Friday, June 18, 2010

दो जून की रोटी को मोहताज सांस्कृतिक दूत ये सपेरे




-फ़िरदौस ख़ान
भारत विभिन्न संस्कृतियों और परंपराओं का देश है. प्राचीन संस्कृति के इन्हीं रंगों को देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में बिखेरने में सपेरा जाति की अहम भूमिका रही है, लेकिन सांस्कृतिक दूत ये सपेरे सरकार, प्रशासन और समाज के उपेक्षित रवैये की वजह से दो जून की रोटी तक को मोहताज हैं.

देश के सभी हिस्सों में सपेरा जाति के लोग रहते हैं. सपेरों के नाम से पहचाने जाने वाले इस वर्ग में अनेक जातियां शामिल हैं. भुवनेश्वर के समीपवर्ती गांव पद्मकेश्वरपुर एशिया का सबसे बड़ा सपेरों का गांव माना जाता है. इस गांव में सपेरों के क़रीब साढ़े पांच सौ परिवार रहते हैं और हर परिवार के पास कम से कम दस सांप तो होते ही हैं. सपेरों ने लोक संस्कृति को न केवल पूरे देश में फैलाया, बल्कि विदेशों में भी इनकी मधुर धुनों के आगे लोगों को नाचने के लिए मजबूर कर दिया. सपेरों द्वारा बजाई जाने वाली मधुर तान किसी को भी अपने मोहपाश में बांधने की क्षमता रखती है.

डफली, तुंबा और बीन जैसे पारंगत वाद्य यंत्रों के जरिये ये किसी को भी सम्मोहित कर देते हैं. प्राचीन कथनानुसार भारतवर्ष के उत्तरी भाग पर नागवंश के राजा वासुकी का शासन था. उसके शत्रु राजा जन्मेजय ने उसे मिटाने का प्रण ले रखा था. दोनों राजाओं के बीच युध्द शुरू हुआ, लेकिन ऋषि आस्तिक की सूझबूझ पूर्ण नीति से दोनों के बीच समझौता हो गया और नागवंशज भारत छोड़कर भागवती (वर्तमान में दक्षिण अमेरिका) जाने पर राजी हो गए. गौरतलब है कि यहां आज भी पुरातन नागवंशजों के मंदिरों के दुर्लभ प्रमाण मौजूद हैं.

स्पेरा परिवार की कस्तूरी कहती हैं कि इनके बच्चे बचपन से ही सांप और बीन से खेलकर निडर हो जाते हैं. आम बच्चों की तरह इनके बच्चों को खिलौने तो नहीं मिल पाते, इसलिए उनके प्रिय खिलौने सांप और बीन ही होते हैं. बचपन से ही सांपों के सानिंध्य में रहने वाले इन बच्चों के लिए सांप से खेलना और उन्हें क़ाबू कर लेना ख़ास शग़ल बन जाता है.

सिर पर पगड़ी, देह पर भगवा कुर्ता, साथ में गोल तहमद, कानों में मोटे कुंडल, पैरों में लंबी नुकीली जूतियां और गले में ढेरों मनकों की माला और ताबीज़ पहने ये लोग कंधे पर दुर्लभ सांप और तुंबे को डाल कर्णप्रिय धुन के साथ गली-कूचों में घूमते रहते हैं. ये नागपंचमी, होली, दशहरा और दिवाली के मौक़ों पर अपने घरों को लौटते हैं. इन दिनों इनके अपने मेले आयोजित होते हैं.

मंगतराव कहते हैं कि सभी सपेरे इकट्ठे होकर सामूहिक भोज 'रोटड़ा' का आयोजन करते हैं. ये आपसी झगड़ों का निपटारा कचहरी में न करके अपनी पंचायत में करते हैं, जो सर्वमान्य होता है. सपेरे नेपाल, असम, कश्मीर, मणिपुर, नागालैंड और महाराष्ट्र के दुर्गम इलाकों से बिछुड़िया, कटैल, धामन, डोमनी, दूधनाग, तक्षकए पदम, दो मुंहा, घोड़ा पछाड़, चित्तकोडिया, जलेबिया, किंग कोबरा और अजगर जैसे भयानक विषधरों को अपनी जान की बाजी लगाकर पकड़ते हैं. बरसात के दिन सांप पकड़ने के लिए सबसे अच्छे माने जाते हैं, क्योंकि इस मौसम में सांप बिलों से बाहर कम ही निकलते हैं.

हरदेव सिंह बताते हैं कि भारत में महज 15 से 20 फीसदी सांप ही विषैले होते हैं. कई सांपों की लंबाई 10 से 30 फीट तक होती है. सांप पूर्णतया मांसाहारी जीव है. इसका दूध से कुछ लेना-देना नहीं है, लेकिन नागपंचमी पर कुछ सपेरे सांप को दूध पिलाने के नाम पर लोगों को धोखा देकर दूध बटोरते हैं. सांप रोजाना भोजन नहीं करता. अगर वह एक मेंढक निगल जाए तो चार-पांच महीने तक उसे भोजन की ज़रूरत नहीं होती. इससे एकत्रित चर्बी से उसका काम चल जाता है. सांप निहायत ही संवेदनशील और डरपोक प्राणी है. वह ख़ुद कभी नहीं काटता. वह अपनी सुरक्षा और बचाव की प्रवृत्ति की वजह से फन उठाकर फुंफारता और डराता है. किसी के पांव से अनायास दब जाने पर काट भी लेता है, लेकिन बिना कारण वह ऐसा नहीं करता.

सांप को लेकर समाज में बहुत से भ्रम हैं, मसलन सांप के जोड़े द्वारा बदला लेना, इच्छाधारी सांप का होना, दुग्धपान करना, धन संपत्ति की पहरेदारी करना, मणि निकालकर उसकी रौशनी में नाचना, यह सब असत्य और काल्पनिक हैं. सांप की उम्र के बारे में सपेरों का कहना है कि उनके पास बहुत से सांप ऐसे हैं जो उनके पिता, दादा और पड़दादा के जमाने के हैं. कई सांप तो ढाई सौ से तीन सौ साल तक भी ज़िन्दा रहते हैं. पौ फटते ही सपेरे अपने सिर पर सांप की पिटारियां लादकर दूर-दराज के इलाक़ों में निकल पड़ते हैं. ये सांपों के करतब दिखाने के साथ-साथ कुछ जड़ी-बूटियों और रत्न भी बेचते हैं. अतिरिक्त आमदनी के लिए सांप का विष मेडिकल इंस्टीटयूट को बेच देते हैं. किंग कोबरा और कौंज के विष के दो सौ से पांच सौ रुपये तक मिल जाते हैं, जबकि आम सांप का विष 25 से 30 रुपये में बिकता है।

आधुनिक चकाचौंध में इनकी प्राचीन कला लुप्त होती जा रही है. बच्चे भी सांप का तमाशा देखने की बजाय टीवी देख या वीडियो गेम खेलना पसंद करते हैं. ऐसे में इनको दो जून की रोटी जुगाड़ कर पानी मुश्किल हो रहा है. मेहर सिंह और सुरजा ठाकुर को सरकार और प्रशासन से शिकायत है कि इन्होंने कभी भी सपेरों की सुध नहीं ली. काम की तलाश में इन्हें दर-ब-दर भटकना पड़ता है. इनकी आर्थिक स्थिति दयनीय है. बच्चों को शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं. सरकार की किसी भी योजना का इन्हें कोई लाभ नहीं मिल सका, जबकि क़बीले के मुखिया केशव इसके लिए सपेरा समाज में फैली अज्ञानता को ज़िम्मेदार ठहराते हैं. वह कहते हैं कि सरकार की योजनाओं का लाभ वही लोग उठा पाते हैं, जो पढ़े-लिखे हैं और जिन्हें इनके बारे में जानकारी है. मगर निरक्षर लोगों को इनकी जानकारी नहीं होती, इसलिए वे पीछे रह जाते हैं. वह चाहते हैं कि बेशक वह नहीं पढ़ पाए, लेकिन उनकी भावी पीढ़ी को शिक्षा मिले. वह बताते हैं कि उनके परिवारों के कई बच्चों ने स्कूल जाना शुरू किया है.

निहाल सिंह बताते हैं कि सपेरा जाति के अनेक लोगों ने यह काम छोड़ दिया है. वे अब मज़दूरी या कोई और काम करने लगे हैं. इस काम में उन्हें दिन में 100-150 रुपये कमाना पहाड़ से दूध की नदी निकालने से कम नहीं है, लेकिन अपने पुश्तैनी पेशे से लगाव होने की वजह से वह आज तक सांपों को लेकर घूमते हैं.

40 Comments:

sajid said...

Nice Post

Bhavesh (भावेश ) said...

फ़िरदौस जी सबसे पहले तो इस रोचक जानकारी के लिए आपका आभार. जैसा की आपने कहाँ कि भारत संस्कृतियों और परंपराओं का देश है लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध और अंधी दौड़ में हम अपनी संस्कृति और परंपराये खोते जा रहे है. कमोबेश सपेरो जैसा ही हाल आज कठपुतली के खेल दिखाने वालो का है. ये परंपरागत खेल तमाशे आज अपने अंतिम पड़ाव तक आ पहुंचे है और अफ़सोस इस समय भी इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है.

Tarkeshwar Giri said...

Bahut badhiya jankari di hai apne

सुलभ § Sulabh said...

सपेरे की वर्तमान स्थितियों के साथ साथ आपने सांप के बारे भी विस्तृत जानकारी दी है.
बचपन में मैंने ढेरो सपेरे के करतब देखे हैं, पर आज के बच्चे नहीं देख पा रहे हैं. ये सचमुच सपेरों और उनकी जातियों के लिए दुखद है. ऐसे ही लुप्त हो जायेंगे ये संस्कृति के वाहक.

vedvyathit said...

bhn aap ne is me bdi mehnt ki hai prntu aaj thoda njriya bdlna pdega is kam me vaigyanikta ka smavesh hona jroori hai spere kevl sanp dikha kr bhik mangne tk simit n rhe apitu in ke hunr ko mnpyogi bna kr us ka labh liya jaje jo hunr in ke pass hai us ko shejne ka kam ho
bhut se bhrm jo ye spere swym bhi failate hain ve bhi door hone chahiye tatha sanpon ko bhi aajadi milni chahiye is ke bhut kam krne jroort hai kevl prmpra ke nam pr sb kuchh thik nhi hai apitu smy ke sath privrtn jroori hai
1been ko sangeet ke madhym se aage bdhaya jaye
srp pkdne ki kla ko viksit kiya jaye srp dnsh se mukti ka adhynn kiya jaye
aur bhi bhut kuchh krne ka hai
aap hm in ke shyogi bne
ved vyathit

Mahak said...

@फिरदौस जी

विपरीत मत रखने के लिए माफ़ी चाहूंगा .ये अच्छी बात है की आपने सपेरों की दयनीय दशा का वर्णन किया लेकिन क्या ये सही है की हम अपने खेल के लिए, अपने मनोरंजन के लिए जीवों की स्वंतंत्रता के साथ खिलवाड़ करें ?, उन्हें उनके घर में उनके परिवार के साथ रहने देने की बजाये अपने घर में बंद रखें ?, उन्हें मजबूर करें विभिन्न मुद्राएं लेने के लिए सिर्फ अपना मनोरंजन और पेट पालने के लिए ?. क्या रोज़ी-रोटी किसी और काम से नहीं कमाई जा सकती . हमें तो उस समय देखने में मज़ा आता है लेकिन इन जीवों के साथ जो व्यवहार किया जाता है इनके मालिकों द्वारा इनसे ये सब करवाने के लिए वो ये ही जानते हैं फिर चाहे वो सपेरों हों , बन्दर-बंदरिया का खेल दिखाने वाले हों या फिर circus आदि हों . मेरे विचार में ये बिलकुल भी उचित नहीं है .

महक

Mahendra Arya said...

" सांप को लेकर समाज में बहुत से भ्रम हैं, मसलन सांप के जोड़े द्वारा बदला लेना, इच्छाधारी सांप का होना, दुग्धपान करना, धन संपत्ति की पहरेदारी करना, मणि निकालकर उसकी रौशनी में नाचना, यह सब असत्य और काल्पनिक हैं। "............................बहुत सही कहा आपने. लेकिन एक और ऐसी ही भ्रामक धारणा है की सांप बीन की धुन पर नाचता है .सच्चाई यह है की सांप बहरा होता है .उसका सारा नर्तन सपेरे द्वारा बीन से उसके सामने किया गया हिलाना डुलाना है .संस्कृत में सांप को चक्छुश्रुवा कहा गया है क्योंकि सांप आँख से देख कर ही सुनने का काम चलाता है.

Archana said...

और..............हम .....पूजा करते है ......सांपों की.....!!!!!!!(सोचनीय)

अन्तर सोहिल said...

बहुत उम्दा जानकारी और सपेरा जाति की रोटी से जुडी समस्याओं को उठाने के लिये धन्यवाद

हमने तो सुना है कि मेनका गांधी ने इन लोगों का (सपेरों, बन्दर और भालू का खेल दिखाने वाले मदारियों) रोजगार छुडवा दिया।

प्रणाम

JEEVAN SANGEET said...

"APNA DESH SADA APNA HAI
MILJUL KAR RAHNA-BADHNA HAI.
RAHE SHANTIMAY JEEVAN SABKA
ISI HETU RAKSHA KARNA HAI."

सतीश सक्सेना said...

पारंपरिक से अशिक्षित संपेरे सिर्फ एक ही रोजगार करते आ रहे हैं, सरकार को इन्हें सर्पों के बारे में शिक्षा तथा उनसे बाय प्रोडक्ट निकालने की समझ आदि के लिए प्लान करना चाहिए ! शोध क्षात्रों के लिए बढ़िया रुचिकर विषय ! शुभकामनायें !

P.N. Subramanian said...

साँपों और सपेरों के बारे में इस विस्तार से दी गयी रोचक जानकारी किये आभार.

सुनील दत्त said...

रोचक

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

सचमुच शोचनीय स्थिति में जी रहे हैं ये।
--------
भविष्य बताने वाली घोड़ी।
खेतों में लहराएँगी ब्लॉग की फसलें।

Maria Mcclain said...

interesting blog, i will visit ur blog very often, hope u go for this site
to increase visitor.Happy Blogging!!!

Arvind Mishra said...

सपेरो पर बहुत अच्छा कवरेज,हाँ मजबूरी के चलते वे सापों से सम्बन्धित कई अंधविश्वासों को बढाते हैं -शुक्रिया !

श्यामल सुमन said...

अच्छी जानकारी के साथ साथ अच्छा विश्लेषण उससे भी अच्छा लगा सपेरों को संस्कृति से जोड़ने की चतुराई फिरदौस जी। सुन्दर।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

L.R.Gandhi said...

अब तो सांप के यह खेल कानूनन अवैध हो चुके हैं। ये सपेरे सर्प विष के बारे जानकारी प्राप्त कर अपने व्यवसाय को नया मोड़ दे सकते हैं -सर्प विष का बहुत बड़ा बाज़ार है जिस से अनेकों औषधियां बनती हैं और सर्प विष बड़ी ऊंची कीमत पर बिकता है। सर्प विष निकालने से सांप को कोई हानि भी नहीं पहुँचती।
सपेरों की दयनीय दशा के यथार्थ चित्रण के लिए आप बधाई की पात्रा हैं... धन्यवाद।

दीर्घतमा said...

firdaus ji
namaste
bahut acchhi jankari ke liye dhanyabad.
Apko mai bahut padhta hu ,ap jaiso par hamarew desh ko garv hai.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

कुछ चित्र और लगाये जाते तो और अधिक आनन्द आता...

सलीम ख़ान said...

thanks for this type of valuable information !!!

Divya said...

इस रोचक जानकारी के लिए आपका आभार.

aarya said...

सादर वन्दे !
बहुत ही उपयुक्त जानकारी! क्या है कि, रोजमर्रा कि जिंदगी में हम इनको देखते जरुर है लेकिन लेकिन हमारी संवेदनाएं इतनी मर चुकी हैं कि हमें खुद से ही फुरशत नहीं मिलती | आपको फुरसत मिली (या निकाली) और शायद संवेदना जीवित है सो आपने लिखा, आपको बधाई !
हाँ यहाँ एक बात जरुर कहना चाहूँगा कि ये हमारे भारतवाशी ही हैं, अपने बन्धुं हैं इनके जीवन स्तर को सुधारने का काम होना चाहिए !
रत्नेश त्रिपाठी

सुरेन्द्र Verma said...

Sundar Post ! Is khoji patrakarita ke liye aapko bahaut-bahaut dhanyabaad

RAJAN said...

sapero par achchi jankari.hindi filmon ne bhi saanp aur sapero ke baare me andhvishwas badhaya hai.lekin kuch saanp shayad doodh peete ho.maine aisa dekha hai.

दिगम्बर नासवा said...

साँपों से जुड़ी कई भ्रांतियों को आपने इस लेख के जरिए डोर करने का प्रयास किया है ... सराहनीय प्रयास ....

boletobindas said...

धीरे-धीरे देश से कई पुरानी कलाएं खत्म होती जा रही हैं। जिस कारण जो ज्ञान सहज रुप से भी मिल जाता था वो अब किताबों के आसरे ही है। उस पर मेनका गांधी जी का काम। काम अच्छा है पर उसके साथ जुड़ी रोजी रोटी की समस्या का भी निदान करतीं तो कोई बात होती। हर सपेरा सांप को दयनीय स्थिती में नहीं रखता। कई के लिए ये देवता होते हैं क्योंकि इन्हीं के कारण उसे रोटी मिलती है।

राकेश जैन said...

आपकी जानकारी किसी क्षेत्र विशेष के लिए शायद सही होगी..
किन्तु मेरे व्यावहारिक तजुर्बे से मेल नहीं खाती.
जीवों को कैद कर के उन्हें धर्मं और आस्था के नाम पे इस्तेमाल करना ग़लत है,
कुछ दिनों पहले गुडगाँव बस स्टैंड के पास एक सपेरा मेरे साथ खड़े व्यक्ति के पास आया,
बोला सोमवार का दिन है, बावा भोलेनाथ कृपा करेंगे, उस व्यक्ति ने १ रुपया उस बावा को दिया,
बावा बोला, तुम्हारी जेब मे जो सबसे बड़ा नोट हो उसे माँ के मुंह पे लगाओ, वो चूम के उसे तुम्हे
आशीर्वाद देगी, उसने १०० रुपये का नोट नाग /नागिन जो भी हो,के मुह पे लगाया और आश्चर्य,
कि उस नाग ने वो नोट मुह खोल कर निगल लिया, बावा बोला, बोल बेटा माँ बड़ी या पैसा,
वो बोला, माँ बड़ी, बावा बोला जा कल्याण होगा, इससे कई गुना कमाएगा..
व्यक्ति थोडा क्रोधित को हो कर चला गया...
आप बताइए, क्या यही है सपेरो का दर्द...
आप तो मीडिया से ताल्लुक रखती हैं,, अगर आपके संपर्क से यह चीज़ जन-२ तक पहुच सकती हो,
तो ज़ुरूर एक बार गुडगाँव बस स्टैंड के इर्द-गिर्द गौर फरमाइए..

सुज्ञ said...

राकेश जी से सहमत,

यह संस्कृति नहिं,आस्थाओं का शोषण है,
नागो के साथ वे बडी क्रुरता से पेश आते है,दर्दनाक तरिके से पकडते है,
गर्म सलाख से उसके जहरीले दान्त उखाडते हैं,और उसके प्राकृतिक आवास और भोजन से विमुख कर देते हैं
वेसे भी भारत सपेरों का देश नहिं कहलाना चाह्ता,यह न संस्कृति हैं,न हमारी पह्चान। 'भारत में सभी प्राणियों पर दया की जाती है'यही है हमारी संस्कृति।

PADMSINGH said...

ये सच है कि अपने फायदे के लिए किसी जानवर या किसी भी जीव के प्रति अत्याचार स्वीकार्य नहींहोना चाहिए ... इसी क्रम मे आज रोज़ लाखों की संख्या मे दुधारू पशु काटे जा रहे हैं और लोग उन्हें चट कर रहे हैं... इनके बारे में कब और कौन सोचेगा ,,,
सतीश जी की बात विचारणीय है कि सपेरों को उनकी रोज़ी रोटी से मरहूम न कर के उचित दिशा दिया जाना बेहतर विकल्प हो सकता है

प्रवीण पाण्डेय said...

सँपेरों के बारे में तथ्यात्मक पोस्ट । बचपन में सँपेरों को बड़े वीर के रूप में निहारते थे, साँप को वश में करने वाला ।

pankaj mishra said...

बहुत बढिय़ा। बहुत अच्छा आलेख। वास्तव में बहुत दिन बाद इस विषय पर कोई लेख पढऩे को मिला। वैसे जानवरों पर अत्याचार करना भी ठीक नहीं है। जिन लोगों ने यह बात कही है वह भी अपनी जगह ठीक हैं। सपेरों को अब कोई नया व्यवसाय अपना लेना चाहिए।

सर्प संसार said...

ये सचमुच चिंता की बात है।
---------
क्या आप बता सकते हैं कि इंसान और साँप में कौन ज़्यादा ज़हरीला होता है?
अगर हाँ, तो फिर चले आइए रहस्य और रोमाँच से भरी एक नवीन दुनिया में आपका स्वागत है।

lokendra singh rajput said...

बहुत अच्छी जानकारी दी आपने उसके लिए धन्यवाद। भ्रामक सोच से भी पर्दा हटाया और सपेरों की स्थिति पर भी प्रकाश डाला। अब गलती तो सपेरों की भी है वे अपना पेट भरने के लिए सांपों के पेट पर जुल्म करते हैं।

lokendra singh rajput said...

बहुत अच्छी जानकारी दी आपने उसके लिए धन्यवाद। भ्रामक सोच से भी पर्दा हटाया और सपेरों की स्थिति पर भी प्रकाश डाला। अब गलती तो सपेरों की भी है वे अपना पेट भरने के लिए सांपों के पेट पर जुल्म करते हैं।

सच का बोलबाला, झूठ का मुँह काला said...

{महमूद एंड कम्पनी ,मरोल पाइप लाइन ,मुंबई द्वारा हिंदी में प्रकाशित कुरान मजीद से ऊदत } इस्लाम के अनुसार इस्लाम के प्रति इमान न रखने वाले ,व बुतपरस्त( देवी -देवताओ व गुरुओ को मानने वाले काफिर है ) 1................मुसलमानों को अल्लाह का आदेश है की काफिरों के सर काट कर उड़ा दो ,और उनके पोर -पोर मारकर तोड़ दो (कुरान मजीद ,पेज २८१ ,पारा ९ ,सूरा ८ की १२ वी आयत )! 2.....................जब इज्जत यानि , युद्द विराम के महीने निकल जाये ,जो की चार होते है [जिकागा ,जिल्हिज्या ,मोहरम ,और रजक] शेष रामजान समेत आठ महीने काफिरों से लड़ने के उन्हें समाप्त करने के है !(पेज २९५ ,पारा १० ,सूरा ९ की ५ वी आयत ) 3...................जब तुम काफिरों से भिड जाओ तो उनकी गर्दन काट दो ,और जब तुम उन्हें खूब कतल कर चुको तो जो उनमे से बच जाये उन्हें मजबूती से केद कर लो (पेज ८१७ ,पारा २६ ,सूरा ४७ की चोथी आयत ) 4............निश्चित रूप से काफिर मुसलमानों के खुले दुश्मन है (इस्लाम में भाई चारा केवल इस्लाम को माननेवालों के लिए है ) (पेज १४७ पारा ५ सूरा ४ की १०१वि आयत ) .........................क्या यही है अमन का सन्देश देने वाले देने वाले इस्लाम की तस्वीर इसी से प्रेरित होकर ७१२ में मोह्हम्मद बिन कासिम ,१३९८ में तेमूर लंग ने १७३९ में नादिर शाह ने १-१ दिन मै लाखो हिन्दुओ का कत्ल किया ,महमूद गजनवी ने १०००-१०२७ में हिन्दुस्तान मै किये अपने १७ आक्रमणों मै लाखो हिन्दुओ को मोट के घाट उतारा मंदिरों को तोड़ा,व साढ़े ४ लाख सुंदर हिन्दू लड़कियों ओरतो को अफगानिस्तान में गजनी के बाजार मै बेच दिया !गोरी ,गुलाम ,खिलजी ,तुगलक ,लोधी व मुग़ल वंश इसी प्रकार हिन्दुओ को काटते रहे और हिन्दू नारियो की छीना- झपटी करते रहे {द हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया एस टोल्ड बाय इट्स ओवन हिस्तोरिअन्स,लेखक अच् ,अच् एलियार्ड ,जान डावसन }यही स्थिति वर्तमान मै भी है सोमालिया ,सूडान,सर्बिया ,कजाकिस्तान ,अफगानिस्तान ,अल्जीरिया ,सर्बिया ,चेचनिया ,फिलिपींस ,लीबिया ,व अन्य अरब देश आतंकवाद के वर्तमान अड्डे है जिनका सरदार पाकिस्तान है क्या यह विचारणीय प्रश्न नहीं की किस प्रेरणा से इतिहास से वर्तमान तक इक मजहब आतंक का पर्याय बना है ???????????????

फ़िरदौस ख़ान said...

@सच का बोलबाला
आपसे निवेदन है कि हमारे ब्लॉग पर आप सिर्फ़ पोस्ट से संबंधित कमेंट्स ही कीजिए... आपके बाक़ी कमेंट्स हम प्रकाशित नहीं कर सकते...

newspostmartem said...

देखा जाय तो एक तरीके से सपेरे सांपों के रखवाले भी कहे जा सकते हैं. लेकिन एक सरकारी आदेश से अब सपेरे सांपों का प्रदर्शन नहीं कर सकते. जिससे स्थानीय स्तर पर रोजी रोटी कमाने वाले सपेरे अब अब दूसरे धंधों में जा रहे हैं. स्थिति तो कुछ बर्षों में यह हो जायेगी कि अगली पीढ़ी को सांपों के बारे में चित्र से ही बताया जा सकेगा.

sumeet "satya" said...

sahi tasveer pesh ki hai........
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Ritesh Tikariha said...

well bahi achhchhi jankari
thanx

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