Thursday, September 4, 2014

किताबें...



हमें बचपन से ही किताबें बहुत भाती हैं. अपने दोस्तों को भी उनकी सालगिरह पर किताबें ही देतेहैं, लेकिन जिनका किताबों से कोई सरोकार नहीं यानी उन्हें किताबें पसंद नहीं, तो उनके लिए कोई दूसरा तोहफ़ा ख़रीदने में हमें काफ़ी सोचना पड़ता है... ख़ैर पसंद अपनी-अपनी.

दूरदर्शन में हमारे साथ एक बंगाली प्रोड्यूसर भी थे. उनसे बंगाली तहज़ीब को क़रीब से जानने का मौक़ा मिला. वैसे भी हम बांग्ला साहित्य पढ़ते रहे हैं. वहां के लोगों की एक बात हमें बेहद पसंद है और उनके इस जज़्बे की हम दिल से क़द्र करते हैं. बंगाल में लोग शादी-ब्याह में भी तोहफ़े के तौर पर किताबें भी देते हैं.

गुज़श्ता दो साल पहले प्रगति मैदान में लगे मेले में जाने का मौक़ा मिला, तो हमने उर्दू, अरबी, पंजाबी और हिन्दी की बहुत-सी किताबें ख़रीदीं. पाकिस्तान और ईरान के स्टॉल पर बहुत भीड़ थी. यह देखकर अच्छा लगा कि किताबों के क़द्रदानों की आज भी कोई कमी नहीं है. जब भी घर जाना होता है, तो हमारी यही कोशिश रहती है कि अम्मी और बहन-भाइयों के लिए उनकी पसंद की कोई न कोई किताब लेकर जाएं. अम्मी को उर्दू और अरबी की किताबें पसंद हैं. भाई को पत्रकारिता, पशु-पक्षियों और बाग़वानी की. हमारे घर पर एक अच्छी-ख़ासी लाइब्रेरी है. यहां भी हमारे पास किताबों का एक ज़ख़ीरा है.

किताबों की अपनी ही एक दुनिया है. कहते हैं किताबों से अच्छा कोई दोस्त नहीं होता. कॉलेज के वक़्त हर महीने आठ से दस किताबें पढ़ लेते थे. लाइब्रेरी में उर्दू और पंजाबी की किताबें पढ़ने वाले हम अकेले थे. उर्दू या पंजाबी का कोई बुज़ुर्ग पाठक कभी साल-दो-साल में ही वहां आता था. कई बार लाइब्रेरी के लोग किताबों को तरतीब से लगाने के लिए हमारी मदद लेते थे, तो कभी फटी-पुरानी या कभी-कभी नई किताबों के नाम, लेखक और प्रकाशक के नाम हिन्दी में लिखने में. हमें यह सब काम करना बहुत अच्छा लगता था.

किताबों से मुताल्लिक़ एक ख़ास बात. कुछ लोगों की आदत में शुमार होता है कि वो अच्छी किताब देखते ही आपसे मांग लेंगे. आपने एक बार किताब दे दी तो फिर मजाल है कि वो आपको वापस मिल जाए. किताबों के पन्ने मोड़ने, पैन से लाइनें खींचकर किताबों की अच्छी सूरत को बिगाड़ने में भी लोगों को बहुत मज़ा आता है. हमारे पास नामी कहानीकारों की कहानियों का एक संग्रह था. एक रोज़ हम उसे अपने साथ दफ़्तर ले गए. एक लड़की ने हमसे मांग लिया. कई महीने गुज़र गए, लेकिन उसने वापस नहीं किया. हमने पूछा तो कहने लगी-वक़्त ही नहीं मिला. ख़ैर क़रीब दो साल बाद हमारा उसके घर जाना हुआ, तो उसने उसे लौटा दिया. लेकिन उसे वापस पाकर हमें बेहद दुख हुआ. तक़रीबन हर सफ़े पर पैन से लाइनें खींची हुईं थीं. कवर पेज भी बेहद अजनबी लगा. जब भी उस किताब को देखते, तो बुरा लगता. छोटे भाई ने हमारी सालगिरह पर नई किताब लाकर दी और उस किताब को अलमारी से हटा दिया. ऐसे कितने ही क़िस्से हैं अपनी प्यारी किताबों से जुदा होने के...

रोज़मर्रा की ज़िन्दगी की जद्दो-जहद में लोग किताबें पढ़ने के शौक़ को क़ायम नहीं रख पाते. जो लोग किताबें पढ़ने के शौक़ीन हैं, उनसे यही गुज़ारिश है कि वो इसे पूरा ज़रूर करें. ख़ैर, हमारा काम तो किताबों से ही जुड़ा है. किताबों की समीक्षा लिखते हैं, इस वजह से भी आए दिन कोई न कोई किताब मिलती ही रहती है और वक़्त निकालकर उसे पढ़ना भी होता है...

अलबत्ता, जांनिसार अख़्तर साहब का एक शेअर याद आता है-
ये इल्म का सौदा, ये रिसालें, ये किताबें
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं...

ज़िन्दगी रही तो फिर इसी ब्लॉग पर मुलाक़ात होगी...
तब तक के लिए अल्लाह हाफिज़

5 Comments:

Manvinder said...

ज़िन्दगी रही तो फिर इसी ब्लॉग पर मुलाक़ात होगी...
तब तक के लिए अल्लाह हाफिज़,
achach likha hai....
mulakaat age bhi ho...jahi tammana hai

sayeed.journalist said...

माशा अल्लाह...
आपको पढ़ना आदत में शुमार हो गया है...

नीरज गोस्वामी said...

अशआर मेरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं
कुछ शेर फकत तुमको सुनाने के लिए हैं
जानिसार अख्तर साहेब की ग़ज़ल के शेर से आगाज़ की गयी आप की पोस्ट को पढ़ कर बहुत अच्छा लगा...किताबों से मेरी भी दोस्ती दीवानगी की हद तक है...अख्तर साहेब की बेगम साहिबा साफिया अख्तर की लिखी किताब"तुम्हारे नाम" अगर मिले तो जरूर पढियेगा.
नीरज

Omkar Chaudhary said...

फिरदौस, आपका ब्लॉग देख कर बहुत अच्छा लगा. अभी बाकी पोस्ट पढ़ना शेष है.
शुभकामनाएँ

ePandit said...

किताबों को साफ-सुथरा रखने के मामले में मेरी आदत आपसे काफी मिलती है। मैं अपनी पसंदीदा किताबों पर पारदर्शी पॉलीथीन वाली जिल्द लगा कर रखता हूँ, इससे टाइटल कवर दिखता रहता है। मुझे किताब पर पहले पन्ने पर नाम छोड़कर कहीं भी पैन से लिखना पसन्द नहीं। कहीं जरुरी हुआ तो पैन्सिल से लिखता हूँ। मित्रों को किताबें देने का मेरा भी तजुर्बा अच्छा नहीं रहा। वे किताबों का पूरा हुलिया बिगाड़कर ही वापस करते हैं और कई बार तो वापस ही नहीं मिलती। खैर अब किताबें पढ़ना लगभग छूट गया है पर पुरानी किताबें अब भी सम्भाल कर रखते हैं।

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