Sunday, August 6, 2017

ये लोकतंत्र पर हमला है

फ़िरदौस ख़ान
गुजरात में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की कार पर किए गए हमले को किसी भी सूरत में हल्के में नहीं लिया जा सकता है. यह हमला कई सवाल खड़े करता है. यह हमला एक पार्टी विशेष के नेता पर किया गया हमला नहीं है. दरअसल, यह फ़ासीवादी ताक़तों द्वारा लोकतंत्र पर किया गया हमला है. यह हमला इस बात का सबूत है कि शासन-प्रशासन कितना नाकारा है.  कितना डरा हुआ है. विशेष सुरक्षा बल की तैनाती के बावजूद कुछ लोग काले झंडे लेकर मोदी-मोदी के नारे लगाते हुए आते हैं और फिर अचानक राहुल गांधी की कार पर पत्थरों से हमला बोल देते हैं.
यह हमला उस वक़्त हुआ, जब राहुल गांधी गुजरात के बाढ़ प्राभावित ज़िले बनासकांठा के धनेरा में पीड़ितों से मिलकर लौट रहे थे. वे कार की अगली सीट पर बैठे थे.  उनकी कार पर एक बड़ा पत्थर फेंका गया, जिससे गाड़ी का शीशा चकनाचूर हो गया. कार में पिछली सीट पर बैठे एसपीगी कमांडो को चोट आई. हमले से पहले राहुल गांधी को काले झंडे दिखाए गए. उनके सामने लोगों ने मोदी-मोदी के नारे भी लगाए. इसके बावजूद राहुल गांधी ने कहा कि उन्हें आने दो, ये काले झंडे यहां लगाने दो, ये लोग घबराए हुए लोग हैं. हमें इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. हमले के बाद राहुल गांधी ने कहा कि ऐसे हमलों से उनकी आवाज़ दबाई नहीं जा सकती. मैं इन काले झंडे दिखाने वालों से डरने वाला नहीं हूं. मैं आप सभी के बीच आना चाहता था और कहना चाहता था कि कांग्रेस पार्टी आपके साथ है. उनके दफ़्तर की तरफ़ किए गए ट्वीट में कहा गया है कि नरेंद्र मोदी जी के नारों से, काले झंडों से और पत्थरों से हम पीछे हटने वाले नहीं हैं, हम अपनी पूरी ताक़त लोगों की मदद करने में लगाएंगे. उन्होंने ऐसा किया भी.
राहुल गांधी हमले से ज़रा भी विचलित नहीं हुए और गुजरात के बाढ़ प्रभावित इलाक़ों के हवाई दौरे के लिए निकल गए. राहुल गांधी पर हमला करने वाले शायद यह भूल गए हैं कि वे उस शख़्स को डराने की कोशिश कर रहे हैं, जिसकी रगों में शहीदों का ख़ून है. उनके पूर्वजों ने इस देश के लिए अपनी जानें क़ुर्बान की हैं. इस देश की माटी उन कांग्रेस नेताओं की ऋणी है, जिन्होंने अपने ख़ून से इस धरती को सींचा है. देश की आज़ादी में महात्मा गांधी के योगदान को भला कौन भुला पाएगा. देश को आज़ाद कराने के लिए उन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी समर्पित कर दी. पंडित जवाहरलाल नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी, श्री राजीव गांधी और श्रीमती सोनिया गांधी ने देश के लिए, जनता के लिए बहुत कुछ किया. पंडित जवाहर लाल नेहरू ने विकास की जो बुनियाद रखी, इंदिरा गांधी ने उसे परवान चढ़ाया. श्री राजीव गांधी ने देश के युवाओं को आगे बढ़ने की राह दिखाई. उन्होंने युवाओं के लिए जो ख़्वाब संजोये, उन्हें साकार करने में श्रीमती सोनिया गांधी ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी.

राहुल गांधी भी लोगों की मदद करने से कभी पीछे नहीं रहते. इस मामले में वह अपनी सुरक्षा की ज़रा भी परवाह नहीं करते. एक बार वह अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी से लौट रहे थे. रास्ते में उन्होंने एक ज़ख़्मी व्यक्ति को सड़क पर तड़पते देखा, तो क़ाफ़िला रुकवा लिया. उन्होंने एंबुलेंस बुलवाई और ज़ख़्मी व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाया. उन्होंने विधायक और पार्टी प्रवक्ता को उसके इलाज की ज़िम्मेदारी सौंपी. इस दौरान सुरक्षा की परवाह किए बिना वह काफ़ी देर तक सड़क पर खड़े रहे.
राहुल गांधी जब पीड़ितों से मिलने सहारनपुर पहुंचे, तो वहां एक बच्चा भी था. उन्होंने उस बच्चे को अपनी गोद में बिठा लिया. उन्होंने बच्चों से प्यार से बातें कीं और फिर घटना के बारे में पूछा. इस पर बच्चे ने कहा कि अंकल हमारा घर जल गया है, बस्ता भी जल गया और सारी किताबें भी जल गईं. घर बनवा दो, नया बस्ता और किताबें दिलवा दो. इस पर राहुल गांधी ने एक स्थानीय कांग्रेस नेता को उस बच्चे का घर बनवाकर देने और नया बस्ता व किताबें दिलाने की ज़िम्मेदारी सौंप दी. वे मध्य प्रदेश के मंदसौर में भी पीड़ित किसानों से मिलने पहुंच गए. शासन-प्रशासन से उन्हें किसानों से मिलने से रोकने के लिए भरपूर कोशिश कर ली, लेकिन वे भी किसानों से मिले बिना दिल्ली नहीं लौटे, भले उन्हें गिरफ़्तार होना पड़ा. वे आक्रामक रुख़ अख्तियार करते हुए कहते हैं, मोदी किसानों का क़र्ज़ नहीं माफ़ कर सकते, सही रेट और बोनस नहीं दे सकते, मुआवज़ा नहीं दे सकते, सिर्फ़ किसानों को गोली दे सकते हैं.

राहुल गांधी का कहना है कि उनके क़ाफ़िले पर भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने हमला किया. ये हमला एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत किया गया. उन्होंने कहा, ''एक बड़ा पत्थर बीजेपी कार्यकर्ता ने मेरी ओर मारा, मेरे पीएसओ को लगा.'' उन्होंने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनकी पार्टी की राजनीति का तरीक़ा बताया. उन्होंने कहा, ''मोदी जी और बीजेपी-आरएसएस का राजनीति का तरीक़ा है. क्या कह सकते हैं.'' भाजपा की तरफ़ से हादसे को लेकर आ रही प्रतिक्रिया पर राहुल गांधी ने कहा कि जब उन्होंने खुद इस तरह की चीज़ें की हों, तो वे इसकी निंदा कैसे कर सकते हैं. यह काम उनके लोगों ने किया है तो वे इसकी भर्त्सना कैसे करेंगे.

राहुल गांधी पर हमले के बाद कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी की सरकार पर सवाल खड़े किए हैं. कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल का कहना है कि यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है. यह सबकुछ पहले से तयशुदा साज़िश के तहत हुआ है. राहुल गांधी को इतनी ज़्यादा सुरक्षा मिली हुई है, इसके बावजूद यह हमला होना सवाल खड़ा करता है. सरकार ने पहले से कोई इंतज़ाम नहीं किए, यह हमला रोका जा सकता था. भाजपा के लोगों ने हमला किया. राहुल गांधी के दौरे से भाजपा सरकार डर गई है.
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद का कहना है कि राहुल गांधी पर जानलेवा हमला किया गया है.  उन्होंने कहा कि जिस पत्थर से हमला किया गया है वह सीमेंट और पत्थर से बना था. जो वहां कहीं और से लाया गया था. राहुल गांधी को निशाना बनाकर पत्थर फेंके गए हैं. उन्होंने कहा कि भाजपा इन कामों के लिए हमेशा से मशहूर रही है. गांधी जी से लेकर अब तक हम देखते आ रहे हैं.
वहीं कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने राहुल गांधी पर हुए हमले की आलोचना करते हुए कहा कि क्या हम इस लोकतंत्र में ऐसी जगह पहुंच रहे हैं, जहां राजनीतिक विरोधियों को लोकतांत्रिक राजनीति की इजाज़त नहीं दी जाएगी? उन्होंने तल्ख़ लहजे में कहा, "बीजेपी के गुंडों ने राहुल गांधी पर सीमेंट की ईंटों से हमला किया. उनके साथ चलने वाली एसपीजी को भी हल्की चोटें आई हैं. इसकी चौतरफ़ा निंदा की जानी चाहिए." कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने भी राहुल पर हमले की कड़ी निंदा करते हुए कहा, 'बीजेपी के गुंडों ने गुजरात में बनासकांठा के धनेरा में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर हमला किया है. यह बेहूदा और शर्मनाक हरकत है. बीजेपी सरकार अब किस हद की राजनीति पर उतर आई है? राहुल गांधी की गाड़ी पर हमला करने दिया गया. इसकी कड़े शब्दों में निंदा की जानी चाहिए. कांग्रेस उपाध्यक्ष ठीक हैं, लेकिन उनके साथ के लोगों को चोटें आई हैं. बीजेपी के गुंडे हमें नुक़सान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हम और मज़बूत होकर उभरेंगे.'
उधर, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता डी राजा ने भी राहुल गांधी पर हमले की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि यह हमला बीजेपी शासित राज्य में हुआ है, इसलिए बीजेपी को जवाब देना होगा.

कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी एक ऐसी शख़्सियत के मालिक हैं, जिनसे कोई भी मुतासिर हुए बिना नहीं रह सकता. देश के प्रभावशाली राज घराने से होने के बावजूद उनमें ज़र्रा भर भी ग़ुरूर नहीं है.  उनकी भाषा में मिठास और मोहकता है, जो सभी को अपनी तरफ़ आकर्षित करती है. वे विनम्र इतने हैं कि अपने विरोधियों के साथ भी सम्मान से पेश आते हैं, भले ही उनके विरोधी उनके लिए कितनी ही तल्ख़ भाषा का इस्तेमाल क्यों न करते रहें. किसी भी हाल में वे अपनी तहज़ीब से पीछे नहीं हटते. पिछले साल दिसंबर में उत्तर प्रदेश के जौनपुर में कांग्रेस की चुनावी जनसभा में मोदी मुर्दाबाद के नारे लगे, तो राहुल गांधी ने कहा कि ऐसा मत कीजिए. ये कांग्रेस की जनसभा है और यहां मुर्दाबाद लफ़्ज़ का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए. नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं, उनसे हमारी सियासी लड़ाई है. लेकिन मुर्दाबाद बोलना हमारा काम नहीं है, ये बीजेपी और आरएसएस वाले लोगों का काम है.
राहुल गांधी ख़ुशमिज़ाज, ईमानदार, मेहनती और सकारात्मक सोच वाले हैं.  आज देश को उनके जैसे ही नेता की बेहद ज़रूरत है. वे मुल्क की अवाम की उम्मीद हैं. हिन्दुस्तान की उम्मीद हैं. उनके विरोधी उनसे ख़ौफ़ खाते हैं, तभी उन्हें झुकाने के लिए बरसों से उनके ख़िलाफ़ साज़िशें रच रहे हैं.

राहुल गांधी छल और फ़रेब की राजनीति नहीं करते. वे कहते हैं,  ''मैं गांधीजी की सोच से राजनीति करता हूं. अगर कोई मुझसे कहे कि आप झूठ बोल कर राजनीति करो, तो मैं यह नहीं कर सकता. मेरे अंदर ये है ही नहीं. इससे मुझे नुक़सान भी होता है. 'मैं झूठे वादे नहीं करता. "  वे कहते हैं, 'सत्ता और सच्चाई में फ़र्क़ होता है. ज़रूरी नहीं है, जिसके पास सत्ता है उसके पास सच्चाई है. गुजरात में एक आयोजित एक रैली में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मासिक रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' पर तंज़ करते हुए कहते हैं, अगर कांग्रेस चुनाव जीतती है, तो हमारी सरकार हर किसी के लिए होगी न कि केवल एक व्यक्ति के लिए. अपने 'मन की बात' कहने के बजाय हमारी सरकार आपके मन की बात सुनने का प्रयास करेगी.

वे कहते हैं, "जब भी मैं किसी देशवासी से मिलता हूं. मुझे सिर्फ़ उसकी भारतीयता दिखाई देती है. मेरे लिए उसकी यही पहचान है. अपने देशवासियों के बीच न मुझे धर्म, ना वर्ग, ना कोई और अंतर दिखता है."  क़ाबिले-ग़ौर है कि एक सर्वे में विश्वसनीयता के मामले में दुनिया के बड़े नेताओं में राहुल गांधी को तीसरा दर्जा मिला हैं, यानी दुनिया भी उनकी विश्वसनीयता का लोहा मानती है.
उधर गुजरात के उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल का कहना है कि राहुल गांधी को बुलेट प्रूफ़ कार ऒफ़र की गई थी, इसके बावजूद वे पार्टी की कार से गए.  राहुल गांधी की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी केंद्र और राज्य सरकार की है. इस मामले में सरकार पूरी तरह नाकाम रही है, हमलावर सत्ताधारी पार्टी के ही पदाधिकारी हैं, इसलिए इसमें गहरी साज़िश से इंकार नहीं किया जा सकता.

राहुल गांधी पर किया गया हमला यह साबित करता है कि आने वाला वक़्त कांग्रेस का है. आज़ादी के बाद से देश में सबसे ज़्यादा वक़्त तक हुकूमत करने वाली कांग्रेस के लोकसभा में भले ही 44 सांसद हैं, लेकिन कई मामलों में वे भारतीय जनता पार्टी के 282 सांसदों पर भारी पड़े हैं. सत्ताधारी पार्टी ने कई बार ख़ुद कहा है कि कांग्रेस के सांसद उसे काम नहीं करने दे रहे हैं.
भारत एक लोकतांत्रिक देश है. क्या इस देश में किसी सियासी पार्टी को इतना भी हक़ नहीं है कि वे पीड़ित लोगों से मिल सके. आख़िर देश किस दिशा में जा रहा है.
बहरहाल, अंधेरा कितना ही घना क्यों न हो, सुबह को आने से नहीं रोक सकता.

Wednesday, July 19, 2017

सिर्फ़ अपनी पीठ न थपथपाये सरकार

फ़िरदौस ख़ान
देश में आज भी छोटे-बड़े क़स्बों और गांव-देहात में पारंपरिक चूल्हे पर खाना पकाया जाता है. इनमें लकड़ियां और उपले जलाए जाते हैं. इसके अलावा अंगीठी का भी इस्तेमाल किया जाता है. अंगीठी में लकड़ी और पत्थर के कोयले जलाए जाते हैं. लकड़ी के बुरादे, काठी और तेंदुए के पत्तों से भी अंगीठी दहकाई जाती है. ऐसी अंगीठियां अमूमन उन इलाक़ों में देखने को मिलती हैं, जहां कपास उगाई जाती है और बीड़ी बनाने का काम होता है. आदिवासी इलाक़ों और गांव-देहात में पुरुष, महिलाएं और बच्चे तक जंगल से जलावन इकट्ठा करके लाते हैं.
दुनिया की तकरीबन आधी आबादी आज भी घरों के भीतर पारंपरिक चूल्हों पर खाना पकाती है. भारत में भी तक़रीबन 50 करोड़ लोग इन्हीं चूल्हों का इस्तेमाल करते हैं. चूल्हे के धुएं से खाना पकाने वाली महिलाएं आंखों में जलन, हृदय और फेफड़ों की बीमारियों की शिकार हो जाती हैं. बीमारी गंभीर होने पर उनकी मौत तक हो जाती है. ऐसा नहीं है कि महिलाएं ही चूल्हे के धुएं से प्रभावित हैं. घर के पुरुष और बच्चे भी घरेलू वायु प्रदूषण की चपेट में आ जाते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ घरेलू वायु प्रदूषण की वजह से भारत में हर साल तक़रीबन 15 लाख लोगों की मौत होती हैं.

भारत में महिलाओं को पारंपरिक चूल्हे के धुएं से होने वाली परेशानी से बचाने के लिए केंद्र सरकार ने रसोई गैस के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया. लेकिन रसोई गैस कनेक्शन महंगा होने की वजह से ग़रीब लोग चाहकर भी इसे इस्तेमाल में नहीं ला पाए. इसके बाद ग़रीब परिवारों को मुफ़्त  रसोई गैस कनेक्शन देने की योजना आई. ग़ौरतलब है कि प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना 1 मई 2016 को उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले में शुरू की गई थी. इसका मकसद तीन साल के भीतर ग़रीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों की पांच करोड़ महिलाओं को मुफ़्त रसोई गैस के कनेक्‍शन मुहैया कराना है. इसके लिए सरकार 1,600 रुपये प्रति गैस कनेक्शन की दर से अनुदान दे रही है. सरकार ने इसके लिए 8,000 करोड़ रुपये का आवंटन किया है. इस योजना के तहत परिवार की महिला मुखिया के नाम से गैस कनेक्शन दिया जाता है. पिछले शनिवार को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत पश्चिम बंगाल में अपने गृह ज़िले जांगीपुर में आयोजित कार्यक्रम में ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाली महिला गौरी सरकार को मुफ़्त रसोई गैस कनेक्शन प्रदान किया. इसके साथ ही ग़रीब परिवार की महिलाओं को मुफ़्त रसोई गैस कनेक्शन देने की इस योजना के लाभार्थियों की तादाद ढाई करोड़ तक पहुंच गई.
इस योजना के प्रचार-प्रसार पर सरकार पानी की तरह पैसा बहा रही है. सरकार ज़्यादा से ज़्यादा कनेक्शन बांटकर अपनी पीठ थपथपाने को बेचैन दिख रही है. इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है कि जिन महिलाओं को मुफ़्त गैस कनेक्शन दिए गए हैं, क्या उन्होंने दोबारा सिलेंडर ख़रीदा भी है या नहीं ?

क़ाबिले-ग़ौर यह भी है कि जिन लोगों के पास रसोई गैस कनेक्शन है, उन्हें भी अकसर शासाअन-प्रशासन से अनेक शिकायतें रहती हैं. गैस उपभोक्ताओं को सिलेंडर बुक कराने के बाद कई-कई दिन तक सिलेंडर नहीं मिलता. गैस एजेंसी के बाहर उपभोक्ताओं की लंबी-लंबी क़तारें देखा जा सकती हैं. लोग अपने काम-धंधे छोड़कर झुलसती गरमी में घंटों क़तार में लगे रहते हैं. फिर भी बहुत लोगों को सिलेंडर नहीं मिलता. उनसे कह दिया जाता है कि सिलेंडर ख़त्म हो गए, पीछे से गैस नहीं आ रही है, गैस की क़िल्लत चल रही है, वग़ैरह-वग़ैरह. लेकिन कालाबाज़ारी में कभी गैस की क़िल्लत नहीं होती, ज़्यादा दाम चुकाओ, जितने चाहे सिलेंडर ख़रीदो. गैस एजेंसी के गोदामों से काला बाज़ार के माफ़िया तक पहुंच जाती है और उपभोक्ता गैस के लिए परेशान होते रहते हैं.

एक तरफ़ उपभोक्ता रसोई गैस को तरस रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ घरेलू रसोई गैस व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में ख़ूब इस्तेमाल हो रही है. नियम के मुताबिक़ होटल, रेस्त्रां या व्यवसायिक प्रतिष्ठान के घरेलू रसोई गैस का इस्तेमाल करने पर संबंधित प्रतिष्ठान के ख़िलाफ़ आवश्यक वस्तु अधिनियम के अलावा अन्य सुसंगत धाराओं के तहत कार्रवाई करने का प्रावधान है. इसके अलावा छोटे सिलेंडरों का बाज़ार भी बड़ा है. बड़े सिलेंडरों से छोटे सिलेंडरों में गैस भरकर मनचाहे दामों पर गैस बेची जाती है. जिनके पास बड़े सिलेंडर नहीं हैं, वे लोग पांच किलो वाले सिलेंडर में गैस भरवाकर ही अपना चूल्हा जला लेते हैं. रौशनी के लिए भी छोटे गैस सिलेंडर इस्तेमाल किए जाते हैं. गैस भरने का यह काम ख़तरनाक है. अकसर इसकी वजह से आगज़नी जैसे हादसे भी हो जाते हैं, लेकिन इससे न तो गैस कारोबारी सबक़ लेते हैं और न ही शासन-प्रशासन इस बारे में कोई सख़्त क़दम उठाता है. ये काम प्रशासन की नाक के नीचे सरेआम भी किया जाता है और चोरी-छुपे भी किया जाता है.

इतना ही नहीं तेल कंपनियों के तमाम दावों के बावजूद सिलेंडर में गैस में कम होने के मामले भी थमने का नाम नहीं ले रहे हैं. हालत यह है कि गैस सिलेंडरों में एक से दो किलो तक गैस कम निकल रही है. अमूमन भरे हुए रसोई गैस सिलेंडर का वज़न 30 किलो होता है इसमें 15.8 किलो वज़न सिलेंडर का और 14.2 किलो वज़न गैस का होता है. यह जानकारी सिलेंडर पर लिखी होती है. सिलेंडर में गैस निकालकर वज़न पूरा करने के लिए पानी डाले जाने के मामले भी सामने आते रहते हैं. सिलेंडर में पानी डालने से वह ज़ंग पकड़ लेता है, जिससे कभी भी होई भी हादसा हो सकता है. शिकायत करने पर गैस एजेंसी संचालक अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की कोशिश करते हैं. अकसर जवाब मिलता है कि एजेंसी से सही सिलेंडर भेजा गया है. अगर ऐसा भी है, तो घर तक सही सिलेंडर पहुंचाने की ज़िम्मेदारी गैस एजेंसी की है. दरअसल, देश में शासन-प्रशासन की लापरवाही और उपभोक्ता में जागरुकता की कमी की वजह से तेल कंपनियां और गैस एजेंसी संचालक अपनी मनमानी करते हैं. और इसका ख़ामियाज़ा उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ता है.

सरकार योजनाएं शुरू तो कर देती है, लेकिन उसके सही कार्यान्वयन पर ध्यान नहीं देती. इसीलिए न जाने कितनी योजनाएं सरकारी क़ाग़ज़ों तक ही सिमट कर रह जाती हैं. अगर सरकार ईमानदारी से चाहती है कि महिलाएं रसोई गैस का इस्तेमाल करें, तो उसे इस योजना के हर पहलू पर ग़ौर करना होगा. सिर्फ़ सिलेंडर बांटने से ही महिलाओं की रसोई बदलने वाली नहीं है. इस बात का भी ख़्याल रखना होगा कि महिलाएं गैस सिलेंडर का ख़ुद इस्तेमाल करें न कि कोई और. इसके लिए यह भी बेहद ज़रूरी है कि गैस के दाम इतने ज़्यादा न बढ़ा दिए जाएं कि वे लोगों की पहुंच से दूर हो जाएं.

Saturday, July 1, 2017

बयानबाज़ी नहीं, कार्रवाई होनी चाहिए

फ़िरदौस ख़ान
गंगा-जमुनी तहज़ीब हमारे देश की रूह है. संतों-फ़क़ीरों ने इसे परवान चढ़ाया है. प्रेम और भाईचारा इस देश की मिट्टी के ज़र्रे-ज़र्रे में है.  कश्मीर से कन्याकुमारी तक हमारे देश की संस्कृति के कई इंद्रधनुषी रंग देखने को मिलते हैं. प्राकृतिक तौर पर विविधता है, कहीं बर्फ़ से ढके पहाड़ हैं, कहीं घने जंगल हैं, कहीं कल-कल करती नदियां हैं, कहीं दूर-दूर तक फैला रेगिस्तान है, तो कहीं नीले समन्दर का चमकीला किनारा है. विभिन्न इलाक़ों के लोगों की अपनी अलग संस्कॄति है, अलग भाषा है, अलग रहन-सहन है और उनके खान-पान भी एक-दूसरे से काफ़ी अलग हैं. इतनी विभिन्नता के बाद भी सबमें एकता है, भाईचारा है, समरसता है. लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते हैं. देश के किसी भी इलाक़े में कोई मुसीबत आती है, तो पूरा देश इकट्ठा हो जाता है. कोने-कोने से मुसीबतज़दा इलाक़े के लिए मदद आने लगती है. मामला चाहे, बाढ़ का हो, भूकंप का हो या फिर कोई अन्य हादसा हो. सबके दुख-सुख सांझा होते हैं.

कितने अफ़सोस की बात है कि पिछले तीन सालों में कई ऐसे वाक़ियात हुए हैं, जिन्होंने सामाजिक समरस्ता में ज़हर घोलने की कोशिश की है, सांप्रदायिक सद्भाव को चोट पहुंचाने की कोशिश की है. अमीर और ग़रीब के बीच की खाई को और गहरा करने की कोशिश की है, मज़हब के नाम पर लोगों को बांटने की कोशिश की है, जात-पांत के नाम पर एक-दूसरे को लड़ाने की कोशिश की है. इसके कई कारण हैं, मसलन अमीरों को तमाम तरह की सुविधाएं दी जा रही हैं, उन्हें टैक्स में छूट दी जा रही है, उनके टैक्स माफ़ किए जा रहे हैं, उनके क़र्ज़ माफ़ किए जा रहे हैं. ग़रीबों पर नित-नये टैक्स का बोझ डाला जा रहा है. आए-दिन खाद्यान्न और रोज़मर्रा में काम आने वाली चीज़ों के दाम बढ़ाए जा रहे हैं. ग़रीबों की थाली से दाल तक छीन ली गई. हालत यह है कि अब उनकी जमा पूंजी पर भी आंखें गड़ा ली गई हैं. पाई-पाई जोड़ कर जमा किए गए पीएफ़ और ईपीफ़ पर टैक्स लगा कर उसे भी हड़प लेने की साज़िश की गई. नौकरीपेशा लोगों के लिए पीएफ़ और ईपीएफ़ एक बड़ा आर्थिक सहारा होता है. मरीज़ों को भी नहीं बख़्शा जा रहा है. दवाओं यहां तक कि जीवन रक्षक दवाओं के दाम भी बहुत ज़्यादा बढ़ा दिए गए हैं, ऐसे में ग़रीब मरीज़ अपना इलाज कैसे करा पाएंगे. इसकी सरकार को कोई फ़िक्र नहीं है.  नोटबंदी कर लोगों का जीना मुहाल कर दिया. नोट बदलवाने के लिए लोग कड़ाके की ठंड में रात-रात भर बैंकों के आगे सड़कों पर खड़े रहे. क़तारों में लगे-लगे कई लोगों की जान तक चली गई. किसानों की तरफ़ कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा. गले तक क़र्ज़ में डूबे किसान आत्महत्या कर रहे हैं. अपने अधिकारों के लिए आंदोलन करने वाले किसानों पर गोलियां दाग़ी जा रही हैं, उनकी हत्या की जा रही है. केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वैंकेया नायडू कह रहे हैं कि  क़र्ज़ माफ़ी अब फैशन बन चुका है.

समाज में हाशिये पर रहने वाले तबक़ों की आवाज़ को भी कुचलने की कोशिश की जा रही है. आदिवासियों को उजाड़ा जा रहा है. जल, जंगल और ज़मीन के लिए संघर्ष करने वाले आदिवासियों को नक्सली कहकर प्रताड़ित करने का सिलसिला जारी है. हद तो यह है कि सेना के जवान तक आदिवासी महिलाओं पर ज़ुल्म ढहा रहे हैं, उनका शारीरिक शोषण कर रहे हैं. दलितों पर अत्याचार बढ़ गए हैं. ज़ुल्म के ख़िलाफ़ बोलने पर दलितों को देशद्रोही कहकर उन्हें सरेआम पीटा जाता है. गाय के नाम पर मुसलमान निशाने पर हैं. अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाने पर उन्हें दहशतगर्द क़रार दे दिया जाता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नया बयान दिया है कि गौभक्ति के नाम पर इंसानों का क़त्ल बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है. हालांकि कि कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मोदी पर पलटवार करते हुए कहा है कि बहुत देर हो गई. कहने से कुछ नहीं होगा, जब तक कार्रवाई नहीं की जाती. प्रधानमंत्री का यह बयान उस वक़्त आया था जब तथाकथित गौरक्षकों ने गुजरात के ऊना में दलितों को बुरी तरह पीटा था. लेकिन गौरक्षकों  पर इस बयान का कोई असर नहीं हुआ, क्योंकि वह जानते हैं कि और बयानों की तरह यह बयान भी सिर्फ़ ’जुमला’ ही होगा. प्रधानमंत्री के बयान के चंद घंटों के बाद ही झारखंड के रामगढ़ में बेरहमी से एक व्यक्ति का क़त्ल कर दिया गया और उसकी जीप को आग लगा दी गई. आए दिन ऐसे ख़ौफ़नाक वाक़िये सामने आ रहे हैं.

दादरी के अख़्लाक कांड में जिस तरह एक बेक़सूर व्यक्ति पर बीफ़ खाने का इल्ज़ाम लगाकर उसका क़त्ल किया गया, उसने मुसलमानों के दिल में असुरक्षा की भावना पैदा कर दी. कभी उन्हें घर में घुस कर मार दिया जाता है, कभी सड़क पर क़त्ल कर दिया जाता है,  तो कभी रेल में सफ़र कर रहे युवक पर हमला करके उसकी जान ले ली जाती है. मुसलमानों को लगने लगा कि वे अपने देश में ही महफ़ूज़ नहीं हैं. देश के कई हिस्सों में बीफ़-बीफ़ कहकर कुछ असामाजिक तत्वों ने समुदाय विशेष के लोगों के साथ अपनी रंजिश निकाली. जिस तरह मुस्लिम देशों में ईश निन्दा के नाम पर ग़ैर मुसलमानों को निशाना बनाया जाता रहा है, वैसा ही अब हमारे देश में भी होने लगा है.  दरअसल, भारत का भी तालिबानीकरण होने लगा है. दलितों पर अत्याचार के मामले आए-दिन देखने-सुनने को मिलते रहते हैं. आज़ादी के इतने दशकों बाद भी दलितों के प्रति लोगों की सोच में कोई ख़ास बदलाव नहीं आया है. गांव-देहात में हालात बहुत ख़राब हैं. दलित न तो मंदिरों में प्रवेश कर सकते हैं और न ही शादी-ब्याह के मौक़े पर दूल्हा घोड़ी पर चढ़ सकता है. उनके साथ छुआछूत का तो एक लंबा इतिहास है. पिछले दिनों आरक्षण की मांग को लेकर हरियाणा में हुए उग्र जाट आंदोलन ने सामाजिक समरसता को चोट पहुंचाई है. आरक्षण के नाम पर लोग जातियों में बट गए हैं. जो लोग पहले 36 बिरादरी को साथ लेकर चलने की बात करते थे, अब वही अपनी-अपनी जाति का राग आलाप रहे हैं.

अंग्रेज़ों की नीति थी- फूट डालो और राज करो. अंग्रेज़ तो विदेशी थे. उन्होंने इस देश के लोगों में फूट डाली और और एक लंबे अरसे तक शासन किया. उन्हें इस देश से प्यार नहीं था. लेकिन इस वक़्त जो लोग सत्ता में हैं, वे तो इसी देश के वासी हैं. फिर क्यों वे सामाजिक सद्भाव को ख़राब करने वाले लोगों का साथ दे रहे हैं. उन्हें यह क़तई नहीं भूलना चाहिए कि जब कोई सियासी दल सत्ता में आता है, तो वह सिर्फ़ अपनी विचारधारा के मुट्ठी भर लोगों पर ही शासन नहीं करता, बल्कि वह एक देश पर शासन करता है. इसलिए यह उसका नैतिक दायित्व है कि वह उन लोगों को भी समान समझे, जो उसकी विपरीत विधारधारा के हैं. सरकार पार्टी विशेष की नहीं, बल्कि देश की समूची जनता का प्रतिनिधित्व करती है. सरकार को चाहिए कि वह जनता को फ़िज़ूल के मुद्दों में उलझाए रखने की बजाय कुछ सार्थक काम करे. सरकार का सबसे पहला काम देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने और देश में चैन-अमन का माहौल क़ायम रखना है. इसके बाद जनता को बुनियादें सुवाधाएं मुहैया कराना है. बाक़ी बातें बाद की हैं. सुनहरे भविष्य के ख़्वाब देखना बुरा नहीं है, लेकिन जनता की बुनियादी ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ करके उसे सब्ज़ बाग़ दिखाने को किसी भी सूरत में सही नहीं कहा जा सकता. बेहतर तो यह होगा कि चुनाव के दौरान जनता से किए गए वादों को पूरा करने का काम शुरू किया जाए.

Friday, June 30, 2017

बैंक अपनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकते

फ़िरदौस ख़ान 
लोग अपने ख़ून-पसीने की कमाई में से पाई-पाई जोड़कर पैसा जमा करते हैं. अपने बच्चों के अच्छे भविष्य के लिए अपनी पूंजी को सोने-चांदी के रूप में बदल कर किसी सुरक्षित स्थान पर रख देना चाहते हैं. घरों में सोना-चांदी रखना ठीक नहीं है, क्योंकि इनके चोरी होने का डर है. इनकी वजह से माल के साथ-साथ जान का भी ख़तरा बना रहता है. ऐसी हालत में लोग बैंको का रुख़ करते हैं. उन्हें लगता है कि बैंक के लॊकर में उनकी पूंजी सुरक्षित रहेगी. वे बैंकों पर भरोसा करके चैन की नींद सो जाते हैं, लेकिन वे यह नहीं जानते कि बैंकों के लॊकर् में भी उनका क़ीमती सामान सुरक्षित नहीं है. बैंक के लॊकर से भी उनकी ज़िन्दगी भर की कमाई चोरी हो सकती है, लुट सकती है. और इसके लिए उन्हें फूटी कौड़ी तक नहीं मिलेगी, नुक़सान होने की हालत में बैंक अपनी हर तरह की ज़िम्मेदारी से मुंह मोड़ लेंगे. वे यूं ही तन कर खड़े रहेंगे, भले ही ग्राहक की कमर टूट जाए.  

सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत मांगी गई जानकारी में इस बात का ख़ुलासा हुआ है कि बैंक के लॊकर में जमा किसी भी क़ीमती चीज़ की चोरी होने या कोई हादसा होने पर हुए नुक़सान के लिए बैंक ज़िम्मेदार नहीं हैं, इसलिए ग्राहक उनसे किसी भी तरह की कोई उम्मीद क़तई न रखें.  भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) द्वारा आरटीआई के तहत दिए गए जवाब के मुताबिक़ आरबीआई ने बैंकों को इस बारे में कोई आदेश जारी नहीं किया है कि लॉकर से चोरी होने या फिर कोई हादसा होने पर ग्राहक को कितना मुआविज़ा दिया जाएगा. इतना ही नहीं,  सरकारी क्षेत्र के 19 बैंकों ने भी नुक़सान की भरपाई करने से बचते हुए कहा है कि ग्राहक से उनका रिश्ता मकान मालिक और किरायेदार जैसा है. ऐसे रिश्ते में ग्राहक लॉकर में रखे गए अपने सामान का ख़ुद ज़िम्मेदार है, चाहे वह लॉकर बैंकों के मालिकाना हक़ में ही क्यों न हो. कुछ बैंकों ने अपने क़रार में भी साफ़ किया है कि लॉकर में रखा गया सामान ग्राहक के अपने ’रिस्क’ पर है, क्योंकि बैंक को इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि ग्राहक अपने लॉकर में क्या सामान रख रहा है और उसकी क़ीमत क्या है? ऐसे में ग्राहक मनमर्ज़ी से कोई भी दावा कर सकता है.  ज़्यादातर बैंकों के लॉकर हायरिंग अग्रीमेंट्स में इसी तरह की बातें कही गई हैं. बैंक लॉकर में जमा किसी भी चीज़ के लिए ज़िम्मेदार नहीं होगा. अगर चोरी, गृह युद्ध, युद्ध छिड़ने या फिर किसी आपदा की हालत में कोई नुक़सान होता है, तो ग्राहक को ही उसकी ज़िम्मेदारी उठानी होगी. इसके लिए बैंक जवाबदेह नहीं होगा. एक अन्य बैंक लॉकर हायरिंग अग्रीमेंट के मुताबिक़ बैंक अपनी तरफ़ से लॉकर की सुरक्षा के लिए हर कोशिश करेंगे, लेकिन किसी भी तरह के नुक़सान की हालत में बैंक की जवाबदेही नहीं होगी. इन बैंकों में बैंक ऑफ़ इंडिया, ओरिएंटल बैंक ऑफ़ कॉमर्स, पंजाब नेशनल बैंक, यूको और कैनरा आदि शामिल हैं.

भारतीय रिज़र्व बैंक के नियमों के मुताबिक़ किसी भी अनियंत्रित या अप्रत्याशित घटना जैसे चोरी, डकैती, आगज़नी और प्राकृतिक आपदा आदि में हुए नुक़सान के लिए बैंक ज़िम्मेदार नहीं होगा. इसलिए इसके बैंक के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती.  बैंक के लॊकर में क्या सामान है, इसके बारे में बैंक को कोई जानकारी नहीं है. ऐसी हालत में भरपाई किस तरह की जाए, इसका कोई तरीक़ा नहीं है.

ग़ौर करने लायक़ बात यह भी है कि बैंक लॊकर की सुविधा देने की एवज में ग्राहकों से सालाना किराया लेते हैं. इसलिए ग्राहक के क़ीमती सामान की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी भी बैंक की ही बनती है.
बैंक अपने बचाव में दलील देते हैं कि वे ग्राहकों को लॉकर में रखे सामान का बीमा करवाने की सलाह देते हैं.
सवाल यह है कि जब ग्राहक अपने क़ीमती सामान की जानकारी किसी को नहीं देना चाहता, तो ऐसे में उसका बीमा कौन करेगा, किस आधार पर करेगा?  ऐसा करना उसकी निजता का उल्लंघन भी माना जा सकता है. बैंक और बीमा कंपनी के सामने ग्राहक छोटी मछली ही है. ज़्यादातर कंपनियां शब्दों के मायाजाल में उलझी अपनी शर्तें बहुत छोटे अक्षरों में लिखती हैं, मानो वे ग्राहक से उसे छुपाना चाहती हों. एजेंट की लच्छेदार बातों में उलझा ग्राहक शर्तों नीचे अपने दस्तख़्त कर देता है. वह ख़ुद यह नहीं जानता कि वक़्त पड़ने पर यही शर्तें उसके लिए मुसीबत का सबब बन जाएंगी, जबकि होना यह चाहिए कि शर्तें बड़े-बड़े अक्षरों में लिखी होनी चाहिए, ताकि ग्राहक उन्हें आसानी से पढ़ सकें और उस हिसाब से ही कोई फ़ैसला ले सके.

क़ाबिले-ग़ौर है कि बैंकों में चोरी होने और लॊकर तोड़ने की घटनाएं होती रहती हैं. कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ियाबाद ज़िले के मोदीनगर में चोरों ने पंजाब नेशनल बैंक के तक़रीबन 30 लॉकरों के ताले तोड़कर क़ीमती सामान चुरा लिया था.  वे बैंक की छत तोड़कर लॊकर रूम में घुसे थे. इस मामले में बैंक की कोताही सामने आई थी. ग़ौरतलब है कि ऐसे मामलों में अदालतों ने भी कई बार बैंको की सुरक्षा व्यवस्था पर उठाते हुए इनके लिए बैंकों को ज़िम्मेदार ठहराया है. इसके बावजूद बैंकों ने इस पर कोई ख़ास तवज्जो नहीं दी. आख़िर वे तवज्जो दें भी क्यों, नुक़सान तो ग्राहक का ही होता है न. जिस दिन नुक़सान की भरपाई बैंकों को करनी पड़ेगी, वे सुरक्षा व्यवस्था पर ध्यान ही नहीं देंगे, बल्कि सुरक्षा के ख़ास इंतज़ाम भी करने लगेंगे.

अच्छी बात यह है कि आरटीआई आवेदक कुश कालरा ने भारतीय प्रतिस्पर्द्धा आयोग (सीसीआई) की पनाह ली है. उनका कहना है कि बैंक गुटबंदी ग़ैर-प्रतिस्पर्धिता का रवैया अख़्तियार किए हुए हैं, जो सरासर जनविरोधी है.  उम्मीद है कि भारतीय प्रतिस्पर्द्धा आयोग में इस मुद्दे पर जनहित के मद्देनज़र सकारात्मक ढंग से विचार होगा. बहरहाल, बैंक किसी भी लिहाज़ से अपनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकते, उन्हें ग्राहकों के नुक़सान की भरपाई तो करनी ही चाहिए. बैंको को चाहिए कि वह इस मामले में फ़िज़ूल की बहानेबाज़ी न करें. वैसे अदालत के दरवाज़े भी खुले हैं, जहां बैंकों की मनमर्ज़ी के ख़िलाफ़ गुहार लगाई जा सकती है.

Saturday, June 24, 2017

हमारा लिखना सार्थक हुआ...

कई साल पहले की बात है. गर्मियों का मौसम था. सूरज आग बरसा रहा था. दोपहर के वक़्त कुछ पत्रकार साथी बैठे बातें कर रहे थे. बात झुलसती गरमी से शुरू हुई और सियासत पर पहुंच गई. टेलीविज़न चल रहा था. उस वक़्त कांग्रेस की हुकूमत थी. यानी केंद्र और दिल्ली राज्य में कांग्रेस की सरकार थी. एक विपक्षी नेता भाषण दे रहा था. ये देखकर दुख हुआ कि वह कांग्रेस नेता राहुल गांधी के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल कर रहा था. हम ख़बरें देख रहे थे. ये देखकर दुख के साथ अफ़सोस भी हुआ कि एक पत्रकार साथी भी कांग्रेस नेता का मज़ाक़ उड़ाने लगे. शायद इसकी वजह यह थी कि वह भी उसी विचारधारा के थे, जिस विचारधारा का वह नेता था. जो अपने भाषण के ज़रिये अपने संस्कारों और तहज़ीब का प्रदर्शन कर रहा था.
मीटिंग ख़त्म हुई. लेकिन उस नेता के शब्द कानों में गूंज रहे थे. साथ ही पत्रकार का रवैया भी नागवार गुज़रा था. हम काफ़ी देर तक सोचते रहे. राहुल गांधी कांग्रेस के नेता हैं और एक ऐसे परिवार से ताल्लुक़ रखते हैं, जिसने देश के लिए अनेक क़ुर्बानियां दी हैं. लेकिन यह देखकर दुख होता है कि अपने ही देश में राहुल गांधी को न जाने कैसे-कैसे नामों से ट्रोल किया जाता है. एक गिरोह ने उन्हें ’पप्पू’ और ’अमूल बेबी’ जैसे नाम देकर उनका मज़ाक़ उड़ाने में कोई कमी नहीं छोड़ी. यह राहुल गांधी की शिष्टता ही है, कि वे अपने विरोधियों का नाम भी सम्मान के साथ लेते हैं, उनके नाम के साथ ’जी’ लगाते हैं. जबकि उनके विरोधी भले ही वे देश के बड़े से बड़े पद पर हों, राहुल गांधी के लिए ऊल-जलूल शब्दों का इस्तेमाल करते हैं. यह देख और सुनकर बुरा लगता था.
तब ज़ेहन में आया कि क्यों न राहुल गांधी को कोई अच्छा-सा नाम दिया जाए. तब हमने फ़ेसबुक पर एक राहुल गांधी की एक तस्वीर पोस्ट किया और उसके कैप्शन में लिखा-
हिन्दुस्तान का शहज़ादा
हमने अपने बलॊग्स पर ’हिन्दुस्तान का शहज़ादा’ नाम से लिखना शुरू किया. फ़ेसबुक पर इस नाम से एक पेज भी बनाया. हमारे पास विपक्षी पार्टी के एक शख़्स का फ़ोन आया. उन्होंने इस बारे में हमसे बात की. उन्होंने कहा कि आगे चलकर तुम्हारा दिया उपनाम ’शह्ज़ादा’ मशहूर हो जाएगा. ठीक ऐसा ही हुआ भी. यह नाम चलन में आ गया. अब उनके विरोधी ’शहज़ादा’ लक़ब का इस्तेमाल करने लगे. यहां तक कि जो उन्हें ’पप्पू’ और ’अमूल बेबी’ कहा करते थे, वे लोग अब उन्हें शहज़ादा कहने लगे थे.
हमारा लिखना सार्थक हुआ...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

Sunday, June 18, 2017

अवाम की उम्मीद हैं राहुल गांधी

राहुल गांधी जी की सालगिरह 19 जून पर विशेष
फ़िरदौस ख़ान 
कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी एक ऐसी शख़्सियत के मालिक हैं, जिनसे कोई भी मुतासिर हुए बिना नहीं रह सकता. उनके बारे में लिखना इतना आसान नहीं है. लिखने बैठें, तो लफ़्ज़ कम पड़ जाएंगे.  देश के प्रभावशाली राज घराने से होने के बावजूद उनमें ज़र्रा भर भी ग़ुरूर नहीं है.  उनकी भाषा में मिठास और मोहकता है, जो सभी को अपनी तरफ़ आकर्षित करती है. वे विनम्र इतने हैं कि अपने विरोधियों के साथ भी सम्मान से पेश आते हैं, भले ही उनके विरोधी उनके लिए कितनी ही तल्ख़ भाषा का इस्तेमाल क्यों न करते रहें. किसी भी हाल में वे अपनी तहज़ीब से पीछे नहीं हटते. उनके कट्टर विरोधी भी कहते हैं कि राहुल का विरोध करना उनकी पार्टी की नीति का एक अहम हिस्सा है, लेकिन ज़ाती तौर पर वे राहुल गांधी को बहुत पसंद करते हैं. वे ख़ुशमिज़ाज, ईमानदार, मेहनती और सकारात्मक सोच वाले हैं.  आज देश को उनके जैसे ही नेता की बेहद ज़रूरत है. वे मुल्क की अवाम की उम्मीद हैं. हिन्दुस्तान की उम्मीद हैं.

राहुल गांधी का जन्म 19 जून 1970 को दिल्ली में हुआ. वे देश के मशहूर गांधी-नेहरू परिवार से हैं. उनकी मां श्रीमती सोनिया गांधी हैं, जो अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के रायबरेली लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं. उनके पिता स्वर्गीय राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे. राहुल गांधी कांग्रेस में उपाध्यक्ष हैं और लोकसभा में उत्तर प्रदेश में स्थित अमेठी चुनाव क्षेत्र की नुमाइंदगी करते हैं. राहुल गांधी को साल 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली शानदार जीत का श्रेय दिया गया था. वे सरकार में कोई किरदार निभाने की बजाय पार्टी संगठन में काम करना पसंद करते हैं, इसलिए उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री का ओहदा लेने से साफ़ इंकार कर दिया था.

राहुल गांधी की शुरुआती तालीम दिल्ली के सेंट कोलंबस स्कूल में हुई. उन्होंने प्रसिद्ध दून विद्यालय में भी कुछ वक़्त तक पढ़ाई की, जहां उनके पिता ने भी पढ़ाई की थी. सुरक्षा कारणों की वजह से कुछ अरसे तक उन्हें घर पर ही पढ़ाई-लिखाई करनी पड़ी. साल 1989 में उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज में दाख़िला लिया. उनका यह दाख़िला पिस्टल शूटिंग में उनके हुनर की बदौलत स्पोर्ट्स कोटे से हुआ. उन्होंने इतिहास ऑनर्स में नाम लिखवाया. वे सुरक्षाकर्मियों के साथ कॉलेज आते थे. तक़रीबन सवा साल बाद 1990  में उन्होंने कॊलेज छोड़ दिया. उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के रोलिंस कॉलेज फ़्लोरिडा से साल 1994 में अपनी कला स्नातक की उपाधि हासिल की. इसके बाद उन्होंने साल 1995 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज से  डेवलपमेंट स्टडीज़ में एम.फ़िल. की उपाधि हासिल की.

राहुल गांधी को घूमने-फिरने और खेलकूद का बचपन से ही शौक़ रहा है. उन्होंने तैराकी, साईलिंग और स्कूबा-डायविंग की और स्वैश खेला. उन्होंने बॊक्सिंग सीखी और पैराग्लाइडिंग का भी प्रशिक्षण लिया. उनके बहुत से शौक़ उनके पिता राजीव गांधी जैसे ही हैं. अपने पिता के तरह उन्होंने दिल्ली के नज़दीक हरियाणा स्थित अरावली की पहाड़ियों पर एक शूटिंग रेंज में निशानेबाज़ी सीखी. उन्हें भी आसमान में उड़ना उतना ही पसंद है, जितना उनके पिता को पसंद था. उन्होंने भी हवाई जहाज़ उड़ाना सीखा. वे अपनी सेहत का भी काफ़ी ख़्याल रखते हैं. कितनी ही मसरूफ़ियत क्यों न हो, वे कसरत के लिए वक़्त निकाल ही लेते हैं. वे रोज़ दस किलोमीटर तक जॉगिंग करते हैं. उन्हें फ़ुटबॊल बहुत पसंद है. लंदन में पढ़ने के दौरान वह फ़ुटबॊल के दीवाने थे.

स्नातक की पढ़ाई करने के बाद वे लंदन चले गए, जहां उन्होंने प्रबंधन गुरु माइकल पोर्टर की प्रबंधन परामर्श कंपनी मॉनीटर ग्रुप के साथ तीन साल तक काम किया. हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के प्रोफ़ेसर माइकल यूजीन पोर्टर को ब्रैंड स्ट्रैटजी का विद्वान माना जाता है. सुरक्षा कारणों की वजह से राहुल गांधी ने रॉल विंसी के नाम से काम किया. उनके सहयोगी नहीं जानते थे कि वे राजीव गांधी के बेटे और इंदिरा गांधी के पौत्र के साथ काम कर रहे हैं.  राहुल गांधी हमेशा सुरक्षाकर्मियों से घिरे रहे हैं, इसलिए उन्हें वह ज़िन्दगी नहीं मिल पाई, जिसे कोई आम इंसान जीता है. वे अपनी ज़िन्दगी जीना चाहते थे, एक आम इंसान की ज़िन्दगी. राहुल गांधी ने एक बार कहा था, "अमेरिका में पढ़ाई के बाद मैंने जोखिम उठाया और अपने सुरक्षा गार्डो से निजात पा ली, ताकि इंग्लैंड में आम ज़िन्दगी जी सकूं."

विदेश में रहते राहुल गांधी को दस साल हो गए थे. वे स्वदेश लौटे और फिर साल 2002 के आख़िर में उन्होंने देश की व्यावसायिक राजधानी मुंबई में एक इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी आउटसोर्सिग फ़र्म, बेकॉप्स सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड बनाई. रजिस्ट्रार ऑफ़ कंपनीज़ में दर्ज आवेदन के मुताबिक़ इस कंपनी का मक़सद घरेलू और अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों को सलाह और सहायता मुहैया करना, सूचना प्रौद्योगिकी में परामर्शदाता और सलाहकार की भूमिका निभाना और वेब सॉल्यूशन देना था. साल 2004 के लोकसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग को दिए हल्फ़नामे के मुताबिक़ बेकॉप्स सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड में राहुल गांधी की हिस्सेदारी 83 फ़ीसद थी. उनकी पढ़ाई की तरह उनके कारोबार में भी काफ़ी दिक़्क़तें आईं. सियासत की वजह से वे अपने कारोबार पर ख़ास तवज्जो नहीं दे पाए.

राहुल गांधी की सियासी ज़िन्दगी की शुरुआत भी अचानक ही हुई. वे साल 2003 में कांग्रेस की बैठकों और सार्वजनिक समारोहों में नज़र आए. एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट श्रृंखला देखने के लिए एक सद्भावना यात्रा पर वह अपनी बहन प्रियंका गांधी के साथ पाकिस्तान भी गए. इसके बाद जनवरी 2004 में उन्होंने अपने पिता के पूर्व निर्वाचन क्षेत्र अमेठी का दौरा किया, तो उनके सियासत में आने की चर्चा शुरू हो गई. इस बारे में पूछने पर उन्होंने सिर्फ़ इतना कहकर कोई भी प्रतिक्रिया देने से साफ़ इंकार कर दिया था, "मैं राजनीति के ख़िलाफ़ नहीं हूं. मैंने यह तय नहीं किया है कि मैं राजनीति में कब प्रवेश करूंगा और वास्तव में, करूंगा भी या नहीं."

फिर मार्च 2004 में लोकसभा चुनाव का ऐलान हुआ, तो राहुल गांधी ने सियासत में आने का ऐलान कर दिया. उन्होंने अपने पिता के पूर्व निर्वाचन क्षेत्र अमेठी से लोकसभा चुनाव लड़ा. इससे पहले उनके चाचा संजय गांधी ने भी इसी क्षेत्र का नेतृत्व किया था. उस वक़्त उनकी मां सोनिया गांधी यहां से सांसद थीं. तब मीडिया के साथ अपने पहले साक्षात्कार में राहुल गांधी ने देश को जोड़ने वाले शख़्स के तौर पर ख़ुद को पेश किया. उन्होंने कहा था कि वे जातीय और धार्मिक तनाव को कम करने की कोशिश करेंगे. इलाक़े की अवाम ने राहुल गांधी को भरपूर समर्थन दिया. उन्होंने अपने नज़दीकी प्रतिद्वंदी को एक लाख वोटों से हराकर शानदार जीत हासिल की. इस दौरान उन्होंने सरकार या पार्टी में कोई ओहदा नहीं लिया और अपना सारा ध्यान मुख्य निर्वाचन क्षेत्र के मुद्दों और उत्तर प्रदेश की राजनीति पर ही केंद्रित किया.

फिर जनवरी 2006 में आंध्र प्रदेश के हैदराबाद में हुए कांग्रेस के एक सम्मेलन में पार्टी के हज़ारों सदस्यों ने राहुल गांधी से पार्टी में और महत्वपूर्ण नेतृत्व की भूमिका निभाने की ग़ुज़ारिश की. इस पर राहुल गांधी ने कहा, "मैं इसकी सराहना करता हूं और मैं आपके जज़्बात और समर्थन के लिए शुक्रगुज़ार हूं. .मैं आपको यक़ीन दिलाता हूं कि मैं आपको मायूस नहीं करूंगा, लेकिन अभी धैर्य रखें." यह कहकर उन्होंने नेतृत्व वाली कोई भी बड़ी भूमिका निभाने से मना कर दिया. राहुल गांधी को 24 सितंबर 2007 में पार्टी सचिवालय के एक फेरबदल में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का महासचिव नियुक्त किया गया था. उन्हें युवा कांग्रेस और भारतीय राष्ट्रीय छात्र संघ की ज़िम्मेदारी भी सौंपी गई.  साल 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपने नज़दीकी प्रतिद्वंद्वी को तीन लाख तैंतीस हज़ार से शिकस्त देकर जीत दर्ज की. इस चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश की कुल 80 लोकसभा सीटों में से 21 जीतीं. इस तरह राहुल गांधी ने प्रदेश में कांग्रेस को ज़िन्दा करने का काम किया और उन्हें इसका श्रेय दिया गया. उन्होंने डेढ़ महीने में देश भर में 125 रैलियों को संबोधित किया.
राहुल गांधी को 19  जनवरी 2013 में कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाया गया. क़ाबिले-ग़ौर है कि इससे पहले कांग्रेस में उपाध्यक्ष का पद नहीं होता था. लेकिन पार्टी में उनका महत्व बढ़ाने और उन्हें सोनिया गांधी का सबसे ख़ास सहयोगी बनाने के लिए पार्टी ने उपाध्यक्ष के पद का सृजन किया.

राहुल गांधी अपनी जनसभाओं में जिस तरह सांप्रदायिकता, जातिवाद, भ्रष्टाचार और अपराध को लेकर भारतीय जनता पार्टी, बहुजन समाजवादी पार्टी, समाजवादी पार्टी व अन्य सियासी दलों को निशाना बनाते हैं, उससे सभी दलों के होश उड़ जाते हैं. वे उन पर सधे राजनीतिक अंदाज़ में हमले करते हैं. एक संजीदा वक्ता की तरह तार्किक ढंग से वे सियासी दलों को चुन-चुन कर व्यंग्यात्मक लहजे में जवाब देते हैं. उनके इसी अंदाज़ से दलों में बौखलाहट पैदा हो जाती है. वे समझ नहीं पाते कि राहुल के ‘आम आदमी’ का कौन सा तोड़ निकालें.

राहुल गांधी भाजपा के झूठे वादों और लोकपाल पर उसके चरित्र की जमकर बखिया उधेड़ते हैं. वे भाजपा द्वारा भ्रष्टाचारी नेताओं से हाथ मिलाने पर लोगों से सवाल करते हैं, तो उन्हें भीड़ से खुलकर जवाब भी मिलते हैं. उन्हीं जवाबों को आगे बढ़ाते हुए मंच से राहुल गांधी लोगों को बताते हैं कि ग़रीबों का मसीहा बनने वाले नेता कहते हैं कि राहुल गांधी पागल हो गया है, और इसके बाद वह आक्रामक हो जाते हैं. अपनी आस्तीनें चढ़ाकर हमलावर अंदाज़ में कहते हैं- ‘‘हां, मैं ग़रीबों का दुख-दर्द देखकर, प्रदेश की दुर्दशा देखकर पागल हो गया हूं. कोई कहता है कि राहुल गांधी अभी बच्चा है, वह क्या जाने राजनीति क्या होती है. तो मेरा कहना है कि हां, मुझे उनकी तरह राजनीति करनी नहीं आती. मैं सच्चाई और साफ़ नीयत वाली राजनीति करना चाहता हूं. मुझे उनकी राजनीति सीखने का शौक़ भी नहीं है. मायावती कहती हैं राहुल नौटंकीबाज़ है. तो मेरा कहना है कि अगर ग़रीबों का हाल जानना, उनके दुख-दर्द को समझना, नाटक है तो राहुल गांधी यह नाटक ताउम्र करता रहेगा."

राहुल गांधी प्रदेश को बदहाली से निकालने के लिए युवाओं से साथ के लिए हाथ बढ़ाते हैं. इस दौरान राहुल गांधी यह बताना नहीं भूलते कि वे यहां चुनाव जीतने नहीं, प्रदेश को बदलने आए हैं. यह उनकी इस साफ़गोई का सियासी दलों के पास कोई जवाब नहीं होता. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि राहुल गांधी की बातों में दम है.
यह हक़ीक़त है कि वे हवाई नेताओं की तरह आसमान में नहीं उड़ते और न ही किसी पंचतारा सेलिब्रिटी की तरह रथ पर चढ़कर ज़िलों का दौरा करते हैं. उन्होंने खाटी देसी अंदाज़ में गांवों में रात रात बिताई. पगडंडियों पर कीचड़ की परवाह किए बिना चले और आम आदमी से बेलाग संवाद स्थापित करने की कोशिश की. आम आदमी को नज़दीक से जानने-समझने और अपना हाथ उसके हाथ में देने की पहल की.

राहुल गांधी एक परिपक्व राजनेता हैं. इसके बावजूद उन्हें अमूल बेबी कहना उनके ख़िलाफ़ एक साज़िश का हिस्सा ही कहा जा सकता है. भूमि अधिग्रहण मामले को ही लीजिए. राहुल ने भूमि अधिग्रहण को लेकर जिस तरह पदयात्रा की, वह कोई परिपक्व राजनेता ही कर सकता है. हिंदुस्तान की सियासत में ऐसे बहुत कम नेता रहे हैं, जो सीधे जनता के बीच जाकर उनसे संवाद करते हैं. नब्बे की दहाई में बहुजन समाज पार्टी के नेता कांशीराम ने गांव-गांव जाकर पार्टी को मज़बूत करने का काम किया था, जिसका फल बसपा को सत्ता के रूप में मिला. चौधरी देवीलाल ने भी इसी तरह हरियाणा में आम जनता के बीच जाकर अपनी एक अलग पहचान बनाई थी. दक्षिण भारत में भी कई राजनेताओं ने पद यात्रा के ज़रिये जनता में अपनी पैठ बनाई और सत्ता हासिल की.

कुल मिलाकर राहुल गांधी ऐसे क़द्दावर नेताओं की फ़ेहरिस्त में शुमार हो चुके हैं, जिनके तूफ़ान से सियासी दलों के  हौसले  पस्त हो जाते हैं. हालत यह हो गई है कि कोई सियासी दल दाग़ी को लेता है, तो कोई दग़ाबाज़ी को सहारा बना लेता है. जब कोई चारा नहीं दिखता, तो कुछ सियासी दल राहुल पर व्यक्तिगत प्रहार करने में जुट जाते हैं.  मगर इससे राहुल गांधी को कोई नुक़सान नहीं होता, क्योंकि राजनीति की विरासत को संभालने वाला यह युवा नेता अब युवाओं, और अन्य वर्गों के साथ-साथ बुजुर्गों का भी चहेता बन चुका है. राहुल गांधी की जनसभाओं में दूर-दूर से आए बुज़ुर्ग यही कहते हैं कि लड़का ठीक ही तो कह रहा है, यही कुछ करेगा. महिलाओं में तो राहुल गांधी को लेकर काफ़ी क्रेज है. यह बात तो विरोधी दलों के नेता भी बेहिचक क़ुबूल  करते हैं. वे तो मज़ाक़ के लहजे में यहां तक कहते हैं कि अगर महिलाओं को किसी एक नेता को वोट देने को कहा जाए, तो सभी राहुल गांधी को ही देकर आएंगी. राहुल युवाओं ही नहीं, बल्कि बच्चों से भी घुलमिल जाते हैं. कभी किसी मदरसे में जाकर बच्चों से बात करते हैं, तो कभी किसी मैदान में खेल रहे बच्चों के साथ बातचीत शुरू कर देते हैं. यहां तक कि गांव-देहात में मिट्टी में खेल रहे बच्चों तक को गोद में उठाकर उसके साथ बच्चे बन जाते हैं. बच्चे उन्हें बहुत अच्छे लगते हैं. उन्हें अपनी भांजी मिराया और भांजे रेहान के साथ वक़्त बिताना भी बहुत अच्छा लगता है. उनके अच्छे बर्ताव की वजह से ही बुज़ुर्ग उन्हें स्नेह करते हैं, उनके सर पर शफ़क़त का हाथ रखते हैं, उन्हें दुआएं देते हैं.  वे युवाओं के चहेते हैं. राहुल गांधी अपने विरोधियों का नाम भी सम्मान के साथ लेते हैं, उनके नाम के साथ जी लगाते हैं.  सच है कि संस्कार विरासत में मिलते हैं, संस्कार घर से मिला करते हैं. अपने से बड़ों के लिए उनके दिल में सम्मान है, तो बच्चों के लिए प्यार-दुलार है.

जब भ्रष्टाचार और महंगाई के मामले में कांग्रेस के नेतृत्व वाली तत्कालीन केंद्र सरकार का चौतरफ़ा विरोध हो रहा था, ऐसे वक़्त में राहुल गांधी गांव-गांव जाकर जनमानस से एक भावनात्मक रिश्ता क़ायम कर रहे थे. वे लोगों से मिलने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते. वे उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोयडा के नज़दीकी गांव भट्टा-पारसौल गए. उन्होंने आसपास के गांवों का भी दौरा कर ग्रामीणों से बात की, उनकी समस्याएं सुनीं और उनके समाधान का आश्वासन भी दिया- इससे पहले भी वे सुबह मोटरसाइकिल से भट्टा-पारसौल गांव जा चुके हैं. उस वक़्त उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने उन्हें गिरफ्तार करा दिया था. इस बार भी वह गुपचुप तरीक़े से ही गांव गए थे. न तो प्रशासन को इसकी ख़बर थी और न ही मीडिया को इसकी भनक लगने दी गई. हालांकि उनके दौरे के बाद प्रशासन सक्रिय हो गया था. इसके बाद भी वे गांव लखीमपुर में पीड़ित परिवार के घर गए और उन्हें इंसाफ़ दिलाने का वादा किया. और चौकस प्रशासन को भनक तक नहीं लगी. ऐसे हैं राहुल गांधी.

भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर राहुल गांधी द्वारा निकाली गई पदयात्रा से सियासी हलक़ों में चाहे जो प्रतिक्रिया हुई हो, लेकिन यह हक़ीक़त है कि राहुल गांधी ने ग्रेटर नोएडा के ग्रामीणों के साथ जो वक़्त बिताया, उसे वे कभी नहीं भूल पाएंगे. इन लोगों के लिए यह किसी सौग़ात से कम नहीं था कि उन्हें कांग्रेस के युवराज के साथ वक़्त गुज़ारने का मौक़ा मिला. अपनी पदयात्रा के दौरान पसीने से बेहाल राहुल ने शाम होते ही गांव बांगर के किसान विजय पाल की खुली छत पर स्नान किया. फिर थोड़ी देर आराम करने के बाद उन्होंने घर पर बनी रोटी, दाल और सब्ज़ी खाई. ग्रामीणों ने उन्हें पूड़ी-सब्ज़ी की पेशकश की, लेकिन उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया. गांव में बिजली की क़िल्लत रहती है, इसलिए ग्रामीणों ने जेनरेटर का इंतज़ाम किया, लेकिन राहुल ने पंखा भी बंद करवा दिया. वे एक आम आदमी की तरह ही बांस और बांदों की चारपाई पर सोये. यह कोई पहला मौक़ा नहीं था जब राहुल गांधी इस तरह एक आम आदमी की ज़िंदगी गुज़ार रहे थे. इससे पहले भी वे रोड शो कर चुके थे और उन्हें इस तरह के माहौल में रहने की आदत है. कभी वे किसी दलित के घर भोजन करते हैं, तो कभी किसी मज़दूर के  साथ ख़ुद ही परात उठाकर मिट्टी ढोने लगते हैं. राहुल गांधी के आम लोगों से मिलने-जुलने के इस जज़्बे ने उन्हें लोकप्रिय बनाया. राहुल जहां भी जाते हैं, उन्हें देखने के लिए, उनसे मिलने के लिए लोगों का हुजूम इकट्ठा हो जाता है. हालत यह है कि लोगों से मिलने के लिए वह अपना सुरक्षा घेरा तक तोड़ देते हैं.

राहुल गांधी लोगों की मदद करने से कभी पीछे नहीं रहते. इस मामले में वह अपनी सुरक्षा की ज़रा भी परवाह नहीं करते. एक बार वह अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी से लौट रहे थे. रास्ते में उन्होंने एक ज़ख़्मी व्यक्ति को सड़क पर तड़पते देखा, तो क़ाफ़िला रुकवा लिया. उन्होंने एंबुलेंस बुलवाई और ज़ख़्मी व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाया. उन्होंने विधायक और पार्टी प्रवक्ता को उसके इलाज की ज़िम्मेदारी सौंपी. इस दौरान सुरक्षा की परवाह किए बिना वह काफ़ी देर तक सड़क पर खड़े रहे.
राहुल गांधी जब पीड़ितों से मिलने सहारनपुर पहुंचे, तो वहां एक बच्चा भी था. उन्होंने उस बच्चे को अपनी गोद में बिठा लिया. उन्होंने बच्चों से प्यार से बातें कीं और फिर घटना के बारे में पूछा. इस पर बच्चे ने कहा कि अंकल हमारा घर जल गया है, बस्ता भी जल गया और सारी किताबें भी जल गईं. घर बनवा दो, नया बस्ता और किताबें दिलवा दो. इस पर राहुल गांधी ने एक स्थानीय कांग्रेस नेता को उस बच्चे का घर बनवाकर देने और नया बस्ता व किताबें दिलाने की ज़िम्मेदारी सौंप दी. वे मध्य प्रदेश के मंदसौर में भी पीड़ित किसानों से मिलने पहुंच गए. शासन-प्रशासन से उन्हें किसानों से मिलने से रोकने के लिए भरपूर कोशिश कर ली, लेकिन वे भी किसानों से मिले बिना दिल्ली नहीं लौटे, भले उन्हें गिरफ़्तार होना पड़ा. वे आक्रामक रुख़ अख्तियार करते हुए कहते हैं, मोदी किसानों का क़र्ज़ नहीं माफ़ कर सकते, सही रेट और बोनस नहीं दे सकते, मुआवज़ा नहीं दे सकते, सिर्फ़ किसानों को गोली दे सकते हैं.

राहुल गांधी समझ चुके हैं कि जब तक वे आम आदमी की बात नहीं करेंगे, तब तक वे सियासत में आगे नहीं ब़ढ पाएंगे. इसके लिए उन्होंने वह रास्ता अख़्तियार किया, जो बहुत कम लोग चुनते हैं. वे भाजपा की तरह एसी कल्चर की राजनीति नहीं करना चाहते. राहुल गांधी का कहना है कि उन्होंने किसानों की असल हालत को जानने के लिए पदयात्रा शुरू की थी, क्योंकि दिल्ली और लखनऊ के एसी कमरों में बैठकर किसानों की हालत पर सिर्फ़ तरस खाया जा सकता है, उनकी समस्याओं को न तो जाना जा सकता है और न ही उन्हें हल किया जा सकता है.

संसद में भी राहुल गांधी बेहद आक्रामक अंदाज़ में नज़र आते हैं. कालेधन पर तंज़ कसते हुए राहुल गांधी ने कहा था,  "काला धन सफ़ेद कर रहे हैं वित्तमंत्री. पहले कालाधन वापस लाने का वादा किया, अब उसे ही सफ़ेद करने का, यह उनकी फ़ेयर एंड लवली स्कीम है, काले पैसे को आप गोरा कर सकते हो. फ़ेयर एंड लवली योजना के तहत किसी को जेल नहीं होगी, जेटली जी के पास जाइये, आपका पैसा सफ़ेद हो जाएगा."  महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) का ज़िक्र करते हुए राहुल गांधी ने कहा, "महात्मा गांधी हमारे हैं, सावरकर आपके हैं. आपने सावरकर को उठाकर फेंक दिया क्या? फेंक दिया, तो बहुत अच्छा किया." राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर कटाक्ष करते हुए कहा कि वह रोज़गार सृजन के लिए काले रंग का एक बड़ा सा बब्बर शेर लिए घूम रहे हैं, लेकिन उसके बावजूद युवाओं को नौकरी नहीं दे पा रहे हैं. उन्होंने कहा, "आपने बब्बर शेर दिया तो दिया, लेकिन रोज़गार कितने दिए, यह किसी को मालूम नहीं. किसी के पास कोई आंकड़ा नहीं है." संसद में जब राहुल बोल रहे थे, तो भाजपा सांसद हंगामा करने लगे. इस पर राहुल गांधी ने कहा, मैं आरएसएस का नहीं हूं. मैं ग़लतियां करता हूं. मैं सब कुछ नहीं जानता, सब कुछ नहीं समझता. मैं जनता से बातचीत करके उनसे उनकी बात सुनकर और समझकर अपनी बात रखता हूं. हम में और आप में फ़र्क़ यही है कि आप सब जानते हैं और ग़लती नहीं करते, जबकि हम ग़लती करते हैं और उससे सीखते हैं.

राहुल गांधी छल और फ़रेब की राजनीति नहीं करते. वे कहते हैं,  ''मैं गांधीजी की सोच से राजनीति करता हूं. अगर कोई मुझसे कहे कि आप झूठ बोल कर राजनीति करो, तो मैं यह नहीं कर सकता. मेरे अंदर ये है ही नहीं. इससे मुझे नुक़सान भी होता है. 'मैं झूठे वादे नहीं करता. "  वे कहते हैं, 'सत्ता और सच्चाई में फ़र्क़ होता है. ज़रूरी नहीं है, जिसके पास सत्ता है उसके पास सच्चाई है. गुजरात में एक आयोजित एक रैली में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मासिक रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' पर तंज़ करते हुए कहते हैं, अगर कांग्रेस चुनाव जीतती है, तो हमारी सरकार हर किसी के लिए होगी न कि केवल एक व्यक्ति के लिए. अपने 'मन की बात' कहने के बजाय हमारी सरकार आपके मन की बात सुनने का प्रयास करेगी.

राहुल गांधी हमेशा सच के साथ खड़े दिखाई देते हैं. कर्नाटक की राजधानी बंगलुरु में नेशनल हेराल्ड के संस्मरणीय संस्करण के लोकार्पण समारोह में उन्होंने कहा कि मौजूदा वक़्त में जो लोग सच्चाई के साथ हैं, उन्हें दरकिनार किया जा रहा है. दलितों को मारा जा रहा है, अल्पसंख्यकों को सताया जा रहा है और मीडिया को धमकाया जा रहा है. उन्होंने कहा कि नेशनल हेराल्ड के एडिटर एक दिन मेरे पास आए. मैंने उनसे कहा, अगर आपको किसी दिन कांग्रेस पार्टी या मेरे ख़िलाफ़ कुछ लिखना हो, तो बिना ख़ौफ़ के लिखें. ये वो चीज़ है, जो हम नेशनल हेराल्ड से चाहते हैं. सच्चाई से डरने की ज़रूरत नहीं है और ना चुप रहने की.

वे कहते हैं, "जब भी मैं किसी देशवासी से मिलता हूं. मुझे सिर्फ़ उसकी भारतीयता दिखाई देती है. मेरे लिए उसकी यही पहचान है. अपने देशवासियों के बीच न मुझे धर्म, ना वर्ग, ना कोई और अंतर दिखता है."  क़ाबिले-ग़ौर है कि एक सर्वे में विश्वसनीयता के मामले में दुनिया के बड़े नेताओं में राहुल गांधी को तीसरा दर्जा मिला हैं, यानी दुनिया भी उनकी विश्वसनीयता का लोहा मानती है.

प्रभावशाली घराने से होने के बावजूद राहुल गांधी में सादगी है. खाने के वक़्त मेज़ पर वे साथियों को प्लेटें दे देते हैं, अपनी प्लेटें ख़ुद किचन में रख आते हैं. किसी बुज़ुर्ग के पानी मांगने पर सेवकों से कहने की बजाय ख़ुद किचन से पानी लाकर दे देते हैं. सार्वजनिक मंचों पर उन्हें अकसर डॊ. मनमोहन सिंह व अन्य लोगों को पानी देते हुए देखा गया है. वे बनावटीपन से कोसों दूर हैं. वे संसद की सीढ़ियों पर सर नहीं नवाते. अगर उनकी कोई चीज़ गिर जाए, तो बिना किसी का इंतज़ार किए ख़ुद उठा लेते हैं. यहां तक कि अपनी कुर्सी तक ख़ुद उठाकर ले आते हैं. एक आयोजन में एक बुज़ुर्ग अपने जूते का फ़ीता नही बांध पा रहे थे. राहुल गांधी ने बेहिचक बढ़कर बुज़ुर्ग के जूते का फ़ीता बांधा और फिर उन्हें उठने में मदद की.

दुनिया की सबसे महंगी खुदरा हाई स्ट्रीट में शुमार दिल्ली की ख़ान मार्केट में राहुल का भी सबसे प्रिय हैंगआउट है.  उन्हें बरिस्ता में कॉफी पीते हुए या बाज़ार की बाहरी तरफ़ बुक शॊप्स में किताबों के वर्क़ पलटते देखा जा सकता है. अमूमन वे सफ़ेद कुर्ता-पायजामा और सफ़ेद कुर्ता-नीली जींस में नज़र आते हैं. वे खाने के बहुत शौक़ीन हैं. पुरानी दिल्ली का खाना भी उन्हें यहां ख़ींच लाता है. अपनी सुरक्षा की परवाह किए बग़ैर वे शाहजहानाबाद पहुंच जाते हैं.

राहुल गांधी को ख़ामोश शामें बहुत पसंद हैं. इसके साथ ही उन्हें दुनिया की चकाचौंध भी ख़ूब लुभाती है. वे रिश्तों को बहुत अहमियत देते हैं. अगर किसी से कोई वादा कर लें, तो उसे पूरा ज़रूर करते हैं.   बिल्कुल ऐसे हैं राहुल गांधी, जिन्हें लोग प्यार से ’आरजी’ भी कहते हैं.

Saturday, June 17, 2017

राहुल गांधी की छुट्टियों पर हंगामा क्यों है बरपा

फ़िरदौस ख़ान
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी जब भी देश से बाहर जाते हैं, तो एक हंगामा बरपा हो जाता है. भारतीय जनता पार्टी के नेता उनकी छुट्टियों पर तंज़ कसने लगते हैं, उनकी छुट्टियों के बारे में सौ सवाल पूछे जाते हैं.  देश का प्रधानमंत्री देश से कितने ही दिन बाहर क्यों न रहे, किसी को कोई परवाह नहीं, बस सबको राहुल गांधी की फ़िक्र है. राहुल गांधी देश से बाहर नहीं जाने चाहिए, सबकी नज़रों के सामने यहीं रहने चाहिए.

क़ाबिले-ग़ौर है कि 13 जून को उन्होंने ट्विटर पर लिखा, मैं अपनी नानी और परिवार से मिलने के लिए जा रहा हूं. कुछ दिन बाहर रहूंगा. हम साथ में अच्छा वक़्त बिताएंगे. चर्चा है कि वे अपने ननिहाल इटली के छोटे से शहर लुसिआना जा रहे हैं. इससे पहले 31 दिसंबर 2016 को उन्होंने ट्वीट कर छुट्टी पर जाने की जानकारी दी थी. उन्होंने लिखा था, "अगले कुछ दिनों तक यात्रा पर रहूंगा. आप सभी को नववर्ष की शुभकामनाएं. आप और आपके प्रियजन आने वाले इस साल में कामयाबी और ख़ुशियां हासिल करें. "
उस वक़्त देश में नोटबंदी चल रही थी. जनता नोटबंदी, महंगाई और भ्रष्टाचार से बेहाल थी. देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने थे. उन्होंने चुनावी मुहिम शुरू कर दी थी. वे खाट सभाएं कर रहे थे, लेकिन वे चुनावी मुहिम बीच में ही छोड़ कर छुट्टियां मनाने के लिए लंदन चले गए थे. फिर वे 10 दिन बाद स्वदेश लौटे.

राहुल गांधी  साल 2015 में बिहार के विधानसभा चुनाव से पहले फ़्रांस गए थे. उनकी फ़रवरी 2015 की छुट्टियां सबसे ज़्यादा सुर्ख़ियों में रहीं. वे अचानक विदेश चले गए और जब वे 57 दिन बाद दिल्ली लौटे तो पता चला कि वह बैंकाक और म्यामांर गए थे. वहां उन्होंने ध्यान करना भी सीखा. इससे पहले वे
नवंबर 2014 में विदेश गए थे. तब संसद तक में उनकी छुट्टी पर सवाल उठाए गए थे, तब कांग्रेस ने कहा था कि वे एक सेमिनार में शिरकत करने के लिए अमेरिका गए हैं. वे साल 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले भी विदेश गए थे. उस दौरान उन्हें एक खुली जीप पर राहुल गांधी की तस्वीर ने सुर्खि़यां बटोरी थीं. तस्वीर शेयर करने वाले का दावा था कि यह तस्वीर रणथंभौर के नेशनल पार्क की है. हालांकि कांग्रेस की तरफ़ से इस पर कोई टिप्पणी नहीं थी. राहुल गांधी जून 2013 में भी छुट्टियां मनाने के लिए विदेश गए थे. उस वक़्त उत्तराखंड बाढ़ से जूझ रहा था. प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी. उससे पहले वे 2012 में नये साल की छुट्टियां मनाने फ्रांस गए थे.

राहुल गांधी का छुट्टियों पर जाना शायद इसलिए भी सुर्ख़ियों में रहता हैं, क्योंकि वे अकसर ऐसे वक़्त विदेश जाते हैं, जब देश में उनकी ज़्यादा ज़रूरत महसूस की जा रही है. हाल-फ़िलहाल की बात करें, तो मध्य प्रदेश के मंदसौर में किसानों पर गोली चलाकर उन्हें मारने के बाद से देश में किसान आक्रोश में हैं. ख़ुद राहुल राहुल गांधी पीडि़त किसानों से मिलने गए और उन्हें हिम्मत दिलाई, दिलासा दिया कि वे और कांग्रेस हमेशा किसानों के साथ हैं. ऐसे में जब देशभर के किसानों को उनकी ज़रूरत है, तो ऐसे में उनका बाहर जाना खलता ज़रूर है.

हैरत तो तब होती है, जब सरकार में बैठे लोग राहुल गांधी के बारे में सवाल पूछते हैं कि वे कहां गए हैं और कब आएंगे. जगज़ाहिर है कि राहुल गांधी की सुरक्षा का ज़िम्मा विशेष सुरक्षा दल यानी स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (एसपीजी) को मिला हुआ है. इस लिहाज़ से सरकार को इस बात की पूरी जानकारी रहती है कि राहुल गांधी कब और कहां गए हैं, कब आएंगे. ऐसे में उनकी छुट्टियों पर सवाल उठाना सही नहीं है. और लोगों की तरह उन्हें भी छुट्टियों पर जाने का हक़ है. वे कब और कहां छुट्टियां मनाने जाएंगे इसका अख़्तियार भी उन्हें है. इसलिए किसी की ज़ाती ज़िन्दगी में दख़ल देना अख़्लाक़ के ख़िलाफ़ है.

Friday, June 16, 2017

सियासत

फ़िरदौस ख़ान
सियासत में तीन तरह के लोग हुआ करते हैं... पहले वो, जिन्हें सियासत विरासत में मिलती है... जिन्होंने सियासत में आने के लिए कोई जद्दो-जहद नहीं की... दूसरे वो, जो कार्यकर्ता बनकर आए और अपनी मेहनत और मह्त्वाकांक्षा से उन्होंने अपनी पहचान बनाई... और तीसरे वो लोग, जिन्होंने सारी ज़िन्दगी एक कार्यकर्ता की हैसियत से सियासत में गुज़ार दी... उन्हें न कोई ओहदा मिला, ना कोई नाम मिला और न ही कोई दाम मिला... इसके बावजूद वे अपनी पार्टी के लिए हमेशा वफ़ादार रहे... ऐसे ही लोगों के दम पर सियासी दल अपना वजूद क़ायम किए हुए हैं... 

Monday, June 12, 2017

नेशनल हेराल्ड से उम्मीद जगी

फ़िरदौस ख़ान
अख़बारों का काम ख़बरों और विचारों को जन मानस तक पहुंचाना होता है. सूचनाओं के इसी प्रसार-प्रचार को पत्रकारिता कहा जाता है. किसी ज़माने में मुनादी के ज़रिये हुकमरान अपनी बात अवाम तक पहुंचाते थे. लोकगीतों के ज़रिये भी हुकुमत के फ़ैसलों की ख़बरें अवाम तक पहुंचाई जाती थीं. वक़्त के साथ-साथ सूचनाओं के आदान-प्रदान के तरीक़ों में भी बदलाव आया. पहले जो काम मुनादी के ज़रिये हुआ करते थे, अब उन्हें अख़बार, पत्रिकाएं, रेडियो, दूरदर्शन और वेब साइट्स अंजाम दे रही हैं. पत्रकारिता का मक़सद जनमानस को न सिर्फ़ नित नई सूचनाओं से अवगत कराना है, बल्कि देश-दुनिया में घट रही घटनाओं से उन पर क्या असर होगा, यह बताना भी है.  लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि जिस तरह पिछले चंद सालों में कुछ मीडिया घरानों ने पत्रकारिता के तमाम क़ायदों को ताख़ पर रखकर ’कारोबारी’ राह अपना ली है, उससे मीडिया के प्रति जनमानस का भरोसा कम हुआ है. ऐसा नहीं है कि सभी अख़बार या ख़बरिया चैनल बिकाऊ हैं. कुछ अपवाद भी हैं. जिस देश का मीडिया बिकाऊ होगा, उस देश के लोगों की ज़िन्दगी आसान नहीं होगी. पिछले कई साल से देश में अराजकता का माहौल बढ़ा है. जिस तरह से सरेआम लोगों पर हमला करके उनकी हत्याएं की जा रही हैं, अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाने वाले दलितों, किसानों पर गोलियां बरसाई जा रही हैं, ऐसे में मीडिया की ख़ामोशी बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देती है. अराजकता भरे दौर में ऐसे अख़बारों की ज़रूरत महसूस की जा रही है, जो सच्चे हों, जिन पर अवाम भरोसा कर सके, जो चंद सिक्कों के लिए अपना ज़मीर न बेचें, जो जनमानस को गुमराह न करें.

ऐसे में कांग्रेस के अख़बार नेशनल हेराल्ड के प्रकाशन का शुरू होना, ख़ुशनुमा अहसास है. गुज़श्ता 12 जून कोकर्नाटक की राजधानी बंगलुरु में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की मौजूदगी में इसके संस्मरणीय संस्करण का लोकार्पण किया गया. यह अख़बार दिल्ली से साप्ताहिक प्रकाशित किया जाएगा.  इस मौक़े पर राहुल गांधी ने कहा कि मौजूदा वक़्त में जो लोग सच्चाई के साथ हैं, उन्हें दरकिनार किया जा रहा है. दलितों को मारा जा रहा है, अल्पसंख्यकों को सताया जा रहा है और मीडिया को धमकाया जा रहा है. उन्होंने कहा कि नेशनल हेराल्ड के एडिटर एक दिन मेरे पास आए. मैंने उनसे कहा, अगर आपको किसी दिन कांग्रेस पार्टी या मेरे ख़िलाफ़ कुछ लिखना हो, तो बिना ख़ौफ़ के लिखें. ये वो चीज़ है, जो हम नेशनल हेराल्ड से चाहते हैं. सच्चाई से डरने की ज़रूरत नहीं है और ना चुप रहने की.

ग़ौरतलब है कि जवाहरलाल नेहरू और स्वतंत्रता सेनानियों ने लखनऊ से 9 सितंबर, 1938 को नेशनल हेराल्ड नाम से एक अख़बार शुरू किया था. उस वक़्त यह अख़बार जनमानस की आवाज़ बना और जंगे-आज़ादी में इसने अहम किरदार अदा किया. शुरुआती दौर में जवाहरलाल नेहरू ही इसके संपादक थे. प्रधानमंत्री बनने तक वे हेराल्ड बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स के चेयरमैन भी रहे. उन्होंने अख़बार के अंतर्राष्ट्रीय संवाददाता के तौर पर भी काम किया. अख़बार लोकप्रिय हुआ. साल 1968 में दिल्ली से इसके संस्करण का प्रकाशन शुरू हो गया.  हिंदी में नवजीवन और उर्दू में क़ौमी आवाज़ के नाम से इसके संस्करण प्रकाशित होने लगे. अख़बार को कई बार बुरे दौर से गुज़रना पड़ा और तीन बार इसका प्रकाशन बंद किया गया. पहली बार यह अंग्रेज़ी शासनकाल में उस वक़्त बंद हुआ, जब अगस्त 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारतीय अख़बारों के ख़िलाफ़ दमनकारी रवैया अपनाया था. नतीजतन, 1942 से 1945 तक नेशनल हेराल्ड को अपना प्रकाशन बंद करना पड़ा. फिर साल 1945 में अख़बार का प्रकाशन शुरू किया गया. साल 1946 में फ़िरोज़ गांधी को नेशनल हेराल्ड का प्रबंध निदेशक का कार्यभार सौंपा गया. वे 1950 तक उन्होंने इसकी ज़िम्मेदारी संभाली. इस दौरान अख़बार की माली हालत में भी कुछ सुधार हुआ. लेकिन आपातकाल के बाद 1977 के चुनाव में इंदिरा गांधी की हार के बाद अख़बार को दो साल के लिए बंद कर दिया गया.  कुछ वक़्त बाद अख़बार शुरू हुआ, लेकिन साल 1986 में एक बार फिर से इस पर संकट के बादल मंडराने लगे, लेकिन राजीव गांधी के दख़ल की वजह से इसका प्रकाशन होता रहा. मगर माली हालत ख़राब होने की वजह से अप्रैल 2008 में इसे बंद कर दिया गया.

क़ाबिले-ग़ौर है कि असोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड कंपनी (एजेएल ) के तहत नेशनल हेराल्ड का प्रकाशन किया जाता था, जो एक सेक्शन-25 कंपनी थी. इस तरह की कंपनियों का मक़सद कला-साहित्य आदि को प्रोत्साहित करना होता है. मुनाफ़ा कमाने के लिए इनका इस्तेमाल नहीं किया जाता. मुनाफ़ा न होने के बावजूद यह कंपनी काफ़ी अरसे तक नुक़सान में चलती रही. कांग्रेस ने असोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड कंपनी को चलाए रखने के लिए कई साल तक बिना ब्याज़ के उसे क़र्ज़  दिया. मार्च 2010 तक कंपनी को दिया गया क़र्ज़ 89.67 करोड़ रुपये हो गया. बताया जाता है कि कंपनी के पास दिल्ली और मुंबई समेत कई शहरों में रीयल एस्टेट संपत्तियां हैं. इसके बावजूद कंपनी ने कांग्रेस का क़र्ज़ नहीं चुकाया. पार्टी के वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा को 22 मार्च 2002 को कंपनी के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक की ज़िम्मेदारी सौंपी गई. इसके कई साल बाद 23 नवंबर 2010 को यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड नाम की सेक्शन-25 कंपनी सामने आई. गांधी परिवार के क़रीबी सुमन दुबे और सैम पित्रोदा जैसे लोग इसके निदेशक थे. अगले महीने 13 दिसंबर 2010 को राहुल गांधी को इस कंपनी का निदेशक बनाया गया. अगले ही साल 22 जनवरी 2011 को सोनिया गांधी भी यंग इंडिया के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स में शामिल हो गईं. उनके साथ-साथ  मोतीलाल वोरा और कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य ऑस्कर फ़र्नांडीज भी यंग इंडियन के बोर्ड में शामिल किए गए. इस कंपनी के 38-38 फ़ीसद शेयरों पर सोनिया गांधी और राहुल गांधी की हिस्सेदारी है, जबकि के 24 फ़ीसद शेयर मोतीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडीज के नाम हैं. दिसंबर 2010 में असोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड कंपनी के प्रबंधकों ने 90 करोड़ रुपये के क़र्ज़ बदले पूरी कंपनी यंग इंडियन के हवाले कर दी. यंग इंडियन ने इस अधिग्रहण के लिए 50 लाख रुपये का भुगतान किया. इस तरह यह कंपनी यंग इंडियन की सहायक कंपनी बन गई.

बहरहाल, कांग्रेस ने नेशनल हेराल्ड शुरू करके सराहनीय काम किया है. पिछले कुछ अरसे से ऐसे ही अख़बार की ज़रूरत महसूस की जा रही थी. आज का अख़बार कल का साहित्य है, इतिहास है. अख़बार दुनिया और समाज का आईना हैं. देश-दुनिया में में जो घट रहा है, वह सब सूचना माध्यमों के ज़रिये जन-जन तक पहुंच रहा है. आज के अख़बार-पत्रिकाएं भविष्य में महत्वपूर्ण दस्तावेज़ साहिब होंगे, क्योंकि इनके ज़रिये ही आने वाली पीढ़ियां आज के हालात के बारे में जान पाएंगी. इसके ज़रिये ही लोगों को समाज की उस सच्चाई का पता चलता है, जिसका अनुभव उसे ख़ुद नहीं हुआ है. साथ ही उस समाज की संस्कृति और सभ्यता का भी पता चलता है. पत्रकारिता सरकार और जनता के बीच सेतु का काम करती है. अख़बारों के ज़रिये अवाम को सरकार की नीतियों और उसके कार्यों का पता चलता है. ठीक इसी तरह अख़बार जनमानस की बुनियादी ज़रूरतों, समस्याओं और उनकी आवाज़ को सरकार तक पहुंचाने का काम करते हैं.

यह बात समझनी होगी कि मीडिया का काम ’सरकार’ या ’वर्ग’ विशेष का गुणगान करना नहीं है. जहां सरकार सही है, वहां सरकार की सराहना की जानी चाहिए, लेकिन जब सत्ताधारी लोग तानाशाही रवैया अपनाते हुए जनता पर क़हर बरपाने लगें, तो उसका पुरज़ोर विरोध होना ही चाहिए.  मीडिया को जनता की आवाज़ बनना चाहिए, न कि सरकार का भोंपू.
चूंकि, नेशनल हेराल्ड एक सियासी पार्टी का अख़बार है, इसलिए इसे अवाम में अपनी साख बनाए रखने के लिए फूंक-फूंक कर क़दम रखना होगा. इसके हिन्दी, उर्दू व अन्य भाषाओं के संस्करण भी प्रकाशित होने चाहिए.

Tuesday, June 6, 2017

जनवादी पत्रकारिता की बात करें

फ़िरदौस ख़ान
ख़बरों और विचारों को जन मानस तक पहुंचाना ही पत्रकारिता है. किसी ज़माने में मुनादी के ज़रिये हुकमरान अपनी बात अवाम तक पहुंचाते थे. लोकगीतों के ज़रिये भी हुकुमत के फ़ैसलों की ख़बरें अवाम तक पहुंचाई जाती थीं. वक़्त के साथ-साथ सूचनाओं के आदान-प्रदान के तरीक़ों में भी बदलाव आया. पहले जो काम मुनादी के ज़रिये हुआ करते थे, अब उन्हें अख़बार, पत्रिकाएं, रेडियो, दूरदर्शन और वेब साइट्स अंजाम दे रही हैं. पत्रकारिता का मक़सद जनमानस को न सिर्फ़ नित नई सूचनाओं से अवगत कराना है, बल्कि देश-दुनिया में घट रही घटनाओं से उन पर क्या असर होगा, यह बताना भी है.

आज का अख़बार कल का साहित्य है, इतिहास है. अख़बार दुनिया और समाज का आईना हैं. देश-दुनिया में में जो घट रहा है, वह सब सूचना माध्यमों के ज़रिये जन-जन तक पहुंच रहा है. आज के अख़बार-पत्रिकाएं भविष्य में महत्वपूर्ण दस्तावेज़ साहिब होंगे, क्योंकि इनके ज़रिये ही आने वाली पीढ़ियां आज के हालात के बारे में जान पाएंगी. इसके ज़रिये ही लोगों को समाज की उस सच्चाई का पता चलता है, जिसका अनुभव उसे ख़ुद नहीं हुआ है. साथ ही उस समाज की संस्कृति और सभ्यता का भी पता चलता है. पत्रकारिता सरकार और जनता के बीच सेतु का काम करती है. अख़बारों के ज़रिये अवाम को सरकार की नीतियों और उसके कार्यों का पता चलता है. ठीक इसी तरह अख़बार जनमानस की बुनियादी ज़रूरतों, समस्याओं और उनकी आवाज़ को सरकार तक पहुंचाने का काम करते हैं.

आज राष्ट्रवादी पत्रकारिता की बात हो रही है. पत्रकारिता तो होती ही राष्ट्रवादी है. ऐसे में राष्ट्रवादी पत्रकारिता की बात समझ से परे है.  हालांकि पत्रकारिता की शुरुआत सूचना देने से हुई थी, लेकिन बदलते वक़्त के साथ इसका दायरा बढ़ता गया. इसमें विचार भी शामिल हो गए. पत्रकारिता के इतिहास पर नज़र डालें, तो ये बात साफ़ हो जाती है. माना जाता है कि पत्रकारिता 131 ईस्वी पूर्व रोम में शुरू हुई. उस वक़्त Acta Diurna नामक दैनिक अख़बार शुरू किया गया. इसमें उस दिन होने वाली घटनाओं का लेखा-जोखा होता था. ख़ास बात यह थी कि यह अख़बार काग़ज़ का न होकर पत्थर या धातु की पट्टी का था. इस पर उस दिन की ख़ास ख़बरें अंकित होती थीं. इन पट्टियों को शहर की ख़ास जगहों पर रखा जाता था, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग इन्हें पढ़ सकें. इनके ज़रिये लोगों को आला अफ़सरों की तैनाती, शासन के फ़ैसलों और दूसरी ख़ास ख़बरों की जानकारी मिलती थी. फिर मध्यकाल में यूरोप के कारोबारी केंद्र सूचना-पत्र निकालने लगे, जिनमें कारोबार से जुड़ी ख़बरें होती थीं. इनके ज़रिये व्यापारियों को वस्तुओं, ख़रीद-बिक्री और मुद्रा की क़ीमत में उतार-चढ़ाव की ख़बरें मिल जाती थीं. ये सूचना-पत्र हाथ से लिखे जाते थे. पंद्रहवीं सदी के बीच 1439 में जर्मन के मेंज में रहने वाले योहन गूटनबर्ग ने छपाई मशीन का आविष्कार किया. उन्होंने धातु के अक्षरों का आविष्कार किया. इसके ज़रिये छपाई का काम आसान हो गया. सोलहवीं सदी के आख़िर तक यूरोप के शहर स्त्रास्बुर्ग में सूचना-पत्र मशीन से छपने लगे. उस वक़्त यह काम योहन कारोलूस नाम के एक कारोबारी ने शुरू किया. उसने 1605 में ‘रिलेशन’ नामक समाचार-पत्र का प्रकाशन शुरू किया, जो दुनिया का पहला मुद्रित समाचार-पत्र माना जाता है.
भारत में साल 1674 में छपाई मशीन आई.  लेकिन इसका इस्तेमाल नहीं हुआ. देश का पहला अख़बार शुरू होने में सौ साल से ज़्यादा का वक़्त लगा, यानी साल 1776 में अख़बार का प्रकाशन शुरू हो सका.  ईस्ट इंडिया कंपनी के पूर्व अधिकारी विलियम वोल्ट्स ने अंग्रेज़ी भाषा के अख़बार का प्रकाशन शुरू किया, जिसमें कंपनी और सरकार की ख़बरें होती थीं. यह एक तरह का सूचना-पत्र थी, जिसमें विचार नहीं थे. इसके बाद साल 1780 में जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने ‘बंगाल गज़ट’ नाम का अख़बार शुरू किया, जिसमें ख़बरों के साथ विचार भी थे. हक़ीक़त में यही देश का सबसे पहला अख़बार था. इस अख़बार में ईस्ट इंडिया कंपनी के आला अफ़सरों की ज़िन्दगी पर आधारित लेख प्रकाशित होते थे. मगर जब अख़बार ने गवर्नर की पत्नी के बारे में टिप्पणी की, तो अख़बार के संपादक जेम्स ऑगस्टस हिक्की को चार महीने की क़ैद और 500 रुपये का जुर्माने की सज़ा भुगतनी पड़ी. सज़ा के बावजूद जेम्स ऑगस्टस हिक्की हुकूमत के आगे झुके नहीं और बदस्तूर लिखते रहे.  गवर्नर और सर्वोच्च न्यायाधीश की आलोचना करने पर उन्हें एक साल की क़ैद और पांच हज़ार रुपये जुर्माने की सज़ा दी गई. नतीजतन, अख़बार बंद हो गया. साल 1790 के बाद देश में अंग्रेज़ी भाषा के कई अख़बार शुरू हुए, जिनमें से ज़्यादातर सरकार का गुणगान ही करते थे. मगर इनकी उम्र ज़्यादा नहीं थी. रफ़्ता-रफ़्ता ये बंद हो गए.

साल 1818 में ब्रिटिश व्यापारी जेम्स सिल्क बर्किघम ने ’कलकत्ता जनरल’ प्रकाशन किया. इसमें जनता की ज़रूरत को ध्यान में रखकर प्रकाशन सामग्री प्रकाशित की जाती थी. आधुनिक पत्रकारिता का यह रूप जेम्स सिल्क बर्किघम का ही दिया हुआ है. ग़ौरतलब है कि पहला भारतीय अंग्रेज़ी अख़बार साल 1816 में कलकत्ता में गंगाधर भट्टाचार्य ने शुरू किया. 'बंगाल गज़ट' नाम का यह अख़बार साप्ताहिक था.  साल 1818 में बंगाली भाषा में 'दिग्दर्शन' मासिक पत्रिका और साप्ताहिक समाचार पत्र 'समाचार दर्पण’ का प्रकाशन शुरू हुआ.  साल 1821 में राजा राममोहन राय ने बंगाली भाषा का अख़बार शुरू किया, जिसका नाम था- संवाद कौमुदी’ यानी बुद्धि का चांद. भारतीय भाषा का यह पहला समाचार-पत्र था. उन्होंने साल 1822 में 'समाचार चंद्रिका' भी शुरू की.  उन्होंने साल 1822 में फ़ारसी भाषा में 'मिरातुल' अख़बार और अंग्रेज़ी भाषा में 'ब्राह्मनिकल मैगज़ीन' का प्रकाशन शुरू किया. साल 1822 में गुजराती भाषा का साप्ताहिक ‘मुंबईना समाचार’ प्रकाशन शुरू हुआ, जो आज भी छप रहा है. यह भारतीय भाषा का सबसे पुराना अख़बार है. हिन्दी भाषा का पहला अख़बार ‘उदंत मार्तंड’ साल 1826 में शुरू हुआ, लेकिन माली हालत ठीक न होने की वजह से यह बंद हो गया.  साल 1830 में राजा राममोहन राय ने बंगाली भाषा में 'बंगदूत' का प्रकाशन शुरू किया. साल 1831 में मुंबई में गुजराती भाषा में 'जामे जमशेद' और 1851 में 'रास्त गोफ़्तार' और 'अख़बारे-सौदागार' का प्रकाशन शुरू हुआ.  साल 1846 में राजा शिव प्रसाद ने हिंदी पत्र ‘बनारस अख़बार’ शुरू किया.  साल 1868 में भरतेंदु हरिशचंद्र ने साहित्यिक पत्रिका ‘कविवच सुधा’ शुरू की. साल 1854 में हिंदी का पहला दैनिक ‘समाचार सुधा वर्षण’ का प्रकाशन शुरू हुआ. साल 1868 में मोतीलाल घोष ने आनंद बाज़ार पत्रिका निकाली. इनके अलावा इस दौरान बंगवासी, संजीवनी, हिन्दू, केसरी, बंगाली, भारत मित्र, हिन्दुस्तान, हिन्द-ए-स्थान, बम्बई दर्पण, कविवचन सुधा, हरिश्चन्द्र मैगजीन, हिन्दुस्तान स्टैंडर्ड, ज्ञान प्रदायिनी, हिन्दी प्रदीप, इंडियन रिव्यू, मॉडर्न रिव्यू, इनडिपेंडेस, द ट्रिब्यून, आज, हिन्दुस्तान टाइम्स, प्रताप पत्र, गदर, हिन्दू पैट्रियाट, मद्रास स्टैंडर्ड, कॉमन वील, न्यू इंडिया और सोशलिस्ट आदि अख़बारों का प्रकाशन शुरू हुआ. महात्मा गांधी ने यंग इंडिया, नव जीवन और हरिजन अख़बार शुरू किए.  जवाहरलाल नेहरू ने नेशनल हेराल्ड और अबुल कलाम आज़ाद ने अल बिलाग का प्रकशन शुरू किया. मौलाना मुहम्मद अली ने कामरेड और हमदर्द नाम से अख़बार निकाले.

इन अख़बारों ने अवाम को ख़बरें देने के साथ-साथ सामाजिक उत्थान के लिए काम किया. अख़बारों के ज़रिये समाज में फैली कुरीतियों के प्रति जनमानस को जागरूक करने की कोशिश की गई. देश को आज़ाद कराने में भी इन अख़बारों ने अपना अहम किरदान अदा किया. शुरू से आज तक अख़बार समाज और जीवन के हर क्षेत्र में अपना दात्यित बख़ूबी निभाते आए हैं. विभिन्न संस्कृतियों और और अलग-अलग धर्मों वाले इस देश में अख़बार सबको एकता के सूत्र में पिरोये हुए हैं. गंगा-जमुनी तहज़ीब को बढ़ावा देने में अख़बार भी आगे रहे हैं. पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है. यह स्तंभ बाक़ी तीन स्तंभों विधायिका, कार्यपालिका और न्‍यायपालिका की कार्यशैली पर भी नज़र रखता है.

अफ़सोस की बात यह है कि जिस तरह पिछले चंद सालों में कुछ मीडिया घरानों ने पत्रकारिता के तमाम क़ायदों को ताख़ पर रखकर ’कारोबारी’ राह अपना ली है, उससे मीडिया के प्रति जनमानस का भरोसा कम हुआ है. ऐसा नहीं है कि सभी अख़बार या ख़बरिया चैनल बिकाऊ हैं. कुछ अपवाद भी हैं. जिस देश का मीडिया बिकाऊ होगा, उस देश के लोगों की ज़िन्दगी आसान नहीं होगी. पिछले कई साल से देश में अराजकता का माहौल बढ़ा है. जिस तरह से सरेआम लोगों पर हमला करके उनकी हत्याएं की जा रही हैं, अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाने वाले दलितों, किसानों पर गोलियां बरसाई जा रही हैं, ऐसे में मीडिया की ख़ामोशी बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देती है.

यह बात समझनी होगी कि मीडिया का काम ’सरकार’ या ’वर्ग’ विशेष का गुणगान करना नहीं है. जहां सरकार सही है, वहां सरकार की सराहना की जानी चाहिए, लेकिन जब सत्ताधारी लोग तानाशाही रवैया अपनाते हुए जनता पर क़हर बरपाने लगें, तो उसका पुरज़ोर विरोध होना ही चाहिए.  मीडिया को जनता की आवाज़ बनना चाहिए, न कि सरकार का भोंपू. इसलिए जनवादी पत्रकारिता की बात करें.
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में संपादक हैं)

Friday, June 2, 2017

महिलाओं के हक़ में एक और बेहतरीन फ़ैसला

फ़िरदौस ख़ान
देश में हज़ारों-लाखों ऐसी महिलाएं होंगी, जो अकेले दम पर अपने बच्चों की परवरिश कर रही हैं. इनमें से बहुत सी ऐसी महिलाएं हैं, जिनके पति की मौत हो चुकी है. बहुत सी ऐसी महिलाएं हैं, जिनका तलाक़ हो गया है और बहुत सी ऐसी महिलाएं भी हैं, जिनके पति उन्हें छोड़कर चले गए हैं. ऐसी हालत में बच्चों की अच्छी परवरिश करना, उन्हें शिक्षा दिलाना आसान काम नहीं है. आसान काम इसलिए नहीं है, क्योंकि भारत जैसे पितृ सत्तामक समाज में महिलाओं जो हर क़दम पर पुरुष के नाम की ज़रूरत पड़ती है. शादी से पहले उसे पिता के नाम की ज़रूरत होती है और शादी के बाद पति का नाम उसके लिए अनिवार्य कर दिया जाता है. लेकिन जिनके पिता नहीं हैं, पति नहीं हैं, वे महिलाएं कहां जाएं. क्या महिला का अपना वजूद ही उसके लिए काफ़ी नहीं है. जो महिला जननी है, जो पुरुष को जन्म देकर इस दुनिया में लाती है, समाज ने उसे इतना बेबस और मजबूर क्यों बना दिया है. शायद इसलिए कि पुरुष महिलाओं की शक्ति को जानता है, पहचानता है. उसे डर है कि जिस दिन महिला अपने अस्तित्व को, अपनी शक्ति को जान जाएगी, पहचान जाएगी, उस दिन वह उसकी ग़ुलामी से निकल जाएगी. महिलाओं को बांधने के लिए उसने तरह-तरह के नियम-क़ायदे गढ़े और महिलाओं को उन्हें मानने पर मजबूर किया. इसके लिए उसने महिलाओं का भी सहारा लिया. मगर अब वक़्त बदल रहा है. महिलाओं ने ख़ुद को समझनी शुरू कर दिया है. वे अपने अस्तित्व को जानने लगी हैं, अपनी शक्ति को पहचानने लगी हैं. नतीतजन, समाज में बदलाव की हवा चलने लगी है,  देश की सरकारें महिलाओं के हक़ में फ़ैसले करने लगी हैं. इसकी ताज़ा मिसाल है विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी)  द्वारा डिग्री पर पिता का नाम वैकल्पिक बनाने की दिशा में काम करना.

ग़ौरतलब है कि पिछले महीने महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को पत्र लिखकर छात्रों के डिग्री प्रमाण पत्र पर पिता के नाम की अनिवार्यता संबंधी नियम में बदलाव का आग्रह किया था. अपने पत्र में उन्होंने लिखा था, मेरी मुलाक़ात ऐसी कई महिलाओं से हुई, जो अपने पति को छोड़ चुकी हैं. ऐसी महिलाएं भारी कठिनाइयों का सामना कर रही हैं. उन्हें बच्चों का डिग्री प्रमाण पत्र लेने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. पिता के नाम के बग़ैर प्रमाण पत्र नहीं मिलता है. उन्होंने यह भी लिखा था कि शादी का टूटना अथवा पति से अलग रहना आज के दौर की कटु सच्चाई है. लिहाजा हमें अकेली मां के दर्द को समझना होगा. उनकी समस्याओं का समाधान करने के लिए नियमों में बदलाव करना वक़्त की मांग है. मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का कहना है कि छात्र अपनी इच्छा से माता या पिता के नाम का उल्लेख कर सकते हैं. हम इस विचार को पसंद करते हैं और हमें कोई आपत्ति नहीं है. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के मश्विरे पर मानव संसाधन विकास (एचआरडी) मंत्रालय की सैद्धांतिक सहमति के बाद यूजीसी यह क़दम उठाएगा.

क़ाबिले-ग़ौर यह भी है कि पिछले साल मेनका गांधी की पहल पर विदेश मंत्रालय ने अपना पासपोर्ट आवेदन नियम बदल दिया था. मेनका गांधी ने अकेली मां प्रियंका गुप्ता की उस ऑनलाइन याचिका का संज्ञान लिया था, जिसमें पासपोर्ट आवेदन पत्र से पिता के नाम की अनिवार्यता ख़त्म करने का अनुरोध किया गया था. इस संबंध में मेनका गांधी ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को पत्र लिखकर पासपोर्ट आवेदन पत्र पर पिता के नाम की अनिवार्यता ख़त्म करने का आग्रह किया था. इसके बाद विदेश मंत्रालय ने ऐलान किया था कि पासपोर्ट आवेदन पत्र में माता या पिता में से किसी एक का नाम होना चाहिए. दोनों के नाम की ज़रूरत नहीं है.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि हमारे देश में महिलाओं की हालत अच्छी नहीं है. अच्छी इसलिए नहीं है, क्योंकि आज भी उन्हें पुरुष से कमतर माना जाता है. उनके जन्म पर घर मातम पसर जाता है, जबकि लड़के के जन्म पर लड्डू बांटे जाते हैं. मंगल गीत गाए जाते हैं, उत्सव मनाए जाते हैं. यह बात अलग है कि उन्हें देवी मानकर पूजा जाता है. यही वह समाज है, जो एक तरफ़ मंदिर में रखी देवी की प्रतिमा की पूजा भी करता है, वहीं दूसरी तरफ़ महिलाओं की कोख में क्न्या भ्रूण की हत्या करता है. कभी कन्या भ्रूण की हत्या की जाती है, तो कभी जन्म के बाद उसकी हत्या कर दी जाती है. कभी ससुराल में घर की लक्ष्मी मानी जाने वाली बहू को दहेज के लिए ज़िन्दा जला दिया जाता है. इन सबके बीच अच्छी बात यह है कि अब महिलाओं ने अपने हक़ के लिए आवाज़ उठानी शुरू कर दी है. हालात बदलने लगे हैं. महिलाएं घर की चहारदीवारे से बाहर आकर पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं. सरकार भी महिलाओं के हक़ में लगातार अच्छे फ़ैसले ले रही है, जिससे उनकी ज़िन्दगी की मुश्किलें कम हो सकें.

हाल ही में सरकार ने नई राष्ट्रीय महिला नीति बनाने की भी बात कही है, जिसमें उन्हें कई अधिकार मिल जाएंगे. बहरहाल, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के फ़ैसले से उन महिलाओं को बहुत राहत मिलेगी, जो अकेले अपने बच्चों की परवरिश कर रही हैं. इससे उन बच्चों को भी फ़ायदा होगा, जिनके पिता उनके साथ नहीं हैं. उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार आगे भी महिलाओं के अच्छे फ़ैसले करती रहेगी. वैसे अकेली महिलाओं को अधिकार दिए जाने से ज़्यादा ज़रूरी है कि हम उनका सम्मान करना सीखें. अगर समाज में महिलाओं के साथ होने वाले बुरे बर्ताव को ख़त्म कर दिया जाए और हमारी कथनी-करनी में कोई अंतर न रहे, तो किसी भी महिला को अपने पिता या पति से अलग रहना ही नहीं पड़ेगा. इसके लिए ज़रूरी है कि हम अपनी सोच में बदलाव लाएं. देश में महिलाओं के सम्मान से रहने लाय़क माहौल बनाएं.

Thursday, May 25, 2017

या ख़ुदा तूने अता फिर कर दिया रमज़ान है...


फ़िरदौस ख़ान
मरहबा सद मरहबा आमदे-रमज़ान है
खिल उठे मुरझाए दिल, ताज़ा हुआ ईमान है
हम गुनाहगारों पे ये कितना बड़ा अहसान है
या ख़ुदा तूने अता फिर कर दिया रमज़ान है...
माहे-रमज़ान इबादत, नेकियों और रौनक़ का महीना है. यह हिजरी कैलेंडर का नौवां महीना होता है. इस्लाम के मुताबिक़ अल्लाह ने अपने बंदों पर पांच चीज़ें फ़र्ज क़ी हैं, जिनमें कलमा, नमाज़, रोज़ा, हज और ज़कात शामिल है. रोज़े का फ़र्ज़ अदा करने का मौक़ा रमज़ान में आता है. कहा जाता है कि रमज़ान में हर नेकी का सवाब 70 नेकियों के बराबर होता है और इस महीने में इबादत करने पर 70 गुना सवाब हासिल होता है. इसी मुबारक माह में अल्लाह ने हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर क़ु़रआन नाज़िल किया था. यह भी कहा जाता है कि इस महीने में अल्लाह शैतान को क़ैद कर देता है.

इबादत
रमज़ान से पहले मस्जिदों में रंग-रोग़न का काम पूरा कर लिया जाता है. मस्जिदों में शामियाने लग जाते हैं. रमज़ान का चांद देखने के साथ ही इशा की नमाज़ के बाद तरावीह पढ़ने का सिलसिला शुरू हो जाता है. रमज़ान के महीने में जमात के साथ क़ियामुल्लैल (रात को नमाज़ पढ़ना) करने को 'तरावीह' कहते हैं. इसका वक्त रात में इशा की नमाज़ के बाद फ़ज्र की नमाज़ से पहले तक है. हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने रमज़ान में क़ियामुल्लैल में बेहद दिलचस्पी ली. आपने फ़रमाया कि ''जिसने ईमान के साथ और अज्र व सवाब (पुण्य) हासिल करने की नीयत से रमज़ान में क़ियामुल्लैल किया, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाएंगे.''उन्होंने फ़रमाया कि ''यह ऐसा महीना है कि इसका पहला हिस्सा अल्लाह की रहमत है, दरमियानी हिस्सा मग़फ़िरत है और आख़िरी हिस्सा जहन्नुम की आग से छुटकारा है.'' रमज़ान के तीसरे हिस्से को अशरा भी कहा जाता है. आपने फ़रमाया कि ''रमज़ान के आख़िरी अशरे की ताक़ (विषम) रातों में लैलतुल क़द्र की तलाश करो.'' लैलतुल क़द्र को शबे-क़द्र भी कहा जाता है. शबे-क़द्र के बारे में क़ुरआन में कहा गया है कि यह हज़ार रातों से बेहतर है, यानि इस रात में इबादत करने का सवाब एक हज़ार रातों की इबादत के बराबर है. मुसलमान रमज़ान की 21, 23, 25, 27 और 29 तारीख़ को पूरी रात इबादत करते हैं.

ख़ुशनूदी ख़ान कहती हैं- इस महीने में क़ुरआन नाज़िल हुआ, इसलिए रमज़ान बहुत ख़ास है. हर मुसलमान के लिए यह महीना मुक़द्दस और आला है. हमें इस महीने की अहमियत को समझते हुए ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त इबादत में गुज़ारना चाहिए. वैसे भी रमज़ान में हर नेकी और इबादत का सवाब साल के दूसरे महीनों से ज़्यादा ही मिलता है. वे कहती हैं कि शबे-क़द्र को उनके ख़नदान के सभी लोग रातभर जागते हैं. मर्द इबादत के लिए मस्जिदों में चले जाते हैं और औरतें घर पर इबादत करती हैं.

वहीं, ज़ुबैर कहते हैं कि काम की वजह से पांचों वक़्त क़ी नमाज़ नहीं हो पाती, लेकिन रमज़ान में उनकी कोशिश रहती है कि नमाज़ और रोज़ा क़ायम हो सके. दोस्तों के साथ मस्जिद में जाकर तरावीह पढ़ने की बात ही कुछ और है. इस महीने की रौनक़ों को देखकर कायनात की ख़ूबसूरती का अहसास होता है. रमज़ान हमें नेकियां और इबादत करने का सबक़ देता है और हमें अल्लाह के क़रीब करता है.

ज़ायक़ा
माहे-रमज़ान में हर तरफ़ ज़ायक़ेदार व्यंजनों की भरमार रहती है. रमज़ान का ज़िक्र लज़ीज़ व्यंजनों के बग़ैर मुकम्मल नहीं होता. रमज़ान का ख़ास व्यंजन हैं फैनी, सेवइयां और खजला. सुबह सहरी के वक़्त फ़ैनी को दूध में भिगोकर खाया जाता है. इसी तरह सेवइयों को दूध और मावे के साथ पकाया जाता है. फिर इसमें चीनी और सूखे मेवे मिलाकर परोसा जाता है. इसके अलावा मीठी डबल रोटी भी सहरी का एक ख़ास व्यंजन है. ख़ास तरह की यह मीठी डबल रोटी अमूमन रमज़ान में ही ज़्यादा देखने को मिलती है.

इफ़्तार के पकवानों की फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है. अमूमन रोज़ा खजूर के साथ खोला जाता है. दिनभर के रोज़े के बाद शिकंजी और तरह-तरह के शर्बत गले को तर करते हैं. फलों का चाट इफ़्तार के खाने का एक अहम हिस्सा है. ताज़े फलों की चाट रोज़े के बाद ताज़गी का अहसास तो कराती ही है, साथ ही यह पौष्टिक तत्वों से भी भरपूर होती है. इसके अलावा ज़ायक़ेदार पकौड़ियां और तले मसालेदार चने भी रोज़ेदारों की पसंद में शामिल हैं. खाने में बिरयानी, नहारी, क़ौरमा, क़ीमा, नरगिसी कोफ़्ते, सींक कबाब और गोश्त से बने दूसरे लज़ीज़ व्यंजन शामिल रहते हैं. इन्हें रोटी या नान के साथ खाया जाता है. रुमाली रोटी भी इनके ज़ायके को और बढ़ा देती है. इसके अलावा बाकरखानी भी रमज़ान में ख़ूब खाई जाती है. यह एक बड़े बिस्कुट जैसी होती है और इसे क़ोरमे के साथ खाया जाता है. बिरयानी में हैदराबादी बिरयानी और मुरादाबादी बिरयानी का जवाब नहीं. मीठे में ज़र्दा, शाही टुकड़े, फिरनी और हलवा-परांठा दस्तरख़ान पर की शोभा बढ़ाते हैं.
ज़ीनत कहती हैं कि रमज़ान में यूं तो दिन में ज़्यादा काम नहीं होता, लेकिन सहरी के वक़्त और शाम को काम बढ़ जाता है. इफ़्तार के लिए खाना तो घर में ही तैयार होता है, लेकिन रोटियों की जगह हम बाहर से नान या रुमाली रोटियां मंगाना ज़्यादा पसंद करते हैं.
रमज़ान में रोटी बनाने वालों का काम बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है. दिल्ली में जामा मस्जिद के पास रोटी बनाने वालों की कई दुकानें हैं. यहां तरह-तरह की रोटियां बनाई जाती हैं, जैसे रुमाली रोटी, नान, बेसनी रोटी आदि. अमूमन इस इलाके क़े होटल वाले भी इन्हीं से रोटियां मंगाते हैं.

हदीस
जो साहिबे-हैसियत हैं, रमज़ान में उनके घरों में लंबे-चौड़े दस्तरख़्वान लगते हैं. इफ़्तार और सहरी में लज़ीज़ चीज़ें हुआ करती हैं, लेकिन जो ग़रीब हैं, वो इन नेअमतों से महरूम रह जाते हैं. हमें चाहिए कि हम अपने उन रिश्तेदारों और पड़ौसियों के घर भी इफ़्तार और सहरी के लिए कुछ चीज़ें भेजें, जिनके दस्तरख़्वान कुशादा नहीं होते. ये हमारे हुज़ूर हज़रत मुहम्‍मद सल्‍लललाहू अलैहिवसल्‍लम का फ़रमान है. 
आप (सल्‍लललाहू अलैहिवसल्‍लम) फ़रमाते हैं- रमज़ान सब्र का महीना है यानी रोज़ा रखने में कुछ तकलीफ़ हो, तो इस बर्दाश्‍त करें. फिर आपने कहा कि रमज़ान ग़म बांटने का महीना है यानी ग़रीबों के साथ अच्‍छा बर्ताव किया जाए. अगर दस चीज़ें अपने रोज़ा इफ़्तार के लिए लाए हैं, तो दो-चार चीज़ें ग़रीबों के लिए भी लाएं.
यानी अपने इफ़्तार और सहरी के खाने में ग़रीबों का भी ख़्याल रखें. अगर आपका पड़ौसी ग़रीब है, तो उसका ख़ासतौर पर ख़्याल रखें कि कहीं ऐसा न हो कि हम तो ख़ूब पेट भर कर खा रहे हैं और हमारा पड़ौसी थोड़ा खाकर सो रहा है.

ख़रीददारी
रमज़ान में बाज़ार की रौनक़ को चार चांद लग जाते हैं. रमज़ान में दिल्ली के मीना बाज़ार की रौनक़ के तो क्या कहने. दुकानों पर चमचमाते ज़री वाले व अन्य वैरायटी के कपड़े, नक़्क़ाशी वाले पारंपरिक बर्तन और इत्र की महक के बीच ख़रीददारी करती औरतें, साथ में चहकते बच्चे. रमज़ान में तरह-तरह का नया सामान बाज़ार में आने लगता है. लोग रमज़ान में ही ईद की ख़रीददारी शुरू कर देते हैं. आधी रात तक बाज़ार सजते हैं. इस दौरान सबसे ज़्यादा कपड़ों की ख़रीददारी होती है. दर्ज़ियों का काम बढ़ जाता है. इसलिए लोग ख़ासकर महिलाएं ईद से पहले ही कपड़े सिलवा लेना चाहती हैं. अलविदा जुमे को भी नये कपड़े पहनकर नमाज़ पढ़ने का दस्तूर है. हर बार नये डिज़ाइनों के कपड़े बाज़ार में आते हैं. नेट, शिफ़ौन, जॉरजेट पर कुन्दन वर्क, सिक्वेंस वर्क, रेशम वर्क और मोतियों का काम महिलाओं को ख़ासा आकर्षित करता है. दिल्ली व अन्य शहरों के बाज़ारों में कोलकाता, सूरत और मुंबई के कपड़ों की धूम रहती है. इसके अलावा सदाबहार चिकन का काम भी ख़ूब पसंद किया जाता है। पुरानी दिल्ली के कपड़ा व्यापारी शाकिर अली कहते हैं कि बाज़ार में जिस चीज़ का मांग बढ़ने लगती है हम उसे ही मंगवाना शुरू कर देते हैं. ईद के महीने में शादी-ब्याह भी ज़्यादा होते हैं. इसलिए माहे-रमज़ान में शादी की शॉपिंग भी जमकर होती है. शादियों में आज भी पारंपरिक पहनावे ग़रारे को ख़ासा पसंद किया जाता है.

चूड़ियों और मेहंदी के बिना ईद की ख़रीददारी अधूरी है. रंग-बिरंगी चूड़ियां सदियों से औरतों को लुभाती रही हैं. चूड़ियों के बग़ैर सिंगार पूरा नहीं होता. बाज़ार में तरह-तरह की चूड़ियों की बहार है, जिनमें कांच की चूड़ियां, लाख की चूड़ियां, सोने-चांदी की चूड़िया, और मेटल की चूड़ियां शामिल हैं. सोने की चूड़ियां तो अमीर तबक़े तक ही सीमित हैं. ख़ास बात यह भी है कि आज भी महिलाओं को पारंपरिक कांच की रंग-बिरंगी चूड़ियां ही ज़्यादा आकर्षित करती हैं. बाज़ार में कांच की नगों वाली चूड़ियों की भी ख़ासी मांग है. कॉलेज जाने वाली लड़कियां और कामकाजी महिलाएं मेटल और प्लास्टिक की चूड़ियां ज़्यादा पसंद करती हैं, क्योंकि यह कम आवाज़ करती हैं और टूटती भी नहीं हैं, जबकि कांच की नाज़ुक चूड़ियां ज़्यादा दिनों तक हाथ में नहीं टिक पातीं.

इसके अलावा मस्जिदों के पास लगने वाली हाटें भी रमज़ान की रौनक़ को और बढ़ा देती हैं. इत्र, लोबान और अगरबत्तियों से महक माहौल को सुगंधित कर देती है. इत्र जन्नतुल-फ़िरदौस, बेला, गुलाब, चमेली और हिना का ख़ूब पसंद किया जाता है. रमज़ान में मिस्वाक से दांत साफ़ करना सुन्नत माना जाता है. इसलिए इसकी मांग भी बढ़ जाती है. रमज़ान में टोपियों की बिक्री भी ख़ूब होती है. पहले लोग लखनवी दुपल्ली टोपी ज्यादा पसंद करते थे, लेकिन अब टोपियों की नई वैरायटी पेश की जा रही हैं. अब तो लोग विभिन्न राज्यों की संस्कृतियों से सराबोर पारंपरिक टोपी भी पसंद कर रहे हैं. इसके अलावा अरबी रुमाल भी ख़ूब बिक रहे हैं. रमज़ान के मौक़े पर इस्लामी साहित्य, तक़रीरों, नअत, हम्द,क़व्वालियों की कैसेट सीटी और डीवीडी की मांग बढ़ जाती है.

यूं तो दुनियाभर में ख़ासकर इस्लामी देशों में रमज़ान बहुत अक़ीदत के साथ मनाया जाता है, लेकिन हिन्दुस्तान की बात ही कुछ और है. विभिन्न संस्कृतियों के देश भारत में मुसलमानों के अलावा ग़ैर मुस्लिम लोग भी रोज़े रखते हैं. कंवर सिंह का कहना है कि वे पिछले कई सालों से रमज़ान में रोज़े रखते आ रहे हैं. रमज़ान के दौरान वे सुबह सूरज निकलने के बाद से सूरज छुपने तक कुछ नहीं खाते. उन्हें विश्वास है कि अल्लाह उनके रोज़ों को ज़रूर क़ुबूल करेगा. भारत देश की यही महानता है कि यहां सभी धर्मों के लोग मिलजुल कर त्योहार मनाते हैं. यही जज़्बात गंगा-जमुनी तहज़ीब को बरक़रार रखते हैं.

Monday, May 8, 2017

ठंडा पानी और बर्फ़...

सब इंसानों की बुनियादी ज़रूरतें एक जैसी ही हैं... लेकिन सबके पास अपनी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने के साधन नहीं हैं... दुनिया में कितने ही लोग ऐसे हैं, जिनके पास ज़रूरत से ज़्यादा, यहां तक कि बेहिसाब चीज़ें हैं... बहुत से लोग ऐसे हैं, जिनके पास अपनी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने लाय़क भी चीज़ें नहीं हैं... वे महरूम रह जाते हैं... अगर हम एक-दूसरे की मदद करें, इंसान के नाते... ये मानकर कि ये हम पर फ़र्ज़ है, और सामने वाले का ये हक़ है... तो इसमें कोई दो राय नहीं कि इससे जहां हमें दिली सुकून मिलेगा, वहीं सामने वाले की ज़रूरत पूरी हो जाएगी... ऐसा करके हम किसी पर कोई अहसान नहीं करेंगे, बल्कि ये सामने वाला का ही अपनापन होगा कि वो हमारी मदद को क़ुबूल करके हमें ख़ुशी देगा...

बात किसी को रुपये-पैसे की मदद या कोई क़ीमती चीज़ देने की नहीं है... हम अपनी हैसियत के हिसाब से जो कर सकते हैं, वो हमें करना ही चाहिए... मिसाल के तौर पर...

हमारे घर के पास एक सरकारी स्कूल है... अकसर उसका नल ख़राब रहता है... स्कूल में पीने साफ़ पानी का भी कोई इंतज़ाम नहीं है... पानी की जो टंकी है, उसकी भी सफ़ाई नहीं होती... तपती गरमी के मौसम में बच्चों को बहुत परेशानी होती है... हमने अपने घर के आगे सड़क पर एक नल लगवाया... पहले घर के अंदर नल लगा था, लेकिन उसमें रेत आने लगा था, कई बार ठीक कराने के बावजूद जब रेत आना बंद नहीं हुआ, तो उसे बंद करवाकर बाहर नल लगवा लिया... आसपास से बहुत लोग पानी भरने आते थे...  स्कूल के बच्चे भी यहां आने लगे... मगर कुछ वक़्त बाद यह नल भी खराब हो गया... एक दिन अम्मी ने बच्चों को मायूस लौटते देख, उनसे रुकने को कहा और फ़्रिज से ठंडा पानी लाकर उन्हें पिला दिया... अब हर रोज़ बच्चे आने लगे... स्कूल के अलावा सड़कों पर काग़ज़ बीनने वाले बच्चे भी दरवाज़ा खटखटाकर पानी और खाना मांग लेते हैं...

हमारी चार साल की भतीजी भी जब बच्चों को देखती है, तो पानी की बोतल लेकर दौड़ती है... कहते हैं कि बच्चे अपने बड़ों से ही सीखते हैं... हमारी भी एक आदत रही है, कहीं से आते हैं, तो आटो या रिक्शेवाले से पानी को ज़रूर पूछते हैं...

इलाक़े के एक-दो घरों के लोग बर्फ़ भी ले जाते हैं... हालांकि अब घर-घर फ़्रिज हैं, लेकिन अब भी सब लोगों के पास फ़्रिज नहीं हैं... पहले तो ऐसा बहुत होता था कि एक के घर फ़्रिज आया, तो आसपास के लोग बर्फ़ ले जाते थे...
अम्मी जान कई बर्तनों में बर्फ़ जमाती हैं, ताकि किसी को को ख़ाली हाथ न लौटना पड़े... एक रोज़ अम्मी से एक पड़ौसन ने कहा कि हमारे बस का नहीं ये सब... कौन रोज़-रोज़ अपने दरवाज़े पर भीड़ लगाए... हम तो साफ़ मना कर देते हैं... ख़ैर, ये उनकी अपनी सोच है... ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है...

ये सब लिखने का हमारा मक़सद ये है कि अगर हमारे आसपास ऐसे लोग हैं, जिनकी हम किसी भी तरह कोई मदद कर सकते हैं, तो हमें उनकी मदद करनी चाहिए...

Friday, May 5, 2017

कांग्रेस की संजीवनी सोनिया ने आस बांधी

फ़िरदौस ख़ान
अवाम के दिलों पर राज करने वाली कांग्रेस को इस वक़्त सोनिया गांधी की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है.  इतिहास गवाह है कि जब भी कांग्रेस पर कोई मुसीबत आई है, तो सोनिया गांधी ढाल बनकर खड़ी हो गईं. देश के लिए, देश की अवाम के लिए, पार्टी के लिए सदैव उन्होंने क़ुर्बानियां दी हैं. देश की हुकूमत उनके हाथ में थी, प्रधानमंत्री का पद उनके पास था, वे चाहतीं, तो प्रधानमंत्री बन सकती थीं. अपने बेटे राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बना सकती थीं, लेकिन उन्होंने ऐसा बिल्कुल नहीं किया. उन्होंने डॊ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया और उनकी अगुवाई में भारत दुनिया में एक बड़ी ताक़त बनकर उभरा.

फिर से कांग्रेस को संकट में देखकर पिछले काफ़ी अरसे से पार्टी से दूर रही पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सियासत में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है. फ़िलहाल वे राष्ट्रपति चुनाव को लेकर विपक्ष को एकजुट करने की क़वायद में जुटी हैं.  दरअसल, वह भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ एक मज़बूत गठजोड़ बनाना चाहती हैं. इसके लिए वे विपक्षी दलों के नेताओं से मुलाक़ात कर रही हैं.  क़ाबिले-ग़ौर है कि जब-जब कांग्रेस पर संकट के बादल मंडराये, तब-तब सोनिया गांधी ने आगे आकर पार्टी को संभाला. उन्होंने कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाने के लिए देशभर में रोड शो किए. आख़िरकार उनकी अगुवाई में कांग्रेस ने साल 2004 और 2009  का आम चुनाव जीतकर केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की हुकूमत क़ायम की थी. इस दौरान देश के कई राज्यों में कांग्रेस सत्ता में आई. लेकिन जब से अस्वस्थता की वजह से सोनिया गांधी की सियासत में सक्रियता कम हुई है, तब से पार्टी पर संकट के बादल मंडराने लगे. साल 2014 में केंद की हुकुमत गंवाने के बाद कांग्रेस ने कई राज्यों की सत्ता भी खो दी. सोनिया गांधी की सेहत को देखते हुए उनके बेटे राहुल गांधी को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया और पार्टी की अहम ज़िम्मेदारी उन्हें सौंपी गई. राहुल गांधी ने ख़ूब मेहनत भी की, लेकिन उन्हें वह कामयाबी नहीं मिल पाई, जिसकी उनसे उम्मीद की जा रही थी. राहुल गांधी अभी कांग्रेस के अध्यक्ष नहीं बने हैं, लेकिन उनकी कार्यशैली की तुलना सोनिया गांधी की कार्यशैली से की जाने लगी है. जानकारों का मानना है कि जहां सोनिया गांधी अपनी टीम के सदस्यों को उनकी तरह से काम करने की पूरी छूट देती हैं, वही राहुल गांधी ऐसा नहीं करते. दरअसल, काम करने का सबका अपना एक तरीक़ा होता है. फ़िलहाल राहुल गांधी पार्टी के संगठनात्मक चुनाव के मद्देनज़र नई टीम बनाने के काम में लगे हैं. उन पर दोहरी ज़िम्मेदारी है. एक तरफ़ उन्हें पार्टी को मज़बूत बनाना है और दूसरी तरफ़ खोयी हुई हुकूमत को हासिल करना है. इस साल 31 दिसंबर तक कांग्रेस के आंतरिक चुनाव होने हैं. साल 2019 में लोकसभा चुनाव होने हैं. इससे पहले दस राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे, जिनमें हिमाचल प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, मेघालय, मिज़ोरम, त्रिपुरा और नगालैंड शामिल हैं. इस वक़्त हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, मेघालय और मिज़ोरम में कांग्रेस सत्ता में है. गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है. कांग्रेस गुजरात, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में लंबे अरसे से सत्ता से बाहर है और इन राज्यों में उसे भारतीय जनता पार्टी से कड़ा मुक़ाबला करना है. बहरहाल, राहुल गांधी संगठन को मज़बूत करने में जुटे हैं, तो सोनिया गांधी राष्ट्रपति चुनाव के बहाने विपक्ष को एक मंच पर लाना चाहती हैं.

ग़ौरतलब है कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल आगामी 24 जुलाई को ख़त्म हो रहा है और इससे पहले ही चुनाव कराए जाने हैं. राष्ट्रपति के चुनाव के मामले में सियासी समीकरण भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में हैं. इसलिए यह कहना ग़लत न होगा कि अगला राष्ट्रपति वही होगा, जिसे भारतीय जनता पार्टी पसंद करेगी. एक आकलन के मुताबिक़ 23 सियासी दलों वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पास राष्ट्रपति चुनाव से संबंधित निर्वाचक मंडल में तक़रीबन 48.64 फ़ीसद मत हैं. इसके मुक़ाबले में कांग्रेस की अगुवाई वाले विपक्ष के साथ जाने वाले 23 सियासी दलों के संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के पास महज़ 35.47 फ़ीसद मत हैं. इनके अलावा तमिलनाडु की अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके),  ओडिशा की बीजू जनता दल (बीजेडी),  आंध्र प्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (वाईएसआरसीपी), दिल्ली की आम आदमी पार्टी और हरियाणा के इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) का निर्वाचक मंडल में तक़रीबन 48.64 फ़ीसद मत हैं. इसके अलावा भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी पार्टी शिवसेना भी बहुत अहम मानी जा रही है. यह भारतीय जनता पार्टी के लिए परेशानी का सबब बन सकती है, जो कांग्रेस के लिए फ़ायदेमंद है. सनद रहे, शिवसेना ने कांग्रेस की तरफ़ से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार प्रतिभा पाटिल और प्रणब मुखर्जी को अपना समर्थन दिया था.

इसके विपरीत अगर भाजपा इन पार्टियों में से कुछ को भी अपने साथ शामिल करने में सफल होती है उसकी राह आसान हो जाएगी। एनडीए को सिर्फ एक या दो पार्टियों के समर्थन की जरूरत होगी। भाजपा इस समय सत्ता में है इसलिए उसे चुनावी नतीजे अपने पक्ष में करने के लिए ज्यादा परेशानी नहीं होगी। गौरतलब है कि भाजपा की प्रमुख सहयोगी शिवसेना इससे पहले दो बार भाजपा का खेल बिगाड़ चुकी है पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल और प्रणव मुखर्जी को शिवसेना ने अपना समर्थन दिया था। हालांकि इस बार बजट सत्र के दौरान एनडीए ने राष्ट्रपति चुनाव से पहले एकता दिखाई।

दरअसल, राष्ट्रपति चुनाव में लोकसभा, राज्यसभा और विधान सभाओं के सभी सदस्य वोट देते हैं. इन सबको मिलाकर ही राष्ट्रपति पद के चुनाव का निर्वाचक मंडल बनता है. इसमें कुल 784 सांसद और 4114 विधायक हैं. इस कॉलेज में मतदाताओं के वोट की वैल्यू अलग-अलग होती है. सांसद के मत की वैल्यू निकालने के लिए सबसे पहले सभी राज्यों की विधानसभा के चुने गए सदस्यों के मतों की वैल्यू जोड़ी जाती है. इसके बाद राज्यसभा और लोकसभा के चुने गए सदस्यों की कुल संख्या से भाग दिया जाता है. इसके बाद जो अंक मिलते हैं, वे एक सांसद के वोट की वैल्यू होते हैं. हर सांसद के मत की वैल्यू 708 है, जबकि विधायक के वोट की वैल्यू संबंधित राज्य की विधानसभा की सदस्य संख्या और उस राज्य की आबादी पर आधारित होती है, यानी जिस प्रदेश का विधायक है, उसकी आबादी देखी जाती है. इसके साथ उस प्रदेश के विधानसभा सदस्यों की संख्या को भी मद्देनज़र रखा जाता है. प्रदेश की आबादी को चुने गए विधायकों की संख्या से बांटा जाता है. इस तरह जो भी अंक मिलते हैं, उसे फिर एक हज़ार से भाग दिया जाता है. फिर जो अंक सामने आता है, वह उस प्रदेश के विधायक के वोट की वैल्यू होता है. एक हज़ार से भाग देने पर अगर बाक़ी पांच सौ से ज़्यादा हों, तो वैल्यू में एक जोड़ दिया जाता है. इस हिसाब से उत्तर प्रदेश के हर विधायक के वोट की वैल्यू सबसे ज़्यादा 208 है, जबकि सिक्किम के हर विधायक के वोट की वैल्यू सबसे कम सात है.

देश में राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मंडल के ज़रिये होता है. इसमें जनता अपना राष्ट्रपति नहीं चुनती, लेकिन जनता के चुने प्रतिनिधि मतदान करते हैं. ख़ास बात यह भी है कि राष्ट्रपति द्वारा संसद में नामित सदस्य वोट तथा राज्यों की विधान परिषदों के सदस्य मतदान नहीं कर सकते, क्योंकि इन्हें जनता ने चुना है. निर्वाचक मंडल के सदस्यों का प्रतिनिधित्व अनुपातिक भी होता है. मतदाता वोट तो एक ही देता है, लेकिन वह राष्ट्रपति चुनाव में हिस्सा ले रहे सभी उम्मीदवारों में से अपनी पसंद तय कर देता है यानी उसकी पहली, दूसरी और तीसरी पसंद कौन है. अगर पहली पसंद वाले उम्मीदवार के मतों से कोई उम्मीदवार नहीं जीतता, तो उम्मीदवार के खाते में मतदाता की दूसरी पसंद को नये सिंगल वोट की तरह ट्रांसफ़र किया जाता है.

अगर सोनिया गांधी इन दलों को कांग्रेस के साथ लाने में कामयाब हो जाती हैं, तो कांग्रेस का मत फ़ीसद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के मुक़ाबले का हो जाएगा. ऐसे में मुक़ाबला रोचक और कांटे का होगा. इसके साथ-साथ पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भी भर जाएगा. साल 2014 के आम चुनाव के बाद से कांग्रेस को कोई ख़ास कामयाबी नहीं मिली. लगातार सत्ता से दूर रहने, विभिन्न चुनावों में हार और पार्टी की आंतरिक कलह की वजह से पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटने लगा था. लेकिन अब सोनिया गांधी के सक्रिय होने से कार्यकर्ताओं में नये जोश का संचार होगा.