Saturday, August 9, 2008

भूखे लोगों का संकट

फ़िरदौस ख़ान
दिल्ली सरकार ने गरीबों को कम से कम एक बार दोपहर में भरपेट भोजन मुहैया कराने की योजना को मंजूरी दी है. इस योजना के तहत दोपहर 12 से एक बजे के बीच बेसहारा बच्चों, भिखारियों और अन्य ग़रीबों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया जाएगा. सरकार की भागीदारी पहल के तहत आपकी रसोई कार्यक्रम में सरकार रैन बसेरे, संगठनों, एनजीओ और इच्छुक व्यक्तियों को सुविधा देगी, जो पका भोजन जरूरतमंदों में वितरित करेंगे. इसके लिए जल्द ही आवेदन मांगे जाएंगे.

बेशक, सरकार की यह योजना उन लोगों को फायदा पहुंचाएगी जिन्हें दिन में एक वक्त भी भरपेट भोजन नहीं मिल पाता. दरअसल आज देशभर में इस तरह की योजना लागू करने की बेहद जरूरत है. खासकर देश के उन हिस्सों में जो गरीबी की मार से बुरी तरह जूझ रहे हैं और जहां से बार-बार भूख और कुपोषण से लोगों के मरने की खबरें आती रहती हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में हर रोज आठ करोड़ 20 लाख लोग भूखे पेट सोते हैं.भूख से मौत की समस्या आज समूचे विश्व में फैली हुई है. भोजन मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है. इस मुद्दे को सबसे पहले अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति फ्रेंकलिन रूजवेल्ट ने अपने एक व्याख्यान में उठाया था. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान संयुक्त राष्ट्र ने इस मुद्दे को अपने हाथ में ले लिया और 1948 में भोजन के अधिकार के रूप में इसे स्वीकार किया. वर्ष 1976 में संयुक्त राष्ट्र परिषद ने इस अधिकार को लागू किया जिसे आज 156 राष्ट्रों की मंजूरी हासिल है और कई देश इसे कानून का दर्जा भी दे रहे हैं. इस कानून के लागू होने से भूख से होने वाली मौतों को रोका जा सकेगा.

एक रिपोर्ट के मुताबिक भूख और गरीबी के कारण रोजाना 25 हजार लोगों की मौत हो जाती है. 85 करोड़ 40 लाख लोगों के पास पर्याप्त भोजन नहीं है, जो कि यूएस, कनाडा और यूरोपियन संघ की जनसंख्या से ज्यादा है. भुखमरी के शिकार लोगों में 60 फीसदी महिलाएं हैं. दुनियाभर में भुखमरी के शिकार लोगों में हर साल 40 लाख लोगों का इजाफा हो रहा है. हर पांच सेकेंड में एक बच्चा भूख से दम तोड़ता है. 18 साल से कम उम्र के करीब 35.8 से 45 करोड़ बच्चे कुपोषित हैं. विकासशील देशों में हर साल पांच साल से कम उम्र के औसतन 10 करोड़ 90 लाख बच्चे मौत का शिकार बन जाते हैं. इनमें से ज्यादातर मौतें कुपोषण और भुखमरी से जनित बीमारियों से होती हैं. कुपोषण संबंधी समस्याओं से निपटने के लिए राष्ट्रीय आर्थिक विकास व्यय 20 से 30 अरब डॉलर प्रतिवर्ष है. विकासशील देशों में चार में से एक बच्चा कम वजन का है. यह संख्या करीब एक करोड़ 46 लाख है. नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद अल बरदेई ने इस समस्या की ओर विश्व का ध्यान आकर्षित करते हुआ कहा था कि अगर विश्व में सेना पर खर्च होने वाले बजट का एक फीसदी भी इस मद में खर्च किया जाए तो भुखमरी पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता.
ग्लोबल हंगर इंडेक्स (विश्व भुखमरी सूचकांक) में अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्था (आईएफपीआरआई) के विश्व भुखमरी सूचकांक-2007 में भारत को 118 देशों में 94 वां स्थान मिला था, जबकि पाकिस्तान 88 वें नंबर पर था. भारत में पिछले कुछ सालों में लोगों की खुराक में कमी आई है. जहां वर्ष 1989-1992 में 177 किलोग्राम खाद्यान्न प्रति व्यक्ति उपलब्ध था, वहीं अब यह घटकर 155 किलोग्राम प्रति व्यक्ति रह गया है. ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति कैलोरी ग्रहण करने की प्रतिदिन की औसत दर जो 1972-1973 में 2266 किलो कैलोरी थी, वह अब घटकर 2149 किलो कैलोरी रह गई है. करीब तीन चौथाई लोग 2400 किलो कैलोरी से भी कम उपगयोग कर पा रहे हैं. देश में जहां आबादी 1.9 फीसद की दर से बढ़ी है, वहीं खाद्यान्न उत्पादन 1.7 फीसद की दर से घटा है. गौरतलब है कि करीब दस साल पहले 1996 में रोम में हुए प्रथम विश्व खाद्य शिखर सम्मेलन में वर्ष 2015 तक दुनिया में भूख से होने वाली मौतों की संख्या को आधा करने का संकल्प लिया गया था, लेकिन वर्ष 2007 तक करीब आठ करोड़ लोग भुखमरी का शिकार हो चुके हैं.

हमारे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो फसल काटे जाने के बाद खेत में बचे अनाज और बाजार में पड़ी गली-सड़ी सब्जियां बटोरकर किसी तरह उससे अपनी भूख मिटाने की कोशिश करते हैं. महानगरों में भी भूख से बेहाल लोगों को कूड़ेदानों में से रोटी या ब्रेड के टुकड़ों को उठाते हुए देखा जा सकता है. रोजगार की कमी और गरीबी की मार के चलते कितने ही परिवार चावल के कुछ दानों को पानी में उबालकर पीने को मजबूर हैं. इस हालत में भी सबसे ज्यादा त्याग महिलाओं को ही करना पड़ता है, क्योकिं वे चाहती हैं कि पहले परिवार के पुरुषों और बच्चों को उनका हिस्सा मिल जाए. काबिले-गौर यह भी है कि हमारे देश में एक तरफ अमीरों के वे बच्चे हैं जिन्हें दूध में भी बोर्नविटा की जरूरत होती है तो दूसरी तरफ वे बच्चे हैं जिन्हें पेटभर चावल का पानी भी नसीब नहीं हो पाता और वे भूख से तड़पते हुए दम तोड़ देते हैं. यह एक कड़वी सच्चाई है कि हमारे देश में आजादी के बाद से अब तक गरीबों की भलाई के लिए योजनाएं तो अनेक बनाई गईं, लेकिन लालफीताशाही के चलते वे महज कागजों तक ही सीमित होकर रह गईं. पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने तो इसे स्वीकार करते हुए यहां तक कहा था कि सरकार की ओर से चला एक रुपया गरीबों तक पहुंचे-पहुंचते पांच पैसे ही रह जाता है.

एक तरफ गोदामों में लाखों टन अनाज सड़ता है तो दूसरी तरफ भूख से लोग मर रहे होते हैं. ऐसी हालत के लिए क्या व्यवस्था सीधे तौर पर दोषी नहीं है? भुखमरी के स्थायी समाधान के लिए लोगों को रोजगार मुहैया कराना होगा, क्योकिं एक वक्त भोजन उपलब्ध कराना इस समस्या का हल नहीं है. हां, इससे लोगों को कुछ राहत जरूर मिल सकती है. इस लिहाज से भूखों को दिन में एक वक्त भरपेट भोजन कराने का दिल्ली सरकार का कदम वाकई सराहनीय है, लेकिन यह योजना तभी कामयाब हो पाएगी जब इससे जुड़े अधिकारी व कर्मचारी ईमानदारी से काम करें. वरना इस योजना को भी भ्रष्टाचार का दीमक लगते देर न लगेगी.
(20 फ़रवरी 2008 को दैनिक जागरण में प्रकाशित)
तस्वीर : अनुराग मुस्कान

2 Comments:

sumansourabh said...

यह लेख बीस फरवरी को जागरण में पढ़ा था बहुत परिश्रम किया है आप ने ,तथ्यों से भरा है और भी मिलता रहे शुभ कामना है ;

Nitish Raj said...

ये लेख तथ्यों से भरा हुआ है। अच्छा है। लेकिन ऐसी योजनाएं लॉन्ग पीरियड के लिए चलें और उस पर भोजन देने वाली संस्था पर नजर रखना भी अनिवार्य है। वैसे एक दो एनजीओ ऐसे भी हैं जिनको ये काम करते देखा है। लेकिन वो काम के बदले खाना देते हैं। जैसे सफाई करवा ली इलाके की, मतलब बिना रोजगार के खाना नहीं दिया जाता। और जितना होसके उतना सरकार को भी कुछ ऐसा ही काम करना चाहिए। क्या राजीव गांधी ने जो कहा था वो दोहराया नहीं जाएगा? ये सवाल दोस्त अभी भी कायम है।

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