Wednesday, December 14, 2011

यह लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी का बलॊग है

रजनीश जी...
आपकी पोस्ट (ब्लॉगवाणी : यह लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी का ब्लॉग है) पढ़ी...
इतना कहना चाहेंगे कि हम भी अपने बारे में लिखने बैठते तो इतना अच्छा-अच्छा नहीं लिख पाते, जितना अच्छा-अच्छा आपने लिखा है...
आपके लिखने के अंदाज़ के तो हम पहले से ही क़ायल हैं... 
सच! आपने तो हमसे हमारा ही तअरुफ़ करा दिया...वो भी इतने दिलकश अंदाज़ में...क्या कहने...
तारीफ़ और शुक्रिया के लिए हमें लफ़्ज़ ही नहीं मिल पा रहे हैं...
वाक़ई... ज़र्रे को आफ़ताब बनाना तो कोई आपसे सीखे...
आपका बहुत-बहुत शुक्रिया

यह लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी का बलॊग है
-डॊ. ज़ाकिर अली ’रजनीश’
(जनसंदेश टाइम्स, 14 दिसंबर, 2011 के 'ब्‍लॉगवाणी' कॉलम में प्रकाशित)
एक ज़माना हुआ करता था जब शाम को खाना खाने के बाद बच्‍चे अपने दादा-दादी को घेर कर बैठ जाया करते थे और कहानियां सुना करते थे. राजा-रानी, परी-जादूगरों की वे कहानियां इतनी मज़ेदार हुआ करती थीं कि कब उन्‍हें सुनते-सुनते घंटों बीत जाया करते थे, पता ही नहीं चलता था. समय बदला, लोग बदले और साथ ही बदल गया परिवार का ढांचा. अब न तो परिवार में दादा-दादी के लिए जगह बची है और न ही बचा है कहानियों के लिए स्‍पेस. आज के प्रतिद्व‍न्द्विता के युग में ढली पढ़ाई में न तो बच्‍चों के पास कहानियों के लिए समय बचा है और न ही कहानियों के सुनाने वालों के पास अब बच्‍चे ही पहुंच पाते हैं.
राजा-रानी का दौर ख़त्‍म हुए एक युग बीत चुका है. यही कारण है कि घोड़े पर चढ़कर आते हुए राजकुमार अब कहीं नहीं नज़र आते. राजकुमारियों के क़िस्‍से भी अब पुराने पड़ चुके हैं. लेकिन बावजूद उसके वे कथानक, वे स्‍मृतियां अब भी लोगों के जेहन में ज़िन्दा हैं. यही कारण है कि मां-बाप अपने बच्‍चों की तारीफ़ करते हुए उन्‍हें अक्‍सर ‘राजा बेटा’ और ‘नन्‍हीं राजकुमारी’ जैसे विशेषणों का इस्‍तेमाल करते पाए जाते हैं. ब्‍लॉगजगत में जहां एक ओर ऐसे तमाम नन्‍हें राजकुमार और राजकुमारियां अपनी शैतानियों के कारण चर्चा में रहते हैं, वहीं एक शख्शियत ऐसी भी है, जो यूं तो ब्‍लॉग की दुनिया की चर्चित हस्‍ती है, लेकिन अपने को शब्‍दों के द्वीप की राजकुमारी के रूप में प्रस्‍तुत करती है. उस चर्चित ब्‍लॉगर का नाम है सुश्री फ़िरदौस ख़ान.
फ़िरदौस एक युवा लेखिका हैं. वे पत्रकार के साथ-साथ शायरा और कहानीकार के रूप में भी जानी जाती हैं और उर्दू, हिन्दी तथा पंजाबी साहित्‍य में समान रूप से रूचि रखती हैं. अनेक दैनिक एवं साप्‍ताहिक समाचार पत्रों, रेडियो तथा टेलीविज़न चैनलों के लिए काम कर चुकी फ़िरदौस वर्तमान में 'स्टार न्यूज़ एजेंसी' और 'स्टार वेब मीडिया' में समूह संपादक का दायित्व संभाल रही हैं. वे वर्ष 2007 से ब्‍लॉग जगत में सक्रिय हैं और अपने ब्‍लॉग ‘मेरी डायरी’ (http://firdaus-firdaus.blogspot.com) के लिए जानी जाती हैं.

‘मेरी डायरी’ फ़िरदौस का एक समसामयिक ब्‍लॉग है, जिसमें वे बेबाक शैली में अपने विचार रखती हैं. साहित्‍य और विशेषकर उर्दू साहित्‍य से गहरा जुड़ाव होने के कारण जहां उनके शब्‍दों में उर्दू की मिठास मिलती है, वहीं पत्रकारिता के गहन अनुभव के कारण उनकी भाषा में एक तीखी धार का भी एहसास होता है. यही कारण है कि वे जब किसी ज्‍वलंत मुद्दे पर अपनी बात रखती हैं, तो वह काफ़ी मारक हो जाती है. जब वे अपनी क़लम की ज़द में धार्मिक रीति-रिवाजों को लेकर आती हैं, तो अकसर विवाद की ऊंची-ऊंची लपटें उठने लगती हैं. कभी-कभी इन विषयों पर लिखते समय अपने ख़िलाफ़ उठने वाले विवाद के कारण ऐसा भी होता है कि वे शालीनता की सीमा रेखा के आसपास पहिंच जाती हैं. लेकिन न तो वे इस बात का कोई मलाल रखती हैं और न ही वे इस वजह से होने वाली तीखी आलोचनाओं के कारण अपनी सोच से पीछे हटने के लिए तैयार नज़र आती हैं.
एक विचारवारन मुस्लिम महिला होने के कारण फ़िरदौस कठमुल्‍लावाद की सख्‍़त विरोधी हैं और मुस्लिम महिलाओं को आगे बढ़कर समाज की मुख्‍यधारा में शामिल होने की हिमायती हैं. वे गर्व के साथ अपने को भारतीय नारी कहती हैं और न सिर्फ़ मुस्लिम महिलाओं पर लादी गई ज़्यादतियों का विरोध करती हैं, वरन बड़े ख़ख़्र से बताती हैं कि हमने अम्मी, दादी, नानी, मौसी और भाभी को बुर्क़े की क़ैद से निजात दिलाई है. वे मुस्लिम समाज में व्‍याप्‍त दक़ियानूसी विचारधाराओं की सख़्त आलोचक हैं. यही कारण है कि उन्‍होंने अपने ब्‍लॉग पर सबसे ज़्यादा अगर किसी विषय पर लिखा है, तो वह इस्‍लाम और मुस्लिम समाज ही है.
'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' नामक किताब की लेखिका फ़िरदौस हिन्‍दुस्‍तानी शास्‍त्रीय संगीत की भी जानकार हैं और अपनी साहित्यिक सेवाओं के लिए अनेक संस्‍थाओं द्वारा पुरस्‍कृत एवं सम्‍मानित हो चुकी हैं. उनके साहित्यिक रुझान की झलक उनके ब्‍लॉग ‘फ़िरदौस डायरी’ (http://firdausdiary.blogspot.com) से मिलती है, जिस पर वे अपनी नज़्मों के साथ-साथ साहित्यिक एवं सांस्‍कृतिक महत्‍व के विषयों पर लेखन करती पाई जाती हैं. इसके अतिरिक्‍त वे अपने उर्दू ब्‍लॉग ‘जहांनुमां’, पंजाबी ब्‍लॉग ‘हीर’ एवं अंग्रेजी ब्‍लॉग ‘द पैराडाइज़’ के लिए भी जानी जाती हैं, जिनके लिंक उनके हिन्‍दी ब्‍लॉग ‘मेरी डायरी’ पर देखे जा सकते हैं.
अपनी बरदस्‍त टैग लाइन ‘मेरे अल्फ़ाज़, मेरे जज़्बात और मेरे ख़्यालात की तर्जुमानी करते हैं... क्योंकि मेरे लफ़्ज़ ही मेरी पहचान हैं’ के कारण पहली नजर में पाठकों को आकर्षित करने वाली फ़िरदौस एक गम्‍भीर ब्‍लॉगर के रूप में जानी जाती हैं और अपने विविधतापूर्ण तथा प्रभावी लेखन के कारण ब्‍लॉगरों की बेतहाशा भीड़ में भी दूर से पहचानी जाती हैं.

Monday, November 14, 2011

राहुल को सलाहकार की ज़रूरत है...फ़िरदौस ख़ान

फ़िरदौस ख़ान
कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को एक ऐसे सलाहकार की ज़रूरत है, जो उनके लिए समर्पित हो और उन्हें वो सलाह दे सके, जिसकी उन्हें ज़रूरत है... क्योंकि आज उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद के झूंसी में आयोजित जनसभा में जिस तरह राहुल गांधी ने भाषण दिया, उससे तो यही कहा जा सकता है कि सियासत में उनके पास कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है, जो उन्हें कामयाब होते देखना चाहता हो...
राहुल गांधी का एक हल्का बयान उनकी सारी मेहनत पर पानी फेर देता है...कई बार लगता है कि वो ख़ुद अपने ही दुश्मन बन बैठे हैं...आख़िर क्यों वो ऐसे बयान देते हैं, जो उनके विरोधियों को उनके ख़िलाफ़ बोलने का मौक़ा दे देते हैं...बेहतर हो कि वो सार्वजनिक तौर पर कोई भी बयान देने पहले उसके अच्छे-बुरे दोनों पहलुओं पर अच्छे से गौर कर लें... 

Monday, August 8, 2011

राहुल को प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं...


हिन्दुस्तान का शहज़ादा 
फ़िरदौस ख़ान
कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के लिए देशवासियों की पहली पसंद हैं. सीएनएन-आईबीएन और सीएनबीसी-टीवी 18 टीवी नेटवर्क  के सर्वे के मुताबिक़ ज़्यादातर लोगों की राय है कि राहुल गांधी को देश का अगला प्रधानमंत्री बनना चाहिए. देश के 20 राज्यों में किए गए इस सर्वे के मुताबिक़ कांग्रेस शासित राज्यों के 42 फ़ीसदी लोग चाहते हैं कि राहुल देश की कमान संभालें, जबकि 32 फ़ीसदी लोगों का मानना है कि जल्द ही मनमोहन सिंह की जगह ले लेनी चाहिए. कुल 39 हज़ार लोगों में से महज़ 22 फ़ीसदी लोगों का मानना है कि मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद पर बने रहना चाहिए. वहीं 54 फ़ीसदी लोगों का कहना है कि राहुल ग़रीबों के हितैषी और भरोसेमंद नेता हैं. उनके सामने कांग्रेस पार्टी का कोई नेता नहीं टिक पाया.

जब भ्रष्टाचार और महंगाई के मामले में कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का चौतरफ़ा विरोध हो रहा है, ऐसे वक़्त  में राहुल ने गांव-गांव जाकर जनमानस से एक भावनात्मक रिश्ता क़ायम किया. राहुल ने लोगों से मिलने का कोई मौक़ा नहीं छो़ड़ा. बीती पांच जुलाई को वह भट्टा पारसौल गांव गए. उन्होंने आसपास के गांवों का भी दौरा कर ग्रामीणों से बात की, उनकी समस्याएं सुनीं और उनके समाधान का आश्वासन भी दिया. इससे पहले भी 11 मई की सुबह वह मोटरसाइकिल से भट्टा-पारसौल गांव जा चुके हैं. उस वक़्त मायावती ने उन्हें गिरफ्तार करा दिया था. इस बार भी वह गुपचुप तरीक़े से ही गांव गए. न तो प्रशासन को इसकी ख़बर थी और न ही मीडिया को इसकी भनक लगने दी गई. हालांकि उनके दौरे के बाद प्रशासन सक्रिय हो गया. बीती 29 जून को वह लखीमपुर में पीड़ित  परिवार के घर गए और उन्हें इंसाफ़ दिलाने का वादा किया.

भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी द्वारा निकाली गई पदयात्रा से सियासी हलक़ों में चाहे जो प्रतिक्रिया हुई हो, लेकिन यह हक़ीक़त है कि राहुल ने ग्रामीणों के साथ जो वक़्त बिताया, उसे वे कभी नहीं भूल पाएंगे. इन लोगों के लिए यह किसी सौग़ात से कम नहीं था कि उन्हें युवराज के साथ वक़्त गुज़ारने का मौक़ा मिला. अपनी पदयात्रा के दौरान पसीने से बेहाल राहुल ने शाम होते ही गांव बांगर के किसान विजय पाल की खुली छत पर स्नान किया. फिर थोड़ी देर आराम करने के बाद उन्होंने घर पर बनी रोटी, दाल और सब्ज़ी खाई. ग्रामीणों ने उन्हें पूड़ी-सब्ज़ी की पेशकश की, लेकिन उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया. गांव में बिजली की क़िल्लत रहती है, इसलिए ग्रामीणों ने जेनरेटर का इंतज़ाम किया था, लेकिन राहुल ने पंखा भी बंद करवा दिया. वह एक आम आदमी की तरह ही बांस और बांदों की चारपाई पर सोए. यह कोई पहला मौक़ा नहीं था, जब राहुल गांधी इस तरह एक आम आदमी की ज़िंदगी गुज़ार रहे थे. इससे पहले भी वह रोड शो कर चुके हैं और उन्हें इस तरह के माहौल में रहने की आदत है. कभी वह किसी दलित के घर भोजन करते हैं तो कभी किसी मज़दूर से साथ ख़ुद ही परात उठाकर मिट्टी ढोने लगते हैं. राहुल का आम लोगों से मिलने-जुलने का यह जज़्बा उन्हें लोकप्रिय बना रहा है. राहुल जहां भी जाते हैं, उन्हें देखने के लिए, उनसे मिलने के लिए लोगों का हुजूम इकट्ठा हो जाता है.

फ़िलहाल राहुल अपनी मां सोनिया के साथ विदेश में हैं. पिछले दिनों ही उनकी सर्जरी हुई है. उनके जल्द ठीक होने की दुआ करते हैं. उम्मीद है कि हिन्दुस्तान का शहज़ादा जल्द ही वापस आएगा.  माना जा रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की ग़ैर मौजूदगी में राहुल को तिरंगा फहराने का अधिकार सौंपा जा सकता है. अगर ऎसा होता है, तो यह पहला मौक़ा होगा जब राहुल कांग्रेस के 24 अकबर रोड स्थित मुख्यालय पर तिरंगा फहराएंगे...

अन्य
राहुल की मेहनत रंग लाएगी... 

Tuesday, August 2, 2011

या ख़ुदा तूने अता फिर कर दिया रमज़ान है...

फ़िरदौस ख़ान
मरहबा सद मरहबा आमदे-रमज़ान है
खिल उठे मुरझाए दिल, ताज़ा हुआ ईमान है
हम गुनाहगारों पे ये कितना बड़ा अहसान है
या ख़ुदा तूने अता फिर कर दिया रमज़ान है...
माहे-रमज़ान इबादत, नेकियों और रौनक़ का महीना है। यह हिजरी कैलेंडर का नौवां महीना होता है। इस्लाम के मुताबिक़ अल्लाह ने अपने बंदों पर पांच चीज़ें फ़र्ज क़ी हैं, जिनमें कलमा, नमाज़, रोज़ा, हज और ज़कात शामिल है। रोज़े का फ़र्ज़ अदा करने का मौक़ा रमज़ान में आता है। कहा जाता है कि रमज़ान में हर नेकी का सवाब 70 नेकियों के बराबर होता है और इस महीने में इबादत करने पर 70 गुना सवाब हासिल होता है। इसी मुबारक माह में अल्लाह ने हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर कुरआन नाज़िल किया था। यह भी कहा जाता है कि इस महीने में अल्लाह शैतान को क़ैद कर देता है।

इबादत
रमज़ान से पहले मस्जिदों में रंग-रोग़न का काम पूरा कर लिया जाता है। मस्जिदों में शामियाने लग जाते हैं। रमज़ान का चांद देखने के साथ ही इशा की नमाज़ के बाद तरावीह पढ़ने का सिलसिला शुरू हो जाता है। रमज़ान के महीने में जमात के साथ क़ियामुल्लैल (रात को नमाज़ पढ़ना) करने को 'तरावीह' कहते हैं। इसका वक्त रात में इशा की नमाज़ के बाद फ़ज्र की नमाज़ से पहले तक है। हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने रमज़ान में क़ियामुल्लैल में बेहद दिलचस्पी ली। आपने फ़रमाया कि ''जिसने ईमान के साथ और अज्र व सवाब (पुण्य) हासिल करने की नीयत से रमज़ान में क़ियामुल्लैल किया उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाएंगे।''उन्होंने फ़रमाया कि ''यह ऐसा महीना है कि इसका पहला हिस्सा अल्लाह की रहमत है, दरमियानी हिस्सा मग़फ़िरत है और आख़िरी हिस्सा जहन्नुम की आग से छुटकारा है।'' रमज़ान के तीसरे हिस्से को अशरा भी कहा जाता है। आपने फ़रमाया कि ''रमज़ान के आख़िरी अशरे की ताक़ (विषम) रातों में लैलतुल क़द्र की तलाश करो।'' लैलतुल क़द्र को शबे-क़द्र भी कहा जाता है। शबे-क़द्र के बारे में कुरआन में कहा गया है कि यह हज़ार रातों से बेहतर है, यानि इस रात में इबादत करने का सवाब एक हज़ार रातों की इबादत के बराबर है। मुसलमान रमज़ान की 21, 23, 25, 27 और 29 तारीख़ को पूरी रात इबादत करते हैं।

फ़रहाना कहती हैं- इस महीने में क़ुरआन नाज़िल हुआ, इसलिए रमज़ान बहुत ख़ास है। हर मुसलमान के लिए यह महीना मुक़द्दस और आला है। हमें इस महीने की अहमियत को समझते हुए ज्यादा से ज्यादा वक्त ऌबादत में गुज़ारना चाहिए। वैसे भी रमज़ान में हर नेकी और इबादत का सवाब साल के दूसरे महीनों से ज्यादा ही मिलता है। वे कहती हैं कि शबे-क़द्र को उनके परिवार के सभी लोग रातभर जागते हैं। मर्द इबादत के लिए मस्जिदों में चले जाते हैं और औरतें घर पर इबादत करती हैं।

वहीं, राशिद कहते हैं कि काम की वजह से पांचों वक्त क़ी नमाज़ नहीं हो पाती, लेकिन रमज़ान में उनकी कोशिश रहती है कि नमाज़ और रोज़ा क़ायम हो सके। दोस्तों के साथ मस्जिद में जाकर तरावीह पढ़ने की बात ही कुछ और है। इस महीने की रौनक़ों को देखकर कायनात की ख़ूबसूरती का अहसास होता है। रमज़ान हमें नेकियां और इबादत करने का सबक़ देता है और हमें अल्लाह के क़रीब करता है।

ज़ायक़ा
माहे-रमज़ान में हर तरफ़ ज़ायक़ेदार व्यंजनों की भरमार रहती है। रमज़ान का ज़िक्र लज़ीज़ व्यंजनों के बग़ैर मुकम्मल नहीं होता। रमज़ान का ख़ास व्यंजन हैं फैनी, सेवइयां और खजला। सुबह सहरी के वक्त फ़ैनी को दूध में भिगोकर खाया जाता है। इसी तरह सेवइयों को दूध और मावे के साथ पकाया जाता है। फिर इसमें चीनी और सूखे मेवे मिलाकर परोसा जाता है। इसके अलावा मीठी डबल रोटी भी सहरी का एक ख़ास व्यंजन है। ख़ास तरह की यह मीठी डबल रोटी अमूमन रमज़ान में ही ज्यादा देखने को मिलती है।

इफ्तार के पकवानों की फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है। अमूमन रोज़ा खजूर के साथ खोला जाता है। दिनभर के रोज़े के बाद शिकंजी और तरह-तरह के शर्बत गले को तर करते हैं। फलों का चाट इफ्तार के का एक अहम हिस्सा है। ताज़े फलों का चाट रोज़े के बाद ताज़गी का अहसास तो कराती ही है, साथ ही यह पौष्टिक तत्वों से भी भरपूर होती है। इसके अलावा ज़ायक़ेदार पकौड़ियां और तले मसालेदार चने भी रोज़ेदारों की पसंद में शामिल हैं। खाने में बिरयानी, नहारी, क़ौरमा, क़ीमा, नरगिसी कोफ्ते, सींक कबाब और गोश्त से बने दूसरे लज़ीज़ व्यंजन शामिल रहते हैं। इन्हें रोटी या नान के साथ खाया जाता है। रुमाली रोटी भी इनके ज़ायके को और बढ़ा देती है। इसके अलावा बाकरखानी भी रमज़ान में ख़ूब खाई जाती है। यह एक बड़े बिस्कुट जैसी होती है और इसे क़ोरमे के साथ खाया जाता है। बिरयानी में हैदराबादी बिरयानी और मुरादाबादी बिरयानी का जवाब नहीं। मीठे में ज़र्दा, शाही टुकड़े, फिरनी और हलवा-परांठा दस्तरख़ान पर की शोभा बढ़ाते हैं।

इशरत जहां कहती हैं कि रमज़ान में यूं तो दिन में ज़्यादा काम नहीं होता, लेकिन सहरी के वक़्त और शाम को काम बढ़ जाता है। इफ़्तार के लिए खाना तो घर में ही तैयार होता है, लेकिन रोटियों की जगह हम बाहर से नान या रुमाली रोटियां मंगाना ज़्यादा पसंद करते हैं।

रमज़ान में रोटी बनाने वालों का काम बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। दिल्ली में जामा मस्जिद के पास रोटी बनाने वालों की कई दुकानें हैं। यहां तरह-तरह की रोटियां बनाई जाती हैं, जैसे रुमाली रोटी, नान, बेसनी रोटी आदि। अमूमन इस इलाके क़े होटल वाले भी इन्हीं से रोटियां मंगाते हैं।

ख़रीददारी
रमज़ान में बाज़ार की रौनक़ को चार चांद लग जाते हैं। रमज़ान में दिल्ली के मीना बाज़ार की रौनक़ के तो क्या कहने। दुकानों पर चमचमाते ज़री वाले व अन्य वैरायटी के कपड़े, नक्क़ाशी वाले पारंपरिक बर्तन और इत्र की महक के बीच ख़रीददारी करती औरतें, साथ में चहकते बच्चे। रमज़ान में तरह-तरह का नया सामान बाज़ार में आने लगता है। लोग रमज़ान में ही ईद की ख़रीददारी शुरू कर देते हैं। आधी रात तक बाज़ार सजते हैं। इस दौरान सबसे ज्यादा कपड़ों की ख़रीददारी होती है। दर्ज़ियों का काम बढ़ जाता है। इसलिए लोग ख़ासकर महिलाएं ईद से पहले ही कपड़े सिलवा लेना चाहती हैं। अलविदा जुमे को भी नए कपड़े पहनकर नमाज़ पढ़ने का दस्तूर है। हर बार नए डिज़ाइनों के कपड़े बाज़ार में आते हैं। नेट, शिफ़ौन, जॉरजेट पर कुन्दन वर्क, सिक्वेंस वर्क, रेशम वर्क और मोतियों का काम महिलाओं को ख़ासा आकर्षित करता है। दिल्ली व अन्य शहरों के बाज़ारों में कोलकाता, सूरत और मुंबई के कपड़ों की धूम रहती है। इसके अलावा सदाबहार चिकन का काम भी ख़ूब पसंद किया जाता है। पुरानी दिल्ली के कपड़ा व्यापारी शाकिर अली कहते हैं कि बाज़ार में जिस चीज़ का मांग बढ़ने लगती है हम उसे ही मंगवाना शुरू कर देते हैं। ईद के महीने में शादी-ब्याह भी ज्यादा होते हैं। इसलिए माहे-रमज़ान में शादी की शॉपिंग भी जमकर होती है। शादियों में आज भी पारंपरिक पहनावे ग़रारे को ख़ासा पसंद किया जाता है।

चूड़ियों और मेहंदी के बिना ईद की ख़रीददारी अधूरी है। रंग-बिरंगी चूड़ियां सदियों से औरतों को लुभाती रही हैं। चूड़ियों के बग़ैर सिंगार पूरा नहीं होता। बाज़ार में तरह-तरह की चूड़ियों की बहार है, जिनमें कांच की चूड़ियां, लाख की चूड़ियां, सोने-चांदी की चूड़िया, और मेटल की चूड़ियां शामिल हैं। सोने की चूड़ियां तो अमीर वर्ग तक ही सीमित हैं। ख़ास बात यह भी है कि आज भी महिलाओं को पारंपरिक कांच की रंग-बिरंगी चूड़ियां ही ज्यादा आकर्षित करती हैं। बाज़ार में कांच की नगों वाली चूड़ियों की भी ख़ासी मांग है। कॉलेज जाने वाली लड़कियां और कामकाजी महिलाएं मेटल और प्लास्टिक की चूड़ियां ज्यादा पसंद करती हैं, क्योंकि यह कम आवाज़ करती हैं और टूटती भी नहीं हैं, जबकि कांच की नाज़ुक चूड़ियां ज्यादा दिनों तक हाथ में नहीं टिक पातीं।

इसके अलावा मस्जिदों के पास लगने वाली हाटें भी रमज़ान की रौनक़ को और बढ़ा देती हैं। इत्र, लोबान और अगरबत्तियों से महक माहौल को सुगंधित कर देती है। इत्र जन्नतुल-फ़िरदौस, बेला, गुलाब, चमेली और हिना का ख़ूब पसंद किया जाता है। रमज़ान में मिस्वाक से दांत साफ़ करना सुन्नत माना जाता है। इसलिए इसकी मांग भी बढ़ जाती है। रमज़ान में टोपियों की बिक्री भी ख़ूब होती है। पहले लोग लखनवी दुपल्ली टोपी ज्यादा पसंद करते थे, लेकिन अब टोपियों की नई वैरायटी पेश की जा रही हैं। अब तो लोग विभिन्न राज्यों की संस्कृतियों से सराबोर पारंपरिक टोपी भी पसंद कर रहे हैं। इसके अलावा अरबी रुमाल भी ख़ूब बिक रहे हैं। रमज़ान के मौक़े पर इस्लामी साहित्य, तक़रीरों, नअत, हम्द,क़व्वालियों की कैसेट सीटी और डीवीडी की मांग बढ़ जाती है।

यूं तो दुनियाभर में ख़ासकर इस्लामी देशों में रमज़ान बहुत श्रध्दा के साथ मनाया जाता है, लेकिन भारत की बात ही कुछ और है। विभिन्न संस्कृतियों के देश भारत में मुसलमानों के अलावा ग़ैर मुस्लिम लोग भी रोज़े रखते हैं। कंवर सिंह का कहना है कि वे पिछले कई वर्षों से रमज़ान में रोज़े रखते आ रहे हैं। रमज़ान के दौरान वे सुबह सूरज निकलने के बाद से सूरज छुपने तक कुछ नहीं खाते। उन्हें विश्वास है कि अल्लाह उनके रोज़ों को ज़रूर क़ुबूल करेगा। भारत देश की यही महानता है कि यहां सभी धर्मों के लोग मिलजुल कर त्योहार मनाते हैं। यही जज्बात गंगा-जमुनी तहज़ीब को बरक़रार रखते हैं।

Sunday, July 24, 2011

वह तो झांसी वाली रानी थी...


टाइम मैगजीन ने भारतीय वीरांगना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को पति के बचाव में दीवार बनकर खड़ी होने वाली दुनिया की 10 जांबाज़  पत्नियों की फ़ेहरिस्त में शामिल किया है. लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर, 1828 को  में वाराणसी हुआ था. उनके पिता का नाम मोरोपंत तांबे और माता का नाम भागीरथी बाई था. उनका बचपन का नाम 'मणिकर्णिका' रखा गया, लेकिन प्यार से मणिकर्णिका को मनु पुकारा जाता था. अपनी मां की मौत के बाद वह पिता के साथ बिठूर आ गई थीं. उसके पिता मोरोपंत तांबे एक साधारण ब्राह्मण और अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय के सेवक थे.बाजीराव मनु को प्यार से छबीली कहते थे.पेशवा बाजीराव के बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक आते थे. मनु भी उन्हीं बच्चों के साथ पढ़ने लगी. मनु ने यहां किताबी शिक्षा के साथ-साथ सैन्य शिक्षा हासिल की. उनका विवाह 1842 में झांसी के राजा गंगाधर राव निवालकर के साथ हुआ था. विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया.  सन 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया,लेकिन  चार महीने बाद उसकी मौत हो गई.  सन 1853 में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ने पर दरबारियों ने उन्हें पुत्र गोद लेने की सलाह दी. अपने ही परिवार के पांच साल के एक बच्चे को उन्होंने गोद लिया और उसे अपना दत्तक पुत्र बनाया. इस बालक का नाम दामोदर राव रखा गया.  पुत्र गोद लेने के बाद राजा गंगाधर राव की दूसरे ही दिन 21 नवंबर 1853 में मौत हो गई. ईस्ट इंडिया कंपनी झांसी का शासन छीन लेना चाहता थी.
 इसलिए अंग्रेजों ने  दत्तक-पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया और रानी के पत्र लिख भेजा कि राजा का अपना कोई पुत्र नहीं है, इसीलिए झांसी पर अब अंग्रेज़ों का अधिकार होगा. लक्ष्मीबाई ने ऐलान कर दिया की वह किसी भी हाल में झांसी पर अंग्रेज़ों का क़ब्ज़ा नहीं होने देंगी. इस पर अंग्रेज़ों झांसी पर हमला कर दिया. झांसी के सेना ने अंग्रेज़ों का मुकाबला किया. अंग्रेज़ सेनापति ह्यूराज ने  कूटनीति का इस्तेमाल कर झांसी के ही एक विश्वासघाती सरदार दूल्हा सिंह को अपने पक्ष में कर लिया. सरदार ने क़िले का दक्षिणी दरवाज़ा खोल दिया, जिससे अंग्रेज़ सेना क़िले में घुस गई और उने क़त्लेआम और लूटपाट शुरू कर दी. यह देख लक्ष्मीबाई ने पुत्र को पीठ से बांधकर क़िले से निकल गई. अंग्रेज़ों ने उसका पीछा किया और उसे ज़ख़्मी कर दिया.  लक्ष्मीबाई के विश्वासपात्र पठान सरदार गौस ख़ान ने रानी को अंग्रेज़ों से बचाया और ग्वालियर स्थित बाबा गंगादास की कुटिया तक ले आया.  18 जून 1858  को रानी ने अंतिम सांस ली. उसी कुटिया में उनका न्तिम संस्कार किया गया. उनके पुत्र दामोदर राव ने मुखाग्नि दी.

रानी लक्ष्मीबाई के अलावा अमेरिका के राष्ट्राध्यक्ष बराक ओबामा की पत्नी मिशेल ओबामा, पूर्व अमेरिकी राष्ट्राध्यक्ष फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट की पत्नी इलानोर रूजवेल्ट, स्पेन की रानी इजाबेल, मिस्र की चर्चित साम्राज्ञी क्लीयोपेट्रा भी इस फ़ेहरिस्त में शामिल हैं. मीडिया मुगल रूपर्ट मडरेक की पत्नी वेंडी डेंग का अपने पति को हमलावर से बचाने के लिए उस पर टूट पड़ने की हाल ही में हुई साहसिक घटना के मद्देनज़र पत्रिका ने 10 ऐसी पत्नियों की फ़ेहरिस्त जारी की है. हालांकि पत्रिका ने इसकी जानकरी नहीं दी है कि किस आधार पर इन महिलायों का चयन किया गया है.

इस फ़ेहरिस्त में झांसी की अरानी लक्ष्मीबाई को  आठवें स्थान पर रखा गया है, जबकि पहले पहले नंबर  पर इलानोर रूजवेल्ट और दूसरे पर स्पेन की रानी इजाबेल हैं. तीसरे पर कार्टर कैश, चौथे पर मिस्र की रानी क्लीयोपेट्रा, पांचवे पर अलास्का की पूर्व गवर्नर साराह पालिन, छठे पर इलेन डी गेनेरेस और पोर्सियो डी रोसी, सातवें पर  मिशेल ओबामा, नौवें पर  मिलिंडा गेट्स बिल गेट्स की पत्नी मिलिंडा गेट्स और दसवें पर वुड्स की पत्नी इलिन नोरड्रेगेन हैं.

Sunday, July 10, 2011

राहुल की मेहनत रंग लाएगी...


फ़िरदौस ख़ान
कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी एक परिपक्व राजनेता हैं. इसके बावजूद उन्हें अमूल बेबी कहना उनके ख़िलाफ़ एक साज़िश का हिस्सा ही कहा जा सकता है. भूमि अधिग्रहण मामले को ही लीजिए. राहुल ने भूमि अधिग्रहण को लेकर जिस तरह पदयात्रा की, वह कोई परिपक्व राजनेता ही कर सकता है. हिंदुस्तान की सियासत में ऐसे बहुत कम नेता रहे हैं, जो सीधे जनता के बीच जाकर उनसे संवाद करते हैं. नब्बे के दशक में बहुजन समाज पार्टी के नेता कांशीराम ने गांव-गांव जाकर पार्टी को मज़बूत करने का काम किया था, जिसका फल बसपा को सत्ता के रूप में मिला. चौधरी देवीलाल ने भी इसी तरह हरियाणा में आम जनता के बीच जाकर अपनी एक अलग पहचान बनाई थी. दक्षिण भारत में भी कई राजनेताओं ने पद यात्रा के ज़रिये जनता मेंअपनी पैठ बनाई और सत्ता हासिल की.

जब भ्रष्टाचार और महंगाई के मामले में कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का चौतरफ़ा विरोध हो रहा है, ऐसे वक़्त में राहुल गांव-गांव जाकर जनमानस से एक भावनात्मक रिश्ता क़ायम कर रहे हैं. राहुल लोगों से मिलने का कोई मौक़ा नहीं छो़ड रहे हैं. बीती पांच जुलाई को वह भट्टा-पारसौल गांव गए. उन्होंने आसपास के गांवों का भी दौरा कर ग्रामीणों से बात की, उनकी समस्याएं सुनीं और उनके समाधान का आश्वासन भी दिया- इससे पहले भी 11 मई की सुबह वह मोटरसाइकिल से भट्टा-पारसौल गांव जा चुके हैं. उस वक़्त मायवती ने उन्हें गिरफ्तार करा दिया था. इस बार भी वह गुपचुप तरीक़े से ही गांव गए. न तो प्रशासन को इसकी ख़बर थी और न ही मीडिया को इसकी भनक लगने दी गई. हालांकि उनके दौरे के बाद प्रशासन सक्रिय हो गया. बीती 29 जून को वह लखीमपुर में पीड़ित परिवार के घर गए और उन्हें इंसाफ़ दिलाने का वादा किया.

भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी द्वारा निकाली गई पदयात्रा से सियासी हलक़ों में चाहे जो प्रतिक्रिया हो रही हो, लेकिन यह हक़ीक़त है कि राहुल गांधी ने ग्रेटर नोएडा के ग्रामीणों के साथ जो वक़्त बिताया, उसे वे कभी नहीं भूल पाएंगे. इन लोगों के लिए यह किसी सौग़ात से कम नहीं है कि उन्हें कांग्रेस के युवराज के साथ वक़्त गुज़ारने का मौक़ा मिला. अपनी पदयात्रा के दौरान पसीने से बेहाल राहुल ने शाम होते ही गांव बांगर के किसान विजय पाल की खुली छत पर स्नान किया. फिर थोड़ी देर आराम करने के बाद उन्होंने घर पर बनी रोटी, दाल और सब्ज़ी खाई. ग्रामीणों ने उन्हें पूड़ी-सब्ज़ी की पेशकश की, लेकिन उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया. गांव में बिजली की क़िल्लत रहती है, इसलिए ग्रामीणों ने जेनरेटर का इंतज़ाम किया, लेकिन राहुल ने पंखा भी बंद करवा दिया. वह एक आम आदमी की तरह ही बांस और बांदों की चारपाई पर सोये. यह कोई पहला मौक़ा नहीं है जब राहुल गांधी इस तरह एक आम आदमी की ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं. इससे पहले भी वह रोड शो कर चुके हैं और उन्हें इस तरह के माहौल में रहने की आदत है. कभी वह किसी दलित के घर भोजन करते हैं तो कभी किसी मज़दूर के  साथ ख़ुद ही परात उठाकर मिट्टी ढोने लगते हैं. राहुल का आम लोगों से मिलने-जुलने का यह जज़्बा उन्हें लोकप्रिय बना रहा है. राहुल जहां भी जाते हैं, उन्हें देखने के लिए, उनसे मिलने के लिए लोगों का हुजूम इकट्ठा हो जाता है. यह भीड़ वोटों में कितना बदल पाती है, यह तो इस बात पर निर्भर करेगा कि राहुल लोगों की समस्याओं को किस हद तक हल करवा पाते हैं.

राहुल समझ चुके हैं कि जब तक वह आम आदमी की बात नहीं करेंगे, तब तक वह सियासत में आगे नहीं ब़ढ पाएंगे. इसके लिए उन्होंने वह रास्ता अख्तियार किया, जो बहुत कम लोग चुनते हैं. वह भाजपा की तरह एसी कल्चर की राजनीति नहीं करना चाहते. राहुल का कहना है कि उन्होंने किसानों की असल हालत को जानने के लिए पदयात्रा शुरू की, क्योंकि दिल्ली और लखनऊ के एसी कमरों में बैठकर किसानों की हालत पर सिर्फ़ तरस खाया जा सकता है, उनकी समस्याओं को न तो जाना जा सकता है और न ही उन्हें हल किया जा सकता है. 

Saturday, May 21, 2011

हिन्दुस्तान का शहज़ादा


हिन्दुस्तान का शहज़ादा

Wednesday, May 11, 2011

खेत में सिंदूर...



बिहार के भागलपुर ज़िले के गांव कजरैली की महिलाएं खेत में सिन्दूर उगा रही हैं...सिन्दूर के इन पौधों के फलों से बीज निकाल कर उन्हें हथेली पर मसलने पर उनमें से सिन्दूरी रंग निकलता है...इसी प्राकृतिक रंग को महिलाएं अपनी मांग में सजा रही हैं...इन महिलाओं  की देखा-देखी आसपास के गांवों की महिलाओं ने भी घरों में सिंदूर के पौधे लगाने शुरू कर दिए हैं...

भारतीय संस्कृति में सिन्दूर का बड़ा महत्व है...सिन्दूर के बिना सुगागन का श्रृंगार मुकम्मल नहीं होता... बाज़ार में बिकने वाले सिन्दूर में केमिकल होने की वजह से  यह त्वचा के लिए नुक़सानदेह माना जाता है... अमेरिका ने अपने देश में सिन्दूर पर पाबंदी लगाते हुए कहा था कि इसमें काफ़ी मात्र में सीसा होता है...और सीसा सेहत के लिए नुक़सानदेह है...सिंदूर लैड ऑक्साइड यानी पारा युक्त पदार्थ को पीसकर बनाया जाता है... सिंदूर पानी में नहीं घुलता और न किसी चीज पर रंग छोड़ता है... यह 400 से 500 रुपये प्रति किलो की दर से बाज़ार में उपलब्ध है...

दूसरी चीज़ों की ही तरह नक़ली सिंदूर भी धड़ल्ले से बाज़ार में बेचा जा रहा है... अरारोट के पाउडर में गिन्नार और नारंगी रंग मिलाया जाता है. फिर इस मिश्रण को छान लिया जाता है...इसके बाद इस सिंदूरी पाउडर को धूप में सुखाया जाता है...और इस तरह नक़ली या सस्ता सिंदूर बनाया जाता है...इसमें सस्ते रंगों का इस्तेमाल किया जाता है, जो त्वचा को नुक़सान पहुंचाते हैं... यह सिंदूर 50 से 60 रुपये प्रति किलो की दर से मिला जाता है... बाज़ार में इस सिंदूर की भारी मांग है... 

Thursday, May 5, 2011

...तो बात ही कुछ और होती

पिछले शनिवार को दिल्ली के हिंदी भवन में हिंदी साहित्य निकेतन ने अपनी पचास वर्ष की विकास यात्रा के उपलक्ष्य में एक समारोह का आयोजन किया... इस समारोह में ब्लॉगरों को सम्मानित भी किया गया... हमें भी इस समारोह के लिए आमंत्रित किया गया... मसरूफ़ियत की वजह से इस तरह के कार्यक्रमों में जाना नहीं हो पाता... दिन-रात बस ख़बरें और सिर्फ़ ख़बरें...वक़्त का पता ही नहीं चल पाता कि कब दोपहर आई और कब शाम हो गई... और जब कभी वक़्त मिलता है तो परिवार और दोस्तों की ही याद आती है... अरसा हो जाता है अपनों से मिले हुए...यह तो भला हो संचार क्रांति का, जिसकी वजह से दुआ-सलाम हो जाया करती है...ख़ैर, शनिवार की शाम को एक मीटिंग में जाना था...सोचा-सोचा दो-दो निमंत्रण पत्र आए हुए हैं...कुछ देर के लिए हिन्दी भवन जाया जाए, वहां कुछ पत्रकार साथियों से मुलाक़ात हो गई...समारोह में क़रीब दस मिनट गुज़ारने के बाद हम बाहर आ गए... 

यहां मुलाक़ात हुई लेखक लक्ष्मण राव जी से... वह हिंदी भवन के बाहर चाय बनाकर अपनी रोज़ी कमा रहे हैं... महाराष्ट्र के अमरावती ज़िले के गांव तडेगांव दशासर में 22 जुलाई 1954 को जन्मे लक्ष्मण राव किसी के लिए भी प्रेरणा स्त्रोत हो सकते हैं...उन्होंने दिल्ली तिमारपुर पत्राचार विद्यालय से उच्चतर माध्यमिक व दिल्ली विश्वविधालय से बीए किया. उन्होंने दसवीं कक्षा पास करके महाराष्ट्र के अमरावती में सूत मिल में काम किया... कुछ वक़्त बाद मिल बंद हो गई. इसके बाद वह गांव चले गए और वहां खेतीबाड़ी करने लगे... यहां उनका मन नहीं लगा और वह भोपाल आ गए और यहां बेलदार का काम करने लगे... यहां भी उनका मन नहीं रमा और फिर उन्होंने दिल्ली आने का फ़ैसला किया... 30 जुलाई 1975 को वह दिल्ली आ गए और दो वक़्त की रोटी के लिए मेहनत मजदूरी करने लगे... 1977 में दिल्ली के आईटीओ के विष्णु दिगम्बर मार्ग पर वह पान और बीड़ी-सिगरेट बेचने लगे. उन्हें शुरू से ही किताबों से बहुत लगाव था... वह दरियागंज में रविवार को लगने वाले पुस्तक बाज़ार में जाते और कई किताबें ले आते... जब भी उन्हें वक़्त मिलता वह किताबें पढ़ते... किताबों के इसी शौक़ ने उन्हें लिखने के लिए प्रेरित किया... 

उन्होंने लिखना शुरू कर दिया...उनका पहला उपन्यास ' नई दुनिया की नई कहानी' 1979 में प्रकाशित हुआ... इसके बाद वह सुर्ख़ियों में आ गए... लोगों को यक़ीन नहीं हो पा रहा था कि पान और बीड़ी-सिगरेट बेचने वाला व्यक्ति भी उपन्यास लिख सकता है... फ़रवरी 1981 में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के संडे रिव्यू में उनका परिचय प्रकाशित हुआ...27 मई, 1984 को तीन मूर्ति भवन में उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलने का मौक़ा मिला... उन्होंने इंदिरा गांधी से उनके जीवन पर किताब लिखने की ख्वाहिश ज़ाहिर की. इस पर इंदिरा गांधी ने उन्हें अपने प्रधानमंत्रित्व काल के बारे में किताब लिखने की सलाह दी... इसके बाद लक्ष्मण राव ने प्रधानमंत्री नामक एक नाटक लिखा. 1982 में उनका उपन्यास रामदास प्रकाशित हुआ... 2001 में नर्मदा (उपन्यास) और 2006 में परंपरा से जुड़ी भारतीय राजनीति नामक किताब प्रकाशित हुई... फिर 2008 में रेणु नामक किताब का प्रकाशन हुआ...

इनके अलावा वह कई और किताबें लिख चुके हैं, जिनमें शिव अरुणा, सर्पदंश, साहिल, पत्तियों की सरसराहट, प्रात: काल, नर्मदा, दृष्टिकोण, अहंकार, समकालीन संविधान, अभिव्यक्ति, मौलिक पत्रकारिता, प्रशासन, राष्ट्रपति (नाटक ) आत्मकथा साहित्य व्यासपीठ और स्वर्गीय राजीव गांधी की जीवनी संयम आदि शामिल है...

भारतीय अनुवाद परिषद सहित क़रीब 11 संस्थाएं उन्हें सम्मानित कर चुकी हैं, जिनमें भारतीय अनुवाद परिषद, कोच लीडरशिप सेंटर, इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती, निष्काम सेवा सोसायटी, अग्निपथ, अखिल भारतीय स्वतंत्र लेखक मंच, शिव रजनी कला कुंज, प्रागैतिक सहजीवन संस्थान, यशपाल जैन स्मृति, चिल्ड्रेन वैली स्कूल, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद शामिल हैं...

वह बताते हैं कि राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने उनका नवीनतम उपन्यास " रेणु" पढ़ने के बाद उन्हें राष्ट्रपति भवन में आमंत्रित किया था...उन्हें इस बात का मलाल है कि उन्हें प्रकाशक नहीं मिला...इसलिए वह ख़ुद ही प्रकाशक बन गए...उन्होंने भारतीय साहित्य कला प्रकाशन शुरू किया... वह यह भी कहते हैं कि प्रकाशक बन्ने के लिए बड़े तामझाम की ज़रूरत नहीं... बस मज़बूत इरादा और लगन होनी चाहिए... वह ख़ुद साइकिल से विभिन्न स्कूलों और कॉलेजों में जाकर अपनी किताबें बेचते हैं... वह अपने नियमित ग्राहकों को हर किताब पर पचास फ़ीसदी की छूट भी देते हैं...

लक्ष्मण जी ने चाय बनाई... हम चाय पी रहे थे...और यहां-वहां की बातें चल रही थीं...कुछ साथी मौजूदा व्यवस्था से परेशान थे...वे एक और बग़ावत पर ज़ोर दे रहे थे...सब अपने-अपने कामों में मसरूफ़ थे...लक्ष्मण जी भी तल्लीनता से आने वालों को चाय बना-बनाकर दे रहे थे... हिन्दी भवन के सभागार से तालियों की आवाज़ें आ रही थीं...उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक पुरस्कार बांट रहे थे... और हम सोच रहे थे कि साहित्य पर भी सियासत और सत्ता ही भारी पड़ती है... काश निशंक की जगह लक्ष्मण राव ब्लॉगरों को सम्मानित कर रहे होते तो बात ही कुछ और होती और तब हम भी हिंदी भवन के बाहर न होकर अंदर रहकर उस खुशनुमा लम्हे को जी रहे होते...

Monday, May 2, 2011

ऑनर किलिंग पर इबरतनाक फ़ैसला...


फ़िरदौस ख़ान
उत्तर प्रदेश में ऑनर किलिंग मामले में दोषी को फांसी की सख्त सज़ा दिए जाने से इस तरह की दिल दहला देने वाली वारदातों पर कुछ अंकुश लगेगा, ऐसी उम्मीद की जा सकती है. इस फ़ैसले ने जहां समाज को यह संदेश दिया है कि क़ानून से ऊपर कुछ भी नहीं है, वहीं  सामाजिक कुरीतियों के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे लोगों का मनोबल भी बढ़ाया है.

क़ाबिले-गौर है कि रामपुर ज़िले के गांव क्रमचा निवासी शौकत सैफ़ी की बेटी नसीम जहां गांव के ही अपने प्रेमी यासीन से निकाह करना चाहती थी. प्रेमी के भुर्जी बिरादरी का होने की वजह से शौकत को यह रिश्ता मंज़ूर नहीं था. इसलिए नसीम पिता का घर छोड़कर प्रेमी के घर चली गई. बाद में शौकत उसे वापस घर लाया और उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन जब वह मानी तो उसे धारदार हथियार से बेटी की गर्दन काट दी और पेट फाड़ डाला. नसीम की मौक़े पर ही मौत हो गई थी. यह मामला 19 जून 2009 का है. अपर सत्र न्यायाधीश कामिनी पाठक ने अपने फैसले में चिंता ज़ाहिर करते हुए कहा कि बेटियां घर में ही सुरक्षित नहीं हैं और बेटी की हत्या करना बर्बरतापूर्ण कृत्य है. ऐसा करने वाले को फांसी देना ज़रूरी है.    

इससे पहले बीती मई में दिल्ली की एक अदालत ने ऑनर किलिंग को संपूर्ण नारीत्व के सम्मान पर हमला क़रार देते हुए एक ही परिवार के तीन सदस्यों को फांसी की सज़ा सुनाई थी. मामले के मुताबिक़ 1516 अक्टूबर 2007 को उर्मिला की तीन नाबालिग बच्चों की आंखों के सामने उसके पति सुरेंदर सिंह, सास और देवर ने हत्या कर दी थी. 

इसी तरह  इसी तरह बीते माह मई में सुप्रीम कोर्ट ने 'ऑनर किलिंग' के मामले में सुनवाई करते हुए कहा था कि इज़्ज़त के नाम पर हो रही हत्या राष्ट्र पर कलंक है और यह बर्बर और सामंती प्रथा है जिसे ख़त्म किया जाना चाहिए. उसने सभी अदालतों को निर्देश दिए कि ऑनर किलिंग को दुर्लभतम मामलों की श्रेणी में रखा जाना चाहिए और मौत की सज़ा देनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसा असभ्य व्यवहार करने वालों के लिए ऐसे उपाय ज़रूरी हैं. जो भी व्यक्ति ऑनर किलिंग का षडयंत्र रचने जा रहा है उसे अंदाज़ा होना चाहिए कि फांसी का तख़्ता उसका इंतज़ार कर रहा है.

मामले के मुताबिक़ भगवान दास की अपनी बेटी से बहुत नाराज़ थे, क्योंकि उसने अपने पति को छोड़ दिया था और उसने अपने एक चचेरे भाई से संबंध बना लिए थे. इसकी वजह से 16 मई, 2006 को बिजली के तार से गला घोंटकर अपनी बेटी की हत्या कर दी थी. इस मामले में हाईकोर्ट ने उसे उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई थी. हाईकोर्ट के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फ़ैसले को बरक़रार रखा और भगवान दास के इस तर्क को ख़ारिज कर दिया कि केवल परिस्थिति जन्य साक्ष्य के आधार पर सज़ा नहीं दी जा सकती.

बीते अप्रैल माह में भी सुप्रीम कोर्ट ने ऑनर किलिंग या इज्ज़त के नाम पर हत्याओं के ख़िलाफ़ सख़्त रूख अपनाते हुए कहा था कि इस कुप्रथा को बिना किसी रियायत के जड़ से उखाड़ फेंकना होगा.

पिछले साल हरियाणा के करनाल के सत्न न्यायालय ने मनोज-बबली हत्याकांड के पांच दोषियों को फांसी और एक को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई थी. अदालत ने 25 मार्च को इस मामले में तथाकथित खाप नेता गंगा राज और बबली के पांच परिजनों को क़त्ल का कसूरवार ठहराया था. कैथल ज़िले के करोडन गांव के मनोज ने क़रीब तीन साल पहले 18 मई 2007 को बबली के घरवालों के विरोध के बावजूद उससे शादी की थी. दोनों के समान गोत्न का होने के कारण खाप पंचायत ने इस विवाह का विरोध किया और मनोज के परिवार के सामाजिक बहिष्कार का फैसला सुना दिया. शादी के बाद मनोज और बबली करनाल में जाकर रहने लगे, लेकिन अब भी उनकी मुसीबतें अब भी कम नहीं उन्हें शादी तोड़ने के लिए कहा जाने लगा. जब उन्होंने इनकार कर दिया तो उन्हें धमकियां मिलने लगीं और 15 जून 2007 को उनकी बेरहमी से ह्त्या कर दी गई थी. इनके शव बाद में 23 जून को बरवाला ब्रांच नहर से बरामद हुए थे. क़रीब तीन साल तक चले इस मामले में लगभग 50 सुनवाइयां हुईं तथा इस दौरान 40 से ज्यादा गवाहों के बयान दर्ज किए गए थे.

प्राचीनकाल से ही भारत में सामाजिक, राजनीतिक अन्य मामलों में पंचायत की अहम भूमिका रही है. पहले हर छोटे बड़े फ़ैसले पंचायत के ज़रिये ही निपटाए जाते थे. गांवों में आज भी पंचायतों का बोलबाला है. पंचायतों दो प्रकार की होती हैं. एक लोकतांत्रिक प्रणाली द्वारा चुनी गई पंचायतें और दूसरी खाप पंचायतें. दरअसल, खाप या सर्वखाप एक सामाजिक प्रशासन की पद्धति है, जो भारत के उत्तर पश्चिमी प्रदेशों यथा उत्तर भारत विशेषकर हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में प्रचलित हैं. ये पंचायतें पिछले काफ़ी वक़्त से अपने के फ़ैसलों को लेकर सुर्ख़ियों में रही हैं. बानगी देखिये :

20 मार्च 1994 को झज्जर ज़िले के नया गांव में मनोज आशा को मौत की सज़ा मिली. परिजनों ने खाप पंचायतों की हरी झंडी मिलने के बाद दोनों प्रेमियों को मौत की नींद सुला दिया. वर्ष 1999 में भिवानी के देशराज निर्मला को पंचायत के ठेकेदारों को ठेंगा दिखाकर प्रेम-प्रसंग जारी रखने की क़ीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी. दोनों की पत्थर मारकर हत्या कर दी गई.  

वर्ष 2000 में झज्जर ज़िले के जोणधी गांव में हुई पंचायत ने आशीष दर्शना को भाई-बहन का रिश्ता क़ायम करने का फ़रमान सुनाया, जबकि उनका एक बच्चा भी था. वर्ष 2003 में जींद ज़िले के रामगढ़ गांव में दलित युवती मीनाक्षी ने सिख समुदाय के लड़के से प्रेम विवाह कर लिया. चूंकि क़दम लड़की ने बढ़ाया था,

लिहाज़ा उसे पंचायती लोगों ने मौत की सज़ा सुना दी. साहसी प्रेमी जोड़े ने कोर्ट की शरण लेकर विवाह तो कर लिया, लेकिन उन्हें दूसरे राज्य में जाकर गुमनामी की जिंदगी गुज़ारनी पड़ी. वर्ष 2005 के दौरान झज्जर ज़िले के आसंडा गांव में रामपाल सोनिया को भी पति-पत्नी से भाई-बहन बनने का फ़रमान सुना दिया. राठी दहिया गोत्र के बीच अटका यह मामला भी लंबा खिंचा. आख़िर  रामपाल को अदालत की शरण लेनी पड़ी. क़रीब पौने तीन साल की अदालती लड़ाई के बाद रामपाल की जीत हुई, लेकिन खाप पंचायतों का खौफ़ उन्हें आज भी है. 

करनाल ज़िले के बल्ला गांव में भी 9 मई 2008 को एक प्रेमी जोड़े को पंचायत के ठेकेदारों की शह पर मौत के घात उतार दिया गया. जस्सा सुनीता भी एक ही गोत्र से थे. दोनों ने पंचायत की परवाह करते हुए शादी कर ली, मगर कुछ समय बाद ही दोनों की बेरहमी से हत्या कर दी गई.

अप्रैल 2009 के दौरान कैथल ज़िले के करोड़ गांव में विवाह रचाने वाले मनोज बबली को मौत की नींद सुला दिया गया. दोनों एक ही गोत्र के थे. उन्हें बुरा अंजाम भुगतने की धमकी दी गई थी, लेकिन इसकी परवाह करते हुए उन्होंने विवाह कर लिया था. बाद में दोनों को बस से उतारकर मार दिया गया.

अप्रैल 2009 के दौरान कैथल ज़िले के करोड़ गांव में विवाह रचाने वाले मनोज बबली को मौत की नींद सुला दिया गया. दोनों एक ही गोत्र के थे. उन्हें बुरा अंजाम भुगतने की धमकी दी गई थी, लेकिन इसकी परवाह करते हुए उन्होंने विवाह कर लिया था. बाद में दोनों को बस से उतारकर मार दिया गया. हिसार ज़िले के मतलौडा गांव में मेहर और सुमन की प्रेम करने की चेतावनी दी गई. कई दिनों तक लुका-छिपी चलती रही, लेकिन आख़िर में उन्हें भी मौत की नींद सुला दिया गया.  नारनौल ज़िले के गांव बेगपुर में गोत्र विवाद के चलते युवक के परिवार का हुक्का-पानी बंद कर दिया गया. बाद में पंचायत ने फ़ैसला सुनाया कि नवदंपत्ति को सदैव के लिए गांव छोड़ना होगा. आख़िर विजय अपनी पत्नी रानी को लेकर हमेशा के लिए गांव से चला गया. जुलाई 2009 के दौरान जींद जिले के गांव सिंहवाल में अपनी पत्नी को लेने पहुंचे वेदपाल की कोर्ट के वारंट अफसर पुलिस की मौजूदगी में पीट-पीट कर हत्या कर दी गई. मट्टौर निवासी वेदपाल पर पंचायत ने आरोप लगाया था कि उसने गोत्र के ख़िलाफ़ जाकर सोनिया से शादी की है. 

झज्जर ज़िले के सिवाना गांव में भी अगस्त 2009 में गांव के ही युवक-युवती का प्रेम-प्रसंग पंचायत को बुरा लगा. एक दिन दोनों के शव पेड़ पर लटकते मिले. रोहतक ज़िले के खेड़ी गांव में शादी के साल बाद सतीश कविता को भाई-बहन बनने का फ़रमान सुना दिया गया. पति-पत्नी को अलग कर दिया गया और युवक के पिता आज़ाद सिंह के मुंह में जूता ठूंसा गया था. उनका एक बच्चा भी है. इस मुद्दे पर हाईकोर्ट ने स्वयं संज्ञान लेते हुए सरकार को नोटिस जारी किया था. अदालत ने 11 फ़रवरी को उन पंचायतियों के नाम मांगे हैं, जिन्होंने यह फ़तवा जारी किया था. इस संबंध में कविता ने एसपी अनिल राव को शिकायत भी दर्ज करा दी थी. पुलिस ने विभिन्न धाराओं के तहत मामला भी दर्ज कर लिया है. हालांकि पुलिस ने अभी तक आरोपियों के नाम उजागर नहीं किए हैं. हालांकि पांच फरवरी को बेरवाल-बैनीवाल खाप की सांझा पंचायत के बाद सतीश-कविता का रिश्ता बहाल कर दिया था. जूता मुंह में दिए जाने की भी निंदा की गई थी. इस पंचायत ने भी कविता के गांव खेड़ी में प्रवेश पर रोक लगाई है. इस पंचायत ने कविता द्वारा पुलिस को की गई शिकायत वापस लेने के भी कहा था. दोनों पक्षों ने बेरवाल-बैनीवाल खाप पंचायत के फ़ैसले को स्वीकार करने की घोषणा कर दी थी. इसके बावजूद हाईकोर्ट के दख़ल के कारण इस मुद्दे पर अभी असंमजस की स्थिति बनी हुई है. इस माले में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस मुकुल मुदगल जस्टिस जसबीर सिंह की खंडपीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा था-खाप पंचायतों को इस तरह का कोई अधिकार नहीं है कि वे किसी दंपत्ति को भाई-बहन बना दें और जो उसके आदेश का पालन करे, उसे मौत के घाट उतार दें.

यह एक सामाजिक बुराई है. इन खाप पंचायतों को समानांतर न्याय पालिका चलाने की अनुमति नहीं दी जा सकती. वैसे खाप पंचायतों द्वारा दिए गए फ़ैसलों के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट की खंडपीठ का रुख़ सदा कड़ा ही रहा है. इस मामले में पहले भी हाईकोर्ट हरियाणा सरकार से यह पूछ चुका है कि वह क़ानून के ख़िलाफ़ काम करने वाली तुगलकी फ़रमान जारी करने वाली खाप पंचायतों के ख़िलाफ़ कार्रवाई क्यों नहीं कर रही. हाईकोर्ट ने कहा था कि इन पंचायतों द्वारा इस तरह के आदेश जारी करना गैर क़ानूनी है. इस तरह के आदेश कंगारू ला की तरह हैं और उनको रोकना ज़रूरी है. यह अफ़गानिस्तान नही है, यह भारत है. यहां पर तालिबान कोर्ट को मान्यता नहीं दी जा सकती. चीफ जस्टिस ने यह बात उस वकील को कही थी जिसने कोर्ट में एक जवाब दाख़िल कर खाप पंचायतों के क़दम उनकी कार्रवाई को सही ठहराया था.


क़ाबिले-गौर है कि इस तरह के मुद्दे हमेशा से ही सरकार के लिए भी परेशानी का सबब बने हैं, क्योंकि वोट बैंक के चलते सियासी दल इन मामलों से दूर ही रहते हैं. राज्य में क़रीब 22 फ़ीसदी जाट वोट बैंक है. यही वजह कि राज्य सरकार किसी की भी हो खाप पंचायतों के आगे घुटने टेकती है. यही वजह है कि मौत तक के फ़रमान जारी हुए और उन पर अमल हुआ. पुलिस को गवाह तक ढूंढना मुश्किल होता है. ऊपर से सियासी दबाव अलग काम करता है. इसलिए  खाप पंचायतों की तानाशाही के सामने प्रशासन भी बेबस नज़र आता है. हरियाणा में इन पंचायतों का इतना खौफ़ है कि पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में परिजनों से जान का ख़तरा बताने वाले प्रेमी जोड़ों की याचिकाओं की तादाद दिनोदिन बढ़ रही है. पिछले साल 3739 याचिकाएं हाईकोर्ट में आईं और इस साल अभी 28 याचिकाएं चुकी हैं, जिनमें अपने परिजनों से ही जान का ख़तरा बताते हुए सुरक्षा की गुहार लगाई गई है.  खाप पंचायतों के फ़ैसले से आहत हुए सतीश और कविता का कहना था कि शादी के तीन साल बाद उन्हें भाई-बहन बनने के लिए कहा जा रहा है. मेरे ससुर के मुंह में जूता डाला जाता है, बेटे रौनक के 'दादा' को 'नाना' बनने के लिए कहा जाता है. खाप पंचायतों के फ़रमानों का ख़ामियाज़ा भुगतने वाले झज्जर के आसंडा निवासी रामपाल सोनिया का कहना था कि वक़्त के साथ पंचायतों को बदलना होगा. पंचायत ने हम दोनों को शादी के बाद भाई-बहन बनने का फ़रमान जारी कर दिया था. खाप पंचायतों के प्रतिनिधि परंपराओं के नाम पर ख़ुद के अहं को ऊपर रखते हैं.

उधर, खाप पंचायतों के प्रतिनिधि के भी ख़ुद को सही बताते हुए अनेक तर्क देते हैं. उनका कहना है कि हिन्दू मेरिज एक्ट में संशोधन होना चाहिए और एक गोत्र तथा एक गांव में शादी को क़ानून अनुमति नहीं मिलनी चाहिए. सर्व खाप महम चौबीसी के प्रधान रणधीर सिंह कहते हैं हिन्दू मेरिज एक्ट में ख़ासकर उत्तर हरियाणा की परंपराओं का कोई उल्लेख नहीं है. उन्हें प्रेम करने वालों से ऐतराज़ नहीं है, लेकिन जहां भाई-बहन का रिश्ता माना जाता है वहां पति-पत्नी का संबंध जोड़ना उचित नहीं है. इसलिए इससे बचा जाना चाहिए. अलग-अलग गांवों के युवा शादी करते हैं तो उन्हें दिक्क़त नहीं है. उन्होंने कहा कि सतीश और कविता के मामले में खाप पंचायत ने नरमी दिखाई है.

गौरतलब है कि गैर सरकारी संगठन लायर फार ह्यूमन राइट इंटरनेशनल ने हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दाख़िल कर खाप पंचायतों द्वारा गैर क़ानूनी तानाशाही आदेश जारी करने के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने इन खाप पंचायतों पर रोक लगाने की मांग की है. साथ ही याचिका में कहा गया है कि सिंगवाल नरवाना में खाप पंचायत द्वारा मारे गए युवक वेदपाल के मामले की जांच के लिए वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी की अगुवाई में एक एसआईटी बनाई जाए जो हाईकोर्ट की निगरानी में काम करे. इस मामले की सुनवाई के लिए एक स्पेशल कोर्ट भी बनाई जाए जो इस मामले में शामिल लोगों को जल्दी सज़ा दे सके. बहरहाल, खाप पंचायतों की तानाशाही फ़रमानों से परेशान प्रेमी जोड़ों को आस बंधी है कि वो ख़ुशी-ख़ुशी अपनी ज़िंदगी बसर कर सकते हैं.

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से उन लोगों को कुछ सबक ज़रूर मिलेगा, जो इज्ज़त के नाम पर महिलाओं पर ज़ुल्म ढहाते हैं.