Sunday, December 17, 2017

जब राहुल गांधी ने मां की पेशानी चूमी

फ़िरदौस ख़ान
कांग्रेस की वरिष्ठ नेता श्रीमती सोनिया गांधी ने बीते शनिवार को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के मुख्यालय में आयोजित एक समारोह में राहुल गांधी को पार्टी के अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारी सौंपी. इस मौक़े पर राहुल गांधी ने अपनी मां की पेशानी (माथे) को चूमकर अपने जज़्बात का इज़हार किया.
हमेशा मौक़े की ताक में बैठे रहने वाले ’राष्ट्रवादी’ लोगों ने इस बात पर ही बवाल खड़ा कर दिया. उनका कहना था कि राहुल गांधी ने अपनी मां की पेशानी चूमकर विदेशी होने का सबूत दिया है. उन्हें सोनिया गांधी के पैर छूकर आशीर्वाद लेना चाहिए था. ऐसा नहीं है कि राहुल गांधी पहली बार ट्रोल हुए हैं. एक गिरोह उन्हें और उनकी मां को हमेशा विदेशी साबित करने पर आमादा रहता है.

दरअसल, सियासत का कोई मज़हब नहीं होता. सियासत का सिर्फ़ मक़सद होता है, और वह है सत्ता हासिल करना.  येन केन प्रकारेण यानी किसी भी तरह सत्ता हासिल करना. साम, दाम, दंड, भेद तो सियासत के हथियार रहे ही हैं. कहने को भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है, लेकिन यहां की सियासत धर्म की बैसाखियों के सहारे ही आगे बढ़ती है. इस मामले में भारतीय जनता पार्टी सबसे आगे हैं. ये एक ऐसी पार्टी है, जो धार्मिक मुद्दों को आधार बनाकर सत्ता की सीढ़ियां चढ़ती है, वह मुद्दा राम मंदिर का हो, या फिर सांप्रदायिकता को हवा देने का कोई और मामला. भारतीय जनता पार्टी सत्ता के लिए न सिर्फ़ धर्म की राजनीति करती है, बल्कि अगड़े-पिछड़े तबक़े के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाने में ज़रा भी गुरेज़ नहीं करती. इसके बनिस्बत कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, मार्क्सवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और इसी तरह के अन्य दलों ने हमेशा जनता की आवाज़ उठाई है, उनके हक़ की बात की है.

चुनाव के दौरान हर बार की तरह इस मर्तबा भी भारतीय जनता पार्टी ने धर्म को मुद्दा बनाकर देश में एक और विवाद पैदा कर दिया था. सर्व घोषित राष्ट्रवादी पार्टी यानी भारतीय जनता पार्टी का मानना है कि मंदिर वही लोग जा सकते हैं, जिनके पुरखों ने मंदिर बनवाया हो. पिछले दिनों कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अपनी चुनावी मुहिम के दौरान गुजरात के कई मंदिरों में पूजा-अर्चना की थी. इसी कड़ी में वे सोमनाथ मंदिर भी गए और वहां भी पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद लिया. इस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तंज़ किया, "आपके परनाना ने नहीं बनवाया सोमनाथ मंदिर." यानी जिनके पुरखों ने मंदिर बनवाए हैं, वही मंदिर जा सकते हैं. इतना ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी का यह भी कहना है कि राहुल गांधी ने सोमनाथ मंदिर की उस विज़िटर्स बुक में अपना नाम लिखा है, जो ग़ैर हिन्दुओं के लिए रखी गई है. इसमें पार्टी के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल ने भी दस्तख़्त किए हैं. भारतीय जनता पार्टी ने इसकी प्रतियां जारी करते हुए राहुल गांधी के ’हिन्दू’ होने पर सवाल उठाए हैं.

विवाद गहराता देख कांग्रेस को प्रेस कांफ़्रेसं कर सफ़ाई पेश करनी पड़ी. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रणदीप सुरजेवाला का कहना है कि राहुल गांधी न सिर्फ़ ’हिन्दू’ हैं, बल्कि ’जनेऊधारी’ भी हैं. अपने बयान के पक्ष में कांग्रेस ने तीन तस्वीरें जारी की हैं. एक तस्वीर में राहुल गांधी अपने पिता राजीव गांधी के अंतिम संस्कार के दौरान अस्थियां इकट्ठा कर रहे हैं,  दूसरी तस्वीर में वे जनेऊ पहने नजर आ रहे हैं, जबकि तीसरी तस्वीर में वे अपनी बहन प्रियंका के साथ खड़े हैं.  इतना ही नहीं, कांग्रेस सोनिया गांधी, राजीव गांधी, इंदिरा गांधी और जवाहरलाल नेहरू की वे तस्वीरें सोशल मीडिया पर प्रसारित कर रही हैं, जिनमें उन्हें हिन्दू कर्म-कांड करते हुए दिखा गया है. रणदीप सुरजेवाला ने भाजपा पर घटिया स्तर की राजनीति करने का आरोप लगाते हुए कहा है कि न तो यह हस्ताक्षर राहुल गांधी का है और न ही यह वह रजिस्टर है, जो एंट्री के वक़्त राहुल गांधी को दिया गया था.

ख़ुद के ’ग़ैर हिन्दू’ होने पर राहुल गांधी का कहना है, "मैं मंदिर के भीतर गया. तब मैंने विज़िटर्स बुक पर हस्ताक्षर किए. उसके बाद भाजपा के लोगों ने दूसरी पुस्तिका में मेरा नाम लिख दिया." उन्होंने कहा, ‘‘मेरी दादी (दिवंगत इंदिरा गांधी) और मेरा परिवार शिवभक्त है. लेकिन हम इन चीज़ों को निजी रखते हैं. हम आमतौर पर इस बारे में बातचीत नहीं करते हैं, क्योंकि, हमारा मानना है कि यह बेहद व्यक्तिगत मामला है और हमें इस बारे में किसी के सर्टिफ़िकेट की आवश्यकता नहीं है.’’ उन्होंने यह भी कहा, ‘‘हम इसका 'व्यापार' नहीं करना चाहते हैं. हम इसको लेकर दलाली नहीं करना चाहते हैं. हम इसका राजनैतिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहते हैं.’’

इस मामले में भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी का कहना है कि राहुल गांधी जन्म से ही ग़ैर हिन्दू हैं. उनका दावा है कि पढ़ाई के दौरान राहुल गांधी ने कई जगहों पर ख़ुद को कैथोलिक क्रिश्चयन के तौर पर अपना मज़हब दर्ज कराया है. सनद रहे, सुब्रमण्यम स्वामी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को भी कैथोलिक क्रिश्चयन बताते हैं. ऐसा नहीं है कि राहुल गांधी के कथित ’ग़ैर हिन्दू’ होने को लेकर पहली बार हंगामा बरपा है. इससे पहले भी उन पर ग़ैर-हिंदू होने के आरोप लगते रहे हैं. यहां तक कि उनकी मां सोनिया गांधी के मज़हब को लेकर भी ऐसी ही बातें फैलाई जाती रही हैं. उनके दादा फ़िरोज़ गांधी, परदादा जवाहरलाल नेहरू और उनके पिता के मज़हब को लेकर भी विरोधी सवाल उठाते रहे हैं.

राहुल गांधी किस मज़हब से ताल्लुक़ रखते हैं या वे किस मज़हब को मानते हैं, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. दरअसल, फ़र्क़ मज़हब से नहीं पड़ता, फ़र्क़ किसी के अच्छे या बुरे होने से पड़ता है. राहुल गांधी एक अच्छे इंसान हैं. वे ईमानदार हैं, मिलनसार हैं. वे लोगों के दर्द को महसूस करते हैं, उनके सुख-दुख में शरीक होते हैं. वे मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं, तो मज़ारों पर फूल और चादर भी चढ़ाते हैं. वे चर्च जाते हैं, तो गुरुद्वारों में माथा भी टेकते हैं. वे एक ऐसी पार्टी के नेता हैं, जो सर्वधर्म सदभाव में विश्वास करती है. इसलिए अब राहुल गांधी को कह देना चाहिए कि वे सर्वधर्म में य़कीन रखते हैं, उनके लिए सभी मज़हब बराबर हैं, ताकि मज़हब के झगड़े ही ख़त्म हो जाएं.

यह देश का दुर्भाग्य है कि यहां बुनियादी ज़रूरतों और विकास को मुद्दा नहीं बनाया जाता. इसके लिए सिर्फ़ सियासी दलों को दोष देना भी सही नहीं है, क्योंकि अवाम भी वही देखना और सुनना चाहती है, जो उसे दिखाया जाता है, सुनाया जाता है. जब तक स्कूल, अस्पताल, रोज़गार और बुनियादी ज़रूरत की सुविधाएं मुद्दा नहीं बनेंगी, तब तक सियासी दल मज़हब के नाम पर लोगों को बांटकर सत्ता हासिल करते रहेंगे, सत्ता का सुख भोगते रहेंगे और जनता यूं ही पिसती रहेगी. अब वक़्त आ गया है. जनमानस को धार्मिक मुद्दों को तिलांजलि देते हुए राजनेताओं से कह देना चाहिए कि उसे मंदिर-मस्जिद नहीं खाना चाहिए, बिजली-पानी चाहिए, स्कूल-कॊलेज-यूनिवर्सिटी चाहिए, अस्पताल चाहिए, रोज़गार चाहिए. अवाम को वे सब बुनियादी सुविधाएं चाहिए, जिसकी उसे ज़रूरत है.

और जहां तक राहुल गांधी के अपनी मां की पेशानी चूमने का सवाल है, तो ये किसी भी इंसान का ज़ाती मामला है कि वे अपने जज़्बात का इज़हार किस तरह करता है. इस तरह की बातों को फ़िज़ूल में तूल देना किसी भी सूरत में सही नहीं है.

Monday, December 11, 2017

राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बने

फ़िरदौस ख़ान
एक लम्बे इंतज़ार के बाद आख़िरकार राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए. पिछले काफ़ी अरसे से पार्टी में उन्हें अध्यक्ष बनाए जाने की मांग उठ रही थी. कांग्रेस नेताओं का मानना था कि पार्टी की बागडोर अब राहुल गांधी के सुपुर्द कर देनी चाहिए. सोमवार को पार्टी अध्यक्ष पद के प्रस्तावित चुनाव के लिए नामांकन की आख़िरी तारीख़ थी. राहुल गांधी के ख़िलाफ़ किसी ने भी परचा दाख़िल नहीं किया था. कांग्रेस नेता मुल्लापल्ली रामचंद्रन ने कहा कि नामांकन के 89 प्रस्ताव दाख़िल किए गए थे. सभी वैध पाए गए. सिर्फ़ एक ही उम्मीदवार मैदान में है, इसलिए मैं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर राहुल गांधी के निर्वाचन की घोषणा करता हूं. कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद पर राहुल गांधी निर्विरोध चुन लिए गए हैं

ग़ौरतलब है कि अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 28 दिसम्बर 1885 को हुई थी. 1885 में बोमेश चंद्र बनर्जी कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए. इसके बाद 1886 में दादाभाई नौरोजी, 1887 में बदरूद्दीन तैय्यबजी, 1888 में जार्ज यूल, 1889 में सर विलियम वेडरबर्न, 1890 में सर फ़िरोज़शाह मेहता, 1891 में पी. आनन्द चार्लू,  1892 में बोमेश चन्द्र बनर्जी, 1893 में दादाभाई नौरोजी,  1894 में अलफ़्रेड वेब, 1895 में सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, 1896 में रहीमतुल्ला सयानी, 1897 में सी. शंकरन नायर, 1898 में आनन्द मोहन बोस, 1899 में रमेश चन्द्र दत्त, 1900 में एनजी चन्द्रावरकर, 1901 में दिनशा इदुलजी वाचा, 1902 में एसएन बनर्जी, 1903 में लाल मोहन घोष, 1904 में सर हैनरी कॊटन, 1905 में गोपाल कृष्ण गोखले, 1906 में दादाभाई नौरोजी, 1907 में डॉ. रास बिहारी घोष, 1909 में पंडित मदन मोहन मालवीय, 1910 में सर विलियम वेडर्बन, 1911 में पंडित बिशन नारायण धर, 1912 में आरएन माधोलकर, 1913 मेंसैयद मोहम्मद बहादुर, 1914 में भूपेन्द्रनाथ बसु, 1915 में सर सत्येन्द्र प्रसन्न सिन्हा, 1916 में अम्बिका चरण मज़ूमदार, 1917 में एनी बेसेंट, 1918 में हसन इमाम और मदनमोहन मालवीय, 1919 में पंडित मोतीलाल नेहरू, 1920 में सी विजया राघवाचारियर, 1921 में सीआर दास, 1923 में लाला लाजपत राय और मुहम्मद अली, 1924 में मोहनदास करमचंद गांधी, 1925 में सरोजिनी नायडू, 1926 में एस श्रीनिवास आयंगार, 1927 में डॉ. एमए अंसारी, 1928 में मोतीलाल नेहरू, 1929 में पंडित जवाहरलाल नेहरू, 1931 में सरदार बल्लभभाई पटेल, 1932 में आर अमृतलाल, 1933 में नेल्ली सेन गुप्ता, 1934 में बाबू राजेन्द्र प्रसाद, 1936 में पंडित जवाहरलाल नेहरू, 1938 में सुभाष चन्द्र बोस, 1940 में मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद, 1946 में पंडित जवाहरलाल नेहरू और सितंबर 1946 में आचार्य जेबी कृपलानी पार्टी अध्यक्ष बने. आज़ादी के बाद 1948 में बी पट्टाभि सीतारमय्या कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए. इसके बाद 1950 में पुरुषोत्तम दास टंडन, 1951 में पंडित जवाहरलाल नेहरू, 1955 में यूएन ढेबर, 1960 में इंदिरा गांधी, 1961 में एन संजीव रेड्डी, 1962 में डी संजिवैया, 1964 में के कामराज, 1968 में एस निजिलिंगप्पा, 1969 में सी सुब्रमण्यम, 1970 में जगजीवन राम, 1971 में डी संजिवैया, 1972 में डॊ. शंकर दयाल शर्मा, 1975 में देवकांत बरूआ, 1976 में ब्रहमनंदा रेड्डी और 1978 में इंदिरा गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं. इंदिरा गांधी की मौत के बाद पंडित कमलापति त्रिपाठी कार्यकारी अध्यक्ष बनाए गए. फिर 1984 में राजीव गांधी को पार्टी अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी सौंपी गई. उनके बाद 1991 में पी वी नरसिंह राव, 1996 में सीताराम केसरी और 1998 में सोनिया गांधी को सर्वसम्मति से कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया.

क़ाबिले-ग़ौर है कि मोतीलाल नेहरू जी से राहुल गांधी जी तक नेहरू परिवार के सिर्फ़ 6 लोग ही कांग्रेस के अध्यक्ष बने हैं. कांग्रेस की कट्टर विरोधी भारतीय जनता पार्टी के नेता इसे ’गांधी परिवार’ की पार्टी कहकर जनता को गुमराह करते हैं. कांग्रेस ने देश को सात प्रधानमंत्री दिए हैं, जिनमें जवाहरलाल नेहरू, गुलज़ारी लाल नन्दा, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, पीवी नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह शामिल हैं. इनमें से सिर्फ़ तीन प्रधानमंत्री ही गांधी परिवार से हैं.

कांग्रेस के नवनिर्वाचित अध्यक्ष राहुल गांधी का जन्म 19 जून 1970 को दिल्ली में हुआ. वे देश के मशहूर गांधी-नेहरू परिवार से हैं. उनकी मां श्रीमती सोनिया गांधी हैं, जो अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के रायबरेली लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं. उनके पिता स्वर्गीय राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे. राहुल गांधी कांग्रेस में उपाध्यक्ष हैं और लोकसभा में उत्तर प्रदेश में स्थित अमेठी चुनाव क्षेत्र की नुमाइंदगी करते हैं. राहुल गांधी को साल 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली शानदार जीत का श्रेय दिया गया था. वे सरकार में कोई किरदार निभाने की बजाय पार्टी संगठन में काम करना पसंद करते हैं, इसलिए उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री का ओहदा लेने से साफ़ इंकार कर दिया था.

राहुल गांधी की शुरुआती तालीम दिल्ली के सेंट कोलंबस स्कूल में हुई. उन्होंने प्रसिद्ध दून विद्यालय में भी कुछ वक़्त तक पढ़ाई की, जहां उनके पिता ने भी पढ़ाई की थी. सुरक्षा कारणों की वजह से कुछ अरसे तक उन्हें घर पर ही पढ़ाई-लिखाई करनी पड़ी. साल 1989 में उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज में दाख़िला लिया. उनका यह दाख़िला पिस्टल शूटिंग में उनके हुनर की बदौलत स्पोर्ट्स कोटे से हुआ. उन्होंने इतिहास ऑनर्स में नाम लिखवाया. वे सुरक्षाकर्मियों के साथ कॉलेज आते थे. तक़रीबन सवा साल बाद 1990  में उन्होंने कॊलेज छोड़ दिया. उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के रोलिंस कॉलेज फ़्लोरिडा से साल 1994 में अपनी कला स्नातक की उपाधि हासिल की. इसके बाद उन्होंने साल 1995 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज से  डेवलपमेंट स्टडीज़ में एम.फ़िल. की उपाधि हासिल की.

राहुल गांधी को घूमने-फिरने और खेलकूद का बचपन से ही शौक़ रहा है. उन्होंने तैराकी, साईलिंग और स्कूबा-डायविंग की और स्वैश खेला. उन्होंने बॊक्सिंग सीखी और पैराग्लाइडिंग का भी प्रशिक्षण लिया. उनके बहुत से शौक़ उनके पिता राजीव गांधी जैसे ही हैं. अपने पिता के तरह उन्होंने दिल्ली के नज़दीक हरियाणा स्थित अरावली की पहाड़ियों पर एक शूटिंग रेंज में निशानेबाज़ी सीखी. उन्हें भी आसमान में उड़ना उतना ही पसंद है, जितना उनके पिता को पसंद था. उन्होंने भी हवाई जहाज़ उड़ाना सीखा. वे अपनी सेहत का भी काफ़ी ख़्याल रखते हैं. कितनी ही मसरूफ़ियत क्यों न हो, वे कसरत के लिए वक़्त निकाल ही लेते हैं. वे रोज़ दस किलोमीटर तक जॉगिंग करते हैं. वे जापानी मार्शल आर्ट आइकीडो में ब्लैक बेल्ट हैं. एक बार उन्होंने कहा था, "मैं अभ्यास करता हूं, दौड़ता हूं, तैराकी करता हूं और आइकीडो में ब्लैक बेल्ट भी हूं." उन्हें फ़ुटबॊल बहुत पसंद है. लंदन में पढ़ने के दौरान वे फ़ुटबॊल के दीवाने थे.

राहुल गांधी छल और फ़रेब की राजनीति नहीं करते. वे कहते हैं,  ''मैं गांधीजी की सोच से राजनीति करता हूं. अगर कोई मुझसे कहे कि आप झूठ बोल कर राजनीति करो, तो मैं यह नहीं कर सकता. मेरे अंदर ये है ही नहीं. इससे मुझे नुक़सान भी होता है. 'मैं झूठे वादे नहीं करता. "  वे कहते हैं, 'सत्ता और सच्चाई में फ़र्क़ होता है. ज़रूरी नहीं है, जिसके पास सत्ता है उसके पास सच्चाई है. गुजरात में एक आयोजित एक रैली में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मासिक रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' पर तंज़ करते हुए कहते हैं, अगर कांग्रेस चुनाव जीतती है, तो हमारी सरकार हर किसी के लिए होगी न कि केवल एक व्यक्ति के लिए. अपने 'मन की बात' कहने के बजाय हमारी सरकार आपके मन की बात सुनने का प्रयास करेगी.

बहरहाल, राहुल गांधी के सामने कई चुनौतियां हैं, जिनका सामना उन्हें पूरी हिम्मत और कुशलता से करना है. 

Sunday, November 26, 2017

ईवीएम : लोकतंत्र के लिए ख़तरा

फ़िरदौस ख़ान
देश का लोकतंत्र ख़तरे में है. वजह है इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में की जा रही छेड़छाड़. ईवीएम से चुनाव कराने का मक़सद निर्वाचन प्रक्रिया को और बेहतर बनाना था, ताकि इससे जहां वक़्त की बचत हो, मेहनत की बचत हो, वहीं धन की भी बचत हो. इतना ही नहीं, मत पेटियां लूटे जाने की घटनाओं से भी राहत मिल सके. लेकिन अफ़सोस की बात है कि ईवीएम की वजह से चुनाव में धांधली कम होने की बजाय और बढ़ गई. हाल में उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव के दौरान ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जब मतदाताओं ने वोट कांग्रेस को दिया है, लेकिन वह किसी अन्य दल के खाते में गया है. इस मामले में कहा जा रहा है कि मशीन ख़राब है. माना कि मशीन ख़राब है, तो फिर सभी वोट किसी ’विशेष दल’ के खाते में ही क्यों जा रहे हैं?

बहुजन समाज पार्टी इस मामले को लेकर अदालत पहुंच गई है. लखनऊ से बहुजन समाज पार्टी की मेयर बुलबुल गोडियाल ने उच्च नयायालय में अर्ज़ी दाख़िल की है. उनका कहना है कि अगर ज़रूरत पड़ी, तो सर्वोच्च न्यायालय भी जाएंगे. उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव के पहले चरण के मतदान के दौरान कानपुर में भी ईवीएम मशीन में ग़ड़बड़ी को लेकर ख़ूब हंगामा हुआ था. मतदाताओं का आरोप है कि ईवीएम में किसी भी पार्टी का बटन दबाने पर वोट भारतीय जनता पार्टी के खाते में जा रहा है. उनका कहना है कि हाथ के निशान और साइकिल के निशान का बटन दबाने पर कमल के निशान की बत्ती जलती है. जब कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं को ये बात पता चली, तो उन्होंने बूथ के बाहर प्रदर्शन किया. दोनों दलों के नेताओं ने इस बारे में प्रदेश के चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई है. उनका यह भी कहना है कि प्रशासन भारतीय जनता पार्टी के इशारे पर काम कर रहा है.

क़ाबिले-ग़ौर है कि इस साल के शुरू में उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव के वक़्त से ही बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री मायावती भारतीय जनता पार्टी पर ईवीएम में छेड़छाड़ करने के आरोप लगा रही हैं. उनका कहना है कि भारतीय जनता पार्टी ने ईवीएम में छेड़छाड़ करके ही विधानसभा चुनाव जीता है. उन्होंने राज्यसभा में ईवीएम से मतदान को बंद करने की मांग की थी. उनका कहना था कि इसके लिए क़ानून बनना चाहिए. बसपा नेता नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी ने भी आरोप लगाया था कि 2017 की जीत भाजपा की ईमानदारी की जीत नहीं है, ये 2019 को भी ऐसी ही मशीनों का इस्तेमाल कर जीतना चाहते हैं. इन्होंने 2014 के चुनावों में भी धोखा किया था, तब सत्ता में आए थे.
बहुजन समाज पार्टी ईवीएम के ख़िलाफ़ सड़क पर उतर आई थी. पार्टी के कार्यकर्ताओं ने बीते 11 अप्रैल को ईवीएम के ख़िलाफ़ काला दिवस मनाया था और जगह-जगह धरने-प्रदर्शन किए थे. उनका कहना था कि जब तक चुनाव मतपत्र से कराने की उनकी मांग नहीं मानी जाती, उनका आंदोलन जारी रहेगा.
उस वक़्त बहुजन समाज पार्टी ने विधानसभा चुनावों में ईवीएम से छेड़छाड़ का आरोप लगाते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अर्ज़ी दाख़िल की थी. पार्टी ने अदालत से उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में हुए विधानसभा चुनावों को रद्द करने की मांग की थी. समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक अताउर्रहमान ने भी ईवीएम से छेड़छाड़ की अर्ज़ी सर्वोच्च न्यायालय में दाख़िल की थी. इसमें भारतीय जनता पार्टी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी की ईवीएम को लेकर दायर याचिका पर फ़ैसले के बाद भी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ईवीएम के साथ वोटर वेरीफ़ाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) नहीं लगाने की बात कही गई थी. उन्होंने ईवीएम में हर पांचवां वोट भारतीय जनता पार्टी को पड़ने और ईवीएम से छेड़छाड़ के सुबूत होने की बात कही थी.
ग़ौरतलब यह भी है कि उस वक़्त कांग्रेस की अगुवाई में देश के सियासी दल ईवीएम के ख़िलाफ़ एकजुट हुए थे. तक़रीबन 16 बड़े सियासी दलों ने विधानसभा चुनावों में मतदान के लिए इस्तेमाल हुईं ईवीएम के साथ छेड़छाड़ होने की बढ़ती शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए इनके प्रति अपना अविश्वास ज़ाहिर किया था. उन्होंने चुनाव आयोग से मांग की थी कि आगामी चुनावों में मतदान के लिए ईवीएम की बजाय काग़ज़ के मतपत्रों का इस्तेमाल किया जाए. उनका आरोप था कि केंद्र सरकार ईवीएम को फुलप्रूफ़ बनाने के लिए वोटर वेरीफ़ाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) सुनिश्चित कराने के लिए चुनाव आयोग को ज़रूरी रक़म मुहैया कराने में कोताही बरत रही है.

विपक्षी दलों की तरफ़ से चुनाव आयोग को दिए गए ज्ञापन में कहा गया था कि चुनाव कराने के तौर तरीक़ों को लेकर सियासी दलों के बीच एक राय है, लेकिन वे फ़िलहाल चुनाव के लिए ईवीएम का इस्तेमाल करने के ख़िलाफ़ हैं. वे चाहते हैं कि मतदान के लिए काग़ज़ के मतपत्रों का इस्तेमाल किया जाए. इसलिए जब तक ईवीएम के साथ छेड़छाड़ होने और उसमें गड़बड़ी की मसला हल नहीं हो जाता और जब तक राजनीतिक दलों की संतुष्टि के लिहाज़ से यह तकनीकी तौर पक्का नहीं हो जाता कि ईवीएम बिना किसी दिक़्क़त के काम करेंगी और इसकी पुष्टि वैश्विक स्तर पर नहीं हो जाती, तब तक मतदान पुराने मतपत्र वाली व्यवस्था के हिसाब से ही हो. मतपत्रों के ज़रिये मतदान की व्यवस्था को दुनियाभर में मान्यता मिली हुई है. सेक्शन 61ए के तहत चुनाव आयोग के विवेक का इस्तेमाल तभी किया जाए, जब सभी राजनीतिक दलों की संतुष्टि के साथ उन दिक़्क़तों का दूर कर लिया जाए.

कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह का कहना था कि अगले चुनाव, भले ही गुजरात में हों या कहीं और, मतपत्र के साथ होने चाहिए और ईवीएम का इस्तेमाल बंद होना चाहिए. उनकी दलील थी कि अगर बैंक ऒफ़ बांग्लादेश के खातों को हैक किया जा सकता है और आठ करोड़ डॊलर चुराए जा सकते हैं, रूसी बैंक से तीन करोड़ डॊलर निकाले जा सकते हैं, तो ईवीएम के साथ छेड़छाड़ क्यों नहीं हो सकती. उन्होंने कहा कि ईवीएम के मामले में वे आडवाणी से लेकर मायावती और केजरीवाल तक के साथ हैं. सनद रहे कि लालकृष्ण आडवाणी ने साल 2009 के आम चुनाव में ईवीएम को लेकर सवाल उठाए थे.

दिल्ली के मुख्यमंत्री व आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष अरविंद केजरीवाल ने चुनाव आयोग को चुनौती दी थी कि अगर ईवीएम मशीन उन्हें दे दी जाए, तो 72 घंटों के अंदर वह साबित कर देंगे कि इन मशीनों के साथ छेड़छाड़ मुमकिन है. चुनाव आयोग की मंशा पर सवाल खड़े करते हुए उन्होंने चुनाव आयोग की इस दलील को नकार दिया था कि ईवीएम में एक बार सॊफ़्टवेयर लगाने के बाद ना तो इसे पढ़ा जा सकता है और ना ही इस पर कुछ लिखा जा सकता है. उन्होंने मध्य प्रदेश के भिंड में गड़बड़ी वाले ईवीएम के सॊफ़्टवेयर से जुड़ा डाटा सार्वजनिक करने की मांग करते हुए कहा था कि अगर चुनाव आयोग के पास डाटा डीकोड करने का तंत्र उपलब्ध नहीं है, तो वह अपने विशेषज्ञों की टीम से गड़बड़ पाई गई मशीनों का सॊफ़्टवेयर 72 घंटे में डीकोड करके आयोग को इसकी रिपोर्ट दे सकते हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि ईवीएम की तरह वोटर वेरीफ़ाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) में भी अपने हिसाब से बदलाव किया जा सकता है. ख़बर है कि गुजरात में ईवीएम के परीक्षण के दौरान कांग्रेस को 21 वोट डाले गए और पर्ची भी 21 वोट की निकली, लेकिन कांग्रेस के खाते में सिर्फ़ सात वोट ही गए.

हालांकि चुनाव आयोग ईवीएम को सुरक्षित बता रहा है. इतना ही नहीं, विपक्ष में रहते ईवीएम मशीन की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने वाली भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को भी अब ईवीएम पाक-साफ़ नज़र आ रही है. इस मामले में अरविन्द केजरीवाल का कहना है कि चुनाव आयोग धृतराष्ट्र बनकर दुर्योधन को बचा रहा है. उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव में ईवीएम में गड़बड़ियों की ख़बरों को लेकर शिवसेना ने भी भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधा है. पार्टी के मुखपत्र ’सामना’ में लिखा है कि उत्तर प्रदेश में जनता का ध्यान बांटने और ईवीएम में छेड़छाड़ के अलावा भाजपा के पास कोई चारा नहीं बचा है. पार्टी का आरोप है कि भाजपा उत्तर प्रदेश में डर्टी पॉलिटिक्स कर रही है. जहां ईवीएम से छेड़छाड़ नहीं होती, वहां भाजपा कांग्रेस से पिट जाती है. चित्रकूट, मुरैना और सबलगढ़ इस बात का प्रमाण है.

बहरहाल, ईवीएम से छेड़छाड़ के मामले सामने आने के बाद सियासी दलों में इनके प्रति अविश्वास पैदा हो गया है. इसके साथ-साथ जनमानस में भी चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर भरोसा ख़त्म हुआ है. सियासी दलों के कार्यकर्ता ईवीएम की बजाय मतपत्र से मतदान की मांग को लेकर मुहिम छेड़े हुए हैं. महाराष्ट्र की रिसोड़ तहसील के इंदिरा निष्ठावंत समर्थक ओंकार तोष्णीवाल कहते हैं कि भस्मासुरी शक्तियां ईवीएम को कितना ही अपने पक्ष में कर लें, लेकिन उन असुरी शक्तियों का विनाश होने तक उनका संघर्ष जारी रहेगा.

बहरहाल, ईवीएम गड़बड़ी मामले में चुनाव आयोग जिस तरह का रवैया अख़्तियार किए हुए है, वह भी संतोषजनक नहीं है. इसमें कोई दो राय नहीं कि ईवीएम के साथ छेड़छाड़ लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है. लोकतंत्र यानी जनतंत्र. जनतंत्र इसलिए क्योंकि इसे जनता चुनती है. लोकतंत्र में चुनाव का बहुत महत्व है. निष्पक्ष मतदान लोकतंत्र की बुनियाद है. यह बुनियाद जितनी मज़बूत होगी, लोकतंत्र भी उतना ही सशक्त और शक्तिशाली होगा. अगर यह बुनियाद हिल जाए, तो लोकतंत्र की दीवारों को दरकने में ज़रा भी देर नहीं लगेगी. फिर लोकतंत्र, राजतंत्र में तब्दील होने लगेगा. नतीजतन, मुट्ठी भर लोग येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतकर लोकतंत्र पर हावी हो जाएंगे. इसीलिए चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि चुनाव निष्पक्ष हों. अगर सियासी दल मतपत्र से चुनाव की मांग कर रहे हैं, तो इसे मंज़ूर किया जाना चाहिए. अगर सरकार और चुनाव आयोग ऐसा नहीं करते हैं, तो फिर लोकतांत्रिक प्रणाली का क्या महत्व रह जाता है. इसीलिए बेहतर यही होगा कि मतदान ईवीएम की बजाय मतपत्र के ज़रिये हो.

Thursday, November 23, 2017

सोनिया गांधी और राहुल गांधी जी के नाम एक खुला पत्र

आदरणीया सोनिया गांधी जी और सम्मानीय राहुल गांधी जी !
जैसा कि आप जानते हैं. पिछले कुछ सालों से देश एक बुरे दौर से गुज़र रहा है. नोटबंदी और जीएसटी की वजह से काम-धंधे बंद हो गए हैं. लगातार बढ़ती महंगाई से अवाम का जीना दुश्वार हो गया है. देश में सांप्रदायिक और जातिगत तनाव बढ़ा है. देश की एकता और अखंडता ख़तरे में पड़ गई है. ऐसी हालत में अवाम को कांग्रेस से बहुत उम्मीदें हैं.
लेकिन ईवीएम की वजह से अवाम परेशान है. उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव के दौरान ऐसे मामले सामने आए हैं, जब मतदाताओं ने वोट कांग्रेस को दिया है, लेकिन वह किसी अन्य दल के खाते में गया है. इस मामले में कहा जा रहा है कि मशीन ख़राब है. माना कि मशीन ख़राब है, तो फिर सभी वोट किसी ’विशेष दल’ के खाते में ही क्यों जा रहे हैं? साल के शुरू में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान भी ऐसे मामले सामने आए थे. किसी विशेष दल के खाते में वोट जाने के मसले को लेकर जहां पार्टी कार्यकर्ता परेशान हैं, वहीं मतदाता भी कशमकश में हैं.

जैसा कि आप जानते हैं, लोकतंत्र यानी जनतंत्र. जनतंत्र इसलिए क्योंकि इसे जनता चुनती है. लोकतंत्र में चुनाव का बहुत महत्व है. निष्पक्ष मतदान लोकतंत्र की बुनियाद है. यह बुनियाद जितनी मज़बूत होगी, लोकतंत्र भी उतना ही सशक्त और शक्तिशाली होगा. अगर यह बुनियाद हिल जाए, तो लोकतंत्र की दीवारों को दरकने में देर नहीं लगेगी. फिर लोकतंत्र, राजतंत्र में तब्दील होने लगेगा. नतीजतन, मुट्ठी भर लोग येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतकर लोकतंत्र पर हावी हो जाएंगे.

देश की आज़ादी के बाद निरंतर चुनाव सुधार किए गए. मसलन मतदाता की उम्र घटाकर कम की गई, जन मानस ख़ासकर युवाओं और महिलाओं को मतदान के लिए प्रोत्साहित किया गया. इन सबसे बढ़कर मत-पत्र के इस्तेमाल की बजाय इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) द्वारा मतदान कराया जाने लगा. इससे जहां वक़्त की बचत हुई, मेहनत की बचत हुई, वहीं धन की भी बचत हुई. इतना ही नहीं, मत पेटियां लूटे जाने की घटनाओं से भी राहत मिली. लेकिन अफ़सोस की बात ये है कि ईवीएम की वजह से चुनाव में धांधली कम होने की बजाय और बढ़ ज़्यादा गई. पिछले काफ़ी वक़्त से चुनाव में ईवीएम से छेड़छाड़ के मामले लगातार सामने आ रहे हैं. इस तरह की ख़बरें देखने-सुनने को मिल रही हैं कि बटन किसी एक पार्टी के पक्ष में दबाया जाता है और वोट किसी दूसरी पार्टी के खाते में चला जाता है. इसके अलावा जितने लोगों ने मतदान किया है, मशीन उससे कई गुना ज़्यादा वोट दिखा रही है.

जीत और हार, धूप और छांव की तरह हुआ करती हैं. वक़्त कभी एक जैसा नहीं रहता. देश पर हुकूमत करने वाली कांग्रेस बेशक आज केंद्र की सत्ता में नहीं है, लेकिन इसके बावजूद वह देश की माटी में रची-बसी है. देश का मिज़ाज हमेशा कांग्रेस के साथ रहा है और आगे भी रहेगा. कांग्रेस जनमानस की पार्टी रही है. कांग्रेस का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है. इस देश की माटी उन कांग्रेस नेताओं की ऋणी है, जिन्होंने अपने ख़ून से इस धरती को सींचा है. देश की आज़ादी में महात्मा गांधी के योगदान को भला कौन भुला पाएगा. देश को आज़ाद कराने के लिए उन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी समर्पित कर दी. पंडित जवाहरलाल नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी, राजीव गांधी जी और आपने देश के लिए, जनता के लिए बहुत कुछ किया है. पंडित जवाहर लाल नेहरू जी ने विकास की जो बुनियाद रखी, इंदिरा गांधी जी ने उसे परवान चढ़ाया. राजीव गांधी जी ने देश के युवाओं को आगे बढ़ने की राह दिखाई. उन्होंने युवाओं के लिए जो ख़्वाब संजोये, उन्हें साकार करने में आपने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी.

जनता कांग्रेस के साथ खड़ी है, लेकिन उसे ईवीएम पर यक़ीन नहीं. उसे भरोसा नहीं कि उसका कांग्रेस को दिया वोट कांग्रेस के पक्ष में जाएगा भी या नहीं. इसलिए आपसे अनुरोध है कि आप चुनाव आयोग से मांग करें कि वह चुनाव ईवीएम की बजाय मत पत्र के ज़रिये कराए, क्योंकि ईवीएम से अवाम का यक़ीन उठ चुका है.

आपकी शुभाकांक्षी
फ़िरदौस ख़ान

Wednesday, November 22, 2017

हर बार क़ब्र छोटी पड़ जाती

फ़िरदौस ख़ान
कल एक वाक़िया सुना... सच या झूठ, जो भी हो... लेकिन वो सबक़ ज़रूर देता है...
एक क़बिस्तान में एक क़ब्र खोदी गई... उस क़ब्र में लेट कर देखा गया कि क़ब्र सही है, छोटी तो नहीं है, कहीं कोई कमी तो नहीं रह गई... क़ब्र सही थी...
क़ब्र में मैयत को उतारा गया... लेकिन जैसे ही क़ब्र में मैयत रखी, क़ब्र छोटी पड़ गई... मैयत को ऊपर उठा लिया गया... फिर से क़ब्र को वसीह (बड़ा) किया गया... और उसमें मैयत उतारी गई... लेकिन फिर से क़ब्र छोटी पड़ गई... कई बार क़ब्र खोदी गई, लेकिन हर बार वह छोटी पड़ जाती... सब हैरान और परेशान थे... आख़िरकार मुर्दे को जैसे-तैसे दफ़नाया गया...
जिस शख़्स को दफ़नाया गया था, उसके बारे में घरवालों और आस-पड़ौस के लोगों से मालूमात की गई... मालूम हुआ कि उसने अपने भाइयों की ज़मीन पर क़ब्ज़ा किया हुआ था... लोगों का मानना था कि इसी वजह से उसकी क़ब्र तंग हो गई थी...

हम ये तो नहीं जानते कि ये वाक़िया सच्चा है या झूठा... हां, लेकिन इतना ज़रूर है कि इसने सोचने पर मजबूर कर दिया... आख़िर इंसान को चाहिये ही कितना होता है... दो वक़्त का खाना, चार जोड़े कपड़े... और मरने के बाद दो गज़ ज़मीन... फिर भी क्यों लोग दूसरों की हक़ तल्फ़ी करके ज़मीन-जायदाद, माल और दौलत इकट्ठी कराते हैं... सब यही रह जाना है... साथ अगर कुछ जाएगा, तो वो सिर्फ़ आमाल ही होंगे...
फिर क्यों इंसान दूसरों को लूटने में लगा हुआ है...? ज़रा सोचिये...

Saturday, November 18, 2017

इंदिरा गांधी : हिम्मत और कामयाबी की दास्तां

फ़िरदौस ख़ान
’लौह महिला’ के नाम से मशहूर इंदिरा गांधी न सिर्फ़ भारतीय राजनीति पर छाई रहीं, बल्कि विश्व राजनीति के क्षितिज पर भी सूरज की तरह चमकीं. उनकी ज़िन्दगी संघर्ष, चुनौतियों और कामयाबी का एक ऐसा सफ़रनामा है, जो अदम्य साहस का इतिहास बयां करता है. अपने कार्यकाल में उन्होंने अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय चुनौतियों का सामना किया और हर मोर्चे पर कामयाबी का परचम लहराया. मामला चाहे कांग्रेस पार्टी की अंदरूनी कलह का हो, अलगाववाद का हो, पाकिस्तान के साथ जंग का हो, बांग्लादेश की आज़ादी का हो, या फिर इसी तरह का कोई और बड़ा मुद्दा हो. हर मामले में उन्होंने अपनी सूझबूझ और साहस का परिचय दिया. बैंकों के राष्ट्रीयकरण, प्रीवी पर्स का ख़ात्मा, प्रथम पोखरण परमाणु विस्फोट, प्रथम हरित क्रांति जैसे कार्यों के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा. गुटनिरपेक्ष आंदोलन की अगुवाई और बांग्लादेश की आज़ादी भी उनके साहसिक कार्यों में शामिल है.

देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का जन्म 19 नवंबर, 1917 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में हुआ था. उनका पूरा नाम इंदिरा प्रियदर्शिनी गांधी था. उनके पिता पंडित जवाहरलाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री थे और माता कमला नेहरू थीं. उन्होंने शुरुआती तालीम इलाहाबाद के स्कूल में ही ली. इसके बाद उन्होंने गुरु रबींद्रनाथ टैगोर के शांति निकेतन स्थित विश्व भारती विश्वविद्यालय में दाख़िला लिया. कहते हैं, रबीन्द्रनाथ टैगोर ने ही उन्हें ’प्रियदर्शिनी’ नाम दिया था. इसके बाद वे इंग्लैंड चली गईं और ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में बैठीं,लेकिन नाकाम हुईं. इसके बाद उन्होंने ब्रिस्टल के बैडमिंटन स्कूल में कुछ महीने बिताए. फिर साल 1937 में इम्तिहान में कामयाब होने के बाद उन्होंने ऑक्सफ़ोर्ड के सोमरविल कॉलेज में दाख़िला ले लिया. उस दौरान उनकी मुलाक़ात फ़िरोज़ गांधी से हुई, जिन्हें वे इलाहाबाद से जानती थीं. फ़िरोज़ गांधी उन दिनों लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनॉमिक्स में पढ़ रहे थे. उनकी जान-पहचान मुहब्बत में बदल गई और फिर 16 मार्च 1942 को उन्होंने इलाहाबाद के आनंद भवन में  फिरोज़ से विवाह कर लिया. उनके दो बेटे संजय और राजीव हुए. राजीव गांधी बाद में देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री बने.

बचपन से ही इंदिरा गांधी को सियासी माहौल मिला था, जिसका उनके किरदार और उनकी ज़िन्दगी पर गहरा असर पड़ा. साल 1941 में ऑक्सफ़ोर्ड से स्वदेश वापसी के बाद वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गईं. उन्होंने युवाओं के लिए वानर सेना बनाई. वानर सेना विरोध प्रदर्शन और झंडा जुलूस निकालने के साथ-साथ कांग्रेस नेताओं की भी ख़ूब मदद करती थी, मसलन संवेदनशील प्रकाशनों और प्रतिबंधित सामग्रियों को गंतव्य तक पहुंचाने का काम करती थी. आज़ादी की लड़ाई में इसके काम को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.  1930 की दहाई के शुरू का वाक़िया है, जब इंदिरा गांधी ने पुलिस की निगरानी में रह रहे अपने पिता के घर से एक अहम दस्तावेज़ को अपनी किताबों के बस्ते में छुपाकर गंतव्य तक पहुंचाया था. इस दहाई के आख़िर में ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में अपनी पढ़ाई के दौरान वे लंदन में आज़ादी के समर्थक दल भारतीय लीग की सदस्य बनीं और विदेश में रहकर भी स्वदेश के लिए काम करती रहीं. सितम्बर 1942 में उन्हें  ब्रिटिश हुकूमत द्वारा गिरफ़्तार कर लिया गया. आख़िर तक़रीबन 243 दिन जेल में गुज़ारने के बाद उन्हें 13 मई 1943 को रिहा किया गया. साल 1947 के देश के बंटवारे के दौरान उन्होंने शरणार्थी शिविरों को संगठित किया और पाकिस्तान से आए लाखों शरणार्थियों के लिए भोजन और चिकित्सा का इंतज़ाम किया. उनके इस कार्य को ख़ूब सराहा गया और इससे उन्हें एक नई पहचान मिली.

1950 की दहाई में इंदिरा गांधी अपने पिता यानी देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के निजी सहायक के तौर पर काम कर रही थीं. साल 1959 वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गईं. पार्टी के लिए उन्होंने सराहनीय काम किया. 27 मई, 1964 को उनके पिता का देहांत हो गया. इसके बाद वे राज्यसभा सदस्य के रूप में चुनी गईं और प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में सूचना और प्रसारण मंत्री बनीं. साल 1965 की भारत-पाकिस्तान जंग के दौरान वे सेना की हौसला अफ़ज़ाई के लिए श्रीनगर सीमा के इलाक़े में गईं. सेना की चेतावनी के बावजूद उन्होंने दिल्ली आना मंज़ूर नहीं किया और सेना का मनोबल बढ़ाती रहीं. उस दौरान लालबहादुर शास्त्री ताशक़ंद गए हुए थे, जहां सोवियत मध्यस्थता में पाकिस्तान के अयूब ख़ान के साथ शांति समझौते पर दस्तख़त करने के कुछ घंटों बाद ही उनका निधन हो गया.
इसके बाद 19 जनवरी, 1966 को इंदिरा गांधी देश की तीसरी प्रधानमंत्री बनीं. उस वक़्त कांग्रेस दो गुटों में बंट चुकी थी. समाजवादी ख़ेमा इंदिरा गांधी के साथ खड़ा था, जबकि दूसरा रूढ़िवादी गुट मोरारजी देसाई का समर्थक था. मोरारजी देसाई इंदिरा गांधी को ’गूंगी गुड़िया’ कहा करते थे, क्योंकि वे बहुत कम बोलती थीं. साल 1967 के चुनाव में 545 सीटों वाली लोकसभा में कांग्रेस को 297 सीटें मिलीं. उन्हें प्रधानमंत्री चुन लिया गया और वे  24 मार्च, 1977 अपने पद पर बनी रहीं. क़ाबिले-ग़ौर है कि वे 1967 में प्रधानमंत्री पद के लिए चुने जाने के बाद आख़िर तक प्रधानमंत्री बनी रहीं, लेकिन 1977 से 1980 के बीच उन्हें हुकूमत से बेदख़ल रहना पड़ा. उन्होंने मोरारजी देसाई को देश का उप प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री बनाया. साल 1969 में मोरारजी देसाई के साथ अनेक मुद्दों पर मतभेद हुए और आख़िरकार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस बंट गई. उन्होंने समाजवादी और साम्यवादी दलों के समर्थन से हुकूमत की. इसके कुछ वक़्त बाद फिर से देश को जंग का सामना करना पड़ा. साल 1971 में जंग के दौरान उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति को नई दिशा दी. नतीजतन, जंग में भारत ने शानदार जीत हासिल की. इस दौरान बांग्लादेश को पाकिस्तान से आज़ादी मिली. दरअसल, बांग्लादेश को आज़ाद कराने में इंदिरा गांधी ने बेहद अहम किरदार निभाया था. कहते हैं कि इस जीत के बाद जब संसद सत्र शुरू हुआ, तो विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने भाषण मे इंदिरा गांधी को ‘दुर्गा’ कहकर संबोधित किया था.

इंदिरा गांधी ने  26 जून, 1975 को देश में आपातकाल लागू किया. इसकी वजह से उनकी पार्टी 1977 के आम चुनाव में पहली बार हार गई. उन्हें अक्टूबर 1977 और दिसम्बर 1978 में जेल तक जाना पड़ा. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और जद्दोजहद करती रहीं. फिर 1980 में उन्होंने हुकूमत में वापसी की. कांग्रेस को शानदार कामयाबी मिली और 22 राज्यों में से 15 राज्यों में कांग्रेस पार्टी की सरकार बनी. 14 जनवरी, 1980 को वे फिर से देश की प्रधानमंत्री बनीं और अपनी ज़िन्दगी के आख़िर तक हुकूमत की. उन दिनों पंजाब में आतंकवाद चरम पर था. उन्होंने पंजाब में अलगाववादियों के ख़िलाफ़ मुहिम शुरू कर दी. इसकी वजह से अलगाववादी उनकी जान के दुश्मन बन गए और 31 अक्टूबर, 1984 को दिल्ली में उनके अंगरक्षकों ने ही उनका क़त्ल कर दिया. उनकी आकस्मिक मौत से देश शोक में डूब गया.

श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पंडित जवाहरलाल  नेहरू से श्रीमती इंदिरा गांधी की तुलना करते हुए कहा था कि अपने पिता के विपरीत श्रीमती इंदिरा गांधी संसद से दूर-दूर रहती थीं. आरंभ में तो वह इतनी चुप रहती थीं कि उन्हें ’गूंगी गुड़िया’ तक कह दिया गया था, किंतु यह उनके साथ अन्याय था. वह कम बोलने में विश्वास करती थीं. सबकी बातें सुनने के बाद अपना मत स्थिर करती थीं और सबसे अंत में प्रकट करती थीं. वह सदन में आकर समय गंवाने की बजाय अपने कमरे में बैठकर सत्ता की चाबियां घुमाती थीं. उन्होंने चौदह वर्ष तक शासन कर विश्व को चमत्कृत कर दिया और विरोधियों को कई बार पछाड़ा. इंदिरा जी के साथ संसद में कई बार काफी नोक-झोंक होती रहती थी, किंतु राजनीति के मतभेदों को उन्होंने व्यक्तिगत संबंधों में बाधक नहीं बनने दिया. उनकी निर्मम त्रासद और क्रूर हत्या ने एक ऐसे व्यक्तित्व को हमारे बीच से उठा लिया, जिन्हें योग्य पिता की योग्य पुत्री के नाते ही नहीं, अपनी निजी योग्यता, कुशलता, निर्णय क्षमता तथा कठोरता के कारण याद किया जाएगा.

दरअसल, सियासत की इस महान और कामयाब शख़्सियत को अपनी निजी ज़िन्दगी में कई ग़म मिले थे. साल 1936 में उनकी मां कमला नेहरू तपेदिक से एक लम्बे अरसे तक जूझने के बाद उन्हें अकेला छोड़ गईं. उस वक़्त उनकी उम्र महज़ 18 साल थी. फिर शादीशुदा ज़िन्दगी में भी उन्हें दुख मिले.शादी के बाद उनकी शुरुआती ज़िन्दगी ठीक रही, लेकिन बाद में वे अपने पिता के घर आ नई दिल्ली आ गईं. देश के पहले आम चुनाव 1951 में वे अपने पिता और पति दोनों के लिए चुनाव प्रचार कर रही थीं. चुनाव जीतने के बाद फ़िरोज़ गांधी ने अपने लिए अलग घर चुना. फिर साल 1958 में उप-निर्वाचन के कुछ वक़्त बाद फिरोज़ गांधी को दिल का दौरा पड़ा. इस दौरान इंदिरा गांधी ने उनकी ख़ूब ख़िदमत की. उनके रिश्ते बेहतर होने लगे, लेकिन 8 सितम्बर1960 को जब इंदिरा गांधे अपने पिता के साथ एक विदेश दौरे पर गई थीं, तब फिरोज़ की मौत हो गई. उन्होंने ख़ुद को पार्टी और देश के काम में मसरूफ़ कर लिया. उन्होंने संजय गांधी को अपना सियासी वारिस चुना, लेकिन 23 जून, 1980 को एक उड़ान हादसे में उनकी मौत हो गई. इसके बाद वे अपने छोटे बेटे राजीव गांधी को सियासत में लेकर आईं. राजीव गांधी पायलट की नौकरी में ख़ुश थे और सियासत में आना नहीं चाहते थे, लेकिन मां को वे इंकार न कर सके और न चाहते हुए भी उन्हें सियासत में क़दम रखना पड़ा.

इंदिरा गांधी ख़ाली वक़्त में अपने परिजनों के लिए स्वेटर बुना करती थीं. उन्हें संगीत और किताबों से भी ख़ास लगाव था. पाकिस्तानी गायक मेहंदी हसन की ग़ज़लें भी अकसर सुनती थीं. सोने से पहले वे आध्यात्मिक किताबें पढ़ती थीं. भारत रत्न से सम्मानित इंदिरा गांधी ने कहा था- जीवन का महत्व तभी है, जब वह किसी महान ध्येय के लिए समर्पित हो. यह समर्पण ज्ञान और न्याययुक्त हो. शहादत कुछ ख़त्म नहीं करती, वो महज़ शुरुआत है. अगर मैं एक हिंसक मौत मरती हूं, जैसा कि कुछ लोग डर रहे हैं और कुछ षड़यंत्र कर रहे हैं, तो मुझे पता है कि हिंसा हत्यारों के विचार और कर्म में होगी, मेरे मरने में नहीं. लोग अपने कर्तव्यों को भूल जाते हैं, लेकिन अधिकारों को याद रखते हैं. अपने आप को खोजने का सबसे अच्छा तरीक़ा यह है कि आप अपने आप को दूसरों की सेवा में खो दें. संतोष प्राप्ति में नहीं, बल्कि प्रयास में होता है पूरा प्रयास पूर्ण विजय है. प्रश्न करने का अधिकार मानव प्रगति का आधार है. देशों के बीच के शांति, व्यक्तियों के बीच प्यार की ठोस बुनियाद पर टिकी होती है
उन्होंने यह भी कहा था, जब मैं सूर्यास्त  पर आश्चर्य या चांद की ख़ूबसूरती की प्रशंसा कर रही होती हूं, उस समय मेरी आत्मा इन्हें बनाने वाले की पूजा कर रही होती है.

Thursday, November 16, 2017

जब राहुल गांधी के ख़िलाफ़ लिखने को कहा गया...

फ़िरदौस ख़ान
ये उन दिनों की बात है, जब कांग्रेस के तत्कालीन महासचिव (अब उपाध्यक्ष) राहुल गांधी भूमि अधिग्रहण विधेयक को लेकर अपनी ही सरकार के ख़िलाफ़ खड़े थे... और उन्होंने साल 2011 में जबरन भूमि अधिग्रहण के खिलाफ़ पदयात्रा की थी... उन दिनों हम एक अख़बार के लिए काम कर रहे थे... हमसे कहा गया कि हमें एक तहरीर लिखनी है, जो राहुल गांधी के ख़िलाफ़ हो और विपक्ष (अब सत्ता पक्ष) से जुड़े एक बड़े उद्योगपति के पक्ष में हो...
हमें ये बात बहुत ही नागवार गुज़री... हमारा मानना था कि हमें किसी ख़ास मुद्दे पर लिखने को कहा जाता... जिसका जैसा पक्ष होता, हम उसे उसी तरह पेश करते... बिना ये तय किए कि वह तहरीर किसकी हिमायत में जा रही है, और किसके ख़िलाफ़...
हमने कहा कि हम राहुल गांधी के ख़िलाफ़ नहीं लिखेंगे, अगर कोई बात उनके ख़िलाफ़ नहीं है तो... ऐसा करना सहाफ़त (पत्रकारिता) के उसूलों के ख़िलाफ़ है...
हमसे कहा गया कि हमें काम करना है, तो वही लिखना पड़ेगा, जो कहा जाएगा... हमने ऐसा करने से साफ़ इंकार कर दिया... और घर आ गए...
बाद में दफ़्तर से फ़ोन आया और हमें वापस बुला लिया गया... लेकिन फिर कभी हमसे राहुल गांधी के ख़िलाफ़ लिखने को नहीं कहा... ये काम अब और लोग कर रहे थे... बाद में हमने काम छोड़ दिया...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

Tuesday, November 14, 2017

पंडित जवाहरलाल नेहरू : आधुनिक भारत के निर्माता

फ़िरदौस ख़ान
देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू आधुनिक भारत के निर्माताओं में एक माने जाते हैं. देशभर में उनके जन्म दिन 14 नवंबर को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है. नेहरू बच्चों से बेहद प्यार करते थे और यही वजह थी कि उन्हें प्यार से चाचा नेहरू बुलाया जाता था. एक बार चाचा नेहरू से मिलने एक सज्जन आए. बातचीत के दौरान उन्होंने नेहरू जी से पूछा- पंडित जी, आप सत्तर साल के हो गए हैं,  लेकिन फिर भी हमेशा बच्चों की तरह तरोताज़ा दिखते हैं, जबकि आपसे छोटा होते हुए भी मैं बूढ़ा दिखता हूं. नेहरू जी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया- इसके तीन कारण हैं.  पहला, मैं बच्चों को बहुत प्यार करता हूं. उनके साथ खेलने की कोशिश करता हूं., इससे मैं अपने आपको उनको जैसा ही महसूस करता हूं. दूसरा, मैं प्रकृति प्रेमी हूं और पेड़-पौधों, पक्षी, पहाड़, नदी, झरनों, चांद, सितारों से बहुत प्यार करता हूं. मैं इनके साथ में जीता हूं, जिससे यह मुझे तरोताज़ा रखते हैं. तीसरी वजह यह है कि ज़्यादातर लोग हमेशा छोटी-छोटी बातों में उलझे रहते हैं और उसके बारे में सोच-सोचकर दिमाग़ ख़राब करते हैं. मेरा नज़रिया अलग है और मुझ पर छोटी-छोटी बातों का कोई असर नहीं होता. यह कहकर नेहरू जी बच्चों की तरह खिलखिलाकर हंस पड़े.
पंडित जवाहरलाल नेहरू  का जन्म 14 नवंबर 1889 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में हुआ था. वह पंडित मोतीलाल नेहरू और स्वरूप रानी के इकलौते बेटे थे. उनसे छोटी उनकी दो बहनें थीं. उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित बाद में संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष बनीं. उनकी शुरुआती तालीम घर पर ही हुई. उन्होंने 14 साल की उम्र तक घर पर ही कई अंग्रेज़ शिक्षकों से तालीम हासिल की. आगे की शिक्षा के लिए 1905 में जवाहरलाल नेहरू को इंग्लैंड के हैरो स्कूल में दाख़िल करवा दिया गया. इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए वह कैंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए, जहां से उन्होंने प्रकृति विज्ञान में स्नातक उपाधि प्राप्त की. 1912 में उन्होंने लंदन के इनर टेंपल से वकालत की डिग्री हासिल की और उसी साल भारत लौट आए. उन्होंने इलाहाबाद में वकालत शुरू कर दी, लेकिन वकालत में उनकी ख़ास दिलचस्पी नहीं थी. भारतीय राजनीति में उनकी दिलचस्पी बढ़ने लगी और वह सियासी कार्यक्रमों में शिरकत करने लगे. उन्होंने 1912 में बांकीपुर (बिहार) में होने वाले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में प्रतिनिधि के रूप में हिस्सा लिया लिया. 8 फ़रवरी 1916 को कमला कौल से उनका विवाह हो गया. 19 नवंबर 1917 को उनके यहां बेटी का जन्म हुआ, जिसका नाम इंदिरा प्रियदर्शिनी रखा गया, जो बाद में भारत की प्रधानमंत्री बनीं. इसके बाद उनके यहां एक बेटे का जन्म हुआ, लेकिन जल्द ही उसकी मौत हो गई.

पंडित जवाहरलाल नेहरू  1916 के लखनऊ अधिवेशन में महात्मा गांधी के संपर्क में आए. मगर 1929 में कांग्रेस के ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन का अध्यक्ष चुने जाने तक नेहरू भारतीय राजनीति में अग्रणी भूमिका में नहीं आ पाए थे. इस अधिवेशन में भारत के राजनीतिक लक्ष्य के रूप में संपूर्ण स्वराज्य का ऐलान किया गया. इससे पहले मुख्य लक्ष्य औपनिवेशिक स्थिति की मांग थी. वह जलियांवाला बाग़ हत्याकांड की जांच में देशबंधु चितरंजनदास और महात्मा गांधी के सहयोगी रहे और 1921 के असहयोग आंदोलन में तो महात्मा गांधी के बेहद क़रीब में आ गए और गांधी जी की मौत तक यह नज़दीकी क़ायम रही. कांग्रेस पार्टी के साथ नेहरू का जुड़ाव 1919 में प्रथम विश्व युद्ध के फ़ौरन बाद शुरू हुआ. उस वक़्त राष्ट्रवादी गतिविधियों की लहर ज़ोरों पर थी और अप्रैल 1919 को अमृतसर के नरसंहार के रूप में सरकारी दमन खुलकर सामने आया. स्थानीय ब्रिटिश सेना कमांडर ने अपनी टुकड़ियों को निहत्थे भारतीयों की एक सभा पर गोली चलाने का हुक्म दिया, जिसमें 379 लोग मारे गए और तक़रीबन बारह सौ लोग ज़ख़्मी हुए.

1921 के आख़िर में जब कांग्रेस पार्टी के प्रमुख नेताओं और कार्यकर्ताओं को कुछ प्रदेशों में ग़ैर क़ानूनी घोषित कर दिया गया,  तब पहली बार नेहरू जेल गए. अगले 24 साल में उन्हें आठ बार गिरफ्तार कर जेल भेजा गया. नेहरू ने कुल मिलाकर नौ साल से ज़्यादा वक़्त जेलों में गुज़ारा. अपने मिज़ाज के मुताबिक़ ही उन्होंने अपनी जेल-यात्राओं को असामान्य राजनीतिक गतिविधि वाले जीवन के अंतरालों के रूप में वर्णित किया है.  कांग्रेस के साथ उनका राजनीतिक प्रशिक्षण 1919 से 1929 तक चला. 1923 में और फ़िर 1927 में वह दो-दो साल के लिए पार्टी के महासचिव बने. उनकी रुचियों और ज़िम्मेदारियों ने उन्हें भारत के व्यापक क्षेत्रों की यात्रा का मौक़ा दिया, ख़ासकर उनके गृह प्रदेश संयुक्त प्रांत का,  जहां उन्हें घोर ग़रीबी और किसानों की बदहाली की पहली झलक मिली और जिसने इन महत्वपूर्ण समस्याओं को दूर करने की उनकी मूल योजनाओं को प्रभावित किया. हालांकि उनका कुछ-कुछ झुकाव समाजवाद की ओर था, लेकिन उनका सुधारवाद किसी निश्चित ढांचे में ढला हुआ नहीं था. 1926-27 में उनकी यूरोप और सोवियत संघ की यात्रा ने उनके आर्थिक और राजनीतिक चिंतन को पूरी तरह प्रभावित कर दिया.
वह महात्मा गांधी के कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लड़े, चाहे असहयोग आंदोलन हो या फिर नमक सत्याग्रह, या फिर 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन हो. उन्होंने गांधी जी के हर आंदोलन में बढ़-चढ़कर शिरकत की. नेहरू की विश्व के बारे में जानकारी से गांधी जी काफ़ी प्रभावित थे और इसलिए आज़ादी के बाद वह उन्हें प्रधानमंत्री पद पर देखना चाहते थे. 1920 में उन्होंने उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ ज़िले में पहले किसान मार्च का आयोजन किया. वह 1923 में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के महासचिव चुने गए. गांधी जी ने यह सोचकर उन्हें यह पद सौंपा कि अतिवादी वामपंथी धारा की ओर आकर्षित हो रहे युवाओं को नेहरू कांग्रेस आंदोलन की मुख्यधारा में शामिल कर सकेंगे.
1931 में पिता की मौत के बाद जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस की केंद्रीय परिषद में शामिल हो गए और महात्मा के अंतरंग बन गए. हालांकि 1942 तक गांधी जी ने आधिकारिक रूप से उन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया था, लेकिन 1930 के दशक के मध्य में ही देश को गांधी जी के स्वाभाविक उत्तराधिकारी के रूप में नेहरू दिखाई देने लगे थे. मार्च 1931 में महात्मा और ब्रिटिश वाइसरॉय लॉर्ड इरविन (बाद में लॉर्ड हैलिफ़ैक्स) के बीच हुए गांधी-इरविन समझौते से भारत के दो प्रमुख नेताओं के बीच समझौते का आभास मिलने लगा. इसने एक साल पहले शुरू किए गए गांधी जी के प्रभावशाली सविनय अवज्ञा आंदोलन को तेज़ी प्रदान की, जिसके दौरान नेहरू को गिरफ़्तार किया गया. दूसरे गोलमेज सम्मेलन के बाद लंदन से स्वदेश लौटने के कुछ ही वक़्त बाद जनवरी 1932 में गांधी को जेल भेज दिया. उन पर फिर से सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने की कोशिश का आरोप लगाया गया. नेहरू को भी गिरफ़्तार करके दो साल की क़ैद की सज़ा दी गई.

भारत में स्वशासन की स्थापना की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए लंदन में हुए गोलमेज़ सम्मेलनों की परिणति आख़िरकार 1935 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट के रूप में हुई, जिसके तहत भारतीय प्रांतों के लोकप्रिय स्वशासी सरकार की प्रणाली प्रदान की गई. इससे एक संघीय प्रणाली का जन्म हुआ, जिसमें स्वायत्तशासी प्रांत और रजवाड़े शामिल थे. संघ कभी अस्तित्व में नहीं आया, लेकिन प्रांतीय स्वशासन लागू हो गया.
1930 के दशक के मध्य में नेहरू यूरोप के घटनाक्रम के प्रति ज़्यादा चिंतित थे, जो एक अन्य विश्व युद्ध की ओर बढ़ता प्रतीत हो रहा था. 1936 के शुरू में वह अपनी बीमार पत्नी के इलाज के लिए यूरोप में थे. इसके कुछ ही वक़्त  बाद स्विट्ज़रलैंड के एक सेनीटोरियम में उनकी पत्नी की मौत हो गई. उस वक़्त भी उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि युद्ध की स्थिति में भारत का स्थान लोकतांत्रिक देशों के साथ होगा. हालांकि वह इस बात पर भी ज़ोर देते थे कि भारत एक स्वतंत्र देशों के रूप में ही ग्रेट ब्रिटेन और फ़्रांस के समर्थन में युद्ध कर सकता है.
सितंबर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ने के बाद जब वाइसरॉय लॉर्ड लिनलिथगो ने स्वायत्तशासी प्रांतीय मंत्रिमंडलों से मशविरा किए बगैर भारत को युद्ध में झोंक दिया, तो इसके ख़िलाफ़ कांग्रेस पार्टी के आलाकमान ने अपने प्रांतीय मंत्रिमंडल वापस ले लिए. कांग्रेस की इस कार्रवाई से राजनीति का अखाड़ा जिन्ना और मुस्लिम लीग के लिए साफ़ हो गया.

अक्तूबर 1940 में महात्मा गांधी जी ने अपने मूल विचार से हटकर एक सीमित नागरिक अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का फ़ैसला किया, जिसमें भारत की आज़ादी के अग्रणी पक्षधरों को क्रमानुसार हिस्सा लेने के लिए चुना गया था. नेहरू को गिरफ़्तार करके चार साल की क़ैद की सज़ा दी गई. एक साल से कुछ ज़्यादा वक़्त तक ज़ेल में रहने के बाद उन्हें अन्य कांग्रेसी क़ैदियों के साथ रिहा कर दिया गया. इसके तीन दिन बाद हवाई में पर्ल हारबर पर बमबारी हुई. 1942 में जब जापान ने बर्मा के रास्ते भारत की सीमाओं पर हमला किया  तो इस नए सैनिक ख़तरे के मद्देनज़र ब्रिटिश सरकार ने भारत की तरफ़ हाथ बढ़ाने का फ़ैसला किया. प्रधानमंत्री विन्स्टन चर्चिल ने सर स्टेफ़ोर्ड क्रिप्स को संवैधानिक समस्याओं को सुलझाने के प्रस्तावों के साथ भेजा. सर स्टेफ़ोर्ड क्रिप्स  युद्ध मंत्रिमंडल के सदस्य और राजनीतिक रूप से नेहरू के नज़दीकी और मोहम्मद अली जिन्ना के परिचित थे. क्रिप्स की यह मुहिम नाकाम रही, क्योंकि गांधी जी आज़ादी से कम कुछ भी मंज़ूर करने के पक्ष में नहीं थे.

कांग्रेस में अब नेतृव्य गांधी जी के हाथों में था, जिन्होंने अंग्रेज़ों को भारत छोड़ देने का आह्वान किया. 8 अगस्त 1942 को मुंबई में कांग्रेस द्वारा भारत छोड़ो  प्रस्ताव पारित करने के बाद गांधी जी और नेहरू समेत पूरी कांग्रेस कार्यकारिणी समिति को गिरफ़्तार करके जेल भेज दिया गया. नेहरू 15 जून 1945 को रिहा हुए. लंदन में युद्ध के दौरान सत्तारूढ़ चर्चिल प्रशासन का स्थान लेबर पार्टी की सरकार ने ले लिया था. उसने अपने पहले कार्य के रूप में भारत में एक कैबिनेट मिशन भेजा और बाद में लॉर्ड वेवेल की जगह लॉर्ड माउंटबेटन को तैनात कर दिया. अब सवाल भारत की आज़ादी का नहीं, बल्कि यह था कि इसमें एक ही आज़ाद राज्य होगा या एक से ज़्यादा होंगे. गांधी जी ने बटवारे को क़ुबूल करने से इंकार कर दिया, जबकि नेहरू ने मौक़े की नज़ाकत को देखते हुए  मौन सहमति दे दी. 15 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान दो अलग-अलग आज़ाद देश बने. नेहरू आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बन गए.
फिर 1952 में आज़ाद भारत में चुनाव हुए. ब्रिटिश संसदीय प्रणाली को आधार मान कर बनाए गए भारतीय संविधान के तहत हुआ यह पहला चुनाव था, जिसमें जनता ने मतदान के अधिकार का इस्तेमाल किया. इस चुनाव के वक़्त मतदाताओं की कुल संख्या 17 करोड़ 60 लाख थी, जिनमें से 15 फ़ीसदी साक्षर थे. इस चुनाव में कांग्रेस भारी बहुमत से सत्ता में आई और पंडित जवाहरलाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने. इससे पहले वह 1947 में आज़ादी मिलने के बाद से अंतरिम प्रधानमंत्री थे. संसद की 497 सीटों के साथ-साथ राज्यों की विधानसभाओं के लिए भी चुनाव हुए.  देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का पहला चुनाव प्रचार भी यादगार है. कहा जाता है कि कांग्रेस का चुनाव प्रचार केवल नेहरू पर केंद्रित था. चुनाव प्रचार के लिए नेहरू ने सड़क, रेल, पानी और हवाई जहाज़ सभी का सहारा लिया. उन्होंने 25,000 मील का सफ़र किया यह सफ़र 18,000 मील हवाई जहाज़ से,  5200 मील कार से, 1600 मील ट्रेन से और 90 मील नाव से किया गया. ख़ास बात यह भी रही कि देशभर में 60  फ़ीसदी मतदान हुआ और पहले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सबसे ज़्यादा 364 सीटें मिली थीं.

नेहरू के वक़्त एक और अहम फ़ैसला भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का था. इसके लिए राज्य पुनर्गठन क़ानून-1956 पास किया गया. आज़ादी के बाद भारत में राज्यों की सीमाओं में हुआ, यह सबसे बड़ा बदलाव था. इसके तहत 14 राज्यों और छह केंद्र शासित प्रदेशों की स्थापना हुई. इसी क़ानून के तहत केरल और बॉम्बे को राज्य का दर्जा मिला. संविधान में एक नया अनुच्छेद जोड़ा गया, जिसके तहत भाषाई अल्पसंख्यकों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा हासिल करने का अधिकार मिला.

1929 में जब लाहौर अधिवेशन में गांधी ने नेहरू को अध्यक्ष पद के लिए चुना था,  तब से 35 बरसों तक 1964 में प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए मौत तक नेहरू अपने देशवासियों के आदर्श बने रहे. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नेहरू का सितारा अक्टूबर 1956 तक बुलंदी पर था, लेकिन 1956 में सोवियत संघ के ख़िलाफ़ हंगरी के विद्रोह के दौरान भारत के रवैये की वजह से उनकी गुटनिरपेक्ष नीति की जमकर आलोचना हुई. संयुक्त राष्ट्र में भारत अकेला ऐसा गुटनिरपेक्ष देश था, जिसने हंगरी पर हमले के मामले में सोवियत संघ के पक्ष में मत दिया. इसके बाद नेहरू को गुटनिरपेक्ष आंदोलन के आह्वान की विश्वनियता साबित करने में काफ़ी मुश्किल हुई. आज़ादी के बाद के शुरूआती बरसों में उपनिवेशवाद का विरोध उनकी विदेश-नीति का मूल आधार था, लेकिन 1961 के गुटनिरपेक्ष देशों के बेलग्रेड सम्मेलन तक नेहरू ने प्रति उपनिवेशवाद की जगह गुटनिरपेक्षता को सर्वोच्च प्राथमिकता देना शुरू कर दिया था. 1962 में लंबे वक़्त से चले आ रहे सीमा-विवाद की वजह से चीन ने ब्रह्मपुत्र नदी घाटी पर हमले की चेतावनी दी. नेहरू ने अपनी गुटनिरपेक्ष नीति को दरकिनार कर पश्चिमी देशों से मदद की मांग की. नतीजतन चीन को पीछे हटना पड़ा. कश्मीर नेहरू के प्रधानमंत्रीत्व काल में लगातार एक समस्या बना रहा, क्योंकि भारत के साथ-साथ पाकिस्तान भी इस पर अपना दावा कर रहा था. संघर्ष विराम रेखा को समायोजित करके इस विवाद को निपटाने की उनकी शुरुआती कोशिशें नाकाम रहीं और 1948 में पाकिस्तान ने कश्मीर पर क़ब्ज़े की कोशिश की. भारत में बचे आख़िरी उपनिवेश पुर्तग़ाली गोवा की समस्या को सुलझाने में नेहरू अधिक भाग्यशाली रहे. हालांकि दिसंबर 1961 में भारतीय सेनाओं द्वारा इस पर क़ब्ज़ा किए जाने से कई पश्चिमी देशों में नाराज़गी पैदा हुई, लेकिन नेहरू की कार्रवाई सही थी. हिन्दी-चीनी भाई-भाई का नारा उस वक़्त बेमानी साबित हो गया, जब सीमा विवाद को लेकर 10 अक्तूबर 1962 को चीनी सेना ने लद्दाख़ और नेफ़ा में भारतीय चौकियों पर क़ब्ज़ा कर लिया. नवंबर में एक बार फिर चीन की ओर से हमले हुए. चीन ने एकतरफ़ा युद्धविराम का ऐलान कर दिया, तब तक 1300 से ज़्यादा भारतीय सैनिक शहीद हो चुके थे. पंडित नेहरू के लिए यह सबसे बुरा दौर साबित हुआ. उनकी सरकार के ख़िलाफ़ संसद में पहली बार अविश्वास प्रस्ताव पेश किया गया. चीन के साथ हुई जंग के कुछ वक़्त बाद नेहरू की सेहत ख़राब रहने लगी. उन्हें 1963 में दिल का हल्का दौरा पड़ा, फिर जनवरी 1964 में उन्हें दौरा पड़ा. कुछ ही महीनों बाद तीसरे दौरे में 27 मई 1964 में उनकी मौत हो गई.

जवाहरलाल नेहरू ने देश के विकास के लिए कई महत्वपूर्ण काम किए. उन्होंने औद्योगीकरण को महत्व देते हुए भारी उद्योगों की स्थापना को प्रोत्साहन दिया. उन्होंने विज्ञान के विकास के लिए 1947  में भारतीय विज्ञान कांग्रेस की स्थापना की. देश  के विभिन्न भागों में स्थापित वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद के अनेक केंद्र इस क्षेत्र में उनकी दूरदर्शिता के प्रतीक हैं. खेलों में भी नेहरू की रुचि थी. उन्होंने खेलों को शारीरिक और मानसिक विकास के लिए ज़रूरी बताया. उन्होंने 1951 दिल्ली में प्रथम एशियाई खेलों का आयोजन करवाया.

पंडित जवाहरलाल नेहरू एक महान राजनीतिज्ञ ही नहीं, बल्कि विख्यात लेखक भी थे. उनकी आत्मकथा 1936  में प्रकाशित हुई और दुनियाभर में सराही गई. उनकी अन्य रचनाओं में भारत और विश्व, सोवियत रूस, विश्व इतिहास की एक झलक, भारत की एकता और स्वतंत्रता और उसके बाद आदि शामिल हैं. वह भारतीय भाषाओं को काफ़ी महत्व देते थे. वह चाहते थे कि हिन्दुस्तानी जब कहीं भी एक-दूसरे से मिले तो अपनी ही भाषा में बातचीत करें. उन्होंने कहा था-मेरे विचार में हम भारतवासियों के लिए एक विदेशी भाषा को अपनी सरकारी भाषा के रूप में स्वीकारना सरासर अशोभनीय होगा. मैं आपको कह सकता हूं कि बहुत बार जब हम लोग विदेशों में जाते हैं, और हमें अपने ही देशवासियों से अंग्रेज़ी में बातचीत करनी पड़ती है  तो मुझे कितना बुरा लगता है. लोगों को बहुत ताज्जुब होता है, और वे हमसे पूछते हैं कि हमारी कोई भाषा नहीं है? हमें विदेशी भाषा में क्यों बोलना पड़ता है?

पंडित जवाहरलाल नेहरू अपने विचारों और अपने उल्लेखनीय कार्यों की वजह से ही महान बने. विभिन्न मुद्दों पर नेहरू के विचार उन्हीं के शब्दों में- भारत की सेवा का अर्थ करोड़ों पीड़ितों की सेवा है. इसका अर्थ दरिद्रता और अज्ञान और अवसर की विषमता का अंत करना है. हमारी पीढ़ी के सबसे बड़े आदमी की यह आकांक्षा रही है कि हर आंख के हर आंसू को पोंछ दिया जाए. ऐसा करना हमारी शक्ति से बाहर हो सकता है, लेकिन जब तक आंसू हैं और पीड़ा है, तब तक हमारा काम पूरा नहीं होगा.

नेहरू जी ने कहा था- अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि से आज का बड़ा सवाल विश्व शांति का है. आज हमारे लिए यही विकल्प है कि हम दुनिया को उसके अपने रूप में ही स्वीकार करें. हम देश को इस बात की स्वतंत्रता देते रहें कि वह अपने ढंग से अपना विकास करे और दूसरों से सीखे, लेकिन दूसरे उस पर अपनी कोई चीज़ नहीं थोपें. निश्चय ही इसके लिए एक नई मानसिक विधा चाहिए. पंचशील या पांच सिद्धांत यही विधा बताते हैं.

नेहरू जी ने कहा था- आप में जितना अधिक अनुशासन होगा, आप में उतनी ही आगे बढ़ने की शक्ति होगी. कोई भी देश, जिसमें न तो थोपा गया अनुशासन है, और न आत्मा-अनुशासन-बहुत वक़्त तक नहीं टिक सकता.

मीडिया द्वारा अपना विरोध करने के बारे में उन्होंने कहा था, ’हो सकता है, प्रेस गलती करे, हो सकता है, प्रेस ऐसी बात लिख दे, जो मुझे पसंद न हो. प्रेस का गला घोंटने की बजाय मैं यह पसंद करूंगा कि प्रेस गलती करे और गलती से सीखे, मगर देश में प्रेस की स्वतंत्रता बरकरार रहे.
वह यह भी कहा करते थे कि एक ऐसा क्षण जो इतिहास में बहुत ही कम आता है , जब हम पुराने को छोड़ नए की तरफ जातेहैं , जब एक युग का अंत होता है , और जब वर्षों से शोषित एक देश की आत्मा , अपनी बात कह सकती है.
बेशक, पंडित नेहरू जैसे नेता सदियों में जन्म लेते हैं. उनके विचार आज भी बेहद प्रासंगिक हैं. बस ज़रूरत है उनको अपनाने की.

Saturday, November 11, 2017

राहुल के कारण झुकी मोदी सरकार

फ़िरदौस ख़ान
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के गुजरात दौरे से केंद्र की भाजपा सरकार में हड़कंप मचा हुआ है. जीएसटी में बदलाव इसकी ताज़ा मिसाल है. पिछले दिनों राहुल गांधी ने गुजरात में जीएसटी के मौजूदा स्वरूप में बदलाव करने का वादा किया था. उन्होंने कहा था कि साल 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के सत्ता में आने पर भाजपा सरकार द्वारा लागू किए गए जीएसटी में बड़े बदलाव किए जाएंगे. उन्होंने कहा था कि सत्ता में आने पर हम ऐसा जीएसटी लेकर आएंगे, जिससे आपको फ़ायदा होगा. आप के मुताबिक़ हम काम करेंगे. हम आपकी बात को सुनेंगे.

राहुल गांधी के इस बयान के बाद केंद्र की भाजपा सरकार में खलबली मच गई और सरकार को जीएसटी में बदलाव करना पड़ा. गुवाहाटी में शुक्रवार को संपन्न जीएसटी काउंसिल की बैठक के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने टैक्स में राहत देने का ऐलान किया. इसके तहत रोज़मर्रा की 178 वस्तुओं को 28 फ़ीसद से हटाकर 18 फ़ीसद की स्लैब में लाया गया है. कुल 200 वस्तुओं पर टैक्स कम किया गया है. अब सिर्फ़ 50 लग्ज़री चीज़ें ऐसी बची हैं, जिन पर अधिकतम 28 फ़ीसद कर लगेगा. ग़ौरतलब है कि पिछली 1 जुलाई से देश में लागू नई अप्रत्यक्ष कर प्रणाली (जीएसटी) में कर की पांच स्लैब-0, 5, 12, 18 और 28 फ़ीसद हैं.
जीएसटी में बदलाव पर पूर्व वित्त मंत्री व कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने कहा है कि गुवाहाटी बैठक में ’राहतों की बारिश’ होनी ही थी, क्योंकि ’ख़ौफ़ज़दा मोदी सरकार’ के पास इसके सिवा कोई और चारा नहीं था. सरकार अगले माह होने वाले गुजरात चुनाव की वजह से टैक्स घटाने को मजबूर हुई है.

जीएसटी में संशोधन के फ़ौरन बाद राहुल गांधी ने फिर से भाजपा सरकार पर निशाना साधा. उन्होंने जीएसटी को ‘गब्बर सिंह टैक्स’ बताते हुए कहा कि हम इसे किसी भी सूरत में देश पर थोपने नहीं देंगे. इतना ही नहीं, उन्होंने भाजपा सरकार को कई नसीहतें दीं. उन्होंने जीएसटी को और आसान बनाने के लिए सरकार को तीन मश्विरे भी दिए. पहला, जीएसटी ढांचे के बुनियादी ख़ामी को दूर करते हुए भारत को ‘जेन्यूइन सिंपल टैक्स’ दें. दूसरा, सिर्फ़ लच्छेदार बातों से देश का वक़्त बर्बाद न करें. और तीसरे मश्विरे में राहुल गांधी ने मोदी का नाम लिए बिना कहा कि आप अपनी अक्षमता स्वीकार करें. अहंकार ख़त्म कर देश के लोगों की बात सुनें. जीएसटी पर राहुल गांधी का कहना है कि जीएसटी में एक रेट और इसे सिम्पल टैक्स बनाया जाए. देश को पांच तरह का नहीं, बल्कि एक टैक्स चाहिए. उन्होंने कहा कि पहले नोटबंदी और फिर जीएसटी ने लोगों के काम-धंधे बर्बाद कर दिए, गुजरात ही नहीं, पूरे देश का यही हाल है.

राहुल गांधी इन दिनों गुजरात के दौरे पर हैं. उनका यह दौरा नवसर्जन गुजरात यात्रा के तहत हो रहा है, जो 13 नवंबर को महेसाणा के विसनगर में ख़त्म होगा. क़ाबिले-ग़ौर है कि यह वही जगह है, जहां जुलाई 2015 में पाटीदार आरक्षण आंदोलन की शुरुआत हुई थी, जिसने केंद्र की भाजपा सरकार को हिलाकर रख दिया था. इससे पहले राहुल गांधी 25 से 27 सितंबर तक सौराष्ट्र के पांच ज़िलों की यात्रा कर चुके हैं. उनकी यात्रा द्वारका के मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद 25 सितंबर को शुरू हुई थी. फिर 9 से 11 अक्टूबर तक मध्य गुजरात के छह ज़िलों में उन्होंने जनसंपर्क किया. 23 अक्टूबर को वे अहमदाबाद में रहे. उसके बाद उन्होंने 1 से 3 नवंबर तक दक्षिण गुजरात के छह ज़िलों का दौरा कर अवाम की समस्याएं सुनीं और कारोबारियों से मुलाक़ात की. गुरुवार को उन्होंने सूरत में टेक्टटाइल, डाई और ज़री का करने वाली महिलाओं से मुलाक़ात की और उनके काम, उनकी समस्याओं के बारे में बात की.
सनद रहे कि गुजरात की 182 विधानसभा सीटों के लिए इस बार दो चरणों में चुनाव होगा. राज्य में 9 और14 दिसंबर को मतदान होगा, जबकि चुनाव नतीजे 18 दिसंबर को आएंगे. यहां अहम मुक़ाबला कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी में है, जो 19 साल से लगातार सत्ता पर क़ाबिज़ है.

बहरहाल, गुजरात में राहुल गांधी को ख़ासा जन समर्थन मिल रहा है. उनकी सभाओं में लोगों का हुजूम जुटा रहता है. राहुल गांधी अपनी सुरक्षा की परवाह किए बिना लोगों से मिल रहे हैं, उनके बीच जा रहे हैं. उनके सुख-दुख बांट रहे हैं. उनकी मेहनत कितना रंग लाती है, ये तो चुनाव के बाद पता चलेगा, लेकिन इतना ज़रूर है कि केंद्र की भाजपा सरकार राहुल गांधी से ख़ौफ़ज़दा नज़र आ रही है और उसके मंत्री राहुल गांधी के सवालों के जवाब तलाशने में दिन-रात जुटे हुए हैं.

Tuesday, November 7, 2017

सांप्रदायिक सदभाव की अलख जगाती पुस्तक

मोहम्मद अफ़ज़ाल
प्रस्तुत पुस्तक ’गंगा जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ में लेखिका फ़िरदौस ख़ान का उद्देश्य हिन्दुस्तान की उस तहज़ीब को प्रकाश में लाना है, जिसकी बुनियाद पर भारतीय समाज परवान चढ़ा. किसी भी देश की आत्मा को अगर समझना है, तो उसके लिए उस देश के समाज और उसकी प्रवृत्ति का अध्ययन अति आवश्यक है. जिस समाज का आधार प्रेम हो, वहां मानवता है. और अहिंसा मानवता का प्रतीक है. सम्राट अशोक के हाथ में जब तक तलवार रही, वह क्रूर और ज़ालिम कहलाया. जब उसने अहिंसा का दामन थामा, तो वह एक महान सम्राट अशोक बन गया. संसार में अगर कहीं कोई ऐसा समाज है, जहां मानवता, प्रेम और अहिंसा जिसके आचरण में विद्यमान है, वह हमारा प्रिय देश हिन्दुस्तान ही है. इसका वातावरण, जलवायु और इसकी मिट्टी जिसकी ख़ुशबू इतनी लुभावनी और मनभावन है कि जब उसकी ख़ुशबू वातावरण में रच-बसकर संसार में फैली तो इसकी ठंडक और महक को अरब तक महसूस किया गया और संसार के लिए देश आकर्षण आ केंद्र बन गया.

कोई व्यक्ति मानवता, प्रेम और अहिंसा का पाठ पढ़ने के लिए इस देश की ओर आकर्षित हुआ, तो कोई ज्ञान के आदान-प्रदान के लिए हाथ में कांसा-ए- गदाई (भिक्षा पात्र) के साथ इसकी संस्कृति को नये आयाम देने के लिए यहां आया. क्योंकि वे जानते थे कि जिस सम्मान और प्रेम की उन्हें तलाश है, वह इसी पवित्र धरती पर उन्हें मिल सकता है. कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्होंने तलवार के बल पर इसकी सभ्यता और संस्कृति को तबाह करने की कोशिश की, तो किसी ने छल-कपट और बल के द्वारा इस समाज की एकता की जड़ें हिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. लेकिन ऋषि-मुनियों और औलिया, पीर-फ़क़ीरों ने अपनी अमर वाणी द्वारा मानवता, प्रेम और अहिंसा के इस दीपक को कभी बुझने नहीं दिया. उन्होंने यह सिद्ध करके दिखाया कि किसी जलधारा, मज़हब और धर्मों के उदगम स्थान अलग-अलग हो सकते हैं. मार्ग की कठिनाइयों और बाधाओं को दूर करके निरंतर आगे बढ़ना उनके जीवन का प्रतीक है, लेकिन संगम ही उसको अमरता प्रदान करता है.

 ’गंगा जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ पुस्तक के नाम से ही यह ज्ञात हो जाता है कि इसमें ऐसी महान हस्तियों का बखान है, जिन्होंने संसार के किसी अन्य भूमि के टुकड़े पर जन्म लिया हो, लेकिन इस देश की माटी, संस्कृति के आकर्षण, मोह, ज्ञान और प्रेरणा से अपने आपको अछूता न रख सके तथा उनके क़दम बरबस इस धरती की ओर खींच लाए. कुछ ऐसे महापुरुष भी इस पुस्तक के केंद्र में हैं, जिनका जन्म इस धरती पर मुस्लिम परिवार में हुआ, लेकिन उनकी लेखनी और जीवन शैली पर हिन्दू देवी-देवताओं का राज था. रसखान मुस्लिम होते हुए भी दूसरे जन्म की कामना करते हैं. वह भी इस शर्त के साथ कि जन्म चाहे किसी भी रूप में हो, लेकिन जन्म स्थल ब्रज ही हो. सम्राट अकबर की पत्नी ताजबीबी भगवान श्रीकृष्ण की भक्त थीं, जिसे सम्राट अकबर ने भगवान श्रीकृष्ण का ऐसा चित्र भेंट किया, जिसकी क़ीमत चित्रकार को इतनी दी कि उसे जीवन में कोई और चित्र बनाने की आवश्यकता ही न पड़े. इसके अलावा संत लालदास, भक्त लतीफ़ शाह, पेमी, अब्दुल समद, संत वाजिंद, संत बाबा मलेक ऐसे नाम हैं, जिन्होंने हिन्दू और हिन्दुस्तान की संस्कृति की सेवा की. इसमें कोई शक नहीं कि अगर उन्होंने यह कार्य किसी मुस्लिम देश में किया होता, तो उन्हें मौत की नींद सुला दिया जाता. मगर हमारी संस्कृति की महान उपलब्धि यही है कि हिन्दू परिवार में जन्म लेकर इस्लाम और मुस्लिम परिवार में जन्म लेकर हिन्दू संस्कृति का बखान किया गया है अर्थात अभिव्यक्ति की आज़ादी भी हमारी संस्कृति का एक अभिन्न अंग है.

लेखिका फ़िरदौस ख़ान ने प्रस्तुत पुस्तक में 55 महान हस्तियों का बखान किया है. उनमें से कुछ ऐसे महापुरुष भी हैं, जिन्होंने न तो इस धरती पर जन्म लिया और न ही वे कभी इस धरती पर आकर बसे, लेकिन उन्होंने भी अत्यंत कठिन मार्ग पर चलकर जनमानस की सेवा की. अर्थात जन्म,  उदगम स्थान और मार्ग कोई भी हो दानवता रूपी क्रूर राक्षस को इस धरती से मिटाना उनका उद्देश्य रहा. संसार में जहां कहीं भी प्रेम, मानवता और भाईचारे का पाठ पढ़ाया जाता है, वहां भी भारतीय संस्कृति की ही आत्मा बसती है. लेखिका ने जिस सुंदर ढंग से 55 महान अनमोल मोतियों को पुस्तक रूपी अटूट माला में पिरो दिया, जिसका लाभ दिव्य दृष्टि रखने वाले पारखी पाठकजन अवश्य उठाएंगे.

लेखिका फ़िरदौस ख़ान का इस पुस्तक के लेखन का उद्देश्य मुस्लिम संत-फ़क़ीरों द्वारा जगाई गई प्रेम, अहिंसा और भाईचारे की अलख से जनमानस को अवगत कराना है. ये संत-फ़क़ीर बेशक राष्ट्रीय एकता का प्रतीक और गंगा-जमुनी तहज़ीब के स्तंभ हैं. अफ़सोस की बात तो यह है कि इनका ज़िक्र अकसर लोगों की ज़ुबान पर आता तो है,  लेकिन वो इसकी आत्मा से दूर और इसके अर्थ से आज तक नावाक़िफ़ रहे हैं. इस तहज़ीब को परवान चढ़ाने के लिए सिर्फ़ हाथ से हाथ मिलाना काफ़ी नहीं, बल्कि साथ-साथ चलकर ऐसे मधुर संगम को प्राप्त करना है, जहां केवल प्रेम, अहिंसा और मानवता का वास हो.
(लेखक मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय संयोजक हैं)


किताब का नाम : गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत
लेखिका : फ़िरदौस ख़ान
पेज : 172
क़ीमत : 200 रुपये

प्रकाशक
ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह)
205 -सी, चावड़ी बाज़ार
दिल्ली-110006

प्रभात प्रकाशन
 4/19, आसफ़ अली रोड
दरियागंज
नई दिल्ली-110002
फ़ोन : 011 2328 9555

राहुल को अपना ख़्याल रखना होगा

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी बेशक हिम्मत वाले हैं... बिना सुरक्षा की परवाह किए अवाम के बीच चले जाते हैं... बुलेट प्रूफ़ गाड़ी लेने से तक से मना कर देते हैं... किसी भी अनजान बच्ची को अपनी गाड़ी पर बुलाकर उसके साथ सेल्फ़ी लेते हैं... ये सब अच्छी बात है... एक जननेता में ये ख़ूबी होनी ही चाहिए...

लेकिन उन्हें ये नहीं भूलना चाहिए कि उन पर एक बार हमला हो चुका है... उन्हें धमकियां तक मिल चुकी हैं... उनके पिता राजीव गांधी जी भी लोकप्रिय नेता थे... वे जनता के बीच रहते थे... इसी ख़ूबी का फ़ायदा उठाकर उनके दुश्मनों ने साज़िश रचकर उनकी जान ले ली...

राहुल गांधी को ये नहीं भूलना चाहिए कि उनसे इस मुल्क और इस मुल्क की अवाम को बहुत सी उम्मीदें हैं... उन्हें अवाम की उम्मीदों पर खरा उतरना है... उनके लिए काम करना है... इसलिए उन्हें अपना ख़्याल रखना ही होगा...
सियासत में साम, दाम, दंड, भेद सब चलता है... उन्हें इस बात को भी मद्देनज़र रखना चाहिए...
-फ़िरदौस ख़ान

Thursday, September 21, 2017

कांग्रेस बेरोज़गारी दूर कर सकती है : राहुल गांधी

फ़िरदौस ख़ान
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी फ़िलहाल अमेरिका के दौरे पर हैं. उन्होंने बुधवार रात न्यूयॉर्क के ऐतिहासिक टाइम्स स्क्वायर के पास एक होटल में भारतीय समुदाय के लोगों को संबोधित किया. ग़ौरतलब है कि वे इससे पहले प्रिंसटन और बर्कले यूनिवर्सिटी में भी भाषण दे चुके हैं. राहुल गांधी अपने भाषण में  जहां भारत से जुड़े मुद्दे उठा रहे हैं, वहीं उनका हल भी बता रहे हैं. वे बता रहे हैं कि किस तरह बेरोज़गारी और सांप्रदायिकता जैसी समस्याओं से निपटा जा सकता है, किस तरह देश का विकास किया जा सकता है. किस तरह देश दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बना सकता है.
टाइम्स स्क्वायर में अप्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा, मैं मंच पर मौजूद सभी लोगों का स्वागत करता हूं और इस हॉल में मौजूद आप में से हर एक का स्वागत करता हूं.
आपको पता है कि कई साल पहले सैम भारत आए थे और उन्होंने अभी आपको इंदिरा गांधी जी द्वारा उनके प्रेजेंटेशन को सुनने की बात बताई. मुझे लगता है, सैम ने 1982- 1979 की बात है. मुझे लगता है कि आप दोबारा 1982 में आएं. तो वे 1982 में जब आए, तो उस वक़्त मैं 12 साल का था और एक सुबह मेरे पिता ने मुझसे कहा कि एक प्रेज़ेंटेशन होने वाला है और तुम्हें आना है.
तब प्रेज़ेंटेशन क्या होता है, मुझे ये नहीं पता था. मैंने सोचा कि मुझे कोई ईनाम मिलेगा. ख़ैर, मैं वहां गया और मेरी बहन और मैं कमरे में पीछे की तरफ़ चुपचाप बैठ गए. और हम वहां 6 घंटे तक बैठे रहे. और सैम और मेरे पिता कंप्यूटर पर चर्चा करते रहे. मुझे नहीं पता था कि ये कंप्यूटर क्या चीज़ है. हक़ीक़त में 1982 में कोई भी नहीं जानता था कि कंप्यूटर होता क्या है. मेरे लिए ये एक बॉक्स था, जिसमें टीवी स्क्रीन लगी हुई थी. मेरे लिए यह उस पर एक टीवी स्क्रीन के साथ एक छोटे से बॉक्स की तरह दिखता था. और सच कहूं तो मुझे वो प्रेज़ेंटेशन पसंद नहीं आया, क्योंकि बच्चे के तौर पर मुझे वहां 6 घंटे तक बैठना अच्छा नहीं लगा. और 4-5 साल बाद मैंने उस प्रेज़ेटेशन का नतीजा देखना शुरू किया. प्रधानमंत्री कार्यालय में टाईप राइटर होता था और हर कोई टाईप राइटर का इस्तेमाल करना चाहता था.
सैम और मेरे पिता ने पीएमओ में कहा कि अब हमें कंप्यूटर का इस्तेमाल करना होगा. और हर किसी ने उस वक़्त कहा,  नहीं. हमें अपना टाईप राइटर ही पसंद है, हमें कंप्यूटर नहीं चाहिए. तब सैम और मेरे पिता ने अपनी विशिष्ट शैली में कहा कि ठीक है. आप अपना टाईप राइटर रखें, लेकिन जो हम करना चाहते हैं, वो एक महीने के लिए टाईप राइटर की जगह कंप्यूटर का इस्तेमाल है. और एक महीने के बाद हम आपको आपका टाईप राइटर वापस दे देंगे. उन लोगों ने उन्हें एक महीने के लिए कंप्यूटर दिया और एक महीने बाद उन लोगों ने कहा कि ठीक है. अब हम आपको आपका टाईप राइटर वापस लौटा रहे हैं, तब हर किसी ने लड़ना शुरू कर दिया कि नहीं, हमें अब टाईप राइटर वापस नहीं चाहिए, हमें कंप्यूटर चाहिए.

विचारों को भारत में आने में वक़्त लगता है, लेकिन जब विचार अच्छा हो, तो भारत उसे तेज़ी से समझता है और उसे तेज़ी से अपनाता है. और दुनिया को दिखा देता है कि इसका बेहतर ढंग से इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है. मैं कार में सैम से बात कर रहा था और मैंने उन्हें एक बात कही और उन्होंने कहा कि ओह !
मैंने तो इसके बारे में कभी सोचा ही नहीं. आप सभी एनआरआई हैं. कांग्रेस आंदोलन, मूल कांग्रेस आंदोलन, एक एनआरआई आंदोलन था.  महात्मा गांधी एक प्रवासी भारतीय थे.  जवाहरलाल नेहरू इंग्लैंड से वापस लौटे थे. अम्बेडकर,  आज़ाद, पटेल ये सभी एनआरआई थे. उनमें से हर कोई बाहरी दुनिया में गया था. बाहरी दुनिया को देखा था.  भारत वापस लौट आया और जो कुछ विचार उन्हें हासिल हुआ, उससे भारत को बदल दिया. मैं इससे भी आगे जाऊंगा. भारत में सबसे बड़ी कामयाबी, हालांकि भाजपा के मित्र कहते हैं कि कुछ भी नहीं हुआ, लेकिन भारत में हमारी सबसे बड़ी सफ़लताओं में से एक दुग्ध क्रांति है. भारत में अधिकांश लोग दूध पीते हैं, उसे कुरियन नाम के व्यक्ति जो खुद एनआरआई थे, ने मुमकिन कर दिखाया. वे अमेरिका से वापस आए और उन्होंने भारत को बदल दिया.
सैम एक और मिसाल हैं. और इस तरह की हज़ारों-हज़ार मिसालें हैं, जिनके बारे में हमें पता नहीं है. तो इससे पहले कि मैं अपने भाषण की गहराई में जाऊं.  मैं आपको बताना चाहता हूं कि मैं सेंट फ्रांसिस्को, लॉस एंजिल्स, वाशिंगटन, न्यूयॉर्क में गया. मैंने प्रिंसटन और बर्कले में लोगों को संबोधित किया और जहां भी मैं गया, आप लोगों की वजह से मुझे एक हिन्दुस्तानी होने पर गर्व महसूस हुआ. इस देश में आप लोग हर जगह हैं. यहां भारतीय व्यक्ति है, जो अमेरिका के लिए काम कर रहा है. भारत के लिए काम कर रहा है, शांति से रह रहा है और इस देश और भारत देश का निर्माण कर रहा है.
तो मैं आपको यह बताकर अपनी बात की शुरुआत करना चाहता हूं कि हक़ीक़त में आप हमारे देश की रीढ़ हैं.
कुछ लोग भारत को एक भौगोलिक संरचना के तौर पर देखते हैं. वे भारत को ज़मीन के एक टुकड़े के रूप में देखते हैं. मैं भारत को ज़मीन के एक टुकड़े के रूप में नहीं देखता. मैं भारत को विचारों के एक समूह के तौर पर देखता हूं. तो मेरे लिए, कोई भी व्यक्ति, जो भारत के विचारों को तैयार करता है, वह भारतीय है. हमारे देश में कई सारे मज़हब हैं. हमारे देश में कई सारी अलग-अलग भाषाएं हैं. उनमें से हर कोई मिलजुल कर ख़ुशी से रहता है. और वे ऐसा करने में इसलिए कामयाब हुए हैं, क्योंकि इसकी वजह कांग्रेस पार्टी के विचार हैं.
सैम पित्रोदा ने अभी कहा कि कांग्रेस 130 साल पुरानी है. ये सही बात है. कांग्रेस का संगठन 100 साल से थोड़ा ज़्यादा पुराना है. लेकिन भारत में कांग्रेस के विचार हज़ारों साल पुराने हैं.
सैम ! हम सिर्फ़ एक संगठन का प्रतिनिधित्व नहीं करते, बल्कि हम एक दर्शन का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो हज़ारों साल पुराना है. और मैं आपको थोड़ा बताता हूं कि वो दर्शन क्या है? गांधी जी ने हक़ीक़त में किसके लिए लड़ाई लड़ी? हमारा स्वतंत्रता संग्राम किस लिए था? कुरियन जी ने क्या काम किया?
सैम पित्रोदा ने क्या किया और हज़ारों प्रवासी भारतीयों ने क्या किया? ये सभी सच के लिए खड़े हुए. इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि उनके सामने क्या खड़ा है. जब वे किसी चीज़ पर भरोसा करते हैं और उन्हें यक़ीन होता है कि ये सच है, तो वे इसके लिए खड़े हो जाते हैं और इसके लिए उन्हें क़ीमत चुकानी पड़ती है. यही कांग्रेस का विचार है.
मेरे इस सफ़र के दौरान मैंने काफ़ी बातचीत की. मैं प्रशासन के काफ़ी लोगों से मिला. मैंने डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन दोनों पार्टियों के लोगों से मुलाक़ात की. मैं कई दोस्तों से मिला.  एनआरआई दोस्तों से मिला. और मैं आपको बताना चाहता हूं कि मैं हैरान रह गया, क्योंकि इससे पहले कि मैं उन्हें कुछ बता पाता कि मैं किस बारे में चिंतित हूं, उन लोगों ने मुझे ठीक वही बात कह दी. और सबसे बड़ी बात ये थी कि ज़्यादातर लोगों ने मुझे बताया कि भारत में प्रबल रहने वाली सहिष्णुता का क्या हुआ? भारत में सद्भावना का क्या हुआ?
कई सारी चुनौतियां हैं, जिनका भारत को सामना करना पड़ रहा है. सबसे बड़ी चुनौती, और मैं आपको इसके आंकड़े दूंगा. हर दिन 30 हज़ार युवा नौकरी बाज़ार में शामिल होते हैं.इसका मतलब है कि 24 घंटे में 30 हज़ार नये भारतीय नौकरी के लिए बाज़ार में आते हैं. आज उनमें से केवल 450 को ही नौकरी मिल रही है. मैं बेरोज़गारों के बारे में बात नहीं कर रहा हूं. मैं बता रहा हूं कि हर एक दिन 30 हज़ार नये लोग आते हैं और सिर्फ़ 450 लोगों को ही नौकरी मिलती है. हमारे देश के सामने ये सबसे बड़ी चुनौती है. और इस चुनौती को लोगों को एकजुट करने और इस समस्या का समाधान करके एकीकृत दृष्टिकोण के निर्माण से संबोधित किया जा सकता है.
हम भारत में हर किसी चीज़ पर चर्चा करते हैं. भारत में बांटने वाली राजनीति चल रही है, लेकिन भारत का सामना जिस असली चुनौती से है, वो नौकरी के लिए आने वाले 30 हज़ार युवाओं और उनमें से केवल 450 को नौकरी मिलने को लेकर है.
अगर ऐसे ही चलता रहा, तो आप कल्पना कर सकते हैं कि क्या नतीजे होंगे. भारत अगर अपने युवाओं को रोज़गार नहीं दे पाता, तो वो उन्हें कोई दृष्टिकोण नहीं दे सकता. इस समस्या को हल करने के लिए कांग्रेस पार्टी के पास दूरदृष्टि है. और मैं इस विज़न के बारे में थोड़ा आपको बताना चाहता हूं.
इस वक़्त पूरा फ़ोकस 50-60 काफ़ी बड़ी कंपनियों पर है. मेरा मानना है कि अगर आपको भारत में लाखों-करोड़ों रोज़गार पैदा करने हैं, तो ये छोटे और मध्यम कारोबार को सशक्त बनाकर ही किया जा सकता है. ये काम उद्यमियों को सशक्त बनाकर किया जा सकता है. दूसरा, मैं आपको एक और आंकड़ा बताता हूं. भारत में 40 फ़ीसद सब्ज़ियां सड़ जाती हैं. कृषि को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए. यहां पंजाब के लोग भी हैं.
आप समझ सकते हैं कि मैं हक़ीक़त में क्या कह रहा हूं. कृषि हमारी सामरिक संपत्ति है. हमें कृषि का विकास करने की ज़रूरत है. हमें शीत भंडारण श्रृंखला विकसित करने की ज़रूरत है. हमें खेतों के पास फ़ूड प्रोसेसिंग प्लांट लगाने की ज़रूरत है और हमें भारतीय कृषि को सशक्त बनाने की ज़रूरत है. अगर हम अपने किसानों को सशक्त बनाते हैं, तो हमें लाखों नौकरियां मिल सकती हैं.
स्वास्थ्य देखभाल सुविधाएं बदलने वाली हैं और बर्कले में मैंने अपने भाषण में ये बात कही थी. आज स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी सभी जानकारियां डॉक्टरों को याद हैं. आने वाले कल में ये सारी जानकारियां कंप्यूटर पर होने जा रही हैं. भारत में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है. हम हृदय शल्य चिकित्सा, नेत्र शल्य चिकित्सा सहित काफ़ी तादाद में शल्य क्रियाएं करते हैं. हमें इन सबकी गहरी समझ है कि इन्हें कैसे किया जा सकता है. स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में भारत के लिए बड़ा मौक़ा है. हम दुनिया के स्वास्थ्य सेवा केंद्र बन सकते हैं. लेकिन हमें आज इसके लिए योजना बनानी होगी. और मैं केवल स्वास्थ्य पर्यटन के बारे में बात नहीं कर रहा हूं. मैं ऐसी मान्यता प्रणाली के निर्माण के बारे में बात कर रहा हूं, जिससे भविष्य में चिकित्सा प्रक्रियाओं का बड़ा हिस्सा हमारे देश में किया जाएगा.
मैं आईआईटी के लिए भी इसी तरह का दृष्टिकोण आपको बता सकता हूं. मैं बर्कले में गया. कल मैं प्रिंस्टन में था. अमेरिकी विश्वविद्यालय ज्ञान नेटवर्क हैं. सूचनाएं उनके भीतर दौड़ती हैं. वे कारोबार से जुड़े हुए हैं, वे अर्थव्यवस्था से जुड़े हुए हैं. हमारे आईआईटी शानदार संस्थान हैं, लेकिन वे नेटवर्क नहीं हैं. अगर हम अपने आईआईटी को अपने उद्योगों से जोड़ते हैं, अगर हम अपने आईआईटी को दुनियाभर के कारोबारों से जोड़ते हैं, तो वे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों के साथ प्रतिस्पर्धा करना शुरू कर देंगे. ये सारी चीज़एं हैं, जो की जा सकती हैं.
लेकिन मैं वापस अपने भाषण की शुरुआत में जाना चाहता हूं. आपको शामिल होने की ज़रूरत है. आपके पास ज़बरदस्त ज्ञान है, आपके पास शानदार समझ है, आप विभिन्न क्षेत्रों में काम करते हैं. मैं आपको आगे आने और आगे बढ़ने के दृष्टिकोण पर कांग्रेस पार्टी के साथ काम करने के लिए आमंत्रित करना चाहता हूं. हम आपकी मदद लेना चाहते हैं और देखिए, सैम पित्रोदा ने अकेले दूरसंचार उद्योग को बदल कर रख दिया.हम एक सैम पित्रोदा को नहीं चाहते. हम कम से कम 10-15 सैम पित्रोदा चाहते हैं, क्योंकि भारत में काफ़ी काम करना है. अख़िर में मैं आपसे कहना चाहता हूं कि भारत ने हमेशा दुनिया को दिखाया है कि भाईचारे के साथ कैसे रहना है.
भारत हज़ारों सालों से एकता और शांति के साथ रहने के लिए दुनियाभर में जाना जाता है. इसे चुनौती दी जा रही है. हमारे देश में ऐसी ताक़तें हैं, जो देश को बांट कर रही हैं और देश के लिए यह बहुत ख़तरनाक है. और ये विदेशों में हमारी साख को बर्बाद कर रही हैं.
डेमोक्रेटिक पार्टी के, रिपब्लिकन पार्टी के काफ़ी सारे लोगों ने मुझसे पूछा कि हमारे देश में क्या हो रहा है. हम हमेशा विश्वास करते थे कि आपका देश एकजुटता से काम करता है. हम हमेशा मानते थे कि आपका देश शांतिपूर्ण है, आपके देश में क्या हो रहा है? और इसी चीज़ के ख़िलाफ़ हमें लड़ना है. दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा बेहद अहम है. दुनिया बदल रही है और लोग हमारी तरफ़ देख रहे हैं. चीन उभर रहा है, अमेरिका के साथ हमारे संबंध हैं. हिंसक दुनिया के कई देश भारत की तरफ़ देख रहे हैं, और कह रहे हैं कि इक्कीसवीं सदी में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का जवाब भारत दे सकता है. इसलिए हम अपनी सबसे ताक़तवर संपत्ति खो नहीं सकते. हमारी सबसे बड़ी संपत्ति ख़ुशी, शांति और प्यार से रहने वाली 130 करोड़ जनता है. और पूरी दुनिया ने हमें इस चीज़ के लिए सम्मान दिया है. और यही वो चीज़ है, जिसे हम कांग्रेस के लोग, हममें से हर एक को बचाना है.एक देश के रूप में भारत सभी लोगों के लिए है. इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वे कौन हैं, मैं अपने सिख भाइयों को देख सकता हूं, मैं विभिन्न राज्यों के लोगों को देख सकता हूं.
भारत अकेले आप में से किसी से संबंधित नहीं है, बल्कि भारत इस पूरे कमरे से जुड़ा हुआ है. भारत का रिश्ता हम सभी से है और यही कांग्रेस पार्टी है. मैं एक बार फिर से आप सभी का बहुत धन्यवाद करना चाहता हूं.
और मैंने सैम को बताया है, सैम ! आप जब भी चाहें कि मैं अमेरिका आऊं, आप जहां कहीं भी मुझे बुलाना चाहें बस मुझे एक फ़ोन कर दें, मैं हाज़िर हो जाऊंगा. और आख़िरी बात मैंने आज सैम को बताया.
उन्होंने तस्वीरों के बारे में कहा और मैंने कुछ सीखा है. सैम, हमारे यहां व्यक्तिगत तस्वीरें चलती हैं, तो मुझे लगता है कि अगली बार हमारे पास काफ़ी वक़्त होगा, ताकि हम एक दूसरे के साथ सेल्फ़ी और फ़ोटो ले सकें.
आपका बहुत धन्यवाद.
आप सभी को शुभकामनाएं

Friday, August 25, 2017

निजता पर अवाम की जीत

फ़िरदौस ख़ान
जीवन के हर क्षेत्र में तकनीक के चलन से जहां लोगों को बहुत सी सुविधाएं मिली हैं, वहीं इनकी वजह से कई परेशानियां भी पैदा हो गई हैं.   ये कहना ग़लत न होगा कि तकनीक के इस आधुनिक युग में व्यक्ति की निजता पर लगातार हमले हो रहे हैं. जिस तेज़ी से तकनीक का विकास हो रहा है, उसी तेज़ी से साइबर अपराध भी बढ़ रहे हैं, जो बेहद चिंता की बात है. इस सबके बीच सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला राहत देता नज़र आता है. ये अच्छी ख़बर है कि अब लोगों की निजी जानकारी सार्वजनिक नहीं होगी. सर्वोच्च न्यायालय ने निजता के अधिकार को संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार क़रार दिया है. सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा है कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीने के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अंतर्भूत हिस्सा है. क़ाबिले-ग़ौर है कि 24 अगस्त को दिए अपने फ़ैसले में पीठ ने शीर्ष अदालत के उन दो पुराने फ़ैसलों को ख़ारिज कर दिया, जिनमें निजता को मौलिक अधिकार नहीं माना गया था. इन फ़ैसलों की वजह से निजता के अधिकार पर असर पड़ता था. एमपी शर्मा मामले में छह जजों ने साल 1954 में और खडग सिंह मामले में आठ जजों ने साल 1962 में ये फ़ैसले सुनाए थे. सर्वोच्च न्यायालय के इस अहम फ़ैसले से सरकार के उस रुख़ को करारा झटका लगा है, जिसके तहत वह निजता के अधिकार को संवैधानिक मौलिक आधार नहीं मानती.

ग़ौरतलब है कि तक़रीबन चार साल पहले उस वक़्त निजता के अधिकार को लेकर सवाल उठने शुरू हुए थे, जब अमेरिका में करोड़ों नागरिकों की निजी जानकारियां ऑन लाइन लीक हो गई थीं.एक अमेरिकी इंटेलीजेंस एजेंसी सीआईए के पूर्व एजेंट एडवर्ड स्नोडन ने सारी जानकारियां ऑनलाइन लीक कर दी थीं. भारत में भी कुछ ऐसा ही हुआ था. जब इस साल मई में आधार कार्ड के लिए इकट्ठी हुईं कई भारतीयों की निजी जानकारियां ऑन लाइन लीक हो गईं. देश में यह मामला इसलिए भी ख़ास है, क्योंकि सरकार ने आधार कार्ड को विभिन्न योजनाओं के लिए अनिवार्य कर दिया है. मसलन आय कर रिटर्न भरने, बैंकों में खाता खोलने, क़र्ज़ लेने, पेंशन पाने और वित्तीय लेन-देन यहां तक कि मत्यु प्रमाण पत्र बनवाने के लिए भी आधार कार्ड को अनिवार्य बना दिया है. याचिकाकर्ता आर चंद्रशेखरने आधार कार्ड को निजता के अधिकार में दख़ल अंदाज़ी बताते हुए इसकी अनिवार्यता ख़त्म करने की मांग की थी. इस पर सरकार ने अदालत में कहा था कि निजता का अधिकार तो है, लेकिन वो संपूर्ण अधिकार नहीं है.भारत के संविधान में कोई भी अधिकार संपूर्ण अधिकार नहीं होता है, हर अधिकार के साथ कुछ शर्तें होती हैं. इसलिए देश में इस पर बहस छिड़ गई कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है या नहीं. मामला की गंभीरता को देखते हुए इसे पहले तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ के पास भेजा गया. उसके बाद सुनवाई के लिए पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ के पास मामला गया. फिर 18 जुलाई को नौ सदस्यीय संविधान पीठ का गठन किया गया. इस पीठ ने नियमित सुनवाई करके पिछले 2 अगस्त को फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था. इस मामले की सुनवाई के दौरान कई अजीबो-ग़रीब दलीलें पेश की गईं, मसलन पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने एक दलील में कहा था कि नागरिक के शरीर पर ख़ुद उसका नहीं, बल्कि राज्य का अधिकार है. यह जुमला सुर्ख़ियों में ख़ूब रहा. इस पर भाजपा सरकार की ख़ासी किरकिरी भी हुई.
बहरहाल, कांग्रेस नेताओं ने सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले का स्वागत करते हुए इसे सरकार की फ़ासीवादी सोच के ख़िलाफ़ व्यक्तिगत अधिकारों की जीत क़रार दिया है. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय का निजता का मूलभूत अधिकार के बारे में आया फ़ैसला वैयक्तिक अधिकार, वैयक्तिक स्वतंत्रता व मानवीय गरिमा के एक नये युग का संदेशवाहक है. यह आम आदमी के जीवन में राज्य व उसकी एजेंसियों द्वारा की जा रही निरंकुश घुसपैठ एवं निगरानी के ख़िलाफ़ प्रहार है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी और उसकी सरकारें तथा विपक्षी दल इस अधिकार के पक्ष में इनको सीमित करने के भाजपा सरकार के अहंकारपूर्ण रवैये के ख़िलाफ़ अदालत और संसद में आवाज़ उठा चुके हैं. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले से फ़ासीवादी ताक़तों पर करारा प्रहार हुआ है. निगरानी के ज़रिये दबाने की भाजपा की विचारधारा को मज़बूती से नकारा गया है. उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले का हम स्वागत करते हैं, जिसमें निजता के अधिकार को व्यक्ति की स्वतंत्रता एवं गरिमा का मूलभूत अंग बताया गया है.
कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम का कहना है कि भाजपा सरकार ने अनुच्छेद-21 का जिस तरह से मतलब निकाला है, उससे निजता के अधिकार का हनन हुआ है.उन्होंने ये भी कहा कि आधार में कोई कमी नहीं है, लेकिन यह सरकार जिस तरह से आधार का इस्तेमाल या ग़लत इस्तेमाल करना चाहती है, गड़बड़ी उसमें है. उन्होंने कहा कि ये एक ऐतिहासिक फ़सला है और भारत के संविधान के अस्तित्व में आने के बाद सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गये सबसे महत्वपूर्ण फ़ैसलों में शामिल किया जाएगा. सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले के कारण अनुच्छेद-21 को एक नई भव्यता मिली है. निजता वैयक्तिक स्वतंत्रता के मूल में है तथा यह स्वयं जीवन का अविभाज्य अंग है.  उन्होंने ये भी कहा कि यूपीए सरकार द्वारा आधार को एक प्रशासनिक उपाय के रूप में विचारित किया गया था, ताकि लक्षित लोगों तक कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुंचना सुनिश्चत हो सके. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के महासचिव सीताराम येचुरी ने इसे एक दूरगामी फ़ैसला बताते हुए कहा कि दिनोदिन हमारी ज़िन्दगी में तकनीक की भूमिका बढ़ती जा रही है. विदेशी तकनीकी कंपनियों द्वारा डाटा का ग़लत इस्‍तेमाल किया जा रहा है. ऐसे में फ़ैसले से हमारे अधिकारों को सुरक्षित रखने का मार्ग प्रशस्‍त होगा. दूसरी तरह भारती जनता पार्टी के नेता अपनी सरकार का बचाव करते नज़र आ रहे हैं. उनका कहना है कि निजता का अधिकार संभवत: मौलिक अधिकार है, लेकिन कुछ मामलों में इसमें जायज़ पाबंदियां रहेंगी. याचिकाकर्ता आर चंद्रशेखर का कहना है कि पूरी दुनिया डिजिटल युग की तरफ़ बढ़ रही है. ऐसे में नागरिकों के पास सूचना के दुरुपयोग के ख़िलाफ़ ज़रूरी अधिकार होने चाहिए.


बहरहाल, देखना ये है कि निजता के अधिकार पर सरकार सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले को कितनी गंभीरता से लेती है, क्योंकि सरकार के पास आधार को लेकर अपनी बहुत सी दलीले हैं.

Sunday, August 20, 2017

राजीव गांधी को शत-शत नमन

फ़िरदौस ख़ान
कुछ लोग ज़मीन पर राज करते हैं और कु्छ लोग दिलों पर. मरहूम राजीव गांधी एक ऐसी शख़्सियत थे, जिन्होंने ज़मीन पर ही नहीं, बल्कि दिलों पर भी हुकूमत की. वह भले ही आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन हमारे दिलों में आज भी ज़िंदा हैं. श्री राजीव गांधी ने उन्नीसवीं सदी में इक्कीसवीं सदी के भारत का सपना देखा था.  स्वभाव से गंभीर लेकिन आधुनिक सोच और निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता वाले श्री राजीव गांधी देश को दुनिया की उच्च तकनीकों से पूर्ण करना चाहते थे. वे बार-बार कहते थे कि भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखने के साथ ही उनका अन्य बड़ा मक़सद इक्कीसवीं सदी के भारत का निर्माण है. अपने इसी सपने को साकार करने के लिए उन्होंने देश में कई क्षेत्रों में नई पहल की, जिनमें संचार क्रांति और कंप्यूटर क्रांति, शिक्षा का प्रसार, 18 साल के युवाओं को मताधिकार, पंचायती राज आदि शामिल हैं. वे देश की कंप्यूटर क्रांति के जनक के रूप में भी जाने जाते हैं. वे युवाओं के लोकप्रिय नेता थे. उनका भाषण सुनने के लिए लोग घंटों इंतज़ार किया करते थे. उन्होंने अपने प्रधानमंत्री काल में कई ऐसे महत्वपूर्ण फ़ैसले लिए, जिसका असर देश के विकास में देखने को मिल रहा है. आज हर हाथ में दिखने वाला मोबाइल उन्हीं फ़ैसलों का नतीजा है.


चालीस साल की उम्र में प्रधानमंत्री बनने वाले श्री राजीव गांधी देश के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री थे और दुनिया के उन युवा राजनेताओं में से एक हैं, जिन्होंने सरकार की अगुवाई की है. उनकी मां श्रीमती इंदिरा गांधी 1966 में जब पहली बार प्रधानमंत्री बनी थीं, तब वह उनसे उम्र में आठ साल बड़ी थीं. उनके नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू 58 साल के थे, जब उन्होंने आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री के तौर शपथ ली. देश में पीढ़ीगत बदलाव के अग्रदूत श्री राजीव गांधी को देश के इतिहास में सबसे बड़ा जनादेश हासिल हुआ था. अपनी मां के क़त्ल के बाद 31 अक्टूबर 1984 को वे कांग्रेस अध्यक्ष और देश के प्रधानमंत्री बने थे. अपनी मां की मौत के सदमे से उबरने के बाद उन्होंने लोकसभा के लिए चुनाव कराने का आदेश दिया. दुखी होने के बावजूद उन्होंने अपनी हर ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया. महीने भर की लंबी चुनावी मुहिम के दौरान उन्होंने पृथ्वी की परिधि के डेढ़ गुना के बराबर दूरी की यात्रा करते हुए देश के तक़रीबन सभी हिस्सों में जाकर 250 से ज़्यादा जनसभाएं कीं और लाखों लोगों से रूबरू हुए. उस चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला और पार्टी ने रिकॉर्ड 401 सीटें हासिल कीं. सात सौ करोड़ भारतीयों के नेता के तौर पर इस तरह की शानदार शुरुआत किसी भी हालत में क़ाबिले-तारीफ़ मानी जाती है. यह इसलिए भी बेहद ख़ास है, क्योंकि वे उस सियासी ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते थे, जिसकी चार पीढ़ियों ने जंगे-आज़ादी के दौरान और इसके बाद हिन्दुस्तान की ख़िदमत की थी. इसके बावजूद श्री राजीव गांधी सियासत में नहीं आना चाहते थे. इसीलिए वे सियासत में देर से आए.

श्री राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त, 1944 को मुंबई में हुआ था. वे सिर्फ़ तीन साल के थे, जब देश आज़ाद हुआ और उनके नाना आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने. उनके माता-पिता लखनऊ से नई दिल्ली आकर बस गए. उनके पिता फ़िरोज़ गांधी सांसद बने, जिन्होंने एक निडर तथा मेहनती सांसद के रूप में ख्याति अर्जित की.
राजीव गांधी ने अपना बचपन अपने नाना के साथ तीन मूर्ति हाउस में बिताया, जहां इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री की परिचारिका के रूप में काम किया. वे कुछ वक़्त के लिए देहरादून के वेल्हम स्कूल गए, लेकिन जल्द ही उन्हें हिमालय की तलहटी में स्थित आवासीय दून स्कूल में भेज दिया गया. वहां उनके कई दोस्त बने, जिनके साथ उनकी ताउम्र दोस्ती बनी रही. बाद में उनके छोटे भाई संजय गांधी को भी इसी स्कूल में भेजा गया, जहां दोनों साथ रहे. स्कूल से निकलने के बाद श्री राजीव गांधी कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए, लेकिन जल्द ही वे वहां से हटकर लंदन के इम्पीरियल कॉलेज चले गए. उन्होंने वहां से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की.
उनके सहपाठियों के मुताबिक़ उनके पास दर्शन, राजनीति या इतिहास से संबंधित पुस्तकें न होकर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग की कई पुस्तकें हुआ करती थीं. हालांकि संगीत में उनकी बहुत दिलचस्पी थी. उन्हें पश्चिमी और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय और आधुनिक संगीत पसंद था. उन्हें फ़ोटोग्राफ़ी और रेडियो सुनने का भी ख़ासा शौक़ था. हवाई उड़ान उनका सबसे बड़ा जुनून था. इंग्लैंड से घर लौटने के बाद उन्होंने दिल्ली फ़्लाइंग क्लब की प्रवेश परीक्षा पास की और व्यावसायिक पायलट का लाइसेंस हासिल किया. इसके बाद वे  1968 में घरेलू राष्ट्रीय जहाज़ कंपनी इंडियन एयरलाइंस के पायलट बन गए.
कैम्ब्रिज में उनकी मुलाक़ात इतालवी सोनिया मैनो से हुई थी, जो उस वक़्त वहां अंग्रेज़ी की पढ़ाई कर रही थीं. उन्होंने 1968 में नई दिल्ली में शादी कर ली. वे अपने दोनों बच्चों राहुल और प्रियंका के साथ नई दिल्ली में श्रीमती इंदिरा गांधी के निवास पर रहे. वे ख़ुशी ख़ुशी अपनी ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे, लेकिन  23 जून 1980 को एक जहाज़ हादसे में उनके भाई संजय गांधी की मौत ने सारे हालात बदल कर रख दिए. उन पर सियासत में आकर अपनी मां की मदद करने का दबाव बन गया. फिर कई अंदरूनी और बाहरी चुनौतियां भी सामने आईं. पहले उन्होंने इन सबका काफ़ी विरोध किया, लेकिन बाद में उन्हें अपनी मां की बात माननी पड़ी और इस तरह वे न चाहते हुए भी सियासत में आ गए. उन्होंने जून 1981 में अपने भाई की मौत की वजह से ख़ाली हुए उत्तर प्रदेश के अमेठी लोकसभा क्षेत्र का उपचुनाव लड़ा, जिसमें उन्हें जीत हासिल हुई.  इसी महीने वे युवा कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बन गए. उन्हें नवंबर 1982 में भारत में हुए एशियाई खेलों से संबंधित महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गई, जिसे उन्होंने बख़ूबी अंजाम दिया. साथ ही कांग्रेस के महासचिव के तौर पर उन्होंने उसी लगन से काम करते हुए पार्टी संगठन को व्यवस्थित और सक्रिय किया.

अपने प्रधानमंत्री काल में राजीव गांधी ने नौकरशाही में सुधार लाने और देश की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिए कारगर क़दम उठाए, लेकिन पंजाब और कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन को नाकाम करने की उनकी कोशिश का बुरा असर हुआ. वे सियासत को भ्रष्टाचार से मुक्त करना चाहते थे, लेकिन यह विडंबना है कि उन्हें भ्रष्टाचार की वजह से ही सबसे ज़्यादा आलोचना का सामना करना पड़ा.  उन्होंने कई साहसिक क़दम उठाए, जिनमें श्रीलंका में शांति सेना का भेजा जाना, असम समझौता, पंजाब समझौता, मिज़ोरम समझौता आदि शामिल हैं. इसकी वजह से चरमपंथी उनके दुश्मन बन गए. नतीजतन, श्रीलंका में सलामी गारद के निरीक्षण के वक़्त उन पर हमला किया गया, लेकिन वे बाल-बाल बच गए. साल 1989 में उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया, लेकिन वह कांग्रेस के नेता पद पर बने रहे. वे आगामी आम चुनाव के प्रचार के लिए 21 मई, 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेराम्बदूर गए, जहां एक आत्मघाती हमले में उनकी मौत हो गई. देश में शोक की लहर दौड़ पड़ी.
राजीव गांधी की देश सेवा को राष्ट्र ने उनके दुनिया से विदा होने के बाद स्वीकार करते हुए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया, जिसे श्रीमती सोनिया गांधी ने 6 जुलाई, 1991 को अपने पति की ओर से ग्रहण किया.

राजीव गांधी अपने विरोधियों की मदद के लिए भी हमेशा तैयार रहते थे. साल 1991 में जब राजीव गांधी की हत्या कर दी गई, तो एक पत्रकार ने भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी से संपर्क किया. उन्होंने पत्रकार को अपने घर बुलाया और कहा कि अगर वह विपक्ष के नेता के नाते उनसे राजीव गांधी के ख़िलाफ़ कुछ सुनना चाहते हैं, तो मैं एक भी शब्द राजीव गांधी के ख़िलाफ़ नहीं कहेंगे, क्योंकि राजीव गांधी की मदद की वजह से ही वह ज़िन्दा हैं. उन्होंने भावुक होकर कहा कि जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, तो उन्हें पता नहीं कैसे पता चल गया कि मेरी किडनी में समस्या है और इलाज के लिए मुझे विदेश जाना है. उन्होंने मुझे अपने दफ़्तर में बुलाया और कहा कि वह उन्हें आपको संयुक्त राष्ट्र में न्यूयॉर्क जाने वाले भारत के प्रतिनिधिमंडल में शामिल कर रहे हैं और उम्मीद है कि इस मौक़े का फ़ायदा उठाकर आप अपना इलाज करा लेंगे. मैं न्यूयॉर्क गया और आज इसी वजह से मैं जीवित हूं. फिर वाजपेयी बहुत भावविह्वल होकर बोले कि मैं विपक्ष का नेता हूं, तो लोग उम्मीद करते हैं कि में विरोध में ही कुछ बोलूंगा. लेकिन ऐसा मैं नहीं कर सकता. मैं राजीव गांधी के बारे में वही कह सकता हूं, जो उन्होंने मेरे लिए किया. ग़ौरतलब है कि श्री राजीव गांधी ने अटल बिहारी वाजपेयी को इलाज के लिए कई बार विदेश भेजा था.

श्री राजीव गांधी की निर्मम हत्या के वक़्त सारा देश शोक में डूब गया था. श्री राजीव गांधी की मौत से श्री अटल बिहारी वाजपेयी को बहुत दुख हुआ था. उन्होंने स्वर्गीय राजीव गांधी को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि देते हुए कहा था, मृत्यु शरीर का धर्म है. जन्म के साथ मरण जुड़ा हुआ है. लेकिन जब मृत्यु सहज नहीं होती, स्वाभाविक नहीं होती, प्राकृतिक नहीं होती, ’जीर्णानि वस्त्रादि यथा विहाय’- गीता की इस कोटि में नहीं आती, जब मृत्यु बिना बादलों से बिजली की तरह गिरती है, भरी जवानी में किसी जीवन-पुष्प को चिता की राख में बदल देती है, जब मृत्यु एक साजिश का नतीजा होती है, एक षडतंत्र का परिणाम होती है तो समझ में नहीं आता कि मनुष्य किस तरह से धैर्य धारण करे, परिवार वाले किस तरह से उस वज्रपात को सहें. श्री राजीव गांधी की जघन्य हत्या हमारे राष्ट्रीय मर्म पर एक आघात है, भारतीय लोकतंत्र पर एक कलंक है. एक बार फिर हमारी महान सभ्यता और प्राचीन संस्कृति विश्व में उपहास का विषय बन गई है. शायद दुनिया में और कोई ऐसा देश नहीं होगा जो अहिंसा की इतनी बातें करता हो. लेकिन शायद कोई और देश दुनिया में नहीं होगा, जहां राजनेताओं की इस तरह से हिंसा में मृत्यु होती हो. यह हिंसा और हत्याओं का सिलसिला बंद होना चाहिए.

आज़ाद भारत स्वर्गीय राजीव महत्वपूर्ण योगदान के लिए हमेशा उनका ऋणी रहेगा. स्वर्गीय राजीव गांधी की जयंती 'सद्भावना दिवस' और 'अक्षय ऊर्जा दिवस' के तौर पर मनाई जाती है, जबकि पुण्यतिथि 21 मई को ’बलिदान दिवस’ के रूप में मनाई जाती है.

Sunday, August 6, 2017

ये लोकतंत्र पर हमला है

फ़िरदौस ख़ान
गुजरात में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की कार पर किए गए हमले को किसी भी सूरत में हल्के में नहीं लिया जा सकता है. यह हमला कई सवाल खड़े करता है. यह हमला एक पार्टी विशेष के नेता पर किया गया हमला नहीं है. दरअसल, यह फ़ासीवादी ताक़तों द्वारा लोकतंत्र पर किया गया हमला है. यह हमला इस बात का सबूत है कि शासन-प्रशासन कितना नाकारा है.  कितना डरा हुआ है. विशेष सुरक्षा बल की तैनाती के बावजूद कुछ लोग काले झंडे लेकर मोदी-मोदी के नारे लगाते हुए आते हैं और फिर अचानक राहुल गांधी की कार पर पत्थरों से हमला बोल देते हैं.
यह हमला उस वक़्त हुआ, जब राहुल गांधी गुजरात के बाढ़ प्राभावित ज़िले बनासकांठा के धनेरा में पीड़ितों से मिलकर लौट रहे थे. वे कार की अगली सीट पर बैठे थे.  उनकी कार पर एक बड़ा पत्थर फेंका गया, जिससे गाड़ी का शीशा चकनाचूर हो गया. कार में पिछली सीट पर बैठे एसपीगी कमांडो को चोट आई. हमले से पहले राहुल गांधी को काले झंडे दिखाए गए. उनके सामने लोगों ने मोदी-मोदी के नारे भी लगाए. इसके बावजूद राहुल गांधी ने कहा कि उन्हें आने दो, ये काले झंडे यहां लगाने दो, ये लोग घबराए हुए लोग हैं. हमें इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. हमले के बाद राहुल गांधी ने कहा कि ऐसे हमलों से उनकी आवाज़ दबाई नहीं जा सकती. मैं इन काले झंडे दिखाने वालों से डरने वाला नहीं हूं. मैं आप सभी के बीच आना चाहता था और कहना चाहता था कि कांग्रेस पार्टी आपके साथ है. उनके दफ़्तर की तरफ़ किए गए ट्वीट में कहा गया है कि नरेंद्र मोदी जी के नारों से, काले झंडों से और पत्थरों से हम पीछे हटने वाले नहीं हैं, हम अपनी पूरी ताक़त लोगों की मदद करने में लगाएंगे. उन्होंने ऐसा किया भी.
राहुल गांधी हमले से ज़रा भी विचलित नहीं हुए और गुजरात के बाढ़ प्रभावित इलाक़ों के हवाई दौरे के लिए निकल गए. राहुल गांधी पर हमला करने वाले शायद यह भूल गए हैं कि वे उस शख़्स को डराने की कोशिश कर रहे हैं, जिसकी रगों में शहीदों का ख़ून है. उनके पूर्वजों ने इस देश के लिए अपनी जानें क़ुर्बान की हैं. इस देश की माटी उन कांग्रेस नेताओं की ऋणी है, जिन्होंने अपने ख़ून से इस धरती को सींचा है. देश की आज़ादी में महात्मा गांधी के योगदान को भला कौन भुला पाएगा. देश को आज़ाद कराने के लिए उन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी समर्पित कर दी. पंडित जवाहरलाल नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी, श्री राजीव गांधी और श्रीमती सोनिया गांधी ने देश के लिए, जनता के लिए बहुत कुछ किया. पंडित जवाहर लाल नेहरू ने विकास की जो बुनियाद रखी, इंदिरा गांधी ने उसे परवान चढ़ाया. श्री राजीव गांधी ने देश के युवाओं को आगे बढ़ने की राह दिखाई. उन्होंने युवाओं के लिए जो ख़्वाब संजोये, उन्हें साकार करने में श्रीमती सोनिया गांधी ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी.

राहुल गांधी भी लोगों की मदद करने से कभी पीछे नहीं रहते. इस मामले में वह अपनी सुरक्षा की ज़रा भी परवाह नहीं करते. एक बार वह अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी से लौट रहे थे. रास्ते में उन्होंने एक ज़ख़्मी व्यक्ति को सड़क पर तड़पते देखा, तो क़ाफ़िला रुकवा लिया. उन्होंने एंबुलेंस बुलवाई और ज़ख़्मी व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाया. उन्होंने विधायक और पार्टी प्रवक्ता को उसके इलाज की ज़िम्मेदारी सौंपी. इस दौरान सुरक्षा की परवाह किए बिना वह काफ़ी देर तक सड़क पर खड़े रहे.
राहुल गांधी जब पीड़ितों से मिलने सहारनपुर पहुंचे, तो वहां एक बच्चा भी था. उन्होंने उस बच्चे को अपनी गोद में बिठा लिया. उन्होंने बच्चों से प्यार से बातें कीं और फिर घटना के बारे में पूछा. इस पर बच्चे ने कहा कि अंकल हमारा घर जल गया है, बस्ता भी जल गया और सारी किताबें भी जल गईं. घर बनवा दो, नया बस्ता और किताबें दिलवा दो. इस पर राहुल गांधी ने एक स्थानीय कांग्रेस नेता को उस बच्चे का घर बनवाकर देने और नया बस्ता व किताबें दिलाने की ज़िम्मेदारी सौंप दी. वे मध्य प्रदेश के मंदसौर में भी पीड़ित किसानों से मिलने पहुंच गए. शासन-प्रशासन से उन्हें किसानों से मिलने से रोकने के लिए भरपूर कोशिश कर ली, लेकिन वे भी किसानों से मिले बिना दिल्ली नहीं लौटे, भले उन्हें गिरफ़्तार होना पड़ा. वे आक्रामक रुख़ अख्तियार करते हुए कहते हैं, मोदी किसानों का क़र्ज़ नहीं माफ़ कर सकते, सही रेट और बोनस नहीं दे सकते, मुआवज़ा नहीं दे सकते, सिर्फ़ किसानों को गोली दे सकते हैं.

राहुल गांधी का कहना है कि उनके क़ाफ़िले पर भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने हमला किया. ये हमला एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत किया गया. उन्होंने कहा, ''एक बड़ा पत्थर बीजेपी कार्यकर्ता ने मेरी ओर मारा, मेरे पीएसओ को लगा.'' उन्होंने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनकी पार्टी की राजनीति का तरीक़ा बताया. उन्होंने कहा, ''मोदी जी और बीजेपी-आरएसएस का राजनीति का तरीक़ा है. क्या कह सकते हैं.'' भाजपा की तरफ़ से हादसे को लेकर आ रही प्रतिक्रिया पर राहुल गांधी ने कहा कि जब उन्होंने खुद इस तरह की चीज़ें की हों, तो वे इसकी निंदा कैसे कर सकते हैं. यह काम उनके लोगों ने किया है तो वे इसकी भर्त्सना कैसे करेंगे.

राहुल गांधी पर हमले के बाद कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी की सरकार पर सवाल खड़े किए हैं. कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल का कहना है कि यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है. यह सबकुछ पहले से तयशुदा साज़िश के तहत हुआ है. राहुल गांधी को इतनी ज़्यादा सुरक्षा मिली हुई है, इसके बावजूद यह हमला होना सवाल खड़ा करता है. सरकार ने पहले से कोई इंतज़ाम नहीं किए, यह हमला रोका जा सकता था. भाजपा के लोगों ने हमला किया. राहुल गांधी के दौरे से भाजपा सरकार डर गई है.
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद का कहना है कि राहुल गांधी पर जानलेवा हमला किया गया है.  उन्होंने कहा कि जिस पत्थर से हमला किया गया है वह सीमेंट और पत्थर से बना था. जो वहां कहीं और से लाया गया था. राहुल गांधी को निशाना बनाकर पत्थर फेंके गए हैं. उन्होंने कहा कि भाजपा इन कामों के लिए हमेशा से मशहूर रही है. गांधी जी से लेकर अब तक हम देखते आ रहे हैं.
वहीं कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने राहुल गांधी पर हुए हमले की आलोचना करते हुए कहा कि क्या हम इस लोकतंत्र में ऐसी जगह पहुंच रहे हैं, जहां राजनीतिक विरोधियों को लोकतांत्रिक राजनीति की इजाज़त नहीं दी जाएगी? उन्होंने तल्ख़ लहजे में कहा, "बीजेपी के गुंडों ने राहुल गांधी पर सीमेंट की ईंटों से हमला किया. उनके साथ चलने वाली एसपीजी को भी हल्की चोटें आई हैं. इसकी चौतरफ़ा निंदा की जानी चाहिए." कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने भी राहुल पर हमले की कड़ी निंदा करते हुए कहा, 'बीजेपी के गुंडों ने गुजरात में बनासकांठा के धनेरा में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर हमला किया है. यह बेहूदा और शर्मनाक हरकत है. बीजेपी सरकार अब किस हद की राजनीति पर उतर आई है? राहुल गांधी की गाड़ी पर हमला करने दिया गया. इसकी कड़े शब्दों में निंदा की जानी चाहिए. कांग्रेस उपाध्यक्ष ठीक हैं, लेकिन उनके साथ के लोगों को चोटें आई हैं. बीजेपी के गुंडे हमें नुक़सान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हम और मज़बूत होकर उभरेंगे.'
उधर, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता डी राजा ने भी राहुल गांधी पर हमले की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि यह हमला बीजेपी शासित राज्य में हुआ है, इसलिए बीजेपी को जवाब देना होगा.

कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी एक ऐसी शख़्सियत के मालिक हैं, जिनसे कोई भी मुतासिर हुए बिना नहीं रह सकता. देश के प्रभावशाली राज घराने से होने के बावजूद उनमें ज़र्रा भर भी ग़ुरूर नहीं है.  उनकी भाषा में मिठास और मोहकता है, जो सभी को अपनी तरफ़ आकर्षित करती है. वे विनम्र इतने हैं कि अपने विरोधियों के साथ भी सम्मान से पेश आते हैं, भले ही उनके विरोधी उनके लिए कितनी ही तल्ख़ भाषा का इस्तेमाल क्यों न करते रहें. किसी भी हाल में वे अपनी तहज़ीब से पीछे नहीं हटते. पिछले साल दिसंबर में उत्तर प्रदेश के जौनपुर में कांग्रेस की चुनावी जनसभा में मोदी मुर्दाबाद के नारे लगे, तो राहुल गांधी ने कहा कि ऐसा मत कीजिए. ये कांग्रेस की जनसभा है और यहां मुर्दाबाद लफ़्ज़ का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए. नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं, उनसे हमारी सियासी लड़ाई है. लेकिन मुर्दाबाद बोलना हमारा काम नहीं है, ये बीजेपी और आरएसएस वाले लोगों का काम है.
राहुल गांधी ख़ुशमिज़ाज, ईमानदार, मेहनती और सकारात्मक सोच वाले हैं.  आज देश को उनके जैसे ही नेता की बेहद ज़रूरत है. वे मुल्क की अवाम की उम्मीद हैं. हिन्दुस्तान की उम्मीद हैं. उनके विरोधी उनसे ख़ौफ़ खाते हैं, तभी उन्हें झुकाने के लिए बरसों से उनके ख़िलाफ़ साज़िशें रच रहे हैं.

राहुल गांधी छल और फ़रेब की राजनीति नहीं करते. वे कहते हैं,  ''मैं गांधीजी की सोच से राजनीति करता हूं. अगर कोई मुझसे कहे कि आप झूठ बोल कर राजनीति करो, तो मैं यह नहीं कर सकता. मेरे अंदर ये है ही नहीं. इससे मुझे नुक़सान भी होता है. 'मैं झूठे वादे नहीं करता. "  वे कहते हैं, 'सत्ता और सच्चाई में फ़र्क़ होता है. ज़रूरी नहीं है, जिसके पास सत्ता है उसके पास सच्चाई है. गुजरात में एक आयोजित एक रैली में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मासिक रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' पर तंज़ करते हुए कहते हैं, अगर कांग्रेस चुनाव जीतती है, तो हमारी सरकार हर किसी के लिए होगी न कि केवल एक व्यक्ति के लिए. अपने 'मन की बात' कहने के बजाय हमारी सरकार आपके मन की बात सुनने का प्रयास करेगी.

वे कहते हैं, "जब भी मैं किसी देशवासी से मिलता हूं. मुझे सिर्फ़ उसकी भारतीयता दिखाई देती है. मेरे लिए उसकी यही पहचान है. अपने देशवासियों के बीच न मुझे धर्म, ना वर्ग, ना कोई और अंतर दिखता है."  क़ाबिले-ग़ौर है कि एक सर्वे में विश्वसनीयता के मामले में दुनिया के बड़े नेताओं में राहुल गांधी को तीसरा दर्जा मिला हैं, यानी दुनिया भी उनकी विश्वसनीयता का लोहा मानती है.
उधर गुजरात के उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल का कहना है कि राहुल गांधी को बुलेट प्रूफ़ कार ऒफ़र की गई थी, इसके बावजूद वे पार्टी की कार से गए.  राहुल गांधी की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी केंद्र और राज्य सरकार की है. इस मामले में सरकार पूरी तरह नाकाम रही है, हमलावर सत्ताधारी पार्टी के ही पदाधिकारी हैं, इसलिए इसमें गहरी साज़िश से इंकार नहीं किया जा सकता.

राहुल गांधी पर किया गया हमला यह साबित करता है कि आने वाला वक़्त कांग्रेस का है. आज़ादी के बाद से देश में सबसे ज़्यादा वक़्त तक हुकूमत करने वाली कांग्रेस के लोकसभा में भले ही 44 सांसद हैं, लेकिन कई मामलों में वे भारतीय जनता पार्टी के 282 सांसदों पर भारी पड़े हैं. सत्ताधारी पार्टी ने कई बार ख़ुद कहा है कि कांग्रेस के सांसद उसे काम नहीं करने दे रहे हैं.
भारत एक लोकतांत्रिक देश है. क्या इस देश में किसी सियासी पार्टी को इतना भी हक़ नहीं है कि वे पीड़ित लोगों से मिल सके. आख़िर देश किस दिशा में जा रहा है.
बहरहाल, अंधेरा कितना ही घना क्यों न हो, सुबह को आने से नहीं रोक सकता.