Friday, August 22, 2008

किसानों के लिए वरदान बायो डीज़ल


फ़िरदौस ख़ान
डीज़ल नहीं अब खाड़ी से
तेल मिलेगा बाड़ी से
और
स्वच्छ वातावरण का संकल्प
रतनजोत है एक विकल्प
इन नारों के साथ केंद्र सरकार रतनजोत उगाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित कर रही है. मौजूदा दौर में उत्पन्न ऊर्जा संकट और तेल की लगातार बढ़ती कीमतों के मद्देनज़र रतनजोत की खेती बेहद फ़ायदेमंद है. हालांकि बायो डीज़ल के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाने के मकसद से अरबों रुपए ख़र्च कर रही है, लेकिन इसी बीच रतनजोत उगाने के नाम पर ज़मीनों पर कब्जे करने और सरकारी धन के दुरुपयोग के आरोप भी सुर्खियों में हैं.

दसवीं पंचवर्षीय योजना के तहत केंद्र सरकार ने रतनजोत की खेती को बढ़ावा देने के लिए साढ़े 17 हज़ार करोड़ रुपए का प्रावधान रखा था. इस परियोजना का संचालन योजना आयोग कर रहा है. इसके लिए योजना आयोग ने देश के 18 राज्यों में 200 ऐसे जिलों की पहचान की है, जिनमें रतनजोत की खेती की जाएगी. इन राज्यों में हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ग़ोवा, गुजरात, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, उड़ीसा और तमिलनाडु शामिल हैं. चयनित हर ज़िले में रतनजोत की खेती के लिए एक करोड़ रुपए दिए जाने का प्रावधान है.

केंद्रीय पर्यावरण एवं वन, कृषि एवं सहकारिता तथा पेट्रोलियम मंत्रालय को भी इस मुहिम में शामिल किया गया है. योजना आयोग के मुताबिक़ वर्ष 2012 तक देश को क़रीब 19 करोड़ मीट्रिक टन तेल की ज़रूरत पड़ेगी. अगर देश में रतनजोत का अभियान कामयाब हो जाता है तो कुल तेल की मांग का क़रीब 50 फ़ीसदी हिस्सा बायो डीज़ल से पूरा हो सकेगा. इस समय देश पेट्रोलियम पदार्थों की खपत का 70 फ़ीसदी हिस्सा विदेशों से आयात कर रहा है. इस पर हर साल क़रीब 80 हज़ार करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा ख़र्च हो जाती है. विशेषज्ञों के मुताबिक़ अगर मौजूदा दौर में डीज़ल में पांच फ़ीसदी बायो डीज़ल मिला दिया जाए तो भारत को हर साल चार हज़ार करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा की बचत होगी. इतना ही नहीं इतने बड़े पैमाने पर रतनजोत की खेती से देश के क़रीब 19 लाख ग्रामीणों को रोज़गार भी मिल जाएगा. इसके बाद उससे प्राप्त तेल परिशोधन और विपणन के काम से भी अन्य लाखों लोगों को रोज़गार उपलब्ध हो सकेगा.

रतनजोत के बीजों से उपलब्ध बायो डीज़ल वाहनों के लिए एक बेहतर ईंधन साबित हो रहा है. इसे देखते हुए सार्वजनिक तेल कंपनी इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन और भारतीय रेलवे ने संयुक्त रूप से रेल की पटरियों के आसपास की बेकार पड़ी ज़मीन पर रतनजोत की खेती करने का अभियान शुरू कर दिया है. रतनजोत से मिले बायो डीज़ल का दुनिया की नामी कार निर्माता कंपनी अपनी मर्सिडीज बैंज कारों में सफलतापूर्वक इस्तेमाल कर चुकी है. बायो डीज़ल के उत्साहवर्धक नतीजे सामने आने पर इंडियन ऑयल ने न केवल इसकी बड़े पैमाने पर रेलवे के साथ योजना शुरू कर दी है, बल्कि वह तेल एवं गैस संरक्षण पखवाड़े क़े दौरान किसानों को उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए इसकी खेती करने के लिए प्रोत्साहित भी कर रही है. भारतीय रेलवे ने भी लखनऊ यार्ड में अपने इंजनों में बायो डीज़ल उपयुक्त पाया है. इसके अलावा हरियाणा रोडवेज़ की बसों में भी बायो डीज़ल मिश्रित ईंधन का इस्तेमाल किया जा रहा है. छत्तीसगढ़ क़े मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की कार भी बायो डीज़ल से ही चलती है.रतनजोत की खेती के मामले में छत्तीसगढ़ राज्य काफ़ी आगे है. छत्तीसगढ़ बायो-फ्यूल विकास प्राधिकरण के मुताबिक़ रतनजोत की खेती को यहां नक़दी फ़सल की श्रेणी में रखा गया है और इसके लिए समर्थन मूल्य की भी घोषणा की गई है. साथ ही कार्बन क्रेडिट अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विक्रय करने संबंधी प्रक्रिया शुरू की गई है. इस समय राज्य की क़रीब 86 हजार हेक्टेयर भूमि पर रतनजोत की खेती की जा रही है. वित्तवर्ष 2005-06 में राज्य में पांच करोड़ पौधे लगाए गए थे. वित्तवर्ष 2006-07 में 16 करोड़ 16 लाख पौधे लगाने का लक्ष्य है, जबकि आगामी वित्तवर्ष के लिए यह लक्ष्य 20 करोड़ तय किया गया है. पिछले वित्तवर्ष के दौरान राज्य में छह करोड़ से ज्यादा रतनजोत के पौधे किसानों को वितरित किए गए. चालू वित्त वर्ष में 16 करोड़ पौधे तैयार किए जा रहे हैं. निजी निवेशक भी रतनजोत की खेती के प्रति विशेष रूचि दिखा रहे हैं. क़रीब 118 निजी निवेशकों से रतनजोत का पौधारोपण और बायो डीज़ल संयंत्र स्थापना संबंधी प्रस्ताव राज्य सरकार को मिल चुके हैं. राज्य के ग्राम पंचायतों में सौ लीटर प्रति बैच क्षमता के मिनी बायो डीज़ल संयंत्रों की स्थापना की जाएगी.

मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का मानना है कि रतनजोत से राज्य में एक नई क्रांति की शुरुआत हुई है. सस्ते बायो डीज़ल इसके दूसरी ओर विपक्षी दलों के नेता सत्ता से जुड़े लोगों पर बायो डीज़ल के नाम पर भूमि पर कब्ज़ा करने और सरकारी धन के दुरुपयोग के आरोप लगा रहे हैं. दुर्ग के किसान हरकू राम का आरोप है कि उसकी डेढ़ एकड़ ज़मीन दबा ली गई है. अपनी ज़मीन से कब्ज़ा हटवाने के लिए उसे उसे सरकारी दफ़्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं. पूर्व मंत्री नंदकुमार पटेल व अन्य नेताओं का मानना है कि सरकार इसे लेकर जितनी उत्साहित है, उसके हिसाब से नतीजे सामने नहीं आ रहे हैं. कई जगह सिर्फ़ कागज़ों में ही रतनजोत का पौधारोपण हुआ है. इन नेताओं का यह भी मानना है कि रतनजोत की ग्लोबल पैटर्न पर फ़सल चक्र में बदलाव करना देश की ज़रूरत के विपरीत है.

इससे देश में खाद्य सुरक्षा का संकट पैदा हो जाएगा. अमेरिकी साम्राज्य के इशारे पर विश्व बैंक विकासशील देशों पर पश्चिमी देशों की ज़रूरत की वस्तुओं का उत्पादन करने का दबाव डाल रहा है. अगर किसान खाद्य की खेती छोडक़र रतनजोत उगाने लगे तो राज्य और देश को खाद्य के मामले में विदेशों पर निर्भर होना पडेग़ा. हिसार स्थित चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों का भी यही मानना है कि किसानों को अनुपयोगी भूमि या अन्य फसलों के साथ ही इसे उगाना चाहिए. इसकी खेती के लिए पहले कृषि उपयोग में आ रही भूमि को न चुना जाए, क्योंकि ऐसी हालत में किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाएगा. इसके लिए यह भी ज़रूरी है कि रतनजोत से तेल निकालने के लिए कई किसान मिलकर संयुक्त रूप से प्लांट लगाएं. अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो उन्हें केवल बीजों की ही कीमत मिल पाएगी. इससे मिलने वाले ग्लिसरीन व अन्य पदार्थों का लाभ उन्हें नहीं मिल पाएगा और ऐसी स्थिति में प्लांट लगाने वाले ही चांदी कूटेंगे.

गौरतलब है कि कोलकाता स्थित ब्रिटिश इंस्टीटयूट ने वर्ष 1930 में ऊर्जा फसलों की फ़ेहरिस्त में रतनजोत को प्रथम स्थान पर रखा था. मगर तब से लेकर आज तक देश के विभिन्न वैज्ञानिक एवं शिक्षण अनुसंधान संस्थानों में लैटिन अमेरिकी मूल (मैक्सिको) के इस पौधे को लेकर कई अनुसंधान हुए और इसके फ़ायदों का विवरण इकट्ठा किया गया. मगर इसकी खेती को बढ़ावा देने के लिए कोई विशेष क़दम नहीं उठाया गया, जिसके कारण यह महत्वपूर्ण व उपयोगी पौधा उपेक्षित रहा. शुरुआत के वर्षों में रतनजोत 800 से 3500 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक बीज का उत्पादन करता है. पांचवें साल से यह 1200 से पांच हजार किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक बीज देता है. इसके एक पौधे से 40 से 45 साल तक बीज लिए जा सकते हैं. यूं तो रतनजोत की कई किस्में हैं, लेकिन इसकी सबसे उपयोगी किस्म है रतनजोत करकास. इसके सूखे बीजों में 30 से 35 फीसदी तक तेल होता है. यह तेल बायो डीजल के तौर पर इस्तेमाल होता ही है, साथ ही यह कई प्रकार की औषधियों में भी काम आता है. मोमबत्ती, साबुन और सौंदर्य प्रसाधन सामग्रियों को बनाने में भी इसका इस्तेमाल होता है. इससे कीमती ग्लिसरीन प्राप्त होती है. तेल निकालने के बाद बची खली और सूखी पत्तियों से खाद बनाई जाती है. इसके छिलकों से उच्च स्तर का एक्टिवेटेड चारकोल बनता है, जिसकी रसायन उद्योग में काफी मांग है. हिसार स्थित चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों का मानना है कि रतनजोत की खेती से जहां भूमि क्षरण जैसी समस्याओं से निजात मिलेगी, वहीं इसके तेल के इस्तेमाल से धरती के बढ़ते तापमान को कम किया जा सकेगा, क्योंकि भूमि को उपजाऊ बनाने के अलावा यह वातावरण से कार्बन डाई ऑक्साइड गैस घटाने में भी एक अहम भूमिका निभाता है.
(विभिन्न समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं में प्रकाशित)

3 Comments:

vipinkizindagi said...

dhanyavad jankari ke liye,

mujhe ratanjot ke is upyog ke bare me jankari nahi thi.

sayeed.journalist said...

शानदार और जानकारी से सराबोर लेख के लिए शुक्रिया...

Udan Tashtari said...

आभार जानकारी के लिए.

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