Tuesday, September 14, 2010

हिन्दी दिवस की रस्म अदायगी

फ़िरदौस ख़ान
देश की आज़ादी को छह दशक से भी ज़्यादा का वक़्त बीत चुका है। इसके बावजूद अभी तक हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा हासिल नहीं हो पाया है। यह बात अलग है कि हर साल 14 सितंबर को हिन्दी दिवस पर कार्यक्रमों का आयोजन कर रस्म अदायगी कर ली जाती है। हालत यह है कि कुछ लोग तो अंग्रेज़ी में भाषण देकर हिन्दी की दुर्दशा पर घड़ियाली आंसू बहाने से भी नहीं चूकते।

हिन्दी दिवस 14 सितंबर को राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय के तत्वावधान में नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में हिंदी दिवस समारोह का आयोजन किया जा रहा है। समारोह में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी वर्ष 2008-09 के लिए राजीव गांधी ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार, हिंदी में मौलिक पुस्तक लेखन के लिए इंदिरा गांधी राजभाषा पुरस्कार 2008-09 तथा केन्द्रीय सरकार के कार्यालयों को हिंदी में किए गए उत्कृष्ट कार्य के लिए पुरस्कार और हिंदी गृह पत्रिका पुरस्कार 2009-10 प्रदान करेंगे। इस अवसर पर शील्ड/प्रमाण पत्र तथा नकद राशि के रूप में कुल 53 पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे। अधिकारियों का दावा है कि संविधान सभा द्वारा हिंदी को राजभाषा के रूप में घोषित किए जाने की 61वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम से 90 संघ की राजभाषा नीति के सफ़ल कार्यान्वयन के लिए उत्साहवर्धक वातावरण बनाने और उसे क़ायम रखने के लिए मदद मिलेगी।

गौरतलब है कि संवैधानिक रूप से हिन्दी भारत की प्रथम राजभाषा है। यह देश की सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है। इतना ही नहीं चीनी के बाद हिन्दी दुनियाभर में सबसे ज़्यादा बोली और समझी जाती है। भारत में उत्तर और मध्य भागों में हिन्दी बोली जाती है, जबकि विदेशों में फ़िज़ी, गयाना, मॉरिशस, नेपाल और सूरीनाम के कुछ बाशिंदे हिन्दी भाषी हैं। एक अनुमान के मुताबिक़ दुनियाभर में क़रीब 60 करोड़ लोग हिन्दी बोलते हैं।

देश में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा होने के बाद भी हिन्दी राष्ट्रीय भाषा नहीं बन पाई है। हिन्दी हमारी राजभाषा है। राष्ट्रीय और आधिकारिक भाषा में काफ़ी फ़र्क है। जो भाषा किसी देश की जनता, उसकी संस्कृति और इतिहास को बयान करती है, उसे राष्ट्रीय भाषा कहते हैं। मगर जो भाषा कार्यालयों में उपयोग में लाई जाती है, उसे आधिकारिक भाषा कहा जाता है। इसके अलावा अंग्रेज़ी को भी आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है।

संविधान के अनुचछेद-17 में इस बात का ज़िक्र है कि आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा नहीं माना जा सकता है। भारत के संविधान के मुताबिक़ देश की कोई भी अधिकृत राष्ट्रीय भाषा नहीं है। यहां 23 भाषाओं को आधिकारिक भाषा के तौर पर मंज़ूरी दी गई है। संविधान के अनुच्छेद 344 (1) और 351 के मुताबिक़ भारत में अंग्रेज़ी सहित 23 भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें आसामी, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू शामिल हैं। ख़ास बात यह भी है कि राष्ट्रीय भाषा तो आधिकारिक भाषा बन जाती है, लेकिन आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा बनाने के लिए क़ानूनी तौर पर मंज़ूरी लेना ज़रूरी है। संविधान में यह भी कहा गया है कि यह केंद्र का दायित्व है कि वह हिन्दी के विकास के लिए निरंतर प्रयास करे। विभिन्नताओं से भरे भारतीय परिवेश में हिन्दी को जनभावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनाया जाए।

भारतीय संविधान के मुताबिक़ कोई भी भाषा, जिसे देश के सभी राज्यों द्वारा आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया गया हो, उसे राष्ट्रीय भाषा का दर्जा गया है। मगर हिन्दी इन मानकों को पूरा नहीं कर पा रही है, क्योंकि देश के सिर्फ़ 10 राज्यों ने ही इसे आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया है, जिनमें बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश शामिल है। इन राज्यों में उर्दू को सह-राजभाषा का दर्जा दिया गया है। उर्दू जम्मू-कश्मीर की राजभाषा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 में हिन्दी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है। संविधान के लिए अनुच्छेद 351 के तहत हिन्दी के विकास के लिए विशेष प्रावधान किया गया है।

ग़ौरतलब है कि देश में 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ था। देश में हिन्दी और अंग्रेज़ी सहित 18 भाषाओं को आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है, जबकि यहां क़रीब 800 बोलियां बोली जाती हैं। दक्षिण भारत के राज्यों ने स्थानीय भाषाओं को ही अपनी आधिकारिक भाषा बनाया है। दक्षिण भारत के लोग अपनी भाषाओं के प्रति बेहद लगाव रखते हैं, इसके चलते वे हिन्दी का विरोध करने से भी नहीं चूकते। 1940-1950 के दौरान दक्षिण भारत में हिन्दी के ख़िलाफ़ कई अभियान शुरू किए गए थे। उनकी मांग थी कि हिन्दी को देश की राष्ट्रीय भाषा का दर्जा न दिया जाए।

संविधान सभा द्वारा 14 सितम्बर, 1949 को सर्वसम्मति से हिंदी को संघ की राजभाषा घोषित किया गया था। तब से केन्द्रीय सरकार के देश-विदेश स्थित समस्त कार्यालयों में प्रतिवर्ष 14 सितम्बर हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसीलिए हर साल 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के मुताबिक़ भारतीय संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपी देवनागरी होगी। साथ ही अंकों का रूप अंतर्राष्टीय्र स्वरूप यानी 1, 2, 3, 4 आदि होगा। संसद का काम हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में किया जा सकता है, मगर राज्यसभा या लोकसभा के अध्यक्ष विशेष परिस्थिति में सदन के किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमति दे सकते हैं। संविधान के अनुच्छोद 120 के तहत किन प्रयोजनों के लिए केवल हिन्दी का इस्तेमाल किया जाना है, किन के लिए हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं का इस्तेमाल ज़रूरी है और किन कार्यों के लिए अंग्रेज़ी भाषा का इस्तेमाल किया जाना है। यह राजभाषा अधिनियम 1963, राजभाषा अधिनियम 1976 और उनके तहत समय-समय पर राजभाषा विभाग गृह मंत्रालय की ओर से जारी किए गए दिशा-निर्देशों द्वारा निर्धारित किया गया है।

पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के चलते अंग्रेज़ी भाषा हिन्दी पर हावी होती जा रही है। अंग्रेज़ी को स्टेट्स सिंबल के तौर पर अपना लिया गया है। लोग अंग्रेज़ी बोलना शान समझते हैं, जबकि हिन्दी भाषी व्यक्ति को पिछड़ा समझा जाने लगा है। हैरानी की बात तो यह भी है कि देश की लगभग सभी बड़ी प्रतियोगी परीक्षाएं अंग्रेज़ी में होती हैं। इससे हिन्दी भाषी योग्य प्रतिभागी इसमें पिछड़ जाते हैं। अगर सरकार हिन्दी भाषा के विकास के लिए गंभीर है तो इस भाषा को रोज़गार की भाषा बनाना होगा। आज अंग्रेज़ी रोज़गार की भाषा बन चुकी है। अंग्रेज़ी बोलने वाले लोगों को नौकरी आसानी से मिल जाती है। इसलिए लोग अंग्रेज़ी के पीछे भाग रहे हैं। आज छोटे क़स्बों तक में अंग्रेज़ी सिखाने की 'दुकानें' खुल गई हैं। अंग्रेज़ी भाषा नौकरी की गारंटी और योग्यता का 'प्रमाण' बन चुकी है। अंग्रेज़ी शासनकाल में अंग्रेज़ों ने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए अंग्रेज़ियत को बढ़ावा दिया, मगर आज़ाद देश में मैकाले की शिक्षा पध्दति को क्यों ढोया जा रहा है, यह समझ से परे है।

हिन्दी के विकास में हिन्दी साहित्य के अलावा हिन्दी पत्रकारिता का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इसके अलावा हिन्दी सिनेमा ने भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा दिया है। मगर अब सिनेमा की भाषा भी 'हिन्गलिश' होती जा रही है। छोटे पर्दे पर आने वाले धारावाहिकों में ही बिना वजह अंग्रेज़ी के वाक्य ठूंस दिए जाते हैं। हिन्दी सिनेमा में काम करके अपनी रोज़ी-रोटी कमाने वाले कलाकार भी हर जगह अंग्रेज़ी में ही बोलते नज़र आते हैं। आख़िर क्यों हिन्दी को इतनी हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है? यह एक ज्वलंत प्रश्न है।

अधिकारियों का दावा है कि हिन्दी राष्ट्रभाषा, संपर्क भाषा, जनभाषा के सोपानों को पार कर विश्व भाषा बनने की ओर अग्रसर है, मगर देश में हिन्दी की जो हालत है, वो जगज़ाहिर है। साल में एक दिन को ‘हिन्दी दिवस’ के तौर पर माना लेने से हिंदी का भला होने वाला नहीं है। इसके लिए ज़रूरी है कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए ज़मीनी स्तर पर ईमानदारी से काम किया जाए।

11 Comments:

पी.सी.गोदियाल said...

"संविधान के अनुचछेद-17 में इस बात का ज़िक्र है कि आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा नहीं माना जा सकता है। भारत के संविधान के मुताबिक़ देश की कोई भी अधिकृत राष्ट्रीय भाषा नहीं है। यहां 23 भाषाओं को आधिकारिक भाषा के तौर पर मंज़ूरी दी गई है। संविधान के अनुच्छेद 344 (1) और 351 के मुताबिक़ भारत में अंग्रेज़ी सहित 23 भाषाएं बोली जाती हैं, "

बिलकुल, हिन्दी के बारे अच्छी बाते उजागर की आपने फिरदौस जी ! बड़ी-बड़ी बातों का दम भरने वाला यह १२५ करोड़ का देश, और एक राष्ट्र भाषा नहीं घोषित कर सका सिर्फ इस डर से कि इस देश में रहने वाले भिन्न भिन्न भाषाओं के स्वार्थी खानाबदोस नाराज न हो जाए ! तरस आता है अपने सम्विधान निर्माताओं की मानसिकता पर !

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

हिंदी भाषा पर बहुत सार्थक और सटीक लेख ...अच्छी जानकारी देता हुआ ...

जब तक हिंदी को जीविकोपार्जन से नहीं जोड़ा जायेगा तब तक अपने ही देश में इसकी ऐसी ही दशा रहेगी ...वैसे अब कुछ परीक्षाएं हिंदी में भी होने लगी हैं ...फिर भी अंग्रेज़ी का वर्चस्व बना हुआ है ..इससे कोई इनकार नहीं कर सकता ...

(साल में एक दिन को ‘हिन्दी दिवस’ के तौर पर माना लेने से हिंदी का भला होने वाला नहीं है। इसके लिए ज़रूरी है कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए ज़मीनी स्तर पर ईमानदारी से काम किया जाए।)
इस बात से सहमत ...

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

संघ लोक सेवा आयोग के बाहर कई वर्षॊं से एक धरना अनवरत चल रहा था. इस समय का पता नहीं. अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म करने के लिये. लेकिन हुआ क्या. सबकी आंखों पर अंग्रेजियत की पट्टी बंधी है. चलिये हिन्दी डे सेलीब्रेट कीजिये.

arvind said...

acchhi jaankaari...badhiya post...mujhe lagta hai sarkaari vibhaagon me yedi hindi anivaarya kar diya jaaye...to hindi sachmuch raastrabhaashaa kaa darjaa paa legi.

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ा ही ज्ञानपरक लेख

प्रदीप श्रीवास्तव said...

bahut sundar jankari,badhai

प्रतुल said...

वैदिक से लौकिक संस्कृत धीरे-धीरे
प्राकृत में बदली हुई विखंडित जी रे.
पहली प्राकृत पाली का नाम कहायी.
दूजे में प्राकृत कई रूप ले आयी.
शौरसेनि की ब्रज मागधि की अवधी.
अपभ्रंश बनी जैसे ही भाषा बिगड़ी.
डिंगल-पिंगल मैथिल बुन्देली नोजी.
छतीसगड़ी भाषाएँ पुरिया भोजी.
हिन्दी कुटुंब में ही ये रहने वाली.
क कन्नौजी ख खड़ीबोली ग गढ़वाली.
घ घुमक्कड़ी *डं डं डं डं डं डंउरिया.
च च्म्बाली छत्तीसगढ़ी जयपुरिया.
झ से होती झाँसी कमिश्नरी *यं याँली.
ट टक्क टिकारी ड डोगरी ढ, ण खाली.

* मुझसे घ के बाद वाला और झ के बाद वाला वर्ण नहीं लिखा जा रहा. है. कृपया डं और यं को क्रमशः कवर्ग और चवर्ग के अनुस्वार समझें.
यह हिंदी भाषा के लिये लिखे श्रेष्ठ लेख पर मेरी पहली काव्यांजली.

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

बहुत अच्छा लेख.

Nityanand Gayen said...

congratulations

सुबीर रावत said...

हिंदी दिवस की तो सभी ही रस्में अदा कर रहे हैं, गंभीर कोई नहीं है. न सरकार, न संघटन और न ही मीडिया. मीडिया किस तरह हिंदी का प्रयोग करता है आप जानती ही है -
"----सभी ट्रेनें लेट चल रही है----", "-----एयरपोर्टों पर सुरक्षा बढ़ा दी गयी है------" अभी हाल ही में टीवी पर न्यूज़ flash हो रही थी- "अफगानिस्तान में वोटों की मतगणना" गोया कि मतगणना किसी और चीजों की भी की जा सकती हो.
तो फिर साल में एक दिन 'हिंदी दिवस' के रूप में मना कर औपचारिकता निभा दी जाती है. गलत कहाँ है ?

सुबीर रावत said...

हिंदी दिवस की तो सभी ही रस्में अदा कर रहे हैं, गंभीर कोई नहीं है. न सरकार, न संघटन और न ही मीडिया. मीडिया किस तरह हिंदी का प्रयोग करता है आप जानती ही है -
"-----सभी ट्रेनें लेट चल रही है------", "-----एयरपोर्टों पर सुरक्षा बढ़ा दी गयी है------" अभी हाल ही में टीवी पर न्यूज़ flash हो रही थी "----अफगानिस्तान में वोटों की मतगणना---" गोया कि मतगणना किसी और चीजों की भी की जा सकती हो.
तो फिर साल में एक दिन 'हिंदी दिवस' के रूप में मना कर औपचारिकता निभा दी जाती है. गलत कहाँ है ?

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