे...  स्कूल के बच्चे भी यहां आने लगे... मगर कुछ वक़्त बाद यह नल भी खराब हो गया... एक दिन अम्मी ने बच्चों को मायूस लौटते देख, उनसे रुकने को कहा और फ़्रिज से ठंडा पानी लाकर उन्हें पिला दिया... अब हर रोज़ बच्चे आने लगे... स्कूल के अलावा सड़कों पर काग़ज़ बीनने वाले बच्चे भी दरवाज़ा खटखटाकर पानी और खाना मांग लेते हैं...

हमारी चार साल की भतीजी भी जब बच्चों को देखती है, तो पानी की बोतल लेकर दौड़ती है... कहते हैं कि बच्चे अपने बड़ों से ही सीखते हैं... हमारी भी एक आदत रही है, कहीं से आते हैं, तो आटो या रिक्शेवाले से पानी को ज़रूर पूछते हैं...

इलाक़े के एक-दो घरों के लोग बर्फ़ भी ले जाते हैं... हालांकि अब घर-घर फ़्रिज हैं, लेकिन अब भी सब लोगों के पास फ़्रिज नहीं हैं... पहले तो ऐसा बहुत होता था कि एक के घर फ़्रिज आया, तो आसपास के लोग बर्फ़ ले जाते थे...
अम्मी जान कई बर्तनों में बर्फ़ जमाती हैं, ताकि किसी को को ख़ाली हाथ न लौटना पड़े... एक रोज़ अम्मी से एक पड़ौसन ने कहा कि हमारे बस का नहीं ये सब... कौन रोज़-रोज़ अपने दरवाज़े पर भीड़ लगाए... हम तो साफ़ मना कर देते हैं... ख़ैर, ये उनकी अपनी सोच है... ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है...

ये सब लिखने का हमारा मक़सद ये है कि अगर हमारे आसपास ऐसे लोग हैं, जिनकी हम किसी भी तरह कोई मदद कर सकते हैं, तो हमें उनकी मदद करनी चाहिए...

Friday, May 5, 2017

कांग्रेस की संजीवनी सोनिया ने आस बांधी

फ़िरदौस ख़ान
अवाम के दिलों पर राज करने वाली कांग्रेस को इस वक़्त सोनिया गांधी की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है.  इतिहास गवाह है कि जब भी कांग्रेस पर कोई मुसीबत आई है, तो सोनिया गांधी ढाल बनकर खड़ी हो गईं. देश के लिए, देश की अवाम के लिए, पार्टी के लिए सदैव उन्होंने क़ुर्बानियां दी हैं. देश की हुकूमत उनके हाथ में थी, प्रधानमंत्री का पद उनके पास था, वे चाहतीं, तो प्रधानमंत्री बन सकती थीं. अपने बेटे राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बना सकती थीं, लेकिन उन्होंने ऐसा बिल्कुल नहीं किया. उन्होंने डॊ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया और उनकी अगुवाई में भारत दुनिया में एक बड़ी ताक़त बनकर उभरा.

फिर से कांग्रेस को संकट में देखकर पिछले काफ़ी अरसे से पार्टी से दूर रही पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सियासत में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है. फ़िलहाल वे राष्ट्रपति चुनाव को लेकर विपक्ष को एकजुट करने की क़वायद में जुटी हैं.  दरअसल, वह भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ एक मज़बूत गठजोड़ बनाना चाहती हैं. इसके लिए वे विपक्षी दलों के नेताओं से मुलाक़ात कर रही हैं.  क़ाबिले-ग़ौर है कि जब-जब कांग्रेस पर संकट के बादल मंडराये, तब-तब सोनिया गांधी ने आगे आकर पार्टी को संभाला. उन्होंने कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाने के लिए देशभर में रोड शो किए. आख़िरकार उनकी अगुवाई में कांग्रेस ने साल 2004 और 2009  का आम चुनाव जीतकर केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की हुकूमत क़ायम की थी. इस दौरान देश के कई राज्यों में कांग्रेस सत्ता में आई. लेकिन जब से अस्वस्थता की वजह से सोनिया गांधी की सियासत में सक्रियता कम हुई है, तब से पार्टी पर संकट के बादल मंडराने लगे. साल 2014 में केंद की हुकुमत गंवाने के बाद कांग्रेस ने कई राज्यों की सत्ता भी खो दी. सोनिया गांधी की सेहत को देखते हुए उनके बेटे राहुल गांधी को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया और पार्टी की अहम ज़िम्मेदारी उन्हें सौंपी गई. राहुल गांधी ने ख़ूब मेहनत भी की, लेकिन उन्हें वह कामयाबी नहीं मिल पाई, जिसकी उनसे उम्मीद की जा रही थी. राहुल गांधी अभी कांग्रेस के अध्यक्ष नहीं बने हैं, लेकिन उनकी कार्यशैली की तुलना सोनिया गांधी की कार्यशैली से की जाने लगी है. जानकारों का मानना है कि जहां सोनिया गांधी अपनी टीम के सदस्यों को उनकी तरह से काम करने की पूरी छूट देती हैं, वही राहुल गांधी ऐसा नहीं करते. दरअसल, काम करने का सबका अपना एक तरीक़ा होता है. फ़िलहाल राहुल गांधी पार्टी के संगठनात्मक चुनाव के मद्देनज़र नई टीम बनाने के काम में लगे हैं. उन पर दोहरी ज़िम्मेदारी है. एक तरफ़ उन्हें पार्टी को मज़बूत बनाना है और दूसरी तरफ़ खोयी हुई हुकूमत को हासिल करना है. इस साल 31 दिसंबर तक कांग्रेस के आंतरिक चुनाव होने हैं. साल 2019 में लोकसभा चुनाव होने हैं. इससे पहले दस राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे, जिनमें हिमाचल प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, मेघालय, मिज़ोरम, त्रिपुरा और नगालैंड शामिल हैं. इस वक़्त हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, मेघालय और मिज़ोरम में कांग्रेस सत्ता में है. गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है. कांग्रेस गुजरात, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में लंबे अरसे से सत्ता से बाहर है और इन राज्यों में उसे भारतीय जनता पार्टी से कड़ा मुक़ाबला करना है. बहरहाल, राहुल गांधी संगठन को मज़बूत करने में जुटे हैं, तो सोनिया गांधी राष्ट्रपति चुनाव के बहाने विपक्ष को एक मंच पर लाना चाहती हैं.

ग़ौरतलब है कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल आगामी 24 जुलाई को ख़त्म हो रहा है और इससे पहले ही चुनाव कराए जाने हैं. राष्ट्रपति के चुनाव के मामले में सियासी समीकरण भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में हैं. इसलिए यह कहना ग़लत न होगा कि अगला राष्ट्रपति वही होगा, जिसे भारतीय जनता पार्टी पसंद करेगी. एक आकलन के मुताबिक़ 23 सियासी दलों वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पास राष्ट्रपति चुनाव से संबंधित निर्वाचक मंडल में तक़रीबन 48.64 फ़ीसद मत हैं. इसके मुक़ाबले में कांग्रेस की अगुवाई वाले विपक्ष के साथ जाने वाले 23 सियासी दलों के संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के पास महज़ 35.47 फ़ीसद मत हैं. इनके अलावा तमिलनाडु की अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके),  ओडिशा की बीजू जनता दल (बीजेडी),  आंध्र प्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (वाईएसआरसीपी), दिल्ली की आम आदमी पार्टी और हरियाणा के इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) का निर्वाचक मंडल में तक़रीबन 48.64 फ़ीसद मत हैं. इसके अलावा भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी पार्टी शिवसेना भी बहुत अहम मानी जा रही है. यह भारतीय जनता पार्टी के लिए परेशानी का सबब बन सकती है, जो कांग्रेस के लिए फ़ायदेमंद है. सनद रहे, शिवसेना ने कांग्रेस की तरफ़ से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार प्रतिभा पाटिल और प्रणब मुखर्जी को अपना समर्थन दिया था.

इसके विपरीत अगर भाजपा इन पार्टियों में से कुछ को भी अपने साथ शामिल करने में सफल होती है उसकी राह आसान हो जाएगी। एनडीए को सिर्फ एक या दो पार्टियों के समर्थन की जरूरत होगी। भाजपा इस समय सत्ता में है इसलिए उसे चुनावी नतीजे अपने पक्ष में करने के लिए ज्यादा परेशानी नहीं होगी। गौरतलब है कि भाजपा की प्रमुख सहयोगी शिवसेना इससे पहले दो बार भाजपा का खेल बिगाड़ चुकी है पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल और प्रणव मुखर्जी को शिवसेना ने अपना समर्थन दिया था। हालांकि इस बार बजट सत्र के दौरान एनडीए ने राष्ट्रपति चुनाव से पहले एकता दिखाई।

दरअसल, राष्ट्रपति चुनाव में लोकसभा, राज्यसभा और विधान सभाओं के सभी सदस्य वोट देते हैं. इन सबको मिलाकर ही राष्ट्रपति पद के चुनाव का निर्वाचक मंडल बनता है. इसमें कुल 784 सांसद और 4114 विधायक हैं. इस कॉलेज में मतदाताओं के वोट की वैल्यू अलग-अलग होती है. सांसद के मत की वैल्यू निकालने के लिए सबसे पहले सभी राज्यों की विधानसभा के चुने गए सदस्यों के मतों की वैल्यू जोड़ी जाती है. इसके बाद राज्यसभा और लोकसभा के चुने गए सदस्यों की कुल संख्या से भाग दिया जाता है. इसके बाद जो अंक मिलते हैं, वे एक सांसद के वोट की वैल्यू होते हैं. हर सांसद के मत की वैल्यू 708 है, जबकि विधायक के वोट की वैल्यू संबंधित राज्य की विधानसभा की सदस्य संख्या और उस राज्य की आबादी पर आधारित होती है, यानी जिस प्रदेश का विधायक है, उसकी आबादी देखी जाती है. इसके साथ उस प्रदेश के विधानसभा सदस्यों की संख्या को भी मद्देनज़र रखा जाता है. प्रदेश की आबादी को चुने गए विधायकों की संख्या से बांटा जाता है. इस तरह जो भी अंक मिलते हैं, उसे फिर एक हज़ार से भाग दिया जाता है. फिर जो अंक सामने आता है, वह उस प्रदेश के विधायक के वोट की वैल्यू होता है. एक हज़ार से भाग देने पर अगर बाक़ी पांच सौ से ज़्यादा हों, तो वैल्यू में एक जोड़ दिया जाता है. इस हिसाब से उत्तर प्रदेश के हर विधायक के वोट की वैल्यू सबसे ज़्यादा 208 है, जबकि सिक्किम के हर विधायक के वोट की वैल्यू सबसे कम सात है.

देश में राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मंडल के ज़रिये होता है. इसमें जनता अपना राष्ट्रपति नहीं चुनती, लेकिन जनता के चुने प्रतिनिधि मतदान करते हैं. ख़ास बात यह भी है कि राष्ट्रपति द्वारा संसद में नामित सदस्य वोट तथा राज्यों की विधान परिषदों के सदस्य मतदान नहीं कर सकते, क्योंकि इन्हें जनता ने चुना है. निर्वाचक मंडल के सदस्यों का प्रतिनिधित्व अनुपातिक भी होता है. मतदाता वोट तो एक ही देता है, लेकिन वह राष्ट्रपति चुनाव में हिस्सा ले रहे सभी उम्मीदवारों में से अपनी पसंद तय कर देता है यानी उसकी पहली, दूसरी और तीसरी पसंद कौन है. अगर पहली पसंद वाले उम्मीदवार के मतों से कोई उम्मीदवार नहीं जीतता, तो उम्मीदवार के खाते में मतदाता की दूसरी पसंद को नये सिंगल वोट की तरह ट्रांसफ़र किया जाता है.

अगर सोनिया गांधी इन दलों को कांग्रेस के साथ लाने में कामयाब हो जाती हैं, तो कांग्रेस का मत फ़ीसद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के मुक़ाबले का हो जाएगा. ऐसे में मुक़ाबला रोचक और कांटे का होगा. इसके साथ-साथ पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भी भर जाएगा. साल 2014 के आम चुनाव के बाद से कांग्रेस को कोई ख़ास कामयाबी नहीं मिली. लगातार सत्ता से दूर रहने, विभिन्न चुनावों में हार और पार्टी की आंतरिक कलह की वजह से पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटने लगा था. लेकिन अब सोनिया गांधी के सक्रिय होने से कार्यकर्ताओं में नये जोश का संचार होगा.