Friday, October 31, 2014

शाह अस्त हुसैन, बादशाह अस्त हुसैन...


फ़िरदौस ख़ान
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को ख़िराजे-अक़ीदत पेश करते हुए ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती फ़रमाते हैं-
शाह अस्त हुसैन, बादशाह अस्त हुसैन
दीन अस्त हुसैन, दीने-पनाह हुसैन
सरदाद न दाद दस्त, दर दस्ते-यज़ीद
हक़्क़ा के बिना, लाइलाह अस्त हुसैन... 
इस्लामी कैलेंडर यानी हिजरी सन् का पहला महीना मुहर्रम है. हिजरी सन् का आग़ाज़ इसी महीने से होता है. इस माह को इस्लाम के चार पवित्र महीनों में शुमार किया जाता है. अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने इस माह को अल्लाह का महीना कहा है. साथ ही इस माह में रोज़ा रखने की ख़ास अहमियत बयान की गई है. 10 मुहर्रम को यौमे आशूरा कहा जाता है. इस दिन अल्लाह के नबी हज़रत नूह (अ.) की किश्ती को किनारा मिला था.

कर्बला के इतिहास मुताबिक़ सन 60 हिजरी को यज़ीद इस्लाम धर्म का ख़लीफ़ा बन बैठा. सन् 61 हिजरी से उसके जनता पर उसके ज़ुल्म बढ़ने लगे. उसने हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के नवासे हज़रत इमाम हुसैन से अपने कुशासन के लिए समर्थन मांगा और जब हज़रत इमाम हुसैन ने इससे इनकार कर दिया, तो उसने इमाम हुसैन को क़त्ल करने का फ़रमान जारी कर दिया. इमाम हुसैन मदीना से सपरिवार कुफ़ा के लिए निकल पडे़, जिनमें उनके ख़ानदान के 123 सदस्य यानी 72 मर्द-औरतें और 51 बच्चे शामिल थे. यज़ीद सेना (40,000 ) ने उन्हें कर्बला के मैदान में ही रोक लिया. सेनापति ने उन्हें यज़ीद की बात मानने के लिए उन पर दबाव बनाया, लेकिन उन्होंने अत्याचारी यज़ीद का समर्थन करने से साफ़ इनकार कर दिया. हज़रत इमाम हुसैन सत्य और अहिंसा के पक्षधर थे. हज़रत इमाम हुसैन ने इस्लाम धर्म के उसूल, न्याय, धर्म, सत्य, अहिंसा, सदाचार और ईश्वर के प्रति अटूट आस्था को अपने जीवन का आदर्श माना था और वे उन्हीं आदर्शों के मुताबिक़ अपनी ज़िन्दगी गुज़ार थे. यज़ीद ने हज़रत इमाम हुसैन और उनके ख़ानदान के लोगों को तीन दिनों तक भूखा- प्यास रखने के बाद अपनी फ़ौज से शहीद करा दिया. इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों की तादाद 72 थी.

पूरी दुनिया में कर्बला के इन्हीं शहीदों की याद में मुहर्रम मनाया जाता है. दस मुहर्रम यानी यौमे आशूरा देश के कई शहरों में ताज़िये का जुलूस निकलता है. ताज़िया हज़रत इमाम हुसैन के कर्बला (इराक़ की राजधानी बग़दाद से 100 किलोमीटर दूर उत्तर-पूर्व में एक छोटा-सा क़स्बा) स्थित रौज़े जैसा होता है. लोग अपनी अपनी आस्था और हैसियत के हिसाब से ताज़िये बनाते हैं और उसे कर्बला नामक स्थान पर ले जाते हैं. जुलूस में शिया मुसलमान काले कपडे़ पहनते हैं, नंगे पैर चलते हैं और अपने सीने पर हाथ मारते हैं, जिसे मातम कहा जाता है. मातम के साथ वे हाय हुसैन की सदा लगाते हैं और साथ ही नौहा (शोक गीत) भी पढ़ते हैं. पहले ताज़िये के साथ अलम भी होता है, जिसे हज़रत अब्बास की याद में निकाला जाता है.

मुहर्रम का महीना शुरू होते ही मजलिसों (शोक सभाओं) का सिलसिला शुरू हो जाता है. इमामबाड़े सजाए जाते हैं. मुहर्रम के दिन जगह- जगह पानी के प्याऊ और शर्बत की छबीलें लगाई जाती हैं. हिंदुस्तान में ताज़िये के जुलूस में शिया मुसलमानों के अलावा दूसरे मज़हबों के लोग भी शामिल होते हैं.

विभिन्न हदीसों, यानी हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के कथन व अमल (कर्म) से मुहर्रम की पवित्रता और इसकी अहमियत का पता चलता है. ऐसे ही हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने एक बार मुहर्रम का ज़िक्र करते हुए इसे अल्लाह का महीना कहा है. इसे जिन चार पवित्र महीनों में से एक माना जाता है.

एक हदीस के मुताबिक़ अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने फ़रमाया कि रमज़ान के अलावा सबसे अहम रोज़े (व्रत) वे हैं, जो अल्लाह के महीने यानी मुहर्रम में रखे जाते हैं. यह फ़रमाते वक़्त नबी-ए-करीम हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने एक बात और जोड़ी कि जिस तरह अनिवार्य नमाज़ों के बाद सबसे अहम नमाज़ तहज्जुद की है, उसी तरह रमज़ान के रोज़ों के बाद सबसे अहम रोज़े मुहर्रम के हैं.

मुहर्रम की 9 तारीख़ को जाने वाली इबादत का भी बहुत सवाब बताया गया है. सहाबी इब्ने अब्बास के मुताबिक़ हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने फ़रमाया कि जिसने मुहर्रम की 9 तारीख़ का रोज़ा रखा, उसके दो साल के गुनाह माफ़ हो जाते हैं और मुहर्रम के एक रोज़े का सवाब 30 रोज़ों के बराबर मिलता है.
मुहर्रम हमें सच्चाई, नेकी और ईमानदारी के रास्ते पर चलने की प्रेरणा देता है.
क़त्ले-हुसैन असल में मर्गे-यज़ीद है
इस्लाम ज़िन्दा होता है हर कर्बला के बाद...
(स्टार न्यूज़ एजेंसी)

Monday, October 27, 2014

बेगम अख़्तर को समर्पित रही संगोष्ठी


नई दिल्ली. बेगम अख़्तर जितनी बड़ी गायिका थीं, उतनी बड़ी ही इंसान थीं. यह बात लेखक और फ़िल्मकार शरद दत्त ने बेगम अख़्तर को समर्पित सन्निधि की संगोष्ठी में अध्यक्षीय भाषण के दौरान कही. गांधी हिंदुस्तानी साहित्य सभा और विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान की ओर से रविवार को सन्निधि सभागार में आयोजित संगोष्ठी में दत्त ने बेगम अख़्तर के साथ व्यतीत क्षणों का विस्तार से ज़िक्र करते हुए कहा कि वे अपने मिज़ाज से जीती थीं और कार्यक्रमों में शिरकत करने से इंकार तब भी नहीं करती थीं, जब वे बीमार रहती थीं. वे बड़ी कलाकार अपने प्रयासों के कारण बनीं, लेकिन उनमें अहंकार कभी नहीं रहा.
काका कालेलकर और विष्णु प्रभाकर की स्मृति में हर माह आयोजित होने वाली इस बार की संगोष्ठी ग़ज़ल और डायरी लेखन पर केंद्रित थी. मुख्य अतिथि दीक्षित दनकौरी के सानिध्य में संगोष्ठी में नए रचनाकारों ने अपनी ताज़ातरीन ग़ज़लें पेश कीं. इनमें विशिष्ट अतिथि और वरिष्ठ पत्रकार फ़िरदौस ख़ान सहित प्रदीप तरकश, विकास राज, राजेंद्र कलकल, अरुण शर्मा अनंत, कालीशंकर सौम्य, मनीष मधुकर, उर्मिला माधव, सीमा अग्रवाल, शालिनी रस्तोगी, जीतेंद्र प्रीतम, कामदेव शर्मा, अनिल मीत और अस्तित्व अंकुर शामिल थे. इनकी ग़ज़लों में मौजूदा समय की विसंगतियों और विडंबनाओं का उल्लेख था.
इस मौक़े पर शायरी के क्षेत्र में चर्चित दीक्षित दनकौरी ने अपनी चुनिंदा ग़ज़लों को पेश करने से पहले नये रचनाकारों को हिदायत दी कि वे मंचीय कवियों की नक़ल न करें और न ही सस्ती लोकप्रियता की ओर भागें. उन्होंने नये रचनाकारों से आग्रह किया कि वे अपने स्तर से रचना-कर्म की ख़ूब गहराई डूबें. उन्होंने कहा कि लेखन का कार्य दिखने में भले आसान-सा लगे पर यह वास्तव में कठिन काम है.
समारोह में विशिष्ट अतिथि व स्टार न्यूज़ एजेंसी की समूह संपादक फ़िरदौस ख़ान ने डायरी लेखन का ज़िक्र करते हुए कहा कि इन दिनों डायरी लेखन ख़ूब हो रहा है. डायरी, आत्मकथा का ही एक रूप है. फ़र्क़ बस ये है कि आत्मकथा में पूरी ज़िन्दगी का ज़िक्र होता है और ज़िन्दगी के ख़ास वाक़ियात ही इसमें शामिल  किए जाते हैं, जबकि डायरी में रोज़मर्रा की उन सभी बातों को शामिल किया जाता है, जिससे लेखक मुतासिर होता है. डायरी में अपनी ज़ाती बातें होती हैं, समाज और देश-दुनिया से जुड़े क़िस्से हुआ करते है. डायरी लेखन जज़्बात से सराबोर होता है, क्योंकि इसे अमूमन रोज़ ही लिखा जाता है. इसलिए उससे जुड़ी तमाम बातें ज़ेहन में ताज़ा रहती हैं. डायरी लिखना अपने आप में ही बहुत ख़ूबसूरत अहसास है. डायरी एक बेहद क़रीबी दोस्त की तरह है, क्योंकि इंसान जो बातें किसी और से नहीं कह पाता, उसे डायरी में लिख लेता है. हमारे मुल्क में भी डायरी लेखन एक जानी-पहचानी विधा बन चुकी है. इसकी बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए साहित्य जगत ने भी इसे क़ुबूल कर लिया है. बलॊग ने आज इसे घर-घर पहुंचा दिया है. उन्होंने कहा कि डायरी का ज़िक्र तेरह साल की एनी फ्रेंक के बिना अधूरा है. नीदरलैंड पर नाज़ी क़ब्ज़े के दौरान दो साल उसके परिवार ने छिपकर ज़िन्दगी गुज़ारी. बाद में नाज़ियों ने उन्हें पकड़ लिया और शिविर में भेज दिया, जहां उसकी मां की मौत हो गई. बाद में टायफ़ाइड की वजह से ऐनी और उसकी बहन ने भी दम तोड़ दिया. इस दौरान एनी ने अपनी ज़िन्दगी के अनुभवों को डायरी में लिखा था. जब रूसियों ने उस इलाक़े को आज़ाद करवाया, तब एनी की डायरी मिली. परिवार के ऑटो फ्रैंक ने ’द डायरी ऑफ़ ए यंग गर्ल’ नाम से इसे शाया कराया.  दुनियाभर की अनेक भाषाओं इसका में अनुवाद हो चुका है. और ये दुनिया की सबसे ज़्यादा लोकप्रिय डायरी में शुमार की जाती है.

विशिष्ट अतिथि डॊ. सुनीता ने डायरी लेखन पर कहा कि साहित्य में बाक़ी विधाओं की तरह डायरी लेखन को भले कोई ख़ास महत्व नहीं मिला, लेकिन इसके महत्व को कमतर नहीं आंका जाना चाहिए, क्योंकि मलाला और मुख़्तारन बाई जैसी महिलाओं की संघर्षशील जिंदगी की कठिनाइयों की सच्चाई उनकी डायरियों के ज़रिये ही दुनिया जान सकी. उन्होंने कहा कि डायरी लेखन ही एक ऐसा लेखन है, जिसमें लिखने वालों को ख़ुद से साक्षात्कार करना पड़ता है और यह कोई ज़रूरी नहीं कि डायरी लेखन केवल कोई बड़े लेखक तक ही सीमित हैं. डायरी से हर उस ख़ास और आम आदमी का सरोकार रहता रहा है, जिसमें अभिव्यक्ति की आकांक्षा है. डायरी लेखन पर सुरेश शर्मा ने भी अपने विचार रखे. उन्होंने कहा कि डायरी लेखन में ईमानदारी बरतनी चाहिए, जो बहुत ही कम देखने को मिलती है.

गांधी हिंदुस्तानी साहित्य सभा की मंत्री कुसुम शाह के सानिध्य में आयोजित इस कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार प्रसून लतांत और किरण आर्या ने किया, जबकि स्वागत भाषण करते हुए विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान के मंत्री अतुल प्रभाकर ने आयोजन के मक़सद को उजागर किया और भावी कार्यक्रमों की जानकारी दी. संगोष्ठी में गणमान्य लोगों ने शिरकत की.



रेहाना ! हमें माफ़ करना...


-फ़िरदौस ख़ान
एक लड़की जो जीना चाहती थी... अरमानों के पंखों के साथ आसमान में उड़ना चाहती थी, लेकिन हवस के भूखे एक वहशी दरिन्दे ने उसकी जान ले ली. एक चहकती-मुस्कराती लड़की अब क़ब्र में सो रही होगी... उसकी रूह कितनी बेचैन होगी... सोचकर ही रूह कांप जाती है... लगता है उस क़ब्र में रेहाना जब्बारी नहीं हम ख़ुद दफ़न हैं...
रेहाना ! हमें माफ़ करना... हम तुम्हारे लिए सिर्फ़ दुआ ही कर सकते हैं...

ग़ौरतलब है कि तमाम क़वायद के बावजूद दुनियाभर के संगठन 26 साल की ईरानी महिला रेहाना जब्बारी को नहीं बचा सके. रेहाना को 25 अक्टूबर को फांसी दे दी गई. रेहाना पर इल्ज़ाम था कि उसने 2007 में अपने साथ ज़बरदस्ती करने की कोशिश करने वाले ख़ुफ़िया एजेंट मुर्तजा अब्दोआली सरबंदी पर चाक़ू से वार किया था, जिससे उसकी मौत हो गई थी. रेहाना को साल 2009 में क़त्ल का क़ुसूरवार पाया गया था. क़ानून मंत्री मुस्तफ़ा पी. मोहम्मदी ने अक्टूबर में इशारा किया था कि रेहाना की जान बच सकती है, लेकिन सरबंदी के परिजनों ने रेहाना की जान बचाने के लिए पैसे लेने से इंकार कर दिया. रेहाना की मां ने जज के सामने अपनी बेटी रेहाना की जगह ख़ुद को फांसी दे दिए जाने की गुहार लगाई थी.
पेशे से इंटीरियर डिज़ाइनर रेहाना को फांसी से बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मुहिम चलाई गई, लेकिन उसकी जान नहीं बच सकी. मानवाधिकार संगठन ऐमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस आदेश को बिल्कुल ग़लत ठहराते हुए कहा कि हालांकि रेहाना ने सरबंदी को रेप की कोशिश करते वक़्त चाक़ू मारे जाने की बात मानी, लेकिन उसका क़त्ल कमरे में मौजूद एक अन्य व्यक्ति ने किया था.

रेहाना ने फांसी से पहले अपनी मां को एक ख़त लिखकर अपनी मौत के बाद अंगदान की ख़्वाहिश ज़ाहिर की. इस ख़त को रेहाना की मौत से दूसरे दिन 26 अक्टूबर को सार्वजनिक किया गया.  अपने ख़त में रेहाना लिखती है-

मेरी प्रिय मां,
आज मुझे पता चला कि मुझे किस्सास (ईरानी विधि व्यवस्था में प्रतिकार का क़ानून) का सामना करना पड़ेगा. मुझे यह जानकर बहुत बुरा लग रहा है कि आख़िर तुम क्यों नहीं अपने आपको यह समझा पा रही हो कि मैं अपनी ज़िन्दगी के आख़िरी पन्ने तक पहुंच चुकी हूं. तुम जानती हो कि तुम्हारी उदासी मुझे कितना शर्मिंदा करती है. तुम क्यों नहीं मुझे तुम्हारे और अब्बा के हाथों को चूमने का एक मौक़ा देती हो?

मां, इस दुनिया ने मुझे 19 साल जीने का मौक़ा दिया. उस मनहूस रात को मेरा क़त्ल हो जाना चाहिए था. मेरी लाश शहर के किसी कोने में फेंक दी गई होती और फिर पुलिस तुम्हें मेरी लाश को पहचानने के लिए लाती और तुम्हें मालूम होता कि क़त्ल से पहले मेरा रेप भी हुआ था. मेरा क़ातिल कभी भी पकड़ में नहीं आता, क्योंकि हमारे पास उसके जैसी ना ही दौलत है, और ना ही ताक़त. उसके बाद तुम कुछ साल इसी तकलीफ़ और शर्मिंदगी में गुज़ार लेतीं और फिर इसी तकलीफ़ में तुम मर भी जातीं, लेकिन किसी अज़ाब की वजह से ऐसा नहीं हुआ. मेरी लाश तब फेंकी नहीं गई, लेकिन इविन जेल के सिंगल वॉर्ड स्थित क़ब्र और अब क़ब्रनुमा शहरे-जेल में यही हो रहा है. इसे ही मेरी क़िस्मत समझो और इसका इल्ज़ाम किसी पर मत मढ़ो. तुम बहुत अच्छी तरह जानती हो कि मौत ज़िन्दगी का अंत नहीं होती.

तुमने ही कहा था कि आदमी को मरते दम तक अपने मूल्यों की रक्षा करनी चाहिए. मां, जब मुझे एक क़ातिल के तौर पर अदालत में पेश किया गया, तब भी मैंने एक आंसू नहीं बहाया. मैंने अपनी ज़िन्दगी की भीख नहीं मांगी. मैं चिल्लाना चाहती थी, लेकिन ऐसा नहीं किया, क्योंकि मुझे क़ानून पर पूरा भरोसा था.

मां, तुम जानती हो कि मैंने कभी एक मच्छर भी नहीं मारा. मैं कॉकरोच को मारने की जगह उसकी मूंछ पकड़कर उसे बाहर फेंक आया करती थी. लेकिन अब मुझे सोच-समझकर क़त्ल किए जाने का मुजरिम बताया जा रहा है. वे लोग कितने पुरउम्मीद हैं, जिन्होंने जजों से इंसाफ़ की उम्मीद की थी. तुम जो सुन रही हो कृपया उसके लिए मत रोओ. पहले ही दिन से मुझे पुलिस ऑफ़िस में एक बुज़ुर्ग अविवाहित एजेंट मेरे स्टाइलिश नाख़ून के लिए मारते-पीटते हैं. मुझे पता है कि अभी ख़ूबसूरती की कद्र नहीं है. चेहरे की ख़ूबसूरती, विचारों और आरज़ुओं की ख़ूबसूरती, ख़ूबसूरत लिखावट, आंखों और नज़रिये की ख़ूबसूरती और यहां तक कि मीठी आवाज़ की ख़ूबसूरती.

मेरी प्रिय मां, मेरी विचारधारा बदल गई है, लेकिन तुम इसकी ज़िम्मेदार नहीं हो. मेरे अल्फ़ाज़ का अंत नहीं और मैंने किसी को सबकुछ लिखकर दे दिया है, ताकि अगर तुम्हारी जानकारी के बिना और तुम्हारी ग़ैर-मौजूदगी में मुझे फांसी दे दी जाए, तो यह तुम्हें दे दिया जाए. मैंने अपनी विरासत के तौर पर तुम्हारे लिए कई हस्तलिखित दस्तावेज़ छोड़ रखे हैं.

मैं अपनी मौत से पहले तुमसे कुछ कहना चाहती हूं. मां, मैं मिट्टी के अंदर सड़ना नहीं चाहती. मैं अपनी आंखों और जवान दिल को मिट्टी बनने देना नहीं चाहती, इसलिए प्रार्थना करती हूं कि फांसी के बाद जल्द से जल्द मेरा दिल, मेरी किडनी, मेरी आंखें, हड्डियां और वह सबकुछ जिसका ट्रांसप्लांट हो सकता है, उसे मेरे जिस्म से निकाल लिया जाए और इन्हें ज़रूरतमंद व्यक्ति को तोहफ़े के तौर पर दे दिया जाए. मैं नहीं चाहती कि जिसे मेरे अंग दिए जाएं, उसे मेरा नाम बताया जाए और वह मेरे लिए प्रार्थना करे.