Friday, January 1, 2016

सुनने की फ़ुर्सत हो तो आवाज़ है पत्थरों में...

फ़िरदौस ख़ान
ये कहानी है दिल्ली के ’शहज़ादे’ और हिसार की ’शहज़ादी’ की. उनकी मुहब्बत की. गूजरी महल की तामीर का तसव्वुर सुलतान फ़िरोज़शाह तुगलक़ ने अपनी महबूबा के रहने के लिए किया था...शायद यह किसी भी महबूब का अपनी महबूबा को परिस्तान में बसाने का ख़्वाब ही हो सकता था और जब गूहरी महल की तामीर की गई होगी...तब इसकी बनावट, इसकी नक्क़ाशी और इसकी ख़ूबसूरती को देखकर ख़ुद भी इस पर मोहित हुए बिना न रह सका होगा...
हरियाणा के हिसार क़िले में स्थित गूजरी महल आज भी सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक और गूजरी की अमर प्रेमकथा की गवाही दे रहा है. गूजरी महल भले ही आगरा के ताजमहल जैसी भव्य इमारत न हो, लेकिन दोनों की पृष्ठभूमि प्रेम पर आधारित है. ताजमहल मुग़ल बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज़ की याद में 1631 में बनवाना शुरू किया था, जो 22 साल बाद बनकर तैयार हो सका. हिसार का गूजरी महल 1354 में फ़िरोज़शाह तुग़लक ने अपनी प्रेमिका गूजरी के प्रेम में बनवाना शुरू किया, जो महज़ दो साल में बनकर तैयार हो गया. गूजरी महल में काला पत्थर इस्तेमाल किया गया है, जबकि ताजमहल बेशक़ीमती सफ़ेद संगमरमर से बनाया गया है. इन दोनों ऐतिहासिक इमारतों में एक और बड़ी असमानता यह है कि ताजमहल शाहजहां ने मुमताज़ की याद में बनवाया था. ताज एक मक़बरा है, जबकि गूजरी महल फ़िरोज़शाह तुग़लक ने गूजरी के रहने के लिए बनवाया था, जो महल ही है.
गूजरी महल की स्थापना के लिए बादशाह फ़िरोज़शाह तुग़लक ने क़िला बनवाया. यमुना नदी से हिसार तक नहर लाया और एक नगर बसाया. क़िले में आज भी दीवान-ए-आम, बारादरी और गूजरी महल मौजूद हैं. दीवान-ए-आम के पूर्वी हिस्से में स्थित कोठी फ़िरोज़शाह तुग़लक का महल बताई जाती है. इस इमारत का निचला हिस्सा अब भी महल-सा दिखता है. फ़िरोज़शाह तुग़लक के महल की बंगल में लाट की मस्जिद है. अस्सी फ़ीट लंबे और 29 फ़ीट चौड़े इस दीवान-ए-आम में सुल्तान कचहरी लगाता था. गूजरी महल के खंडहर इस बात की निशानदेही करते हैं कि कभी यह विशाल और भव्य इमारत रही होगी.
सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक और गूजरी की प्रेमगाथा बड़ी रोचक है. हिसार जनपद के ग्रामीण इस प्रेमकथा को इकतारे पर सुनते नहीं थकते. यह प्रेम कहानी लोकगीतों में मुखरित हुई है. फ़िरोज़शाह तुग़लक दिल्ली का सम्राट बनने से पहले शहज़ादा फ़िरोज़ मलिक के नाम से जाने जाते थे. शहज़ादा अकसर हिसार इलाक़े के जंगल में शिकार खेलने आते थे. उस वक्त यहां गूजर जाति के लोग रहते थे. दुधारू पशु पालन ही उनका मुख्य व्यवसाय था. उस काल में हिसार क्षेत्र की भूमि रेतीली और ऊबड़-खाबड़ थी. चारों तरफ़ घना जंगल था. गूजरों की कच्ची बस्ती के समीप पीर का डेरा था. आने-जाने वाले यात्री और भूले-भटके मुसाफ़िरों की यह शरणस्थली थी. इस डेरे पर एक गूजरी दूध देने आती थी. डेरे के कुएं से ही आबादी के लोग पानी लेते थे. डेरा इस आबादी का सांस्कृतिक केंद्र था.
एक दिन शहज़ादा फ़िरोज़ शिकार खेलते-खेलते अपने घोड़े के साथ यहां आ पहुंचा. उसने गूजर कन्या को डेरे से बाहर निकलते देखा तो उस पर मोहित हो गया. गूजर कन्या भी शहज़ादा फ़िरोज़ से प्रभावित हुए बिना न रह सकी. अब तो फ़िरोज़ का शिकार के बहाने डेरे पर आना एक सिलसिला बन गया. फिरोज़ ने गूजरी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा तो उस गूजर कन्या ने विवाह की मंजरी तो दे दी, लेकिन दिल्ली जाने से यह कहकर इंकार कर दिया कि वह अपने बूढ़े माता-पिता को छोड़कर नहीं जा सकती. फ़िरोज़ ने गूजरी को यह कहकर मना लिया कि वह उसे दिल्ली नहीं ले जाएगा.
1309 में दयालपुल में जन्मा फ़िरोज़ 23 मार्च 1351 को दिल्ली का सम्राट बना. फ़िरोज़ की मां हिन्दू थी और पिता तुर्क मुसलमान था. सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक ने इस देश पर साढ़े 37 साल शासन किया. उसने लगभग पूरे उत्तर भारत में कलात्मक भवनों, किलों, शहरों और नहरों का जाल बिछाने में ख्याति हासिल की. उसने लोगों के लिए अनेक कल्याणकारी काम किए. उसके दरबार में साहित्यकार, कलाकार और विद्वान सम्मान पाते थे.
दिल्ली का सम्राट बनते ही फ़िरोज़शाह तुग़लक ने महल हिसार इलांके में महल बनवाने की योजना बनाई. महल क़िले में होना चाहिए, जहां सुविधा के सब सामान मौजूद हों. यह सोचकर उसने क़िला बनवाने का फ़ैसला किया. बादशाह ने ख़ुद ही करनाल में यमुना नदी से हिसार के क़िले तक नहरी मार्ग की घोड़े पर चढ़कर निशानदेही की थी. दूसरी नहर सतलुज नदी से हिमालय की उपत्यका से क़िले में लाई गई थी. तब जाकर कहीं अमीर उमराओं ने हिसार में बसना शुरू किया था.
किवदंती है कि गूजरी दिल्ली आई थी, लेकिन कुछ दिनों बाद अपने घर लौट आई. दिल्ली के कोटला फिरोज़शाह में गाईड एक भूल-भूलैया के पास गूजरी रानी के ठिकाने का भी ज़िक्र करते हैं. तभी हिसार के गूजरी महल में अद्भुत भूल-भूलैया आज भी देखी जा सकती है.
क़ाबिले-गौर है कि हिसार को फ़िरोज़शाह तुग़लक के वक्त से हिसार कहा जाने लगा, क्योंकि उसने यहां हिसार-ए-फिरोज़ा नामक क़िला बनवाया था. 'हिसार' फ़ारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है 'क़िला'. इससे पहले इस जगह को 'इसुयार' कहा जाता था. अब गूजरी महल खंडहर हो चुका है. इसके बारे में अब शायद यही कहा जा सकता है-
सुनने की फुर्सत हो तो आवाज़ है पत्थरों में


उजड़ी हुई बस्तियों में आबादियां बोलती हैं...

26 Comments:

निरन्तर- महेन्द्र मिश्र said...

बहुत ही उम्दा बधाई.

mahashakti said...

बिल्‍कुल सही बात कह रहे है आप

P.N. Subramanian said...

आज के दिन यह सबसे उत्कृष्ट आलेख होगा. हमें भ्रम सा हो रहा है. गूजरी महल और भी कहीं है क्या?

Manoj Kesarwani said...

बहुत ही उम्दा लेख, बहुत उम्दी जानकारी, बहुत ही रोचक लेखन शैली मे|
टाइटल भी ऐसा की लेख तुरंत पढ़ना शुरू किया, और फिर बीच में छोड़ने का प्रश्न ही नही उठता|
फ़िरदौस जी, बहुत-बहुत बधाई की पात्र हैं आप.....

vedvyathit said...

dil se chhuaa hai jis ne
kn 2 sihr utha hai
mati ka sb tmasha
mati se ja mila hai
bdhai bahin

मौसम said...

प्रिय फ़िरदौस
हमें आपकी तहरीरों से मुहब्बत है....... आप वाक़ई लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी हैं......बल्कि हम तो आपको हुस्न और कलाम की मलिका ही कहेंगे.......आपकी हर तहरीर का बेसब्री से इंतज़ार रहता है.......

rashmi ravija said...

बहुत ही उत्कृष्ट जानकारी
गूजरी महल का इतिहास बहुत ही लुभावना लगा....बस अफ़सोस है कि इसकी देखभाल अच्छी तरह से नहीं की जा रही....सम्बंधित अधिकारी इस पर ध्यान दें तो अच्छा...

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

इस शानदार जानकारी के लिए आभार।

नये साल की ढेरों मुबारकबाद।
---------
मिल गया खुशियों का ठिकाना।
वैज्ञानिक पद्धति किसे कहते हैं?

अविनाश वाचस्पति said...

बिल्‍कुल दुरूस्‍त फरमाया है आपने।
किशोरों और युवाओं के लिए उपयोगी ब्‍लॉगों की जानकारी जल्‍दी भेजिएगा

अभिषेक मिश्र said...

हमारी विरासत की महत्वपूर्ण जानकारी दी है आपने.आजकल फरीदाबाद में हूँ, तो कभी इन्हें तलाशने की भी कोशिश करूँगा. अपने ब्लॉग धरोहर के माध्यम से अपनी विरासत के बारे में जागरूकता लाने का यथासंभव प्रयास मैं भी करता रहा हूँ. आभार.

manav vikash vigyan aur adytam said...

sundar

Mukesh Kumar Sinha said...

umda lekh aur behtareen jaankari....nav varsh ki badhai...:)

प्रेम सरोवर said...

नव वर्ष की शुभकामनाएं। जानकारी अच्छी लगी।

mark rai said...

सुनने की फुर्सत हो तो आवाज़ है पत्थरों में
उजड़ी हुई बस्तियों में आबादियां बोलती हैं...

बहुत ही प्रभावशाली रचना
उत्कृष्ट लेखन का नमूना
लेखन के आकाश में आपकी एक अनोखी पहचान है ..

amrendra "aks" said...

Umda lekh k liye badhahi sweekar karein ............intejar rahega aapka
amrendra-shukla.blogspot.com

aman agarwal "marwari" said...

अविस्मर्णीय जानकारी बहुत ही सुन्दर रचना.
आपक लेखन कला को प्रणाम है'
- अमन अग्रवाल "मारवाड़ी"
amanagarwalmarwari.blogspot.com

marwarikavya.blogspot.com

Harman said...

hmmmmmmmm very nice post dear.... good blog

Music Bol
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ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

बहुत ही जानकारी परक लेख

mahendra verma said...

फ़िरोजशाह तुग़लक और गूजरी महल के बारे में आपने नई जानकारी प्रस्तुत की है। पढ़कर ज्ञानवृद्धि हुई ।...आपको धन्यवाद।

Sunil Kumar said...

उत्कृष्ट लेखन प्रभावशाली रचना

रचना दीक्षित said...

फिरदौस जी बहुत ही सुंदर चित्रण किया है आपने इस आलेख में. बेहेतरीन भाषा में सजीव विचारणीय लेख.

गणतंत्र दिवस की बधाई.

हरकीरत ' हीर' said...

.यह किसी भी महबूब का अपनी महबूबा को परिस्तान में बसाने का ख़्वाब ही हो सकता था और जब गूजरी महल की तामीर की गई होगी...
सच वह महबूबा कितनी खुशनसीब होगी ....हैं न फिरदौस जी जिसके लिए ऐसे गुजरी महल बने .....
आपने देखा ये महबूबा महल .....
कितनी खुशनसीब हैं आप .....
इक हम हैं के बस्तियों में आवाज़ लगते हैं ..
कोई कब्र नहीं बोलती .....

V!Vs said...

mahatpurn evam intersting.......

Dinesh pareek said...

वहा वहा क्या कहे आपके हर शब्द के बारे में जितनी आपकी तारीफ की जाये उतनी कम होगी
आप मेरे ब्लॉग पे पधारे इस के लिए बहुत बहुत धन्यवाद अपने अपना कीमती वक़्त मेरे लिए निकला इस के लिए आपको बहुत बहुत धन्वाद देना चाहुगा में आपको
बस शिकायत है तो १ की आप अभी तक मेरे ब्लॉग में सम्लित नहीं हुए और नहीं आपका मुझे सहयोग प्राप्त हुआ है जिसका मैं हक दर था
अब मैं आशा करता हु की आगे मुझे आप शिकायत का मोका नहीं देगे
आपका मित्र दिनेश पारीक

Dinesh pareek said...

वहा वहा क्या कहे आपके हर शब्द के बारे में जितनी आपकी तारीफ की जाये उतनी कम होगी
आप मेरे ब्लॉग पे पधारे इस के लिए बहुत बहुत धन्यवाद अपने अपना कीमती वक़्त मेरे लिए निकला इस के लिए आपको बहुत बहुत धन्वाद देना चाहुगा में आपको
बस शिकायत है तो १ की आप अभी तक मेरे ब्लॉग में सम्लित नहीं हुए और नहीं आपका मुझे सहयोग प्राप्त हुआ है जिसका मैं हक दर था
अब मैं आशा करता हु की आगे मुझे आप शिकायत का मोका नहीं देगे
आपका मित्र दिनेश पारीक

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

फिरदौस जी आपका सुन्दर आलेख पढ कर सुखद आश्चर्य हुआ । अभी तक गूजरी महल के बारे में हमारी जानकारी ग्वालियर तक ही थी । ग्वालियर का किला भी अपनेआप में विशिष्ट है। गूजरी-महल इसका एक खूबसूरत हिस्सा है । यह राजा मानसिंह ने अपनी गूजरी रानी मृगनयनी (पढें वृन्दावनलाल वर्मा का उपन्यास-मृगनयनी )के लिये बनवाया था । आज यह पुरातत्व-विभाग के अन्तर्गत है । राजा मानसिंह और मृगनयनी की प्रेम कथा भी कुछ इसी तरह की सुनी जाती है ।

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