Sunday, December 27, 2015

ऐसे में अवाम कहां जाए...?


फ़िरदौस ख़ान
देश की राजधानी दिल्ली में विकास के प्रतीक लंबे-चौ़डे पुलों के नीचे ठंड से सिकु़ड़ते लोग आती जाती गाड़ियों से बेख़बर ख़ुद में ही सिमटे नज़र आते हैं. इन दिनों पूरा उत्तर भारत ठंड की चपेट में है. घने कोहरे और शीत लहर के थपे़डे ख़ून को जमा देने के लिए काफ़ी होते हैं. तभी तो हर साल सैक़डों लोग ठंड में कांपते हुए मौत की नींद सो जाते हैं. हालांकि सरकार की तरफ़ से बेघरों को ठंड से बचाने के लिए पुख्ता इंतज़ाम किए जाने के तमाम दावे हर साल किए जाते रहे हैं, लेकिन सर्दी के कारण हुई मौतें इन दावों की क़लई खोलकर रख देती हैं, और यह सिलसिला साल दर साल बदस्तूर जारी रहता है.

पिछले दिनों ठंड से हो रही मौतों के मामले में सुप्रीम कोर्ट से सरकार को सख़्त हिदायत दी. अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों से यह सुनिश्चित करने को कहा है कि ठंड की वजह से देश में किसी ग़रीब की मौत न हो. बक़ौल अदालत, हमारा दिल दुख से भर जाता है, जब हम कड़ाके की इस ठंड में बेघर लोगों को बिना छत के सोता हुआ देखते हैं. जस्टिस दलवीर भंडारी व जस्टिस दीपक मिश्रा की पीठ ने दिल्ली सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल मोहन पराशरन से कहा कि आप अपने बच्चे को ठंड में जान गंवाने के लिए नहीं छोड़ सकते. ठीक उसी तरह बेघर लोगों को भी सहारा दिया जाना चाहिए. हमें बड़ा दुख होता है जब हम देखते हैं कि इतनी ठंड में बेघर लोग खुले आसमान के नीचे रहते हैं. अदालत ने यह टिप्पणी एम्स के बाहर फुटपाथ पर पड़े लोगों की अ़खबारों में छपी तस्वीरों और ख़बरों पर संज्ञान लेते हुए की. इन लोगों को इलाज के लिए अस्पताल में जगह नहीं दी गई और वहां से रैन बसेरे भी हटा दिए गए. इसकी वजह से मरीज़ों और उनके परिवारजनों को कड़ाके की ठंड में फुटपाथ पर खुले में रहना पड़ा . ग़ौरतलब है कि सुरक्षा के नाम पर यहां बने रैन बसेरों को गिरा दिया गया है. हालांकि पराशरन ने सरकार को दिलासा दिया कि यहां अस्थायी तौर पर रैन बसेरे बनाए जाएंगे. दिल्ली सरकार का दावा है कि उसने 64 स्थायी रैन बसेरे बनवाए हैं. याचिकाकर्ता पीपल्स यूनियन फोर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) के वकील कॉलिन गोंजालविस का कहना है कि जहां रैन बसेरे बनाए गए हैं, वहां कोई रहता ही नहीं. दूरी ज़्यादा होने की वजह से सरकार के बनाए रैन बसेरों में एक भी व्यक्ति नहीं रह रहा है.
सरकार को ऐसे स्थानों पर रैन बसेरे बनाने चाहिए, जिससे कि बेघर लोग उनका फ़ायदा उठा सकें. सिर्फ़ ख़ानापूर्ति के लिए रैन बसेरे बनाने का कोई औचित्य नहीं है. मीडिया के दबाव के कारण सरकार जब तक रैन बसेरों का इंतज़ाम करती है, मौसम बदल जाता है.

देश के कई राज्यों में रैन बसेरे संचालित किए जाते हैं, ताकि बेघरों को सड़क पर रात न गुज़ारनी पड़े. ठिठुराने वाली सर्दी में लोगों को एक अदद छत नसीब हो सके, इस लिहाज़ से रैन बसेरे बेहद ज़रूरी हैं. लेकिन इनकी तादाद काम रहती है. अकेले उत्तर प्रदेश में जहां शीतलहर के कारण अब तक कई लोगों की मौत हो चुकी है, वहां अलाव जलाने और कंबल बांटने के लिए राज्य सरकार ने सात करोड़ रुपये की राशि जारी की है. इसके बावजूद लोगों के लिए सर्दी से राहत के इंतज़ाम नहीं हो पा रहे हैं. ऐसे में यह पैसा कहां जा रहा है, बताने की ज़रूरत नहीं. हालांकि ग़ैर सरकारी संगठनों और सामाजिक संगठनों के कारण बेघरों को सर्दी में थोड़ी बहुत राहत मिल जाती है, लेकिन यह काफ़ी नहीं है. यह बेहद अफ़सोस की बात है कि ऐसे मामलों में भी अदालत को ही सरकार को आदेश देना पड़ता है, और इससे बड़े दुख की बात यह है कि इसके बावजूद भी सरकार कुछ नहीं करती. ऐसे में जनता कहां जाए...?

मुस्लिम सियासी दलों की हक़ीक़त...


फ़िरदौस ख़ान
मुस्लिम सियासी दलों की हक़ीक़त... देश में चुनाव के क़रीब आते ही मुस्लिम सियासी दल और मुस्लिम संगठन हरकत में आ जाते हैं... इनके कर्ताधर्ता पहले तो देश के तक़रीबन सियासी दलों को पानी पी-पीकर कोसते हैं और बाद में कुछ संगठन इन्हीं सियासी दलों की गोद में जाकर बैठ जाते हैं... पर्दे के पीछे की हक़ीक़त यही रहती है कि इन दलों का मक़सद बड़े सियासी दलों से सैटिंग करके रक़म ऐंठना ही होता है... जो दल खुलेआम किसी सियासी दल को समर्थन नहीं देते, वे भी मुसलमानों के वोट बांटने का काम करते हुए सांप्रदायिक सियासी दलों को फ़ायदा पहुंचाते हैं... मुसलमानों को चाहिए कि वे ऐसे मुस्लिम सियासी दलों से परहेज़ करें, जो उनकी भलाई के नाम पर अपना उल्लू सीधा करते हैं... आज देश में हालात हैं, उन्हें देखते हुए यह बेहद ज़रूरी है कि मुसलमान ऐसे सियासी दल को वोट करें, जो देश की एकता और अखंडता में यक़ीन रखता है... ख़ास बात यह है कि अगर मुसलमान अपना और अपने बच्चों का सुरक्षित भविष्य चाहते हैं, तो उन्हें सांप्रदायिक ताक़तों के ख़िलाफ़ एकजुट होना ही होगा...

गर्म कपड़े


हम सब बाज़ार से नये-नये कपड़े-कपड़े ख़रीदते रहते हैं... हर मौसम में मौसम के हिसाब से कपड़े आते हैं... सर्दियों के मौसम में स्वेटर, जैकेट, गरम कोट, कंबल, रज़ाइयां और भी न जाने क्या-क्या... बाज़ार जाते हैं, जो अच्छा लगा ख़रीद लिया... हालांकि घर में कपड़ों की कमी नहीं होती... लेकिन नया दिख गया, तो अब नया ही चाहिए... इस सर्दी में कुछ नया ही पहनना है... पिछली बार जो ख़रीदा था, अब वो पुराना लगने लगा... वार्डरोब में नये कपड़े आते रहते हैं और पुराने कपड़े स्टोर में पटख़ दिए जाते हैं...
ये घर-घर की कहानी है... जो कपड़े हम इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं और वो पहनने लायक़ हैं, तो क्यों न उन्हें ऐसे लोगों को दे दिया जाए, जिन्हें इनकी ज़रूरत है...

कुछ लोग इस्तेमाल न होने वाली चीज़ें दूसरों को इसलिए भी नहीं देते कि किसे दें, कौन देने जाए... किसके पास इतना वक़्त है... अगर हम अपना थोड़ा-सा वक़्त निकाल कर इन चीज़ों को उन हाथों तक पहुंचा दें, जिन्हें इनकी बेहद ज़रूरत है, तो कितना अच्छा हो...

चीज़ वहीं अच्छी लगती है, जहां उसकी ज़रूरत होती है...

Thursday, December 10, 2015

मज़हब


ज़्यादातर लोग किसी मज़हब को सिर्फ़ इसलिए मानते हैं, क्योंकि वे उस मज़हब को मानने वाले परिवार में पैदा हुए हैं... बहुत कम लोग ही ऐसे होते हैं, जो अपना मज़हब बदलते हैं... कई बार ऐसा भी होता है कि लोग अपना मज़हब नहीं बदलते, लेकिन उनकी अक़ीदत दूसरे मज़हब में होती है...
दरअसल, इबादत बहुत ज़ाती चीज़ है... कौन अपने ख़ुदा को किस तरह याद करता है... यह उसका ज़ाती मामला है...

अपने मज़हब को जबरन किसी पर थोपना अच्छी बात नहीं... अमूमन हर इंसान को अपना मज़हब ही सही लगता है... इसके लिए वह कुतर्क करने से भी बाज़ नहीं आता... अच्छा तो यही है कि हमें सभी मज़हबों की इज़्ज़त करनी चाहिए... जब हम दूसरों के मज़हब की इज़्ज़त करेंगे, तभी वो हमारे मज़हब की भी इज़्ज़त करेंगे...
-फ़िरदौस ख़ान

Tuesday, November 24, 2015

विज्ञापन डराते हैं


टीवी पर दिनभर में जितने भी विज्ञापन आते हैं, उनमें ऐसे विज्ञापनों की भरमार रहती है, जिनमें लोगों को इतनी बुरी तरह डराया जाता है कि वे विज्ञापन ख़त्म होते ही उनके उत्पाद ख़रीदने के लिए दौड़ पड़ें... हाथ धोने से लेकर नहाने तक और बर्तन धोने से लेकर फ़र्श साफ़ करने तक के उत्पादों के विज्ञापनों में कीटाणुओं का डर दिखाया जाता है कि अगर फ़लां उत्पाद इस्तेमाल न किया, तो उनका बच्चा बीमार हो जाएगा...
शुक्र है कि ये विज्ञापन कीटाणुओं के संपूर्ण नाश के लिए कोई कीटनाशक पीने की सलाह नहीं देते...


यह हिंदुस्तान है, जहां धरती को मां कहकर पुकारा जाता है... गांव-देहात में आज भी चोट लगने पर बच्चे और बड़े अपने ज़ख़्म पर मिट्टी डाल लेते हैं...

Saturday, November 14, 2015

अवाम को क्या चाहिए


अवाम को क्या चाहिए, बुनियादी ज़रूरत की चीज़ें... मुल्क में चैन-अमन हो, लोगों के पास रोज़गार हो, पेट भरने के लिए खाना हो, रहने को घर हो, बिजली हो, पानी हो, यातायात के साधन हों, बच्चों के लिए स्कूल-कॊलेज हों  और स्वास्थ्य सुविधाएं हों...

अवाम यही सब तो चाहती है, लेकिन सरकार... सरकार उन्हें ये सब देने की बजाय फ़िज़ूल की बयानबाज़ी में उलझाये रखना चाहती है, ताकि वे अपने हक़ के लिए बग़ावत शुरू न कर दें...
और सरकार अपनी इस साज़िश में काफ़ी हद तक कामयाब भी हुई है... अवाम को चाहिए कि वे बेजा बयानबाज़ी के फेर में न पड़ कर अपने हक़ के लिए आवाज़ बुलंद करें...
-फ़िरदौस ख़ान

Friday, November 6, 2015

विज्ञापन गुमराह करते हैं



सोच रहे हैं, क्या ख़ाला ने ये ख़बर सुनी होगी... अगर सुनी होगी, तो उन्होंने ये ज़रूर सोचा होगा कि ठगी तो वह भी गई हैं, उन करोड़ों लोगों की तरह, जो विज्ञापनों के झूठे दावों पर भरोसा करके कुछ अच्छे की उम्मीद बांध लेते हैं...
ज़्यादातर विज्ञापन गुमराह करते हैं... फिर भी लोग विज्ञापनों के झूठे दावों के दांव में फंस जाते हैं... बचपन की बात है... हमारी रिश्ते की एक ख़ाला हैं... उनका रंग ज़्यादा सांवला है... वो फ़ेयरनेस क्रीम लगाती थीं, शायद उस वक़्त आठ हफ़्तों में गोरा होने का दावा किया जाता था... वो अपनी अम्मी से क्रीम छुपाकर रखती थीं, ताकि वो देख न लें... क्रीम लगाने की सख़्त मनाही थी... बस काजल या सुरमा लगाने की इजाज़त थी... बरसों उन्होंने क्रीम लगाई, लेकिन गोरी नहीं हुईं... चार साल पहले जयपुर में उनसे मुलाक़ात हुई... हमने उनसे पूछा कि क्या अब भी फ़ेयरनेस क्रीम लगाती हैं... वो मुस्करा कर रह गईं...
दिल्‍ली की ज़िला उपभोक्‍ता अदालत ने फ़ेयरनेस क्रीम बनाने वाली कंपनी इमामी पर 15 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है. कोर्ट ने यह फ़ैसला निखिल जैन की याचिका पर सुनाया है. तीन साल पहले दायर अर्ज़ी में निखिल ने आरोप लगाया था कि इमामी ने प्रचार में जो दावा किया था, क्रीम के इस्‍तेमाल से सच में वैसा कोई नतीजा नहीं आया. इमामी स्किन क्रीम के इस्‍तेमाल के बाद ख़ुद को छला हुआ महसूस करने के बाद निखिल ने कंपनी के ख़िलाफ़ अनफ़ेयर ट्रेड प्रैक्टिसेस का आरोप लगाया था. उसने जो क्रीम ख़रीदा थी, उसके प्रचार में चार हफ़्ते में गोरापन लाने का वादा किया गया था. उन्‍हें प्रचार में शाहरुख़ ख़ान यह दावा करते दिखे थे.
अदालत में कंपनी ने कहा कि उसका उत्पाद त्‍वचा की सेहत और गुणवत्‍ता सुधारने के लिए है. इस पर अदालत ने विज्ञापन को भ्रामक बताते हुए ने कहा, ‘पहली बात तो विज्ञापन में गोरापन शब्‍द का इस्तेमाल किया गया है, जिसका मतलब है त्‍वचा का रंग साफ़ करना. दूसरी बात, इसमें वादा किया गया है कि चार हफ़्ते के इस्‍तेमाल के बाद गोरी त्‍वचा मिलेगी.’

Wednesday, October 21, 2015

भूत वाली फ़िल्मों की कहानी सच्ची होती...


काश ! भूत वाली फ़िल्मों की कहानी सच्ची होती...
भूत वाली डरावनी फ़िल्मों में अकसर दिखाया जाता है कि एक ताक़तवर ज़ालिम किसी कमज़ोर औरत पर ज़ुल्म करता है और उसका क़त्ल कर देता है... फिर वो औरत भूत बनकर उससे अपने क़त्ल का बदला लेती है...
आज कितने की लोगों पर ज़ुल्म किए जा रहे हैं, उन्हें ख़ुदकुशी के लिए मजबूर किया जा रहा है... उन्हें बेरहमी से क़त्ल किया जा रहा है... ज़ालिम मासूम बच्चों तक को नहीं बख़्श रहे हैं...
अगर डरावनी फ़िल्मों की तरह इन लोगों की रूहें भी ज़ालिमों से इंतक़ाम लेतीं, तो कितना अच्छा होता... कितने ही मज़लूम इंसाफ़ हासिल कर पाते और ज़ालिमों का भी सफ़ाया हो जाता...

Tuesday, October 20, 2015

मुहर्रम


मुहर्रम के दस दिनों तक हमारे घरों में बाज़ार जाकर ख़रीदारी नहीं करते और न ही कोई नया काम शुरू करते हैं... आठ तारीख़ को खीर पर कर्बला के शहीदों की नियाज़ दिलाई जाती है... इसी तरह नौ तारीख़ को बिरयानी और दस तारीख़ को हलीम पर नियाज़ होती है... दस तारीख़ की सुबह शर्बत पर भी नियाज़ दिलाई जाती है...
मुहर्रम को लेकर शिया और सुन्नियों की अपनी-अपनी अक़ीदत है... शिया इस दौरान मातक करते हैं, ताज़िये निकालते हैं... जबकि सुन्नी इसके ख़िलाफ़ हैं...
इस बारे में सबकी अपनी-अपनी दलीलें हैं, अपनी-अपनी अक़ीदत है...
अल्लामा इक़बाल साहब ने ग़म-ए-शब्बीर के बारे में कहा है-
कह दो ग़म-ए- हुसैन मनाने वालों को
मुसलमान कभी शोहदा का मातम नहीं करते
है इश्क़ अपनी जान से ज़्यादा आले-रसूल (सल्ल) से
यूं सरेआम उनका तमाशा नहीं करते
रोयें वो जो मुनकिर हैं शहादत-ए-हुसैन के
हम ज़िन्दा-ओ-जावेद का मातम नहीं करते...
मरहूम अली नक़ी साहब ने इसका जवाब कुछ इस तरह दिया है-
गिरया किया याक़ूब ने उनको भी तो टोको
यूसुफ़ तो अभी ज़िंदा हैं यूं ग़म नहीं करते
आदम ने तो हव्वा के लिए पीटा है सीना
समझाओ उन्हें ज़िन्दों का मातम नहीं करते
हमज़ा तो शहीदों के भी सरदार हैं लेकिन
करते ना मुहम्मद तो चलो हम नहीं करते
हक़ बात है बस बुग़्ज़-ए-अली का ये चक्कर
तुम इसलिए शब्बीर का मातम नहीं करते
अपना कोई मरता है तो रोते हो तड़प कर
पर सिब्ते-पयम्बर का कभी ग़म नहीं करते
हिम्मत है तो महशर में पयम्बर से ये कहना
हम ज़िन्दा-ओ-जावेद का मातम नहीं करते
बस एक रिवायत रही है रोज़-ए-अज़ल से
क़ातिल कभी मक़तूल का मातम नहीं करते...
कर्बला के शहीद हमारे अपने हैं... कौन उन्हें किस तरह याद करता है, ये उसकी अपनी अक़ीदत है... वैसे भी हर इंसान को अपनी अक़ीदत के साथ जीने का पूरा हक़ है. हम अपनी अक़ीदत के साथ जियें और दूसरों को उनकी अक़ीदत के साथ जीने दें...

Monday, October 12, 2015

क़ुदरत और इंसान


कु़दरत किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं करती... सूरज, चांद, सितारे, हवा, पानी, ज़मीन, आसमान, पेड़-पौधे मज़हब के नाम पर किसी के साथ किसी भी तरह का कोई भेदभाव नहीं करते... जब कायनात की हर शय सबको बराबर मानती है, तो फिर ये इंसान क्यों इतना नीचे गिर गया कि इसके गिरने की कोई हद ही न रही... इंसान को ख़ुदा ने अशरफ़ुल मख़लूक़ात बनाकर इस दुनिया में भेजा था... लेकिन इसने अपनी ग़र्ज़ के लिए इंसानों को मज़हबों में तक़सीम करके रख दिया... फिर ख़ुद को आला समझना शुरू कर दिया और दूसरों को कमतर मानने लगा... उनसे नफ़रत करने लगा, उनका ख़ून बहाने लगा...
ऐसे इंसानों से क्या जानवर कहीं बेहतर नहीं हैं, जो मज़हब के नाम पर किसी से नफ़रत नहीं करते, मज़हब के नाम पर किसी का ख़ून नहीं बहाते...
-फ़िरदौस ख़ान




हर तरफ़ वर्चस्व की लड़ाई है, चाहे सियासत हो या मज़हब... दहशतगर्दी की सबसे बड़ी वजह भी यही है कि दहशतगर्द दुनिया पर अपना वर्चस्व क़ायम करना चाहते हैं...
-फ़िरदौस ख़ान

Tuesday, October 6, 2015

मुसलमानों की बदहाली


फ़िरदौस खान
दुनिया में एक क़ौम ऐसी भी है, जिसके दुनियाभर में तक़रीबन 54 मुल्क हैं... इसके बावजूद क़ौम की हालत बद से बदतर होती जा रही है... हालत ये है कि कहीं उन्हें मस्जिदों में क़त्ल किया जा रहा है, तो कहीं उन्हीं के घर में घुसकर उन्हें मारा जा रहा है... न उनकी जान महफ़ूज़ और न ही कोई उनके माल का रखवाला है... वे बेबसी के आलम में अपना घर, अपना मुहल्ला, अपना शहर और अपना मुल्क छोड़कर ईसाई देशों में पनाह मांग रहे हैं... उनके रहमो-करम पर ज़िन्दा रहने के वसीले तलाश रहे हैं...
क्योंकि-
इस क़ौम के मानने वालों में इत्तेहाद नहीं है... इस क़ौम के फ़िरक़ापरस्त लोग ख़ुद को ’सच्चा’ और दूसरों को ’बुरा’ साबित करने में ही लगे रहते हैं... आपस में ही एक-दूसरे के दुश्मन बने हुए हैं... इनकी बदहाली की सबसे बड़ी वजह यही है... 

Thursday, October 1, 2015

नफ़रत


इस दुनिया में जितनी नफ़रत मज़हब के नाम पर देखने को मिलती है, उतनी कहीं और दिखाई नहीं देती... मज़हब का नाम आते ही इंसान के अंदर का वहशी दरिन्दा जाग उठता है... वह इसी फ़िराक में रहता है कि कब उसे बहाना मिले और वो दूसरे मज़हब वाले इंसान का ख़ून पिये... हिन्दुस्तान समेत दुनिया भर में आज यही सब तो हो रहा है...
बेशक, मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना...
फिर मज़हब के नाम पर ये ख़ून-ख़राबा क्यों ?

Sunday, September 20, 2015

रोज़गार


कभी किसी का रोज़गार नहीं छीनना चाहिए, क्योंकि इससे उसका पूरा ख़ानदान मुतासिर होता है... ऐसे करोड़ों लोग हैं, जिनके घरों में चूल्हा तभी जलता है, जब वे मेहनत-मज़दूरी करके कुछ पैसे कमाते हैं...

अफ़सोस, मीडिया में ये बात बहुत आम है, जब कोई संपादक या ऐसे ही किसी अन्य पद पर आता है, तो वह वहां काम कर रहे लोगों को निकालकर अपने लोग रखने लगता है... इससे बहुत से लोग बेरोज़गार हो जाते हैं... इंसान अगर किसी को रोज़गार नहीं दे सकता, तो किसी से उसकी रोज़ी भी नहीं छीननी चाहिए...

Saturday, September 19, 2015

तुम हो फ़िरऔन तो मूसा भी ज़रूर आएगा


चन्द ज़ालिम हाकिम और दहशतगर्द इस दुनिया को जहन्नुम बनाने पर आमादा हैं... बेशक, इस वक़्त ज़ालिम ताक़तवर हैं... लेकिन उन्हें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि फ़िरऔन भी ताक़तवर था... उसका क्या हश्र हुआ...
ख़ून-ए-मज़लूम ज़्यादा नहीं बहने वाला
ज़ुल्म का दौर बहुत दिन नहीं रहने वाला
इन अंधेरों का जिगर चीर के नूर आएगा
तुम हो फ़िरऔन तो मूसा भी ज़रूर आएगा... 

Wednesday, September 16, 2015

ईद-उल-अज़हा


ईद-उल-अज़हा का महीना शुरू हो चुका है... जो लोग साहिबे-हैसियत हैं, वो बक़रीद पर क़्रुर्बानी करते हैं...ऐसे भी घर हैं, जहां तीन दिन तक कई-कई क़ुर्बानियां होती हैं... इन घरों में गोश्त भी बहुत होता है... एक-दूसरे के घरों में क़ुर्बानी का गोश्त भेजा जाता है... जब गोश्त ज़्यादा हो जाता है, तो लोग गोश्त लेने से मना करने लगते हैं...
ऐसे बहुत से घर होते हैं, जहां क़ुर्बानी नहीं होती... ऐसे भी बहुत से घर होते हैं, जो त्यौहार के दिन भी गोश्त की एक बोटी तक से महरूम रहते हैं... ’राहे-हक़’ से जुड़े साथी गोश्त इकट्ठा करके ऐसे लोगों तक पहुंचाते रहे हैं, जो ग़रीबी की वजह से गोश्त से महरूम रहते हैं...
आपसे ग़ुज़ारिश है कि आप भी क़ुर्बानी के गोश्त को उन लोगों तक ज़रूर पहुंचाएं, जिनके घरों में त्यौहार पर भी गोश्त नहीं आता... आपकी ये कोशिश किसी के त्यौहार को ख़ुशनुमा बना सकती है...
-फ़िरदौस ख़ान

Friday, September 4, 2015

इंसानियत को शर्मसार करते दहशतगर्द


फ़िरदौस ख़ान
दहशतगर्दों ने इंसानियत को शर्मसार करके रख दिया है. दुनियाभर के कई देश दहशतगर्दी से जूझ रहे हैं और कई अन्य देशों पर इसका सीधा असर पड़ रहा है. दहशतगर्दों को किसी की जान लेते हुए ज़रा भी रहम नहीं आता. अपनी ख़ूनी प्यास बुझाने के लिए ये दहशतगर्द कितने ही घरों के चिराग़ों को बुझा डालते हैं, कितनी ही मांओं की गोद सूनी कर देते हैं और बच्चों को यतीम बना देते हैं. तीन साल का एलन कुर्दी भी दहशतगर्दों की वजह से ही मारा गया. वह अपने पांच साल के भाई गालेब और मां रिहाना के साथ समुद्र में डूब गया. पूरा परिवार कुछ अन्य लोगों के साथ जंग से जूझ रहे सीरिया से निकलकर यूरोप जा रहा था. किश्ती समुद्र में पलट गई. लहरों ने इसमें से एक पांच साल के बच्चे को तुर्की के समुद्र टक पर फेंक दिया. वहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने बच्चे को उठाया और अस्पताल ले गए, लेकिन चिकित्सीय जांच में पता चला कि उसकी मौत हो चुकी है.

एलन के पिता अब्दुल्ला ने कहा कि उनके दोनों बच्चे बहुत ख़ूबसूरत थे. वे उनकी गोद में सिमटे थे कि किश्ती डूब गई. उन्होंने बच्चों को बचाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वे हाथों से फिसलकर आंखों के सामने समुद्र में समा गए. वे चाहते हैं कि पूरी दुनिया की नज़र इस हादसे पर जाए, ताकि दोबारा ऐसा किसी और के साथ न हो. अब्दुल्ला का कहना है कि उन्होंने अपने परिवार को ग्रीस ले जाने के लिए तस्करों को दो बार पैसे दिए, लेकिन उनकी हर कोशिश नाकाम रही. इसके बाद उन्होंने एक किश्ती पर सवार होकर पहुंचने की कोशिश की. किश्ती के पानी में जाने के चार मिनट बाद ही कैप्टन ने बताया कि वह डूबने वाली है. तेज़ लहरों की वजह से किश्ती पलट गई. वे अंधेरे में चीख़ रहे थे. उनकी आवाज़ उनकी पत्नी और बच्चे नहीं सुन सके. अब्दुल्ला अपने बेटे की लाश के साथ शुक्रवार को सीरिया के शहर कोबान पहुंचे. आईएसआईएस और कुर्दिश विद्रोहियों के बीच जंग की वजह से पूरा शहर तबाह हो चुका है. तीन महीने पहले ही अब्दुल के परिवार के 11 लोगों को आईएसआईएस के दहशतगर्दों ने क़त्ल कर दिया था. इसी शहर के कब्रिस्तान में एलन, उसकी मां और भाई को दफ़नाया गया.

ग़ौरतलब है कि तस्वीर के सामने आते ही दुनियाभर में एलन की तस्वीर छापने और न छापने पर बहस छिड़ गई. कई अख़बारों में छपा भी. ला-रिपब्लिका (इटली) ने शीर्षक दिया- ‘दुनिया को ख़ामोश करती एक उदास तस्वीर.’ इंग्लैंड के द सन ने लिखा ‘ये ज़िन्दगी और मौत है।’ डेली मिरर ने ‘असहनीय हक़ीक़त’ बताया. मेट्रो ने लिखा- ‘यूरोप बचा नहीं सका.’ द टाइम्स ने कहा- ‘बंटे हुए यूरोप का चेहरा.’ डेली मेल ने लिखा- ‘मानवीय आपदा का मासूम शिकार.’ अवाम के साथ-साथ सरकारों के बीच भी इस तस्वीर को लेकर बहस छिड़ी हुई है. जर्मनी ने कहा है कि यूरोप के सभी देश शरणार्थियों को जगह देने से इंकार करने लगेंगे, तो इससे ‘आइडिया ऑफ़ यूरोप’ ही ख़त्म हो जाएगा. ये बच्चा बच सकता था, अगर यूरोप के देश इन लोगों को शरण देने से इंकार नहीं करते. तुर्की के प्रेसिडेंट रीसेप अर्डान ने जी20 समिट में यहां तक कह दिया कि इंसानियत को इस मासूम की मौत की ज़िम्मेदारी लेनी होगी. जर्मनी और फ्रांस ने ऐलान किया कि शरणार्थियों के लिए यूरोपीय देशों का कोटा तय होगा. मौजूदा नियम में भी ढील दी जाएगी, ताकि लोगों का आना आसान हो सके.  यूएन रिपोर्ट के मुताबिक़ एक साल में 1.60 लाख लोग समुद्र के रास्ते ग्रीस आ चुके हैं. जनवरी से अब तक तीन हज़ार लोगों की मौत हो चुकी है.

एलन की तस्वीर लेने वाले फ़ोटोग्राफ़र निलुफेर देमीर ने कहा है कि उन्होंने बच्चे को तट पर देखा. उन्हें लगा कि इस बच्चे में अब ज़िन्दगी नहीं बची है, तो उन्होंने तस्वीर लेने की सोची, ताकि दुनिया को बताया जा सके कि हालात कितने ख़राब हो चुके हैं. वाक़ई इस तस्वीर ने दहशतगर्दी पर एक बार फिर से सबका ध्यान खींचा है. अब देखना यह है कि इस मुद्दे पर क्या कोई सार्थक पहल होती है या फिर हमेशा की तरह ही बयानबाज़ी के बाद इसे फिर से ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा. इस मुद्दे पर अरब देशों की ख़ामोशी बेहद शर्मनाक है.

हालांकि यूरोपियन यूनियन ने आगामी 16 सितंबर को होने वाली बैठक में इस संकट से निकलने के रास्ते पर विचार करने का फ़ैसला किया है. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने कहा है कि वे हज़ारों शरणार्थियों को अपनाने के लिए तैयार हैं. उन्होंने शरण दिए जाने को लेकर देश के क़ानून की समीक्षा के आदेश दे दिए हैं. हालांकि इस मुद्दे पर सभी देशों की एक राय नहीं बन पाई है. कोटा सिस्टम रिजेक्ट किया जा चुका है. यूरोपीय देशों में आपस में ही मतभेद सामने आ रहे हैं. इसकी वजह यह है कि कुछ देश इस संकट से ज़्यादा प्रभावित हैं. उनके यहां बहुत ज़्यादा शरणार्थी पहुंच रहे हैं, इसलिए इन पर शरणार्थियों के साथ सख़्ती करने का दबाव बन रहा है. हंगरी ने सर्बिया के बॉर्डर पर 175 किलोमीटर लंबी बाड़ लगाई है. वहीं, ब्रिटेन ने जनवरी 2014 के बाद से महज़ 216 सीरियाई शरणार्थियों को अपनाया है. तुर्की ने 20 लाख लोगों को शरण दी है. वहीं, पूरे यूरोप ने बीते चार साल में महज़ दो लाख शरणार्थियों को अपनाया है. तुर्की के प्रेसिडेंट ने तो यहां तक कह दिया कि 28 देश मिलकर यह विचार-विमर्श कर रहे हैं कि 28 हज़ार शरणार्थियों को आपस में कैसे बांटा जाए. इस साल जुलाई तक चार लाख 38 हज़ार लोग यूरोपीय देशों में शरण मांग चुके हैं. बीते साल ही पांच लाख 71 हज़ार लोग यूरोप में शरण ले चुके हैं. शरणार्थियों की यह बढ़ती तादाद यूरोपीय देशों ख़ासकर तौर पर शेंगेन देशों के लिए संकट का सबब बन गई है. शेंगेन इलाक़े के तहत कुल 26 यूरापीय देश आते हैं, जिन्होंने कॉमन बॉर्डर पर पासपोर्ट और दूसरे क़िस्म के बॉर्डर कंट्रोल हटा लिए हैं. कॉमन वीज़ा पॉलिसी के तहत यह पूरा इलाक़ा एक देश की तरह काम करता है. यहां लोगों की आवाजाही पर पाबंदी नहीं है. यूरोपीय देशों में शरण लेने की कोशिश करने वाले लोग ज़्यादातर भूमध्य सागर के ज़रिये वहां पहुंचने की कोशिश करते हैं. जिन देशों में ये जाते हैं, वहां इनके लिए खाना, छत और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने में सरकार को परेशानी होती हैं.

ग़ौरतलब है कि ये शरणार्थी पश्चिमी एशिया और नॉर्थ अफ्रीका के जंग से प्रभावित इलाक़ों और ग़रीब यूरोपीय देशों से हैं. ज़्यादातर लोग सीरिया और लीबिया से पहुंच रहे हैं, जहां पिछले चार साल से गृहयुद्ध छिड़ा हुआ है. यहां आतंकवादी संगठन आईएसआईएस ने लोगों का जीना दुश्वार कर रखा है. इसके अलावा अफ़ग़ानिस्तान, इराक़ और नाइजीरिया से भी लोग ग़रीबी और जंग से परेशान होकर यूरोप जाना चाहते हैं. यूरोप से आने वाले शरणार्थियों में कोसोवो और सर्बिया जैसे देशों के लोग शामिल हैं. इस साल ग्रीस के बॉर्डर पर सबसे ज़्यादा लोग शरण लेने पहुंचे. इनमें से ज़्यादातर सीरिया के नागरिक थे, जो तुर्की तक किश्तियों में सवार होकर पहुंचे. लोग छोटी-छोटी किश्तियों में बैठकर ये ट्यूनीशिया या लीबिया से इटली पहुंचने की कोशिश करते हैं. क्षमता से ज़्यादा लोग इन किश्तियों पर सवार होने की वजह से कई बार बड़े हादसे होते रहते हैं. कुछ किश्तियां लीबिया तट तक पहुंचने से पहले ही डूब गईं. कुछ लालची लोग इन लोगों की जान की परवाह न करते हुए इन्हें रबर की बनी किश्तियों में यूरोप भेजने की कोशिश करते हैं और बदले में लाखों रुपये कमाते हैं. ये किश्तियां पानी पर तैरते ताबूत बनकर रह गई  हैं. अब तक 3200 से ज़्यादा लोगों इन किश्तियों के डूबने की वजह से मारे जा चुके हैं और ये सिलसिला बदस्तूर जारी है.

दरअसल, दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ माहौल बनाना होगा. अगर अब भी इसे उतनी संजीदगी से नहीं लिया गया, जितना लिया जाना चाहिए, तो एक दिन ये पूरी दुनिया को तबाह कर देगा. जब तक दुनिया के सभी देश मिलकर ईमानदारी से दहशतगर्दों के ख़िलाफ़ सख़्ती नहीं बरतेंगे, तब तक न जाने कितने मासूम इसी तरह अपनी जान गंवाते रहेंगे.

Tuesday, September 1, 2015

भूमि अधिग्रहण अधिनियम पर कांग्रेस की जीत


फ़िरदौस ख़ान
भूमि अधिग्रहण अधिनियम पर आख़िरकार कांग्रेस ने बड़ी सियासी लड़ाई जीत ही ली. इस मुद्दे पर राहुल गांधी और कांग्रेस के 44 सांसदों ने भाजपा के 282 सांसदों को झुकाकर ही दम लिया. विवादास्पद भूमि अधिग्रहण अध्यादेश कल ख़त्म हो गया और इसकी जगह पर अब 2013 का संबंधित क़ानून फिर से प्रभावी हो गया है. केंद्र सरकार ने 2013 के भूमि अधिग्रहण क़ानून में कई बदलाव करते हुए पिछले साल दिसम्बर में एक अध्यादेश जारी किया था, जिसकी मियाद दो बार बढ़ाई गई थी. सरकार संसद के बजट सत्र के पहले चरण के दौरान भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक लाई थी. इसे लोकसभा में पारित कराया गया था, लेकिन कांग्रेस के सख़्त विरोध के मद्देनज़र इसे राज्यसभा में नहीं ला पाई. बजट सत्र के दूसरे चरण में इस विधेयक को संसद की संयुक्त संसदीय समिति को सौंप दिया गया था, जिसे मानसून सत्र की शुरुआत में अपनी रिपोर्ट देनी थी. लेकिन समिति तयशुदा वक़्त पर अपनी रिपोर्ट पेश नहीं कर पाई. उसने इसके लिए शीतकालीन सत्र की शुरुआत तक का वक़्त ले लिया.

पिछली बार जारी अध्यादेश की अवधि 31 अगस्त को ख़त्म हो गई है. प्रधानमंत्री ने रविवार को मन की बात में भूमि अधिग्रहण विधेयक को वापस लेने की घोषणा करते हुए कहा कि इसके विरोध के मद्देनज़र सरकार ने यह फ़ैसला लिया है. उन्होंने कहा कि सरकार 13 अन्य क़ानूनों के तहत अधिग्रहित की जाने वाली ज़मीन का मुआवज़ा भी भूमि अधिग्रहण क़ानून के अनुरूप देगी. अब केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय राजमार्ग, पुरातत्व अधिनियम और रेलवे अधिनियम जैसे 13 केंद्रीय अधिनियमों को भूमि अधिग्रहण अधिनियम के दायरे में लाने का आदेश जारी किया है.  इनमें प्राचीन स्मारक एवं पुरातत्व धरोहर अधिनियम-1958, परमाणु ऊर्जा अधिनियम-1962, दामोदर घाटी कॉर्पोरेशन अधिनियम-1948, भारतीय ट्रामवे अधिनियम-1886, खदान भूमि अधिग्रहण अधिनियम-1885, मेटो रेलवे (निर्माण कार्य) अधिनियम-1978, राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम-1956, पेट्रोलियम एवं खनिज पाइप लाइन भूमि अधिग्रहण अधिनियम-1962, विस्थापित पुनर्वास (भूमि अधिग्रहण) अधिनियम-1948, कोयला धारण क्षेत्र एवं विकास अधिनियम-1957, बिजली अधिनियम-2003 और रेलवे अधिनियम-1989 शामिल हैं. इन अधिनियमों के तहत ज़मीन अधिग्रहण होने पर भूमि अधिग्रहण क़ानून के प्रावधान लागू होंगे. केंद्र सरकार के अधिकारियों के मुताबिक़ इससे उन लोगों को फ़ायदा होगा, जिनकी ज़मीन इन 13 क़ानूनों के तहत अधिग्रहित की जाएगी. इस आदेश से केंद्रीय क़ानूनों के तहत भूमि अधिग्रहण के सभी मामलों में उचित मुआवज़ा, पुनर्वास और पुन:स्थापन संबंधित प्रावधान लागू होंगे. संप्रग सरकार द्वारा पास किए गए भूमि अधिग्रहण अधिनियम-2013 में शर्त थी कि इन 13 केंद्रीय अधिनियमों पर भी एक साल के भीतर इस क़ानून के प्रावधान लागू हो जाएंगे. भाजपा सांसद एसएस अहूलवालिया की अध्यक्षता वाली संयुक्त संसदीय समिति राजग सरकार द्वारा लाए गए संशोधित भूमि अधिग्रहण विधेयक की जांच कर रही थी, इसलिए सरकार के इस ताज़ा आदेश में उन उपधाराओं को नहीं छुआ गया है, जिसे संशोधित कर संप्रग सरकार द्वारा लाए गए भूमि अधिग्रहण विधेयक को बदल दिया गया था.

भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक का कांग्रेस समेत तक़रीबन सभी विपक्षी दल और सरकार में शामिल कुछ दल भी लगातार विरोध करते रहे हैं. विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार ने अध्यादेश के ज़रिये यूपीए सरकार द्वारा बनाए गए भूमि अधिग्रहण अधिनियम-2013 में जो संशोधन किए हैं, वे पूरी तरह से किसानों के हितों के ख़िलाफ़ हैं. क़ाबिले-ग़ौर है कि कांग्रेस ने राहुल गांधी की अगुवाई में केंद्र सरकार के  नए भूमि अधिग्रहण अधिनियम के ख़िलाफ़ एक मुहिम शुरू की थी, जिसके तहत राहुल गांधी ने न सिर्फ़ पद यात्राएं कीं, बल्कि रैलियों को भी संबोधित किया. देशभर में कांग्रेस ने नए भूमि अधिग्रहण अधिनियम के ख़िलाफ़ जमकर प्रदर्शन किए. कांग्रेस की इस मुहिम को किसानों का ज़बरदस्त समर्थन मिला. राहुल गांधी ने कहा था कि संसद में भले ही हमारी तादाद कम है, लेकिन देश के करोड़ों किसानों की ताक़त हमारे साथ है और हम किसानों की एक इंच ज़मीन भी छिनने नहीं देंगे. उन्होंने कहा था कि सरकार के पास ज़मीन है, प्रदेश सरकारों के पास ज़मीन है, सेज़ के पास 40 फ़ीसद ज़मीन ख़ाली पड़ी है, लेकिन सरकार उद्योगपतियों को फ़ायदा पहुंचाने के लिए किसानों की ज़मीन छीन लेना चाहती है, लेकिन कांग्रेस ऐसा होने नहीं देगी. किसान अकेले नहीं हैं, कांग्रेस किसानों के साथ खड़ी है. उन्होंने कहा था कि कांग्रेस ने प्रधानमंत्री को किसानों की ताक़त दिखाने का फ़ैसला कर लिया है.

बहरहाल, कांग्रेस ख़ुश है कि उसने भूमि अधिग्रहण अधिनियम पर केंद्र सरकार को अपने क़दम वापस खींचने पर मजबूर कर दिया. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पटना में आयोजित रैली में कह दिया कि संसद में विपक्ष की लड़ाई रंग लाई है. कांग्रेस ने इसे यूपीए सरकार की नीतियों और किसानों की जीत क़रार दिया है.

Sunday, August 16, 2015

लेख चोरी

महासत्ता के संपादक महोदय
आपने अपने ब्लॊग supreem power mukesh में हमारा लेख वे आज़ादी के बावजूद आज़ाद नहीं थे पोस्ट किया है. आपको लेख में हमारा नाम देना चाहिए था.

हम इस चोरी के ख़िलाफ़ अपना ऐतराज़ दर्ज करते हैं...

Thursday, July 23, 2015

क़ुरान के शायद सबसे पुराने वर्क़


ब्रिटेन के बर्मिंघम विश्वविद्यालय में क़ुरआन करीम के शायद सबसे पुराने वर्क़ मिले हैं. पन्नों की रेडियो कार्बन डेटिंग तकनीक की जांच से पता चला कि क़ुरआन के ये पन्ने कम से कम 1370 साल पुराने हैं. भेड़ या बकरी की खाल पर लिखे गए क़ुरान के इन पन्नों की जांच से कई तारीख़े मिलती हैं, इसलिए 95 फ़ीसद संभावना है कि ये पन्ने 568 ईस्वी से 645 ईस्वी के बीच के हैं.
शोधकर्ताओं ने इस बात की भी संभावना जताई है कि जिस शख़्स ने क़ुरआन के ये पन्ने लिखे होंगे, वो पैग़म्बर हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍लललाहु अलैहि वसल्‍लम) से मिला हो. विश्वविद्यालय में ईसाइयत और इस्लाम के प्रोफ़ेसर डेविड थॉमस कहते हैं, यह दस्तावेज़ हमें इस्लाम की स्थापना के कुछ सालों के अंतराल में पहुंचा सकते हैं. मुस्लिम मान्यताओं के मुताबिक़ पैग़म्बर हज़रत मुहम्‍मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्‍लम) को अल्लाह का पैग़ाम 610 से 632 के बीच ही मिला था, जो क़ुरआन का आधार बना.

साभार बीबीसी

Tuesday, July 21, 2015

सब मेरे चाहने वाले हैं, मेरा कोई नहीं


फ़िरदौस ख़ान
सब मेरे चाहने वाले हैं, मेरा कोई नहीं
मैं भी इस मुल्क में उर्दू की तरह रहता हूं
मशहूर शायर हसन काज़मी साहब का यह शेअर देश में उर्दू की हालत को बयान करने के लिए काफ़ी है. हालांकि इस मुल्क में उर्दू के कई अख़बार हैं, लेकिन ज़्यादातर अख़बारों की माली हालत अच्छी नहीं है. उर्दू के पाठक कम होने की वजह से अख़बारों की प्रसार संख्या भी सीमित है. उर्दू अख़बारों को अमूमन ईद-बक़रीद, 15 अगस्त और 26 जनवरी को ही विज्ञापन मिल पाते हैं. उर्दू अख़बारों को यह भी शिकायत रहती है कि सरकारी विज्ञापन भी उन्हें बहुत कम मिलते हैं. इसके अलावा क़ाग़ज़ की बढ़ती क़ीमतें अख़बारों के लिए परेशानी का सबब बनी रहती हैं.

उर्दू अख़बारों का इतिहास काफ़ी पुराना है. सबसे पहले 1785 में इंग्लिश साप्ताहिक कलकत्ता गैज़ेट में फ़ारसी में एक कॊलम शुरू किया गया था, जिसमें दिल्ली और लाल क़िले की ख़बरें होती थीं. उर्दू का पहला अख़बार जाम-ए-जहां-नमाह 27 मार्च 1822 को कोलकाता में शुरू हुआ था. इस साप्ताहिक अख़बार के संपादक मुंशी सदासुख मिर्ज़ापुरी थे. उर्दू मीडिया ने जंगे-आज़ादी में अहम किरदार निभाया. इसकी वजह से ब्रिटिश सरकार ने 1857 पर उर्दू प्रेस पर पाबंदी लगा दी. 1858 में कोलकाता से ही उर्दू गाइड नाम से उर्दू का पहला दैनिक अख़बार शुरू हुआ. इसके संपादक मौलवी कबीर-उद्दीर अहमद ख़ान थे. 1822 के आख़िर तक कोलकाता से फ़ारसी के दो अख़बार शाया होते थे. फ़ारसी साप्ताहिक मीरत-उल-अख़बार के संपादक राजा राममोहन राय थे. 1823 में मनीराम ठाकुर ने शम्सुल अख़बार शुरू किया, जो सिर्फ़ पांच साल ही ज़िन्दा रह पाया.

ब्रिटिश शासनकाल में हिन्दुस्तानी भाषाओं के अख़बार की अनदेखी की गई. 1835 में हिन्दुस्तानी भाषाओं के सिर्फ़ छह अख़बार ही शाया होते थे, जो 1850 में 28 और 1878 में 97 हो गए. इनकी प्रसार संख्या क़रीब डेढ़ लाख थी. हिन्दुस्तानी अख़बारों की अधिकारिक जानकारी 1848 से मिलती है, जब 26 अख़बार शाया होते थे. इनमें 19 उर्दू में, तीन फ़ारसी में, तीन हिन्दी में और एक बंगला भाषा का अख़बार शामिल था. उर्दू अख़बारों ने 1857 की जंगे-आज़ादी में अहम किरदार अदा किया. इसकी वजह से उर्दू अख़बारों को नियंत्रित करने के लिए जून 1857 में गवर्नर जनरल द्वारा एक एक्ट लाया गया. इसका मक़सद उर्दू अख़बारों के प्रसार को रोकना था. इस एक्ट के मुताबिक़ प्रेस के लिए सरकार से लाइसेंस लेना लाज़िमी था. इस एक्ट की आड़ में संपादकों और प्रकाशकों के ख़िलाफ़ आपराधिक मामले दर्ज कर उन्हें तंग किया गया. फ़ारसी अख़बार सुल्तान-उल-हक़ को कोलकाता के सुप्रीम कोर्ट में तमाम इल्ज़ामात का सामना करना पड़ा और उसका लाइसेंस भी रद्द कर दिया गया. इसी तरह गुलशन-ए-नौबहार को बंद कर दिया गया और रायज़ुल अख़बार के साथ भी ऐसा ही किया गया. फ़ारसी साप्ताहिक मुर्तज़ई के संपादक को पेशावर जेल भेज दिया गया. यह उर्दू अख़बारों के लिए एक बुरा दौर था. 1858 में 35 उर्दू अख़बार शाया हो रहे थे. 1857 की जंगे-आज़ादी के बाद उर्दू अख़बार फिर से लोकप्रिय होने लगे, जिनमें लखनऊ का अवध अख़बार और अवध पंच, अलीगढ़ का साइंटिफ़िक, ग़ज़ट और तहज़ीब-उल-अख़्लाक़, दिल्ली का अकमालुल, लाहौर का पंजाब अख़बार, मद्रास का शम्सुल अख़बार, बॊम्बे का काशफ़ुल, बंगलौर का क़ासिम-उल-अख़बार और हैदराबाद का असीफ़ुल अख़बार शामिल है. इनमें से लखनऊ का अवध अख़बार लंबे अरसे तक शाया हुआ. इस दौरान 18 नई पत्रिकाएं भी शुरू हुईं, जिनमें 11 उर्दू के रिसाले शामिल हैं. अलहिलाल ऐसा पहला उर्दू अख़बार था, जिसने तस्वीरों को भी प्रकाशित किया.

1873 तक उर्दू काफ़ी तादाद में उर्दू अख़बार और पत्रिकाएं शाया होने लगीं. सरकार ने भी अख़बारों की प्रतियां ख़रीदना शुरू कर दिया. उत्तर-पश्चिम प्रांत की सरकार ने 1876 में इस व्यवस्था को बंद कर दिया. इसके साथ ही कई अख़बार भी बंद हो गए. 1884-85 के दौरान उर्दू के 117 अख़बार शाया हो रहे थे. इनकी प्रसार संख्या भी अच्छी थी.
1891 में 16,256
1901 में 23,747    
1911 में 76,608 और
1922 में 1,40,486
भारतीय रिसर्च इंस्टीट्यूट नेशनल डॊक्यूमेंटेशन ऒन मास कम्युनिकेशन की एक रिपोर्ट में जीडी चंदन का कहना है कि देश के बंटवारे, संकीर्णता और सियासी पूर्वाग्रह की वजह से उर्दू अख़बारों को नुक़सान पहुंचा. बंटवारे के दौरान उर्दू जानने वाली एक बड़ी आबादी यहां से पलायन कर गई और नई पीढ़ी के बहुत कम लोग ही उर्दू जानते हैं. इसका सीध असर अख़बारों की प्रसार संख्या पर पड़ा. प्रदेश सरकारों ने उर्दू की तरक़्क़ी पर ध्यान नहीं दिया.

दरअसल, बांग्लोदश बनने के बाद उर्दू अख़बारों की तरक़्क़ी अचानक रुक गई. उर्दू अख़बारों को बंगाली सरकार से काफ़ी उम्मीदें थीं. यह बात सही है कि उर्दू अख़बार जनता की आवाज़ उठाते थे. उर्दू अख़बारों को सरकार से मदद मिलती थी. बाद में सरकार ने उर्दू अख़बारों में दिलचस्पी लेना कम कर दिया, जिसका सीधा असर अख़बारों की माली हालत पर पड़ा. उर्दू अख़बार सस्ते काग़ज़ पर छापे जाने लगे. अख़बारों का स्टाफ़ कम हो गया. इसकी वजह से पाठकों को कई अहम और ताज़ा ख़बरें नहीं मिल पाती थीं. नतीजतन, उर्दू के पाठक दूसरी भाषाओं के अख़बारों की तरफ़ जाने लगे. हालात ये हो गए कि कई अख़बार बंद होने की कगार पर पहुंच गए, जिनमें अख़बारे-मशरिक़, आज़ाद हिन्द, आबशार और साप्ताहिक नशेमन और ग़ाज़ी शामिल थे. आज भी उर्दू अख़बारों की हालत अच्छी नहीं है.

आज़ादी से पहले अंग्रेज़ों ने हिन्दुस्तानी भाषाओं को पनपने नहीं दिया और आज़ादी के बाद अंग्रेज़ी के बढ़ते चलन की वजह से लोग अपनी भाषा से दूर हो रहे हैं. उर्दू अख़बारों की तरक़्क़ी के लिए ज़रूरी है कि उर्दू अख़बारों को सरकारी मदद मिले और उनकी प्रसार संख्या बढ़ाई जाए. और इस सबके लिए उर्दू का प्रचार-प्रसार ज़रूरी है. हालांकि देश में उर्दू अकादमियों की कोई कमी नहीं है और उर्दू सिखाने के कई संस्थान भी हैं, जिनमें उर्दू अकादमी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, जमीअत उलेमा-ए-हिन्द, अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू और क़ौमी काउंसिल बराए-फ़रोग़-ए-उर्दू शामिल हैं. मदरसों में तो शिक्षा का माध्यम ही उर्दू है. यह कहना ग़लत न होगा कि उर्दू महज़ मदरसों तक ही सिमटकर रह गई है. जब तक उर्दू को रोज़गार की भाषा नहीं बनाया जाएगा, तब तक इसकी तरक़्क़ी नहीं हो सकती. किसी भाषा को ज़िन्दा रखने का काम सरकार के साथ ही उस ज़बान के लोगों को भी है, जिनकी वो मातृभाषा है. इसलिए यह ज़रूरी है कि हम अपनी मातृभाषा को ज़िन्दा रखने के लिए आने इसके प्रचार-प्रसार पर ज़ोर दें. अपनी मातृभाषा के अख़बार या अन्य साहित्य पत्र-पत्रिकाएं ख़रीदें. ग़ौरतलब है कि 1991 की जनगणना के मुताबिक़ चार करोड़ 34 लाख 6 हज़ार 932 उर्दू भाषी लोग थे, जबकि इनकी वास्तविक संख्या 12 करोड़ बताई जाती है. उर्दू उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा बोली जाती है. इसके बाद बिहार, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक का स्थान आता है. यह जम्मू-कश्मीर की सरकारी भाषा है.

क़ाबिले-ग़ौर यह भी है कि सरकार उर्दू के ज़रिये अपने पड़ौसी देशों के साथ बेहतर तालमेल क़ायम कर सकती है. भाषाएं जोड़ने का काम करती हैं और उर्दू पड़ौसी देशों के साथ आपसी सद्भाव बढ़ाने में अहम किरदार निभा सकती है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

Sunday, July 12, 2015

खाना


हम खाना खाते वक़्त हज़ार नख़रे करते हैं... हमें ये सब्ज़ी पसंद नहीं, हमें वो सब्ज़ी पसंद नहीं... दूध पीने के मामले में भी सौ नख़रे... मां से कितनी ही मिन्नतें करवाने के बाद दूध पीते हैं...  अमूमन हर आम घर की ये कहानी है...
लेकिन हम ये नहीं जानते कि इस दुनिया में करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिन्हें न तो पेट भरने के लिए रोटी मिलती है और न ही पीने के लिए साफ़ पानी... करोड़ों लोग हर रोज़ भूखे पेट सोते हैं... दुनिया भर में लोग भूख से मर रहे हैं...
लाखों बच्चों को दूध तो क्या, पीने के लिए पेटभर उबले चावल का पानी तक नसीब नहीं होता... और भूख से बेहाल बच्चे दम तोड़ देते हैं...
अल्लाह ने जो दिया है, उसका शुक्र अदा करके उसे ख़ुशी-ख़ुशी खा लेना चाहिए... क्या हुआ अगर एक दिन घर में हमारी पसंद की सब्ज़ी नहीं बनी है तो...
फ़िरदौस ख़ान

Thursday, July 9, 2015

रोटी बैंक...


फ़िरदौस ख़ान
इंसान चाहे, तो क्या नहीं कर सकता. उत्तर प्रदेश के महोबा ज़िले के बाशिन्दों ने वो नेक कारनामा कर दिखाया है, जिसके लिए इंसानियत हमेशा उन पर फ़ख़्र करेगी.  बुंदेली समाज के अध्यक्ष हाजी मुट्टन चच्चा और संयोजक तारा पाटकर ने कुछ लोगों के साथ मिलकर एक ऐसे बैंक की शुरुआत की है, जो भूखों को रोटी मुहैया कराता है.
बीती 15 अप्रैल से शुरू हुए इस बैंक में हर घर से दो रोटियां ली जाती हैं. शुरू में इस बैंक को सिर्फ़ 10 घरों से ही रोटी मिलती थी, लेकिन रफ़्ता-रफ़्ता इनकी तादाद बढ़ने लगी और अब 400 घरों से रोटियां मिलती हैं. इस तरह हर रोज़ बैंक के पास 800 रोटियां जमा हो जाती हैं,  जिन्हें पैकेट बनाकर ज़रूरतमंद लोगों तक पहुंचाया जाता है. इस वक़्त 40 युवा और पांच वरिष्ठ नागरिक इस मुहिम को चला रहे हैं.
शाम को युवा घर-घर जाकर रोटी और सब्ज़ी जमा करते हैं. फिर इनके पैकेट बनाकर इन्हें उन लोगों को पहुंचाते हैं, जिनके पास खाने का कोई इंतज़ाम नहीं है. पैकिंग का काम महिलाएं करती हैं. इस काम में तीन से चार घंटे का वक़्त लगता है. फ़िलहाल बैंक एक वक़्त का खाना ही मुहैया करा रहा है, भविष्य में दोनों वक़्त का खाना देने की योजना है.
इस नेक काम में लगे लोग बहुत ख़ुश हैं. अगर देशभर में इस तरह के रोटी बैंक खुल जाएं, तो फिर कोई भूखा नहीं सोएगा.

Monday, July 6, 2015

अंगदान


एक मुसलमान शख़्स की दोनों किडनियां ख़राब हो चुकी हैं... उसका भाई उसे अपनी एक किडनी देना चाहता है, ताकि उसकी जान बचाई जा सके...
मज़हबी लोगों का कहना है कि इस्लाम अंगदान की इजाज़त नहीं देता... क्या उस शख़्स को मौत के मुंह में जाते हुए देखना सही है...?

बीबीसी के मुताबिक़ ब्रिटेन में पिछले साल किडनी ट्रांसप्लांट का इंतज़ार कर रहे एशियाई मूल के 70 मरीज़ों की मौत हो गई. इसकी एक वजह ये है कि कई मुसलमानों को लगता है कि अंगदान इस्लाम के ख़िलाफ़ है. लेकिन ब्रिटेन में एक मुहिम चलाकर बताया जा रहा है कि अगर किसी की ज़िन्दगी बचाने के लिए ऐसा करना हो, तो इस्लाम में उसकी इजाज़त है.

Saturday, June 27, 2015

दहशतगर्द नमाज़ियों को भी नहीं बख़्श रहे हैं


फ़िरदौस ख़ान
दहशतगर्द नमाज़ियों को भी नहीं बख़्श रहे हैं... रमज़ान के दूसरे जुमे को क़ुवैत की मस्जिद में नमाज़ के दौरान बम धमाका किया गया, जिसमें 27 नमाज़ियों की मौत हो गई है और बहुत से नमाज़ी ज़्ख़्मी हो गए... जुमे की नमाज़ के दौरान मस्जिदों में बम धमाके कर नमाज़ियों का ख़ून बहाने की दिल दहला देने वाली ख़बरें आए दिन सुनने को मिलती रहती हैं... दहशतगर्दों को किसी की जान लेते हुए ज़रा भी रहम नहीं आता... अपनी ख़ूनी प्यास बुझाने के लिए ये दहशतगर्द कितने ही घरों के चिराग़ों को बुझा डालते हैं, कितनी ही मांओं की गोद सूनी कर देते हैं और बच्चों को यतीम बना देते हैं...
समझ नहीं आता कि ये दरिन्दे किसे अपना ख़ुदा मानते हैं, क्योंकि अल्लाह को मानने वाला किसी की जान बचाने के लिए अपनी जान तो दे देगा, लेकिन अपने फ़ायदे के लिए कभी किसी की जान नहीं लेगा...

ये देखकर बहुत दुख होता है कि आए दिन मस्जिदों में होने वाले बम धमाकों में मरने वाले नमाज़ियों के बच्चों से किसी को ज़रा भी हमदर्दी नहीं है...
वो मासूम बच्चे, जिनके बाप को वहशी दरिन्दों ने बम से उड़ा दिया... वो बच्चे, जो अब कभी अपने बाप के लाए नये कपड़े नहीं पहन पाएंगे, वो बच्चे, जिनका हाथ थामकर अब ईद की नमाज़ में ले जाने वाला बाप नहीं रहा... अब कौन उन्हें गोद में उठाकर प्यार करेगा, कौन ईद के मेले में ले जाएगा...

कहते हैं कि रमज़ान के महीने में अल्लाह शैतान को क़ैद कर देता है, लेकिन दुनिया में तो बड़े-बड़े शैतान भरे पड़े हैं, लानत हैं इन पर...
आओ ! दुआ करें कि इस दुनिया से दहशतगर्दी का ख़ात्मा हो और हर सिम्त चैन-अमन हो, आमीन

Monday, June 15, 2015

रमज़ान और ग़रीबों का हक़


रमज़ान आ रहा है... जो साहिबे-हैसियत हैं, रमज़ान में उनके घरों में लंबे-चौड़े दस्तरख़्वान लगते हैं... इफ़्तार और सहरी में लज़ीज़ चीज़ें हुआ करती हैं, लेकिन जो ग़रीब हैं, वो इन नेअमतों से महरूम रह जाते हैं...
हमें चाहिए कि हम अपने उन रिश्तेदारों और पड़ौसियों के घर भी इफ़्तार और सहरी के लिए कुछ चीज़ें भेजें, जिनके दस्तरख़्वान कुशादा नहीं होते...
ये हमारे हुज़ूर हज़रत मुहम्‍मद सल्‍लललाहू अलैहिवसल्‍लम का फ़रमान है...
आप (सल्‍लललाहू अलैहिवसल्‍लम) फ़रमाते हैं- रमज़ान सब्र का महीना है यानी रोज़ा रखने में कुछ तकलीफ़ हो, तो इस बर्दाश्‍त करें. फिर आपने कहा कि रमज़ान ग़म बांटने का महीना है यानी ग़रीबों के साथ अच्‍छा बर्ताव किया जाए. अगर दस चीज़ें अपने रोज़ा इफ़्तार के लिए लाए हैं, तो दो-चार चीज़ें ग़रीबों के लिए भी लाएं...
यानी अपने इफ़्तार और सहरी के खाने में ग़रीबों का भी ख़्याल रखें... अगर आपका पड़ौसी ग़रीब है, तो उसका ख़ासतौर पर ख़्याल रखें कि कहीं ऐसा न हो कि हम तो ख़ूब पेट भर कर खा रहे हैं और हमारा पड़ौसी थोड़ा खाकर सो रहा है...
-फ़िरदौस ख़ान

तस्वीर गूगल से साभार

Monday, May 25, 2015

सेहत और ईमान बचाएं...


फ़िरदौस ख़ान
मैगी को लेकर ख़बर है कि इसमें सुअर का मांस और ज़हरीले तत्व पाए गए हैं, जो सेहत के लिए बेहद नुक़सानदेह है... ख़बर के मुताबिक़ अट्टा मैगी में Bactosoytone नामक तत्व शामिल होता है, जो DSG (Disodium ग्लूटामेट), स्वाद-627 के नीचे छुपा हुआ होता है. इसे सामग्री में नहीं लिखा जाता. Bactosoytone एक उत्प्रेरक एंजाइम है, जो सुअर से लिया गया है.

समझ नहीं आता कि आख़िर फ़ैशन और आलस की वजह से लोग अपनी और अपने बच्चों की सेहत के साथ खिलवाड़ कैसे कर लेते हैं...

अगर आपको मैगी ही खानी है, तो इसका घरेलू तरीक़ा अपनाएं. मैदे से घर में मैगी (नूडल्स) बना लें या फिर बाहर बनवाकर, इसे सुखाकर रख लें. जब मैगी खाने का मन हो, तो मनचाही मौसमी सब्ज़ियां और मसालें डालकर इसे पका लें... हां, इसमें दो मिनट की बजाय दस से पंद्रह मिनट लग जाएंगे, लेकिन आप ज़हर खाने से तो बच जाएंगे... साथ ही ईमान भी सलामत रहेगा...













तस्वीरें भास्कर से साभार

Thursday, May 21, 2015

लोकप्रिय नेता थे राजीव गांधी


किसी भी बेटे के लिए उसके पापा का जाना बहुत तकलीफ़देह होता है... हमें भी अपने पापा की बहुत याद आ रही है... स्वर्गीय राजीव गांधी पापा के प्रिय नेता थे...हमारे और पापा के प्रिय नेता स्वर्गीय राजीव गांधी को भावभीनी श्रद्धांजली...

लोकप्रिय नेता थे राजीव गांधी
-फ़िरदौस ख़ान
श्री राजीव गांधी ने उन्नीसवीं सदी में इक्कीसवीं सदी के भारत का सपना देखा था.  स्वभाव से गंभीर लेकिन आधुनिक सोच और निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता वाले श्री राजीव गांधी देश को दुनिया की उच्च तकनीकों से पूर्ण करना चाहते थे. वे बार-बार कहते थे कि भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखने के साथ ही उनका अन्य बड़ा मक़सद इक्कीसवीं सदी के भारत का निर्माण है. अपने इसी सपने को साकार करने के लिए उन्होंने देश में कई क्षेत्रों में नई पहल की, जिनमें संचार क्रांति और कंप्यूटर क्रांति, शिक्षा का प्रसार, 18 साल के युवाओं को मताधिकार, पंचायती राज आदि शामिल हैं. वे देश की कंप्यूटर क्रांति के जनक के रूप में भी जाने जाते हैं. वे युवाओं के लोकप्रिय नेता थे. उनका भाषण सुनने के लिए लोग घंटों इंतज़ार किया करते थे. उन्‍होंने अपने प्रधानमंत्री काल में कई ऐसे महत्वपूर्ण फ़ैसले लिए, जिसका असर देश के विकास में देखने को मिल रहा है. आज हर हाथ में दिखने वाला मोबाइल उन्हीं फ़ैसलों का नतीजा है.

चालीस साल की उम्र में प्रधानमंत्री बनने वाले श्री राजीव गांधी देश के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री थे और दुनिया के उन युवा राजनेताओं में से एक हैं, जिन्होंने सरकार की अगुवाई की है. उनकी मां श्रीमती इंदिरा गांधी 1966 में जब पहली बार प्रधानमंत्री बनी थीं, तब वह उनसे उम्र में आठ साल बड़ी थीं. उनके नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू 58 साल के थे, जब उन्होंने आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री के तौर शपथ ली. देश में पीढ़ीगत बदलाव के अग्रदूत श्री राजीव गांधी को देश के इतिहास में सबसे बड़ा जनादेश हासिल हुआ था. अपनी मां के क़त्ल के बाद 31 अक्टूबर 1984 को वे कांग्रेस अध्यक्ष और देश के प्रधानमंत्री बने थे. अपनी मां की मौत के सदमे से उबरने के बाद उन्होंने लोकसभा के लिए चुनाव कराने का आदेश दिया. दुखी होने के बावजूद उन्होंने अपनी हर ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया. महीने भर की लंबी चुनावी मुहिम के दौरान उन्होंने पृथ्वी की परिधि के डेढ़ गुना के बराबर दूरी की यात्रा करते हुए देश के तक़रीबन सभी हिस्सों में जाकर 250 से ज़्यादा जनसभाएं कीं और लाखों लोगों से रूबरू हुए. उस चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला और पार्टी ने रिकॉर्ड 401 सीटें हासिल कीं. सात सौ करोड़ भारतीयों के नेता के तौर पर इस तरह की शानदार शुरुआत किसी भी हालत में क़ाबिले-तारीफ़ मानी जाती है. यह इसलिए भी बेहद ख़ास है, क्योंकि वे उस सियासी ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते थे, जिसकी चार पीढ़ियों ने जंगे-आज़ादी के दौरान और इसके बाद हिन्दुस्तान की ख़िदमत की थी. इसके बावजूद श्री राजीव गांधी सियासत में नहीं आना चाहते थे. इसीलिए वे सियासत में देर से आए.

श्री राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त, 1944 को मुंबई में हुआ था. वे सिर्फ़ तीन साल के थे, जब देश आज़ाद हुआ और उनके नाना आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने. उनके माता-पिता लखनऊ से नई दिल्ली आकर बस गए. उनके पिता फ़िरोज़ गांधी सांसद बने, जिन्होंने एक निडर तथा मेहनती सांसद के रूप में ख्याति अर्जित की.
राजीव गांधी ने अपना बचपन अपने नाना के साथ तीन मूर्ति हाउस में बिताया, जहां इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री की परिचारिका के रूप में काम किया. वे कुछ वक़्त के लिए देहरादून के वेल्हम स्कूल गए, लेकिन जल्द ही उन्हें हिमालय की तलहटी में स्थित आवासीय दून स्कूल में भेज दिया गया. वहां उनके कई दोस्त बने, जिनके साथ उनकी ताउम्र दोस्ती बनी रही. बाद में उनके छोटे भाई संजय गांधी को भी इसी स्कूल में भेजा गया, जहां दोनों साथ रहे. स्कूल से निकलने के बाद श्री राजीव गांधी कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए, लेकिन जल्द ही वे वहां से हटकर लंदन के इम्पीरियल कॉलेज चले गए. उन्होंने वहां से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की.
उनके सहपाठियों के मुताबिक़ उनके पास दर्शन, राजनीति या इतिहास से संबंधित पुस्तकें न होकर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग की कई पुस्तकें हुआ करती थीं. हालांकि संगीत में उनकी बहुत दिलचस्पी थी. उन्हें पश्चिमी और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय और आधुनिक संगीत पसंद था. उन्हें फ़ोटोग्राफ़ी और रेडियो सुनने का भी ख़ासा शौक़ था. हवाई उड़ान उनका सबसे बड़ा जुनून था. इंग्लैंड से घर लौटने के बाद उन्होंने दिल्ली फ़्लाइंग क्लब की प्रवेश परीक्षा पास की और व्यावसायिक पायलट का लाइसेंस हासिल किया. इसके बाद वे  1968 में घरेलू राष्ट्रीय जहाज़ कंपनी इंडियन एयरलाइंस के पायलट बन गए.
कैम्ब्रिज में उनकी मुलाक़ात इतालवी सोनिया मैनो से हुई थी, जो उस वक़्त वहां अंग्रेज़ी की पढ़ाई कर रही थीं. उन्होंने 1968 में नई दिल्ली में शादी कर ली. वे अपने दोनों बच्चों राहुल और प्रियंका के साथ नई दिल्ली में श्रीमती इंदिरा गांधी के निवास पर रहे. वे ख़ुशी ख़ुशी अपनी ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे, लेकिन  23 जून 1980 को एक जहाज़ हादसे में उनके भाई संजय गांधी की मौत ने सारे हालात बदल कर रख दिए. उन पर सियासत में आकर अपनी मां की मदद करने का दबाव बन गया. फिर कई अंदरूनी और बाहरी चुनौतियां भी सामने आईं. पहले उन्होंने इन सबका काफ़ी विरोध किया, लेकिन बाद में उन्हें अपनी मां की बात माननी पड़ी और इस तरह वे न चाहते हुए भी सियासत में आ गए. उन्होंने जून 1981 में अपने भाई की मौत की वजह से ख़ाली हुए उत्तर प्रदेश के अमेठी लोकसभा क्षेत्र का उपचुनाव लड़ा, जिसमें उन्हें जीत हासिल हुई.  इसी महीने वे युवा कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बन गए. उन्हें नवंबर 1982 में भारत में हुए एशियाई खेलों से संबंधित महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गई, जिसे उन्होंने बख़ूबी अंजाम दिया. साथ ही कांग्रेस के महासचिव के तौर पर उन्होंने उसी लगन से काम करते हुए पार्टी संगठन को व्यवस्थित और सक्रिय किया.

अपने प्रधानमंत्री काल में राजीव गांधी ने नौकरशाही में सुधार लाने और देश की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिए कारगर क़दम उठाए, लेकिन पंजाब और कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन को नाकाम करने की उनकी कोशिश का बुरा असर हुआ. वे सियासत को भ्रष्टाचार से मुक्त करना चाहते थे, लेकिन यह विडंबना है कि उन्हें भ्रष्टाचार की वजह से ही सबसे ज़्यादा आलोचना का सामना करना पड़ा.  उन्होंने कई साहसिक क़दम उठाए, जिनमें श्रीलंका में शांति सेना का भेजा जाना, असम समझौता, पंजाब समझौता, मिज़ोरम समझौता आदि शामिल हैं. इसकी वजह से चरमपंथी उनके दुश्मन बन गए. नतीजतन, श्रीलंका में सलामी गारद के निरीक्षण के वक़्त उन पर हमला किया गया, लेकिन वे बाल-बाल बच गए. साल 1989 में उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया, लेकिन वह कांग्रेस के नेता पद पर बने रहे. वे आगामी आम चुनाव के प्रचार के लिए 21 मई, 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेराम्बदूर गए, जहां एक आत्मघाती हमले में उनकी मौत हो गई. देश में शोक की लहर दौड़ पड़ी.
राजीव गांधी की देश सेवा को राष्ट्र ने उनके दुनिया से विदा होने के बाद स्वीकार करते हुए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया, जिसे श्रीमती सोनिया गांधी ने 6 जुलाई, 1991 को अपने पति की ओर से ग्रहण किया.

राजीव गांधी अपने विरोधियों की मदद के लिए भी हमेशा तैयार रहते थे. साल 1991 में जब राजीव गांधी की हत्या कर दी गई, तो एक पत्रकार ने भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी से संपर्क किया. उन्होंने पत्रकार को अपने घर बुलाया और कहा कि अगर वह विपक्ष के नेता के नाते उनसे राजीव गांधी के ख़िलाफ़ कुछ सुनना चाहते हैं, तो मैं एक भी शब्द राजीव गांधी के ख़िलाफ़ नहीं कहेंगे, क्योंकि राजीव गांधी की मदद की वजह से ही ज़िन्दा हैं. उन्होंने भावुक होकर कहा कि जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, तो उन्हें पता नहीं कैसे पता चल गया कि मेरी किडनी में समस्या है और इलाज के लिए मुझे विदेश जाना है. उन्होंने मुझे अपने दफ़्तर में बुलाया और कहा कि वह उन्हें आपको संयुक्त राष्ट्र में न्यूयॉर्क जाने वाले भारत के प्रतिनिधिमंडल में शामिल कर रहे हैं और उम्मीद है कि इस मौक़े का फ़ायदा उठाकर आप अपना इलाज करा लेंगे. मैं न्यूयॉर्क गया और आज इसी वजह से मैं जीवित हूं. फिर वाजपेयी बहुत भावविह्वल होकर बोले कि मैं विपक्ष का नेता हूं, तो लोग उम्मीद करते हैं कि में विरोध में ही कुछ बोलूंगा. लेकिन ऐसा मैं नहीं कर सकता. मैं राजीव गांधी के बारे में वही कह सकता हूं, जो उन्होंने मेरे लिए किया.

आज़ाद भारत स्वर्गीय राजीव महत्वपूर्ण योगदान के लिए हमेशा उनका ऋणी रहेगा. कांग्रेस स्वर्गीय राजीव गांधी की पुण्यतिथि 21 मई को ’बलिदान दिवस’ के रूप में मनाती है.

Thursday, April 23, 2015

ज़रा सोचिये...


फ़िरदौस ख़ान
जो लोग दूसरों का हक़ मार कर ऐशो-इशरत की ज़िन्दगी बसर कर रहे हैं, वो अपने गुनाहों का बोझ कैसे उठाएंगे...? मेहनतकश किसानों से उनकी ज़मीनें छीनी जा रही हैं... ग़रीबों को बेघर करने वाले अपनी सालगिरह तक पर अरबों रुपये ख़र्च कर रहे हैं... क्या इन लोगों का ज़मीर बिल्कुल मर चुका है... ? क्या इन्हें ज़रा भी ख़ौफ़े-ख़ुदा नहीं है...?
हज़रत अली अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं-
जो शख़्स दुनिया में कम हिस्सा लेता है, वो अपने लिए राहत का सामान बढ़ा लेता है. और जो दुनिया को ज़्यादा समेटता है, वो अपने लिए तबाहकुन चीज़ों का इज़ाफ़ा कर लेता है...

Wednesday, April 22, 2015

ग़लती किसकी


भूमि अधिग्रहण के ख़िलाफ़ दिल्ली में जंतर-मंतर पर आज आयोजित आम आदमी पार्टी की रैली के दौरान गजेंद्र सिंह नाम के एक किसान ने फांसी लगाकर ख़ुदकुशी कर ली... वह राजस्थान के दौसा ज़िले के गांव नांगल झामरवाडा़ का रहने वाला था... किसान की ख़ुदकुशी से उसके परिजनों पर क्या बीत रहे होगी, उस दर्द को लफ़्ज़ों में बयां नहीं किया जा सकता...
अब सवाल यह है कि क्या गजेंद्र सिंह की ख़ुदकुशी के लिए सिर्फ़ केंद्र सरकार ही ज़िम्मेदार है... क्या वो लोग ज़िम्मेदार नहीं हैं, जिन्होंने ऐसी सरकार चुनी... ?

Monday, April 20, 2015

संस्कार विरासत में मिलते हैं,

फ़िरदौस ख़ान
संस्कार विरासत में मिलते हैं, घर से मिला करते हैं... संस्कार बाज़ार में नहीं मिलते... ज़्यादा पैसा या बड़ा पद मिलने से संस्कार नहीं मिल जाते...
राहुल गांधी को देखें, वो अपने विरोधियों का नाम भी सम्मान के साथ लेते हैं, उनके नाम के साथ जी लगाते हैं... जबकि उनके विरोधी भले ही वे देश के बड़े से बड़े पद पर हों, राहुल गांधी के लिए ग़लत शब्दों का इस्तेमाल करते हैं...
दरअसल, किसी के लिए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करके इंसान सामने वाला का अपमान नहीं करता, बल्कि अपने ही संस्कारों का प्रदर्शन करता है...