Sunday, August 12, 2018

बाढ़ के क़हर को रोकने की दरकार

फ़िरदौस ख़ान
बरसात का मौसम शुरू ही देश के कई राज्य बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं. बाढ़ से जान व माल का भारी नुक़सान होता है. लाखों लोग बाढ़ से प्रभावित होते हैं. कितने ही लोग बाढ़ की वजह से मौत की आग़ोश में समा जाते हैं. सैकड़ों मकान क्षतिग्रस्त हो जाते हैं,  हज़ारों लोगों को बेघर होकर शरणार्थी जीवन गुज़ारने को मजबूर होना पड़ता हैं. खेतों में खड़ी फ़सलें तबाह हो जाती हैं.

देश में बाढ़ आने के कई कारण हैं. बाढ़ अमूमन उत्तर पूर्वी राज्यों को ही निशाना बनाती है. इसकी सबसे बड़ी वजह है कि चीन और ऊपरी पहाड़ों में भारी बारिश होती है और वर्षा का यह पानी भारत के निचले इलाक़ों की तरह बहता है. फिर यही पानी तबाही की वजह बनता है. नेपाल में भारी बारिश का पानी भी बिहार की कोसी नदी को उफ़ान पर ला देता है, जिससे नदी के रास्ते में आने वाले इलाक़े पानी में डूब जाते हैं. ग़ौरतलब है कि कोसी नदी नेपाल में हिमालय से निकलती है. यह नदी बिहार में भीम नगर के रास्ते भारत में दाख़िल होती है. कोसी बिहार में भारी तबाही मचाती है, इसलिए इसे बिहार का शोक या अभिशाप भी कहा जाता है. कोसी नदी हर साल अपनी धारा बदलती रहती है. साल 1954 में भारत ने नेपाल के साथ समझौता करके इस पर बांध बनाया था. हालांकि बांध नेपाल की सीमा में बनाया गया है, लेकिन इसके रखरखाव का काम भारत के ज़िम्मे है. नदी के तेज़ बहाव के कारण यह बांध कई बार टूट चुका है. आधिकारिक जानकारी के मुताबिक़ बांध बनाते वक्त आकलन किया गया था कि यह नौ लाख क्यूसेक पानी के बहाव को सहन कर सकता है और बांध की उम्र 25 साल आंकी गई थी. पहली बार यह बांध 1963 में टूटा. इसके बाद 1968 में पांच जगहों से यह टूटा. उस वक़्त कोसी का बहाव नौ लाख 13 हज़ार क्यूसेक मापा गया था. फिर साल 1991 नेपाल के जोगनिया और 2008 में नेपाल के ही कुसहा नामक स्थान पर बांध टूट गया. हैरानी की बात यह रही कि उस वक़्त नदी का बहाव महज़ एक लाख 44 हज़ार क्यूसेक था. फ़िलहाल कोसी पर बने बांध में जगह-जगह दरारें पड़ी हुई हैं.

कोसी की तरह गंडक नदी भी नेपाल के रास्ते बिहार में दाख़िल करती है. गंडक को नेपाल में सालिग्राम और मैदान में नारायणी कहते हैं. यह पटना में आकर गंगा में मिल जाती है. बरसात में गंडक भी उफ़ान पर होती है और इसके आसपास के इलाक़े बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं. ग़ौरतलब है कि बांग्लादेश के बाद भारत ही दुनिया का दूसरा सर्वाधिक बाढ़ग्रस्त देश है. देश में कुल 62 प्रमुख नदी प्रणालियां हैं, जिनमें से 18 ऐसी हैं जो अमूमन बाढ़ग्रस्त रहती हैं. उत्तर-पूर्व में असम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा और उत्तर प्रदेश तथा दक्षिण में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु बाढ़ग्रस्त इलाके माने जाते हैं, लेकिन कभी-कभार देश के अन्य राज्य भी बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं. पश्चिम बंगाल की मयूराक्षी, अजय, मुंडेश्वरी, तीस्ता और तोर्सा नदियां तबाही मचाती हैं, ओडिशा में सुवर्णरेखा, बैतरनी, ब्राह्मणी, महानंदा, ऋषिकुल्या, वामसरदा नदियां उफ़ान पर रहती हैं. आंध्रप्रदेश में गोदावरी और तुंगभद्रा, त्रिपुरा में मनु और गुमती, महाराष्ट्र में वेणगंगा, गुजरात और मध्य-प्रदेश में नर्मदा नदियों की वजह से इनके तटवर्ती इलाक़ों में बाढ़ आती है.

बाढ़ से हर साल करोड़ों रुपये का नुक़सान होता है, लेकिन नुक़सान का यह अंदाज़ा वास्तविक नहीं होता. बाढ़ से हुए नुक़सान की सही राशि का अंदाज़ा लगाना आसान नहीं है, क्योंकि बाढ़ से मकान व दुकानें क्षतिग्रस्त होती हैं. फ़सलें तबाह हो जाती हैं. लोगों का कारोबार ठप हो जाता है. बाढ़ के साथ आने वाली बीमारियों की वजह से स्वास्थ्य सेवाओं पर भी काफ़ी पैसा ख़र्च होता है. लोगों को बाढ़ से नुक़सान की भरपाई में काफ़ी वक़्त लग जाता है. यह कहना ग़लत न होगा कि बाढ़ किसी भी देश, राज्य या व्यक्ति को कई साल पीछे कर देती है. बाढ़ से उसका आर्थिक और सामाजिक विकास ठहर जाता है. इसलिए बाढ़ से होने वाले नुक़सान का सही अंदाज़ा लगाना बेहद मुश्किल है.

जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक़, देश में पिछले साढ़े छह दशक के दौरान बाढ़ से सालाना औसतन 1654 लोगों की मौत हुई और 92763 पशुओं की जान गई. इससे सालाना औसतन 71.69 लाख हेक्टेयर इलाक़े पर असर पड़ा और तकरीबन 1680 करोड़ रुपये फ़सलें तबाह हो गईं. बाढ़ से सालाना 12.40 लाख मकानों को नुक़सान पहुंचा. साल 1953 से 2017 के कुल नुक़सान पर नज़र डालें, तो देश में बाढ़ की वजह से 46.60 करोड़ हेक्टेयर इलाक़े में 205.8 करोड़
लोग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. इस दौरान 8.06 करोड़ मकानों को नुक़सान पहुंचा है. अफ़सोस की बात है कि हर साल बाढ़ से होने वाले जान व माल के नुकसान में बढ़ोतरी हो रही है, जो बेहद चिंताजनक है.

पिछले सात दशकों में देश में अनेक बांध बनाए गए हैं. साथ ही पिछले क़रीब तीन दशकों से बाढ़ नियंत्रण में मदद के लिए रिमोट सेंसिंग और भौगोलिक सूचना व्यवस्था का भी इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन संतोषजनक नतीजे सामने नहीं आ पा रहे हैं. बाढ़ से निपटने के लिए 1978 में केंद्रीय बाढ़ नियंत्रण बोर्ड का गठन किया गया था. देश के कुल 32.9 करोड़ हेक्टेयर में से तक़रीबन 4.64 करोड़ हेक्टेयर भूमि बाढ़ प्रभावित इलाक़े में आती है. देश में हर साल तक़रीबन 4000 अरब घन मीटर बारिश होती है.

हैरत का बात यह भी है कि बाढ़ एक राष्ट्रीय आपदा है, इसके बावजूद इसे राज्य सूची में रखा गया है. इसके तहत केंद्र सरकार बाढ़ से संबंधित कितनी ही योजनाएं बना ले, लेकिन उन पर अमल करना राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है. प्रांतवाद के कारण राज्य बाढ़ से निपटने के लिए पर्याप्त उपाय नहीं कर पाते. एक राज्य की बाढ़ का पानी समीपवर्ती राज्य के इलाक़ों को भी प्रभावित करता है. मसलन हरियाणा का बाढ़ का पानी राजधानी दिल्ली में छोड़ दिया जाता है, जिससे यहां के इलाक़े पानी में डूब जाते हैं. राज्यों में हर साल बाढ़ की रोकथाम के लिए योजनाएं बनाई जाती हैं, मगर प्रशासनिक लापरवाही की वजह से इन योजनाओं पर ठीक से अमल नहीं हो पाता. नतीजतन, यह योजनाएं महज़ काग़जों तक ही सिमट कर जाती हैं. हालांकि बाढ़ को रोकने के लिए सरकारी स्तर पर योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनमें बाढ़ प्रभावित इलाकों में बांध बनाना, नदियों के कटान वाले इलाक़ों में कटान रोकना, पानी की निकासी वाले नालों की सफ़ाई और उनकी सिल्ट निकालना, निचले इलाक़ों के गांवों को ऊंचा करना, सीवरेज व्यवस्था को सुधारना और शहरों में नालों के रास्ते आने वाले कब्ज़ों को हटाना आदि शामिल है.

क़ाबिले-ग़ौर है कि विकसित देशों में आगजनी, तूफ़ान, भूकंप और बाढ़ के लिए क़स्बों का प्रशासन भी पहले से तैयार रहता है. उन्हें पहले से पता होता है कि किस पैमाने पर, किस आपदा की दशा में, उन्हें क्या-क्या करना है. वे बिना विपदा के छोटे पैमाने पर इसका अभ्यास करते रहते हैं. गली-मोहल्लों के हर घर तक यह सूचना मीडिया या डाक के ज़रिये संक्षेप में पहुंचा दी जाती है कि किस दशा में उन्हें क्या करना है. संचार व्यवस्था के टूटने पर भी वे प्रशासन से क्या उम्मीद रख सकते हैं. पहले तो वे इसकी रोकथाम की कोशिश करते हैं. इसमें विशेषज्ञों की सलाह ली जाती है. इस प्रक्रिया को आपदा प्रबंधन कहते हैं. आग तूफ़ान और भूकंप के दौरान आपदा प्रबंधन एक ख़र्चीली प्रक्रिया है, लेकिन बाढ़ का आपदा नियंत्रण उतना ख़र्चीला काम नहीं है. इसे बख़ूबी बाढ़ आने वाले इलाक़ों में लागू किया जा सकता है. विकसित देशों में बाढ़ के आपदा प्रबंधन में सबसे पहले यह ध्यान रखा जाता है कि मिट्टी, कचरे वगैरह के जमा होने से इसकी गहराई कम न हो जाए. इसके लिए नदी के किनारों पर ख़ासतौर से पेड़ लगाए जाते हैं, जिनकी जड़ें मिट्टी को थामकर रखती हैं. नदी किनारे पर घर बसाने वालों के बग़ीचों में भी अनिवार्य रूप से पेड़ लगवाए जाते हैं. जहां बाढ़ का ख़तरा ज़्यादा हो, वहां नदी को और अधिक गहरा कर दिया जाता है. गांवों तक में पानी का स्तर नापने के लिए स्केल बनी होती है.

हमारे देश में भी प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए पहले से ही तैयार रहना होगा. इसके लिए जहां प्रशासन को चाक-चौबंद रहने की ज़रूरत है, वहीं जनमानस को भी प्राकृतिक आपदा से निपटने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए. स्कूल, कॉलेजों के अलावा जगह-जगह शिविर लगाकर लोगों को यह प्रशिक्षण दिया जा सकता है. इसमें स्वयंसेवी संस्थाओं की भी मदद ली जा सकती है. इस तरह प्राकृतिक आपदा से होने वाले नुक़सान को कम किया जा सकता है.

Saturday, June 30, 2018

प्लास्टिक कचरे से गहराता संकट

फ़िरदौस ख़ान                                    
प्लास्टिक ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा बन चुका है. अमूमन हर चीज़ के लिए प्लास्टिक का इस्तेमाल हो रहा है, वो चाहे दूध हो, तेल, घी, आटा, चावल, दालें, मसालें, कोल्ड ड्रिंक, शर्बत, सनैक्स, दवायें, कपड़े हों या फिर ज़रूरत की दूसरी चीज़ें सभी में प्लास्टिक का इस्तेमाल हो रहा है. बाज़ार से फल या सब्ज़ियां ख़रीदो, तो वे भी प्लास्टिक की ही थैलियों में ही मिलते हैं. प्लास्टिक के इस्तेमाल की एक बड़ी वजह यह भी है कि टिन के डिब्बों, कपड़े के थैलों और काग़ज़ के लिफ़ाफ़ों के मुक़ाबले ये सस्ता पड़ता है. पहले कभी लोग राशन, फल या तरकारी ख़रीदने जाते थे, तो प्लास्टिक की टोकरियां या कपड़े के थैले लेकर जाते थे. अब ख़ाली हाथ जाते हैं, पता है कि प्लास्टिक की थैलियों में सामान मिल जाएगा. अब तो पत्तल और दोनो की तर्ज़ पर प्लास्टिक की प्लेट, गिलास और कप भी ख़ूब चलन में हैं. लोग इन्हें इस्तेमाल करते हैं और फिर कूड़े में फेंक देते हैं. लेकिन इस आसानी ने कितनी बड़ी मुश्किल पैदा कर दी है, इसका अंदाज़ा अभी जनमानस को नहीं है.

दरअसल, प्लास्टिक कचरा पर्यावरण के लिए एक गंभीर संकट बन चुका है. केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक़ देश में सबसे ज़्यादा प्लास्टिक कचरा बोतलों से आता है. साल 2015-16 में करीब 900 किलो टन प्लास्टिक बोतल का उत्पादन हुआ था. राजधानी दिल्ली में अन्य महानगरों के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा प्लास्टिक कचरा पैदा होता है. साल 2015 के आंकड़ों की मानें, तो दिल्ली में 689.52 टन, चेन्नई में 429.39 टन, मुंबई में 408.27 टन, बेंगलुरु में 313.87 टन और हैदराबाद में 199.33 टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है. सिर्फ़ दस फ़ीसद प्लास्टिक कचरा ही रि-साइकिल किया जाता है, बाक़ी का 90 फ़ीसद कचरा पर्यावरण के लिए नुक़सानदेह साबित होता है.
रि-साइक्लिंग की प्रक्रिया भी प्रदूषण को बढ़ाती है. रि-साइकिल किए गए या रंगीन प्लास्टिक थैलों में ऐसे रसायन होते हैं, जो ज़मीन में पहुंच जाते हैं और इससे मिट्टी और भूगर्भीय जल विषैला बन सकता है. जिन उद्योगों में पर्यावरण की दृष्टि से बेहतर तकनीक वाली रि-साइकिलिंग इकाइयां नहीं लगी होतीं. उनमें रि-साइक्लिंग के दौरान पैदा होने वाले विषैले धुएं से वायु प्रदूषण फैलता है. प्लास्टिक एक ऐसा पदार्थ है, जो सहज रूप से मिट्टी में घुल-मिल नहीं सकता. इसे अगर मिट्टी में छोड़ दिया जाए, तो भूगर्भीय जल की रिचार्जिंग को रोक सकता है. इसके अलावा प्लास्टिक उत्पादों के गुणों के सुधार के लिए और उनको मिट्टी से घुलनशील बनाने के इरादे से जो रासायनिक पदार्थ और रंग आदि उनमें आमतौर पर मिलाए जाते हैं, वे भी अमूमन सेहत पर बुरा असर डालते हैं.

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि प्लास्टिक मूल रूप से नुक़सानदेह नहीं होता, लेकिन प्लास्टिक के थैले अनेक हानिकारक रंगों, रंजक और अन्य तमाम प्रकार के अकार्बनिक रसायनों को मिलाकर बनाए जाते हैं. रंग और रंजक एक प्रकार के औद्योगिक उत्पाद होते हैं, जिनका इस्तेमाल प्लास्टिक थैलों को चमकीला रंग देने के लिए किया जाता है. इनमें से कुछ रसायन कैंसर को जन्म दे सकते हैं और कुछ खाद्य पदार्थों को विषैला बनाने में सक्षम होते हैं. रंजक पदार्थों में  कैडमियम जैसी जो धातुएं होती हैं, जो सेहत के लिए बेहद नुक़सानदेह हैं. थोड़ी-थोड़ी मात्रा में कैडमियम के इस्तेमाल से उल्टियां हो सकती हैं और दिल का आकार बढ़ सकता है. लम्बे समय तक जस्ता के इस्तेमाल से मस्तिष्क के ऊतकों का क्षरण होने लगता है.

हालांकि पर्यावरण और वन मंत्रालय ने रि-साइकिंल्ड प्लास्टिक मैन्यूफैक्चर एंड यूसेज़ रूल्स-1999 जारी किया था. इसे 2003 में पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम-1968 के तहत संशोधित किया गया है, ताकि प्लास्टिक की थैलियों और डिब्बों का नियमन और प्रबंधन सही तरीक़े से किया जा सके. भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) ने धरती में घुलनशील प्लास्टिक के 10 मानकों के बारे में अधिसूचना जारी की थी, मगर इसके बावजूद हालात वही 'ढाक के तीन पात' वाले ही हैं.

हालांकि दिल्ली समेत देश के कई राज्यों में पॉलीथिन और प्लास्टिक से बनी सामग्रियों पर रोक लगाने का ऐलान किया जा चुका है. इसका उल्लंघन करने पर जुर्माने और क़ैद का प्रावधान भी है.प्लास्टिक के इस्तेमाल से होने वाली समस्याएं ज़्यादातर कचरा प्रबंधन प्रणालियों की ख़ामियों की वजह से पैदा हुई हैं. प्लास्टिक का यह कचरा नालियों और सीवरेज व्यवस्था को ठप कर देता है. इतना ही नहीं नदियों में भी इनकी वजह से बहाव पर असर पड़ता है और पानी के दूषित होने से मछलियों की मौत तक हो जाती है. नदियों के ज़रिये प्लास्टिक का ये कचरा समुद्र में भी पहुंच रहा है. वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम की रिपोर्ट के मुताबिक़ हर साल तकरीबन 80 लाख टन कचरा समंदरों में मिल रहा है. समंदरों में जो प्लास्टिक कचरा मिल रहा है, उसका तक़रीबन 90 फ़ीसद हिस्सा दस नदियों से आ रहा है, जिनमें यांग्त्जे, गंगा, सिंधु, येलो, पर्ल, एमर, मिकांग, नाइल और नाइजर नदियां शामिल हैं. इनमें से आठ नदियां एशिया की हैं. इनमें सबसे ज़्यादा पांच नदियां चीन की, जबकि दो नदियां भारत और एक अफ़्रीका की है. चीन ने 46 शहरों में कचरे को क़ाबू करने का निर्देश जारी किया है, ताकि नदियों के प्रदूषण को कम किया जा सके. प्लास्टिक पशुओं की मौत का भी सबब बन रहा है. कूड़े के ढेर में पड़ी प्लास्टिक की थैलियों को खाकर आवारा पशुओं की बड़ी तादाद में मौतें हो रही हैं.

प्लास्टिक के कचरे की समस्या से निजात पाने के लिए प्लास्टिक थैलियों के विकल्प के रूप में जूट से बने थैलों का इस्तेमाल ज़्यादा से ज़्यादा किया जाना चाहिए. साथ ही प्लास्टिक कचरे का समुचित इस्तेमाल किया जाना चाहिए. देश में सड़क बनाने और दीवारें बनाने में इसका इस्तेमाल शुरू हो चुका है. प्लास्टिक को इसी तरह अन्य जगह इस्तेमाल करके इसके कचरे की समस्या से निजात पाई जा सकती है. बहरहाल, प्लास्टिक कचरे से निपटने के लिए बेहद ज़रूरी है कि इसके प्रति जनमानस को जागरूक किया जाए, क्योंकि इस मुहिम में जनमानस की भागीदारी बहुत ज़रूरी है. इसके लिए जन आंदोलन चलाया जाना चाहिए.

Friday, June 22, 2018

सेवा दल को कांग्रेस की तवज्जो मिली

फ़िरदौस ख़ान 
देश में कुछ संगठन ऐसे हैं, जो निस्वार्थ भाव से जन सेवा के काम में जुटे हैं. अखिल भारतीय कांग्रेस सेवा दल भी एक ऐसा ही संगठन है, जो मुश्किल वक़्त में लोगों की मदद करता है. कहीं बाढ़ आए, सूखा पड़े या फिर कोई और मुसीबत आए, संगठन के कार्यकर्ता राहत के कामों में बढ़ चढ़कर शिरकत करते हैं. दरअसल, जंगे-आज़ादी के वक़्त वजूद में आए इस संगठन का मक़सद ही सामाजिक समरसता को बनाए रखना और देश के नवनिर्माण में योगदान देना है. समाज सेवा के साथ-साथ कांग्रेस को मज़बूत करने में भी इसने अपना अहम किरदार अदा किया है.

पिछले कुछ अरसे से कांग्रेस की अनदेखी के शिकार इस संगठन की गतिविधियां फिर से तेज़ हो गई हैं. कांग्रेस ने अब अपने आनुषांगिक संगठन सेवा दल पर तवज्जो देनी शुरू कर दी है. यह संगठन हर महीने के आख़िरी रविवार को देशभर के एक हज़ार क़स्बों, शहरों और महानगरों में ’ध्वज वंदन’ कार्यक्रम करेगा. इन कार्यक्रमों में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी आदि के सिद्धांतों और विचारों को जनमानस के सामने रखा जाएगा और उनकी प्रासंगिकता पर चर्चा की जाएगी.

हाल में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने सेवा दल के प्रस्तावों को अपनी मंज़ूरी दी है. उन्होंने सेवा दल के पदाधिकारियों को यक़ीन दिलाया है कि पहले की तरह ही यह संगठन आज़ाद होकर काम करेगा. सेवा दल की कार्यकारिणी की दो दिवसीय बैठक में संगठन के पदाधिकारियों ने उनके समक्ष कई प्रस्ताव रखे थे, जिसे उन्होंने मंज़ूर कर लिया.

 सेवा दल के मुख्य संगठक लालजी भाई देसाई का कहना है कि सेवा दल अब पहले की तरह सक्रिय नहीं है. अब तो सेवा दल को कांग्रेस के कार्यक्रमों की ज़िम्मेदारी भी नहीं दी जाती है. मौजूदा हालात को देखते हुए सेवा दल को फिर से खड़ा करने की कोशिश की जा रही है. इसी सिलसिले में कांग्रेस अध्यक्ष के सामने कुछ सुझाव रखे गए.

ग़ौरतलब है कि डॉ. नारायण सुब्बाराव हार्डिकर ने 1 जनवरी, 1924 को आंध्र प्रदेश के काकिनाडा में कांग्रेस सेवा दल की स्थापना की थी. इसके पहले अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू थे. देश को आज़ाद कराने की मुहिम में शामिल कांग्रेस के क़द्दावर नेता इस संगठन से जुड़े हुए थे. सीमाप्रांत और बलूचिस्तान के महान राजनेता ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान के संगठन लाल कुर्ती का विलय भी सेवादल में किया गया था. आज़ादी की मुहिम में सेवा दल के अहम किरदार के मद्देनज़र साल 1931 में इसका आज़ाद वजूद ख़त्म करके इसे कांग्रेस का हिस्सा बना दिया गया. कहा जाता है कि ये फ़ैसला सरदार बल्लभ भाई पटेल की सिफ़ारिश पर किया गया था. उन्हें डर था कि सेवा दल कहीं अपने मातृ संगठन कांग्रेस को ही ख़त्म न कर दे. अपनी इस आशंका का ज़िक्र करते हुए उन्होंने महात्मा गांधी से कहा था कि ‘अगर सेवादल को आज़ाद छोड़ दिया गया, तो वह हम सबको लील जाएगा.’
पहले इसे हिन्दुस्तानी सेवा दल के नाम से जाना जाता था, बाद इसे कांग्रेस सेवा दल का नाम दिया. दरअसल, कांग्रेसियों ने महिला सेना का गठन किया था. इस पर कार्रवाई करते हुए साल 1932 में बिटिश शासकों ने सेवा दल पर पाबंदी लगा दी थी, बाद में कांग्रेस से तो पाबंदी हटा ली गई, लेकिन हिन्दुस्तानी सेवा दल पर पाबंदी जारी रही. बाद में यह संगठन कांग्रेस सेवा दल के नाम से वजूद में आया.

क़ाबिले-ग़ौर यह भी है कि देश को आज़ादी मिलने के बाद कांग्रेस हुकूमत में आ गई. कांग्रेस का सारा ध्यान सत्ता संभालने में लग गया. कांग्रेस के कई नये आनुषांगिक संगठन वजूद में आते गए और बदलते वक़्त के साथ-साथ सेवा दल की अनदेखी होने लगी. सेवा दल के कार्यकर्ताओं को मलाल है कि उन्हें महज़ रवायती बना दिया गया. कांग्रेस के समारोहों में उनकी ज़िम्मेदारी वर्दी पहनकर इंतज़ामों की देखरेख की रह गई.  जिस मक़सद से सेवा दल का गठन किया गया था, वह कहीं पीछे छूटने लगा. लेकिन इस सबके बावजूद सेवा दल के कार्यकर्ता अपने काम में लगे रहे. वे सामाजिक कार्यों में पहले की तरह ही बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते रहे, चाहे प्राकृतिक आपदाओं में पीडि़तों की मदद करनी हो या फिर महाकुंभ जैसे धार्मिक आयोजनों और महोत्सवों में श्रद्धालुओं के रहने और भोजन का इंतज़ाम करना हो. हर जगह इनकी मौजूदगी नज़र आती है.  

कांग्रेस के अग्रिम संगठनों में सेवा दल का अनुशासन और निष्ठा इसे और भी ख़ास बनाती है. बिल्कुल फ़ौज की तरह इसका संचालन किया जाता है. एक दौर वह भी था जब सेवा दल में प्रशिक्षण लेने के बाद ही किसी को कांग्रेस में शामिल किया जाता था. कहा जाता है कि इंदिरा गांधी ने अपने बेटे राजीव गांधी को कांग्रेस में शामिल करने से पहले सेवा दल का प्रशिक्षण दिलाया था, ताकि वे पार्टी की नीतियों को बेहतर तरीक़े से समझ पाएं. निस्वार्थ सेवा और सहयोग भाव की वजह से ही सेवा दल को कांग्रेस का सच्चा सिपाही कहा जाता है.

फ़िलवक़्त देश के 700 ज़िलों और शहरों में सेवा दल की इकाइयां हैं. सेवा दल की एक युवा इकाई शुरू करने की योजना है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा युवाओं को इससे जोड़ा जा सके. आज जब कांग्रेस अपना खोया हुआ जनाधार वापस पाने और पार्टी को हुकूमत में लाने के लिए जद्दोजहद कर रही है, ऐसे में सेवा दल कांग्रेस के लिए बहुत मददगार साबित हो सकता है, बस इस पर ख़ास तवज्जो देने की ज़रूरत है. देश में फैले अराजकता और अविश्वास के माहौल को देखते हुए भी सेवा दल जैसे संगठनों की बेहद ज़रूरत है, जो सांप्रदायिक सौहार्द्र, सामाजिक समरसता और आपसी भाईचारे को बढ़ावा देने का काम करते हैं.

Monday, June 18, 2018

राहुल गांधी : भीड़ में भी तन्हा...

फ़िरदौस ख़ान
राहुल गांधी देश और राज्यों में सबसे लम्बे अरसे तक हुकूमत करने वाली कांग्रेस के अध्यक्ष हैं. वे एक ऐसे ख़ानदान के वारिस हैं, जिसने देश के लिए अपनी जानें क़ुर्बान की हैं. राहुल गांधी के लाखों-करोड़ों चाहने वाले हैं. देश-दुनिया में उनके प्रशंसकों की कोई कमी नहीं है. लेकिन इस सबके बावजूद वे अकेले खड़े नज़र आते हैं. उनके चारों तरफ़ एक ऐसा अनदेखा दायरा है, जिससे वे चाहकर भी बाहर नहीं आ पाते.  एक ऐसी दीवार है, जिसे वे तोड़ नहीं पा रहे हैं. वे अपने आसपास बने ख़ोल में घुटन तो महसूस करते हैं, लेकिन उससे निकलने की कोई राह, कोई तरकीब उन्हें नज़र नहीं आती.

बचपन से ही उन्हें ऐसा माहौल मिला, जहां अपने-पराये और दोस्त-दुश्मन की पहचान करना बड़ा मुश्किल हो गया था. उनकी दादी इंदिरा गांधी और उनके पिता राजीव गांधी का बेरहमी से क़त्ल कर दिया गया. इन हादसों ने उन्हें वह दर्द दिया, जिसकी ज़रा सी भी याद उनकी आंखें भिगो देती है. उन्होंने कहा था,  "उनकी दादी को उन सुरक्षा गार्डों ने मारा, जिनके साथ वे बैडमिंटन खेला करते थे."
वैसे राहुल गांधी के दुश्मनों की भी कोई कमी नहीं है. कभी उन्हें जान से मार देने की धमकियां मिलती हैं, तो कभी उनकी गाड़ी पर पत्थर फेंके जाते हैं. गुज़शता अप्रैल में उनका जहाज़ क्रैश होते-होते बचा. कर्नाटक के हुबली में उड़ान के दौरान 41 हज़ार फुट की ऊंचाई पर जहाज़ में तकनीकी ख़राबी आ गई और वह आठ हज़ार फ़ुट तक नीचे आ गया. उस वक़्त उन्हें लगा कि जहाज़ गिर जाएगा और उनकी जान नहीं बचेगी.  लेकिन न जाने किनकी दुआएं ढाल बनकर खड़ी हो गईं और हादसा टल गया. कांग्रेस ने राहुल गांधी के ख़िलाफ़ साज़िश रचने का इल्ज़ाम लगाया.
किसी अनहोनी की आशंका की वजह से ही राहुल गांधी हमेशा सुरक्षाकर्मियों से घिरे रहे हैं, इसलिए उन्हें वह ज़िन्दगी नहीं मिल पाई, जिसे कोई आम इंसान जीता है. बचपन में भी उन्हें गार्डन के एक कोने से दूसरे कोने तक जाने की इजाज़त नहीं थी. खेलते वक़्त भी सुरक्षाकर्मी किसी साये की तरह उनके साथ ही रहा करते थे. वे अपनी ज़िन्दगी जीना चाहते थे, एक आम इंसान की ज़िन्दगी. राहुल गांधी ने एक बार कहा था, "अमेरिका में पढ़ाई के बाद मैंने जोखिम उठाया और अपने सुरक्षा गार्डो से निजात पा ली, ताकि इंग्लैंड में आम ज़िन्दगी जी सकूं." लेकिन ऐसा ज़्यादा वक़्त नहीं हो पाया और वे फिर से सुरक्षाकर्मियों के घेरे में क़ैद होकर रह गए.

हर वक़्त कड़ी सुरक्षा में रहना, किसी भी इंसान को असहज कर देगा, लेकिन उन्होंने इसी माहौल में जीने की आदत डाल ली. ख़ौफ़ के साये में रहने के बावजूद उनका दिल मुहब्बत से सराबोर है. वे एक ऐसे शख़्स हैं, जो अपने दुश्मनों के लिए भी दिल में नफ़रत नहीं रखते. वे कहते हैं, “मेरे पिता ने मुझे सिखाया कि नफ़रत पालने वालों के लिए यह जेल होती है. मैं उनका आभार जताता हूं कि उन्होंने मुझे सभी को प्यार और सम्मान करना सिखाया.” अपने पिता की सीख को उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में ढाला. इसीलिए उन्होंने अपने पिता के क़ातिलों तक को माफ़ कर दिया. उनका कहना है, "वजह जो भी हो, मुझे किसी भी तरह की हिंसा पसंद नहीं है. मुझे पता है कि दूसरी तरफ़ होने का मतलब क्या होता है. ऐसे में जब मैं जब हिंसा देखता हूं चाहे वो किसी के भी साथ हो रही हो, मुझे पता होता है कि इसके पीछे एक इंसान, उसका परिवार और रोते हुए बच्चे हैं. मैं ये समझने के लिए काफ़ी दर्द से होकर गुजरा हूं. मुझे सच में किसी से नफ़रत करना बेहद मुश्किल लगता है."
उन्होंने लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (लिट्टे) के प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरण का ज़िक्र करते हुए कहा था, "मुझे याद है जब मैंने टीवी पर प्रभाकरण के मुर्दा जिस्म को ज़मीन पर पड़ा देखा. ये देखकर मेरे मन में दो जज़्बे पैदा हुए. पहला ये कि ये लोग इनकी लाश का इस तरह अपमान क्यों कर रहे हैं और दूसरा मुझे प्रभाकरण और उनके परिवार के लिए बुरा महसूस हुआ."

राहुल गांधी एक ऐसी शख़्सियत के मालिक हैं, जिनसे कोई भी मुतासिर हुए बिना नहीं रह सकता. देश के प्रभावशाली राज घराने से होने के बावजूद उनमें ज़र्रा भर भी ग़ुरूर नहीं है.  उनकी भाषा में मिठास और मोहकता है, जो सभी को अपनी तरफ़ आकर्षित करती है. वे विनम्र इतने हैं कि अपने विरोधियों के साथ भी सम्मान से पेश आते हैं, भले ही उनके विरोधी उनके लिए कितनी ही तल्ख़ भाषा का इस्तेमाल क्यों न करते रहें. किसी भी हाल में वे अपनी तहज़ीब से पीछे नहीं हटते. उनके कट्टर विरोधी भी कहते हैं कि राहुल गांधी का विरोध करना उनकी पार्टी की नीति का एक अहम हिस्सा है, लेकिन ज़ाती तौर पर वे राहुल गांधी को बहुत पसंद करते हैं. वे ख़ुशमिज़ाज, ईमानदार, मेहनती और सकारात्मक सोच वाले हैं.  बुज़ुर्ग उन्हें स्नेह करते हैं, उनके सर पर शफ़क़त का हाथ रखते हैं, उन्हें दुआएं देते हैं.  वे युवाओं के चहेते हैं. राहुल गांधी अपने विरोधियों का नाम भी सम्मान के साथ लेते हैं, उनके नाम के साथ जी लगाते हैं.  बड़ों के लिए उनके दिल में सम्मान है. उन्होंने जब सुना कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में दाख़िल कराए गए हैं, तो वे उनका हालचाल जानने के लिए अस्पताल पहुंच गए. वे इंसानियत को सर्वोपरि मानते हैं. अपने पिता की ही तरह अपने कट्टर विरोधियों की मदद करने में भी पीछे नहीं रहते. विभिन्न समारोहों में वे लाल्कृष्ण आडवाणी का भी ख़्याल रखते नज़र आते हैं.

राहुल गांधी छल और फ़रेब की राजनीति नहीं करते. वे कहते हैं,  ''मैं गांधीजी की सोच से राजनीति करता हूं. अगर कोई मुझसे कहे कि आप झूठ बोल कर राजनीति करो, तो मैं यह नहीं कर सकता. मेरे अंदर ये है ही नहीं. इससे मुझे नुक़सान भी होता है. 'मैं झूठे वादे नहीं करता. "  वे कहते हैं, 'सत्ता और सच्चाई में फ़र्क़ होता है. ज़रूरी नहीं है, जिसके पास सत्ता है उसके पास सच्चाई है.
वे कहते हैं, "जब भी मैं किसी देशवासी से मिलता हूं. मुझे सिर्फ़ उसकी भारतीयता दिखाई देती है. मेरे लिए उसकी यही पहचान है. अपने देशवासियों के बीच न मुझे धर्म, ना वर्ग, ना कोई और अंतर दिखता है."

कहते हैं कि सच के रास्ते में मुश्किलें ज़्यादा आती हैं और राहुल गांधी को भी बेहिसाब मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. बचपन से ही उनके विरोधियों ने उनके ख़िलाफ़ साज़िशें रचनी शुरू कर दी थीं.   उन पर लगातार ज़ाती हमले किए जाते हैं. इस बात को राहुल गांधी भी बख़ूबी समझते हैं, तभी तो उन्होंने विदेश जाने से पहले ट्वीट करके अपने विरोधियों से कहा था, "कुछ दिन के लिए देश से बाहर रहूंगा. भारतीय जनता पार्टी की सोशल मीडिया ट्रोल आर्मी के दोस्तों, ज़्यादा परेशान मत होना. मैं जल्द ही वापस लौटूंगा."

राहुल गांधी एक नेता हैं, जो पार्टी संगठन को मज़बूत करने के लिए, पार्टी को हुकूमत में लाने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं, लेकिन उनकी ही पार्टी के लोग ऐन चुनावों के मौक़ों पर ऐसे बयान दे जाते हैं, ऐसे काम कर जाते हैं, जिससे विरोधियों को उनके ख़िलाफ़ बोलने का मौक़ा मिल जाता है. इन लोगों में वे लोग भी शामिल हैं, जो उनकी दादी, उनके पिता के क़रीबी रहे हैं. ताज़ा मिसाल पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की है, जिन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में शिरकत करके सियासी बवाल पैदा कर दिया.

बहरहाल, राहुल गांधी तमाम अफ़वाहों और अपने ख़िलाफ़ रची जाने वाली तमाम साज़िशों से अकेले ही जूझ रहे है, मुस्कराकर उनका सामना कर रहे हैं.

Friday, June 15, 2018

कब रुकेगा भूख से मौतों का सिलसिला

फ़िरदौस ख़ान
देश में भूख से मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है. पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी शासित प्रदेश झारखंड से भूख से मरने की ख़बरें आईं. चतरा ज़िले के इतखोरी में मीना मुसहर नामक एक महिला की मौत हो गई. उसके बेटे का कहना है कि उसकी मां ने चार दिनों से अन्न का एक दाना तक नहीं खाया था. हालत बिगड़ने पर वह अपनी मां को अस्पताल ले गया, जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया. महिला कचरा बीनकर अपना गुज़ारा करती थी. इससे पहले शनिवार को गिरीडीह ज़िले के मनगारगड्डी की सावित्री देवी मौत हो गई थी. ग्रामीणों के मुताबिक़ महिला ने तीन दिनों से कुछ नहीं खाया था. वह भीख मांग कर अपना पेट भरती थी. भूख से मौत के ये पहले मामले नहीं हैं. ऐसे मामले सामने आते रहते हैं और सरकारें इन मामलों को गंभीरता से लेने की बजाय ख़ुद को बचाने के लिए लीपा-पोती में लग जाती हैं, जो बेहद शर्मनाक है.

दरअसल, भूख से मौत की समस्या सिर्फ़ हमारे देश में ही नहीं है, बल्कि यह आज पूरी दुनिया में फैली हुई है. भोजन मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है. इस मुद्दे को सबसे पहले अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति फ़्रेंकलिन रूज़वेल्ट ने अपने एक व्याख्यान में उठाया था. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान संयुक्त राष्ट्र ने इस मुद्दे को अपने हाथ में ले लिया और 1948 में आर्टिकल 25 के तहत भोजन के अधिकार के रूप में इसे मंज़ूर किया. साल 1976 में संयुक्त राष्ट्र परिषद ने इस अधिकार को लागू किया, जिसे आज 156 राष्ट्रों की मंज़ूरी हासिल है और कई देश इसे क़ानून का दर्जा भी दे रहे हैं. इस क़ानून के लागू होने से भूख से होने वाली मौतों को रोका जा सकेगा.

लेकिन तमाम कोशिशों और तमाम दावों के बावजूद लोगों को भरपेट भोजन तक नहीं मिल पा रहा है. हालत ये है कि दुनियाभर में भूख से जूझने वाले लोगों की वालों की तादाद  12 करोड़ 40 लाख हो गई. संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एजेंसी के प्रमुख डेविड बीसली के मुताबिक़ भूख से जूझ रहे तक़रीबन तीन करोड़ 20 लाख लोग चार देशों सोमालिया, यमन, दक्षिण सूडान और उत्तर पूर्व नाइजीरिया में हैं. दुनियाभर में भुखमरी का दंश झेल रहे  81 करोड़ 50 लाख लोगों में से 60 फ़ीसद लोग ऐसे संघर्षरत इलाकों में रहते हैं, जहां उन्हें यह तक मालूम नहीं होता कि उन्हें अगली बार खाना कब से मिलेगा.

एक अन्य रिपोर्ट की मानें, तो भूख और ग़रीबी की वजह से रोज़ाना 25 हज़ार लोगों की मौत हो जाती है. 85 करोड़ 40 लाख लोगों के पास पर्याप्त भोजन नहीं है, जो कि संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और यूरोपियन संघ की जनसंख्या से ज़्यादा है. भुखमरी के शिकार लोगों में 60 फ़ीसद महिलाएं हैं. दुनियाभर में भुखमरी के शिकार लोगों में हर साल 40 लाख लोगों का इज़ाफ़ा हो रहा है. हर पांच सेकेंड में एक बच्चा भूख से दम तोड़ता है. 18 साल से कम उम्र के तक़रीबन 35.8 से 45 करोड़ बच्चे कुपोषित हैं. विकासशील देशों में हर साल पांच साल से कम उम्र के औसतन 10 करोड़ 90 लाख बच्चे मौत का शिकार बन जाते हैं. इनमें से ज़्यादातर मौतें कुपोषण और भुखमरी से जनित बीमारियों से होती हैं. कुपोषण संबंधी समस्याओं से निपटने के लिए सालाना राष्ट्रीय आर्थिक विकास व्यय 20 से 30 अरब डॉलर है. विकासशील देशों में चार में से एक बच्चा कम वज़न का है. यह संख्या तक़रीबन एक करोड़ 46 लाख है.

हमारे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो फ़सल काटे जाने के बाद खेत में बचे अनाज और बाज़ार में पड़ी गली-सड़ी सब्ज़ियां बटोरकर किसी तरह उससे अपनी भूख मिटाने की कोशिश करते हैं. महानगरों में भी भूख से बेहाल लोगों को कूडे़दानों में से रोटी या ब्रेड के टुकड़ों को उठाते हुए देखा जा सकता है. रोज़गार की कमी और ग़रीबी की मार की वजह से कितने ही परिवार चावल के कुछ दानों को पानी में उबालकर पीने को मजबूर हैं. यह एक कड़वी सच्चाई है कि हमारे देश में आज़ादी के बाद से अब तक ग़रीबों की भलाई के लिए योजनाएं तो अनेक बनाई गईं, लेकिन लालफ़ीताशाही की वजह से वे महज़ काग़ज़ों तक ही सिमट कर रह गईं. एक तरफ़ गोदामों में लाखों टन अनाज सड़ता है, तो दूसरी तरफ़ भूख से लोग मर रहे होते हैं. ऐसी हालत के लिए क्या व्यवस्था सीधे तौर पर दोषी नहीं है? भुखमरी के स्थायी समाधान के लिए लोगों को रोज़गार मुहैया कराना होगा. केंद्र की पिछली यूपीए सरकार ने लोगों को बेहद मामूली दामों में अनाज मुहैया कराने की योजना बनाई थी. इसके तहत परिवार के प्रति सदस्य को सात किलो खाद्यान्न यानी 3 रुपये किलो गेहूं, 2 रुपये किलो चावल और एक रुपये किलो की दर से मोटा अनाज दिया जाना था. इस योजना का फ़ायदा हर ज़रूरतमंद व्यक्ति तक पहुंचे सरकार यह सुनिश्चित करना होगा.

ग़ौरतलब है कि पिछले साल  कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने राज्य को भूखमरी मुक्त बनाने के मक़सद से लोगों को सस्ता भोजन मुहैया कराने की एक सराहनीय योजना शुरू की थी. 16 अगस्त, 2017 को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बेंगलुरु के जयनगर वॉर्ड में इंदिरा कैंटीन का उद्घाटन किया था. तमिलनाडु के अम्मा कैंटीन के तर्ज़ पर बने इस इंदिरा कैंटीन में 5 रुपये में नाश्ता और 10 रुपये में दिन और रात का खाना मिलता है.  राहुल गांधी ने कर्नाटक में कांग्रेस सरकार की इस पहल को ‘सभी को भोजन’ के कांग्रेस के संकल्प की ओर एक और क़दम बताया था.  उन्होंने कहा कि बेंगलुरु में बहुत से लोग बड़े घरों में रहते हैं और महंगी कारों से चलते हैं. उनके लिए खाना बड़ा मुद्दा नहीं है, लेकिन यहां लाखों लोग ऐसे हैं, जिनके पास ज़्यादा पैसा नहीं है. इंदिरा कैंटीन इनकी सेवा करेगी. हम चाहते हैं कि शहर के सबसे ग़रीब और कमज़ोर तबक़े के लोग जानें कि वे भूखे नहीं रहने वाले. कैंटीन के भोजन की गुणवत्ता को परखने के लिए  उद्घाटन के बाद राहुल गांधी ने कैंटीन जाकर खाना भी खाया.

जिस देश में भूख से लोगों की मौतें होती हों, जहां करोड़ों लोग आज भी भूखे पेट सोते हों, ऐसे देश में सस्ता खाना मुहैया कराना बेहद ज़रूरी है. तमिलनाडु के ’अम्मा कैंटीन’ की तर्ज़ पर देश भर में कैंटीन खोले जाने चाहिए, ख़ासकर देश के उन हिस्सों में जो ग़रीबी की मार से बुरी तरह जूझ रहे हैं और जहां से बार-बार भूख और कुपोषण से लोगों के मरने की ख़बरें आती रहती हैं. दरअसल, देशभर में इस तरह की योजनाएं लागू करने की बेहद ज़रूरत है

Thursday, May 31, 2018

जनता बेहाल, सरकार मालामाल

फ़िरदौस ख़ान 
केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने 26 मई को चार साल पूरे कर लिए हैं. इन चार सालों को लेकर भारतीय जनता पार्टी के नेता और सरकार अपनी कामयाबी के कितने ही दावे कर लें, लेकिन हक़ीक़त यही है कि हर मोर्चे पर केंद्र सरकार नाकारा ही साबित हुई है. हालत यह है कि आम आदमी को इंसाफ़ मिलने की बात तो दूर, ख़ुद सर्वोच्च न्यायालय के चार जजों को इंसाफ़ के लिए जनता के बीच आना पड़ा. अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए सरकार ने हमेशा ग़ैर ज़रूरी मुद्दों को हवा दी है.  अवाम ने शिक्षा की बात की, तो शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने की बजाय जेएनयू और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में विवाद पैदा किए गए. अवाम ने रोज़गार मांगा, तो नोटबंदी कर उन्हें बैंक के सामने क़तारों में दिन-रात खड़ा रहने पर मजबूर कर दिया गया. स्वास्थ्य सेवाओं की बात करें, तो गोरखपुर के मृत बच्चों की लाशें सामने आ जाती हैं. ऒक्सीज़न की कमी से किस तरह वे तड़प-तड़प कर मौत की आग़ोश में चले गए. दरअसल, मुट्ठीभर अमीरों को छोड़कर देश की अवाम का बुरा हाल है. आलम ये है कि तीज-त्यौहारों के दिनों में भी लोगों के पास काम नहीं हैं. बाज़ार में भी मंदी छाई हुई है. दुकानदार दिन भर ग्राहकों का इंतज़ार करते है, लेकिन जब लोगों के पैसे होंगे, तभी तो वे कुछ ख़रीद पाएंगे. बड़े उद्योगपतियों को छोड़कर बाक़ी छोटे काम-धंधे करने वालों के काम ठप्प होकर रह गए हैं. बेरोज़गारी कम होने की बजाय दिनोदिन बढ़ रही है.

देश की अवाम त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रही है और ऐसे में केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी के नेता अपने चार साल के शासनकाल की उपलब्धियां गिनाते नहीं थक रहे हैं. बेशक इन चार सालों में केंद्र सरकार का काफ़ी भला हुआ है. उसके ख़ज़ाने लगातार भर रहे हैं. पेट्रोल पर भारी एक्साइज़ ड्यूटी से केंद्र को भारी मुनाफ़ा हुआ है. पिछले चार साल के दौरान इससे सरकार को 150 गुना ज़्यादा राजस्व मिला है. ग़ौरतलब है कि पिछली कांग्रेस नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार की एक्साइज़ ड्यूटी में मोदी सरकार 126 फ़ीसद बढोतरी कर चुकी है. पेट्रोल पर जहां केंद्र और राज्य सरकारें मालामाल होती हैं, वहीं उपभोक्ताओं को भारी नुक़सान होता है. केंद्र सरकार  पेट्रोल पर एक्साइज़ ड्यूटी लगाती है और राज्य सरकार अपने स्तर से वैट और बिक्री कर लगाती हैं, जिससे इसकी क़ीमत बहुत ज़्यादा बढ़ जाती है. पिछले साल मार्च में पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने लोकसभा में बताया था कि एक अप्रैल 2014 को मोदी सरकार से पहले पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी 9.48 रुपये और डीजल पर 3.56 रुपये थी. महज़ दो साल में एनडीए सरकार ने एक्साइज टैक्स में 126 फ़ीसद का इज़ाफ़ा किया, जिससे एक्साइज ड्यूटी बढ़कर 21.48 रुपये हो गई. डीज़ल पर भी एक्साइज टैक्स की दर ज़्यादा रही. मार्च 2016 तक डीजल पर चार बार एक्साइज़ ड्यूटी में बढ़ोतरी की गई, जिससे 3.56 से बढ़कर टैक्स 17.33 रुपये हो गया. इस दौरान मोदी सरकार ने 144 फ़ीसद ज़्यादा कमाई की. मोदी सरकार ने वित्तीय वर्ष 2014-5 में सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी से 99.184  लाख करोड़, स्टेट वैट और सेल्स टैक्स से 137.157 लाख करोड़, साल 2015-16 में 178.591 और 142.848 और साल 2016-17 में 242.691 और 166.378 लाख करोड़ रुपये वसूले. यानी इससे सरकार जितना ज़्यादा फ़ायदा हुआ, जनता को उतना ही नुक़सान उठाना पड़ा.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी सरकार को तेल के दाम कम करने का चैलेंज देते हुए कहा था कि तेल की क़ीमते कम कीजिए, वरना हम आपको मजबूर कर देंगे. इसके बाद केंद्र सरकार ने डीज़ल और पेट्रोल की क़ीमत में एक पैसे की कमी कर दी. इस पर राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर तंज़ करते हुए कहा है कि आपने पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतों में एक पैसे की कटौती की है. एक पैसा!!  अगर ये आपका मज़ाक़ करने का तरीक़ा है, तो ये बचकाना और बेहद घटिया है. एक पैसे की कटौती मेरे द्वारा दिया गए फ्युएल चैलेंज का वाजिब जवाब नहीं है.

भारतीय जनता पार्टी  सरकार के शासनकाल में घोटाले भी ख़ूब हुए हैं. सूचना के अधिकार के तहत भारतीय रिज़र्व बैंक से मांगी गई एक जानकारी के मुताबिक़ साल 2014-2015 से 2017-2018 के बीच देश के अलग-अलग बैंकों से 19000 से ज़्यादा धोखाधड़ी के मामले सामने आए हैं, जिनमें 90 हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा का घोटाला हुआ है. अप्रैल, 2017 से मार्च, 2018 के बीच बैंक धोखाधड़ी के 5152 मामले दर किए गए, जिनमें 28,459 करोड़ रुपये शामिल हैं.  इससे पहले साल 2016-17 में 5076 बैंक घोटाले हुए, जिनमें 23,933 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी हुई. ग़ौरतलब है कि केंद्रीय जांच ब्यूरो और प्रवर्तन निदेशालय जैसी कई केंद्रीय जांच एजेंसियां उद्योगपतियों द्वारा किए गए धोखाधड़ी के मामलों की तफ़्तीश कर रही हैं. इनमें नीरव मोदी और मेहुल चोकसी द्वारा किया गया 12 सौ करोड़ से ज़्यादा का पंजाब नेशनल बैंक घोटाला भी शामिल है.

भले ही भारतीय जनता पार्टी जश्न मना रही है, लेकिन विपक्षी दल इसे विश्वासघात के तौर पर देख रहे हैं, वहीं अवाम भी सरकार से हिसाब मांगने लगी है. मोदी सरकार के चार साल पूरे होने पर कांग्रेस ने एक पोस्‍टर जारी किया है. कांग्रेस के राष्‍ट्रीय महासचिव अशोक गहलोत का कहना है कि मोदी सरकार के चार साल जनता से विश्वासघात जैसा है. उन्होंने कहा कि आम आदमी का भरोसा सरकार से उठ चुका है. वामदलों ने भी सरकार पर जनता से विश्वासघात करने का आरोप लगाते हुए कहा है कि देश के सभी तबक़े सरकार से परेशान हैं.

क़ाबिले-ग़ौर है कि पिछले चार सालों में देश की हालत बद से बदतर हुई है. देश में मज़हब और जाति के नाम पर वैमन्य बढ़ा है, लोगों में अविश्वास बढ़ा है. उनका चैन-अमन प्रभावित हुआ है. उनकी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी मुतासिर हुई है. दादरी के अख़्लाक हत्याकांड से समाज में कटुता बढ़ी, जबकि आरक्षण को लेकर चले आंदोलन की वजह से जातिगत वैमन्य बढ़ोतरी हुई है. बढ़ती महंगाई ने लोगों का जीना दुश्वार कर दिया है. तीज-त्यौहारों के रंग फीके पड़ गए हैं, क्योंकि बेरोज़गारी और महंगाई की वजह से लोग ज़रूरत का पूरा सामान तक ख़रीद नहीं पा रहे हैं.

अब जब इस सरकार को चार साल पूरे हो गए हैं, तो ऐसे में लोग उन वादों के बारे में सवाल करने लगे हैं, जो भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता में आने से पहले जनता से किए थे.  तब लोगों को लगा था कि देश में ऐसा शासन आएगा, जिसमें सब मालामाल हो जाएंगे, मगर जब केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बन गई और महंगाई ने अपना रंग दिखाना शुरू किया, तो लोगों को लगा कि इससे तो पहले ही वे सुख से ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे. ऐसा नहीं है कि अच्छे दिन नहीं आए हैं, अच्छे दिन आए हैं, लेकिन मुट्ठी भर अमीरों के लिए. बहरहाल, प्रधानमंत्री ने उन चुनावी वादों को चुनावी जुमले कहकर टाल चुके हैं, लेकिन जनता टालने के मूड में बिल्कुल नहीं है. 

Thursday, May 17, 2018

सियासत का मौसम बदला-बदला है...

फ़िरदौस ख़ान
सियासत का मौसम कब बदल जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता. ये सियासत की ही ज़मीन है, जो सावन में भी ख़ुश्क रह जाए और सूखे में भी बिन बादल भीग जाए. कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी को ही लें. कर्नाटक में पहली बार उन्होंने ख़ुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताकर सबको चौंका दिया है. चौंका इसलिए दिया है, क्योंकि सियासी गलियारे में अभी तक यही माना जा रहा था कि अगर 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस जीत हासिल करती है, तो वे अपने किसी क़रीबी और विश्वसनीय व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाना चाहेंगे. वे ख़ुद अपनी मां सोनिया गांधी की तरह पार्टी संगठन का ही काम देखेंगे और सरकार पर नज़र रखेंगे.  लेकिन राहुल गांधी के एक बयान ने सियासी माहौल को गरमा दिया है.

प्रधानमंत्री बनने के सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा, मैं क्यों पीएम नहीं बनूंगा, अगर 2019 का चुनाव जीते तो ज़रूर पीएम बन सकता हूं. अपने इस बयान से उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुली चुनौती दी है कि वे मुक़ाबले के लिए तैयार हैं. ये राहुल गांधी का हौसला और आत्मविश्वास ही है कि पिछले कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में हारने और सत्ता गंवाने के बाद फिर से संघर्ष के लिए खड़े हो जाते हैं. वे जानते हैं कि सियासत में कभी मौसम एक जैसा नहीं रहता. यहां कुछ भी स्थाई नहीं है. सत्ता कब किसके हाथ में आ जाए, कब किसके हाथ से फिसल जाए, कोई नहीं जानता.  वे जानते हैं कि जीत और हार, धूप और छांव की तरह हैं. और वक़्त कभी एक जैसा नहीं रहता. ये हर पल बदलता रहता है. वक़्त कभी उनके साथ रहा है, तो आज उनके विरोधियों के साथ है. कांग्रेस आज भले ही गर्दिश में है, लेकिन उसने कभी अपनी विचारधारा से अपने उसूलों के साथ समझौता नहीं किया. इसीलिए कांग्रेस आज भी इस देश की माटी में रची-बसी है. अवाम का मिज़ाज हमेशा कांग्रेस के साथ रहा है और आगे भी रहेगा. कांग्रेस ही एक ऐसी पार्टी है, जिसे हर कोई अपनी पार्टी मानता है. कांग्रेस जनमानस की पार्टी रही है. कांग्रेस ने हमेशा इस देश की आत्मा और अपनी अनमोल व समृद्ध विरासत का प्रतिनिधित्व किया है. महात्मा गांधी ने कांग्रेस के बारे में कहा है, "कांग्रेस इस देश में रहने वाले सभी भारतीयों की है, चाहे वे हिन्दू हों, मुसलमान हों, ईसाई, सिख या पारसी हों." कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी कहते हैं, "जब भी मैं किसी देशवासी से मिलता हूं. मुझे सिर्फ़ उसकी भारतीयता दिखाई देती है. मेरे लिए उसकी यही पहचान है. अपने देशवासियों के बीच न मुझे धर्म, ना वर्ग, ना कोई और अंतर दिखता है." यही कांग्रेस की ख़ासियत है.

कांग्रेस हमेशा जनमानस का सहारा बनी और मुश्किल वक़्त में अवाम को हिम्मत दी. किसी भी देश की तरक़्क़ी के लिए, अवाम की ख़ुशहाली के लिए चैन-अमन सबसे ज़रूरी है. पिछले कुछ बरसों में देश में जो नफ़रत और ग़ैर यक़ीनी का माहौल बना है, उस ख़ौफ़ के माहौल में राहुल गांधी ने अवाम को यक़ीन दिलाया है कि वे उसकी हिफ़ाज़त करेंगे. वे उन लोगों की हिफ़ाज़त करने का भी वादा करते हैं, जो हमेशा उनके ख़िलाफ़ रहते हैं, उनके ख़िलाफ़ दुष्प्रचार करते हैं. ऐसा राहुल गांधी ही कर सकते हैं, क्योंकि वे उस विरासत से ताल्लुक़ रखते हैं, जिसने देश की गरिमा को बढ़ाया. बेशक, कांग्रेस का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है. वे कांग्रेस के नेताओं ने इस देश के लिए अपना जान तक क़ुर्बान कर दी. देश को ग़ुलामी की ज़ंजीरों से आज़ाद कराने में महात्मा गांधी के योगदान को भला कौन भुल पाएगा. उन्होंने अपनी सारी ज़िन्दगी देश के नाम कर दी.  देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू आधुनिक भारत के निर्माताओं में अग्रणी रहे हैं. श्रीमती इंदिरा गांधी ने भारत को विश्व पटल पर चमकाया. श्री राजीव गांधी ने देश को, देश के युवाओं को नई राह दी, जिसकी बदौलत आज देश उन्नति के शिखर तक पहुंचा है. श्रीमती सोनिया गांधी ने भी देश के लिए बहुत कुछ किया है और आज भी कर रही हैं. जब भी देश और पार्टी पर कोई संकट आया, श्रीमती सोनिया गांधी आगे आईं.

क़ाबिले-ग़ौर है कि राहुल गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाए जाने के बाद श्रीमती सोनिया गांधी ने ख़्वाहिश ज़ाहिर की थी कि वे अब आराम करना चाहती हैं. माना जा रहा था कि वे अब सियासत से दूरी बना लेंगी. उन्होंने ऐसा किया भी. उन्होंने कुछ अरसे के लिए सियासी सरगर्मियों से फ़ासला रखा, लेकिन कांग्रेस को संकट में देख उन्होंने सियासत में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है. कर्नाटक में उन्होंने चुनावी रैलियां करते हुए केंद्र की भारतीय जनता पार्टी की सरकार से चार साल का हिसाब मांगा. उन्होंने  बीजापुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज़ करते हुए कहा कि मोदी जी अच्छा भाषण देते हैं, एक अभिनेता की तरह भाषण देते हैं. लेकिन केवल भाषण से लोगों का पेट नहीं भर सकता, लोगों का कल्याण नहीं हो सकता है. अगर भाषण से पेट भरता, तो मेरी प्रार्थना है कि वह और भी अच्छा भाषण दें.

सोनिया गांधी चुनावी मुहिम में इसीलिए उतरी हैं, ताकि कांग्रेस को मज़बूत बना सकें. एक वक़्त वह था, जब वे न तो खुद सियासत में आना चाहती थीं और न ही अपने बच्चों को इसमें शामिल होने देना चाहती थीं. लेकिन वक़्त जो न कराए, कम है. राहुल गांधी की भी सियासत में इतनी गहरी दिलचस्पी नहीं थी. वह सत्ता के पीछे भी नहीं भागे. एक वह वक़्त था, जब देश में उनकी पार्टी की सरकार थी, तब उनके समर्थक चाहते थे कि वह सरकार में कोई अहम ओहदा लें, कोई मंत्रालय संभालें, लेकिन उन्होंने बता दिया कि वे सरकार में कोई किरदार निभाने की बजाय पार्टी संगठन में काम करना पसंद करते हैं, इसलिए उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री का ओहदा लेने से साफ़ इंकार कर दिया था.

मगर आज हालात जुदा हैं. राहुल गांधी ने ख़ुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार, तो बता दिया है. क्या उनके सहयोगी दल इस पर राज़ी होंगे? उनके सहयोगी दलों के कई नेता न जाने कब से प्रधानमंत्री बनने का सपना संजोये बैठे हैं.
क्या राहुल गांधी ने बहुत-सोच-समझकर ये ऐलान किया है? सवाल कई हैं, लेकिन जवाब आने वाले वक़्त की तह में छुपे हैं. बहरहाल, कांग्रेसी ख़ासकर राहुल गांधी के चाहने वाले उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में ही देखना चाहते हैं.

Friday, May 4, 2018

कांग्रेस को अवाम की आवाज़ बनना होगा

फ़िरदौस ख़ान
एक ख़ुशहाल देश की पहचान यही है कि उसमें रहने वाले हर व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान हो, उसे बुनियादी ज़रूरत की सभी चीज़ें, सभी सुविधाएं मुहैया हों. जब व्यक्ति ख़ुशहाल होगा, तो परिवार ख़ुशहाल होगा, परिवार ख़ुशहाल होगा, तो समाज ख़ुशहाल होगा. एक ख़ुशहाल समाज ही आने वाली पीढ़ियों को बेहतर समाज, बेहतर परिवेश दे सकता है. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सर्वोदय समाज का सपना देखा था और वे इसे साकार करना चाहते थे. गांधीजी कहते हैं- "समाजवाद का प्रारंभ पहले समाजवादी से होता है. अगर एक भी ऐसा समाजवादी हो, तो उस पर शून्य बढ़ाए जा सकते हैं. हर शून्य से उसकी क़ीमत दस गुना बढ़ जाएगी, लेकिन अगर पहला अंक शून्य हो, तो उसके आगे कितने ही शून्य बढ़ाए जाएं, उसकी क़ीमत फिर भी शून्य ही रहेगी." भूदान आन्दोलन के जनक विनोबा भावे के शब्दों में, सर्वोदय का अर्थ है- सर्वसेवा के माध्यम से समस्त प्राणियो की उन्नति. आज देश को इसी सर्वोदय समाज की ज़रूरत है.

पिछले कुछ बरसों देश एक ऐसे दौर से गुज़र रहा है, जहां सिर्फ़ मुट्ठीभर लोगों का ही भला हो रहा है. बाक़ी जनता की हालत बद से बदतर होती जा रही है. लोगों के काम-धंधे तो पहले ही बर्बाद हो चुके हैं. बढ़ती महंगाई की मार भी लोग झेल ही रहे हैं. ऐसे में अपराधों की बढ़ती वारदातों ने डर का माहौल पैदा कर दिया है. हालत ये है कि चंद महीने की मासूम बच्चियां भी दरिन्दों का शिकार बन रही हैं. क़ानून-व्यवस्था की हालत भी कुछ ऐसी है कि शिकायत करने वाले मज़लूम की हिरासत में मौत तक हो जाती है और आरोपी खुले घूमते रहते हैं. ऐसे में जनता का शासन-प्रशासन से यक़ीन उठने लगा है. बीते मार्च माह में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत आरोपी की फ़ौरन गिरफ़्तारी पर रोक लगाने के आदेश के बाद से इन तबक़ों में खौफ़ पैदा हो गया है. उन्हें लगता है कि पहले ही उनके साथ अमानवीय व्यवहार के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं, ऐसे में उन पर दबंगों का ज़ुल्म और ज़्यादा बढ़ जाएगा. अपने अधिकारों के लिए उन्हें सड़क पर उतरना पड़ा. क़ाबिले-गौर है कि देश में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति की आबादी तक़रीबन 20 करोड़ है. लोकसभा में इन तबक़ों के 131 सदस्य हैं. हैरानी की बात यह है कि भारतीय जनता पार्टी में 67 सांसद इसी तबक़े से होने के बावजूद दलितों के ख़िलाफ़ होने वाले अत्याचारों पर कोई आवाज़ सुनाई नहीं दे रही है. चंद सांसदों के बयान सामने आए, लेकिन जो विरोध होना चाहिए था, वह दिखाई नहीं पड़ा. ग़ौरतलब है कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक़, हर 15 मिनट में एक दलित के साथ अपराध होता है. रोज़ाना छह दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है. ये तो सिर्फ़ सरकारी आंकड़े हैं, और उन मामलों के हैं, जो दर्ज हो जाते हैं. जो मामले दर्ज नहीं कराए जाते, या दर्ज नहीं हो पाते, उनकी तादाद कितनी हो सकती है, इसका अंदाज़ा लगाना कोई मुश्किल नहीं है.

बुरे हालात में कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल दलितों के समर्थन में सामने आए. कांग्रेस ने दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में संविधान बचाओ रैली का आयोजन करके जहां भाजपा सरकार को ये चेतावनी दी कि अब और ज़ुल्म बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, वहीं दलितों को भी ये यक़ीन दिलाने की कोशिश की गई कि वे अकेले नहीं हैं. कांग्रेस हमेशा उनके साथ है. रैली को संबोधित करते हुए कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि  दलितों के ख़िलाफ़ अत्याचार बढ़ रहा है. मोदी के दिल में दलितों के लिए कोई जगह नहीं है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस दलितों, ग़रीबों, किसानों औऱ देश के सभी कमज़ोर तबक़ों की रक्षा के लिए हमेशा लड़ती रहेगी. कांग्रेस ने सत्तर साल में देश की गरिमा बनाई और पिछले चार साल में मोदी सरकार ने इसे धूमिल कर दिया, इसे चोट पहुंचाई. उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने देश को संविधान दिया और ये संविधान दलितों, ग़रीबों और महिलाओं की रक्षा करता है. आज सर्वोच्च न्यायालय को कुचला और दबाया जा रहा है, पहली बार ऐसा हुआ है कि चार जज हिन्दुस्तान की जनता से इंसाफ़ मांग रहे हैं. उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग इस संविधान को कभी नहीं छू पाएंगे, क्योंकि हम ऐसा होने नहीं देंगे. उन्होंने कहा कि आज जनता बेहाल है. देश के प्रधानमंत्री सिर्फ़ अपने मन की बात सुनते हैं. वह किसी को बोलना देना नहीं चाहते. वे कहते हैं कि सिर्फ़ मेरे मन की बात सुनो. मैं कहता हूं कि 2019 के चुनाव में देश की जनता मोदीजी को अपने मन की बात बताएगी.

दरअसल, आपराधिक मामलों में भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के नाम सामने आने की वजह से भी अवाम का भाजपा सरकार से यक़ीन ख़त्म हो चला है. भाजपा नेताओं के अश्लील और विवादित बयान भी इस पार्टी के चाल, चरित्र और चेहरे को सामने लाते रहते हैं. ये बेहद अफ़सोस की बात है कि केंद्र सरकार में ज़िम्मेदार पदों पर बैठे लोग पूरी तरह से संवेदनहीन रवैया अपनाये हुए हैं. इसी ही वारदातों की तरफ़ इशारा करते हुए राहुल गांधी ने तंज़ किया, मोदी जी अब नया नारा देंगे- "बेटी बचाओ, बीजेपी के लोगों से बचाओ."

बहरहाल, आज देश को ऐसे रहनुमाओं की ज़रूरत है, जो बिना किसी भेदभाव के अवाम के लिए काम करें. जनता को इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि देश में किस सियासी दल का शासन है, उसे तो बस चैन-अमन चाहिए, बुनियादी सुविधाएं चाहिएं, ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए अच्छा माहौल चाहिए. अवाम की ये ज़रूरतें वही सियासी दल पूरी कर सकते हैं, जो पूर्वाग्रह से ग्रस्त न हों. इसमें कोई दो राय नहीं है कि कांग्रेस ने इस देश के लिए बहुत कुछ किया है. आज भी अवाम को कांग्रेस से बहुत उम्मीदें हैं. राहुल गांधी की ज़िम्मेदारी है कि वे विपक्ष में होने के नाते, एक सियासी दल के अध्यक्ष होने के नाते, जनता को ये यक़ीन दिलाते रहें कि वे हमेशा उसके साथ हैं. महात्मा गांधी के सर्वोदय के सिद्धांत पर अमल करते हुए देश और समाज के लिए काम करना भी उनकी ज़िम्मेदारियों में शामिल हैं. आज जनता को ऐसे नेता की ज़रूरत है, जो उनकी आवाज़ बन सके. कांग्रेस इसमें कितना कामयाब हो पाती है, ये आने वाला वक़्त ही बताएगा. 

Friday, April 20, 2018

आंदोलन और सरकार की नाकामी

फ़िरदौस ख़ान
जनतंत्र में, लोकतंत्र में जनता को ये अधिकार होता है कि वे अपनी मांगों के समर्थन में, अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आंदोलन कर सकती है,  सरकार की ग़लत नीतियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा सकती है. लेकिन आंदोलन के दौरान, प्रदर्शन के दौरान हिंसा करने की इजाज़त किसी को भी नहीं दी जा सकती. सरकार को भी ये अधिकार नहीं है कि वे शांति से किए जा रहे आंदोलन को कुचलने के लिए किसी भी तरह के बल का इस्तेमाल करे. बल्कि सरकार की ये ज़िम्मेदारी होती है कि वह आंदोलन कर रहे प्रदर्शनकारियों को सुरक्षा मुहैया कराए. इस बात का ख़्याल रखे कि कहीं इस आंदोलन की आड़ में असामाजिक तत्व कोई हंगामा खड़ा न कर दें. अगर आंदोलन में किसी भी तरह की हिंसा होती है, तो उस पर क़ाबू पाना, उसे रोकना भी सरकार की ही ज़िम्मेदारी है. लेकिन केंद्र की  बहुमत वाली भारतीय जनता पार्टी की मज़बूत सरकार इस मामले में बेहद कमज़ोर साबित हो रही है.

हाल में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम पर सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले को लेकर पहले दलितों ने भारत बंद किया था. उसके बाद सर्वणों ने आरक्षण के ख़िलाफ़ जवाबी आंदोलन शुरू कर दिया. ग़ौरतलब है कि पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के दुरुपयोग पर चिंता ज़ाहिर करते हुए गिरफ़्तारी और आपराधिक मामला दर्ज किए जाने पर रोक लगा दी थी. क़ाबिले-ग़ौर है कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोगों के साथ होने वाले भेदभाव को ख़त्म करने और उन्हें इंसाफ़ दिलाने के लिए अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम लाया गया था. संसद द्वारा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम को 11 सितम्बर, 1989 को पारित किया था. इसे 30 जनवरी, 1990 से जम्मू कश्मीर को छोड़कर पूरे में लागू किया गया. यह अधिनियम उस हर व्यक्ति पर लागू होता हैं, जो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं हैं और वह इस तबक़े के सदस्यों का उत्पीड़न करता हैं. इस अधिनियम में पांच अध्याय और 23 धाराएं शामिल हैं.  इस क़ानून के तहत किए गए अपराध ग़ैर- ज़मानती, संज्ञेय और अशमनीय हैं. यह क़ानून अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोगों पर अत्याचार करने वालों को सज़ा देता है. यह पीड़ितों को विशेष सुरक्षा और अधिकार देता है और मामलों के जल्द निपटारे के लिए अदालतों को स्थापित करता है. इस क़ानून के तहत भारतीय दंड संहिता में शामिल क़ानूनों में ज़्यादा सज़ा दिए जाने का प्रावधान है. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों पर होने वाले अमानवीय और अपमानजनक बर्ताव को अपराध माना गया है.  इनमें उन्हें जबरन अखाद्य पदार्थ मल, मूत्र इत्यादि खिलाने, उनका सामाजिक बहिष्कार करने जैसे कृत्य अपराध की श्रेणी में शामिल किए गए हैं. अगर कोई व्यक्ति किसी अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति के सदस्य से कारोबार करने से इनकार करता है, तो इसे आर्थिक बहिष्कार माना जाएगा.  इसमें किसी अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति के सदस्य के साथ काम करने या उसे काम पर रखने/नौकरी देने से इनकार करना, इस तबक़े के लोगों को सेवा प्रदान न करना या उन्हें सेवा प्रदान नहीं करने देना आदि इसमें शामिल हैं.

लेकिन सर्वोच्च न्यालाय के फ़ैसले से दलितों पर अत्याचार करने वाले लोगों की गिरफ़्तारी बेहद मुश्किल हो जाएगी, क्योंकि सरकारी कर्मचारी या अधिकारी की गिरफ़्तारी के लिए उसके नियोक्ता की मज़ूरी लेना ज़रूरी है. अगर दोषी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी नहीं है,  तो एसएसपी स्तर के पुलिस अधिकारी की सहमति के बाद ही उसकी गिरफ़्तारी हो सकेगी. इतना ही नहीं, अदालत ने अग्रिम ज़मानत का भी प्रावधान कर दिया है और एफ़आईआर दर्ज करने से पहले शुरुआती जांच को भी ज़रूरी कर दिया है. यानी दलितों पर अत्याचार के मामले में आरोपी की गिरफ़्तारी और उन पर कोई मामला दर्ज करना बहुत ही मुश्किल हो जाएगा. ऐसी हालत में दलितों पर अत्याचार के मामलों में इज़ाफ़ा होगा, इसमें कोई दो राय नहीं है. सख़्त क़ानून होने के बावजूद आए दिन देश के किसी न किसी हिस्से से दलितों के साथ अमानवीय बर्ताव करने के मामले सामने आते रहते हैं. अब जब क़ानून ही कमज़ोर हो जाएगा, तो हालात बद से बदतर होने में देर नहीं लगेगी.  

ये भी बेहद अफ़सोस की बात है कि आंदोलन न सिर्फ़ उग्र रूप धारण कर रहे हैं, बल्कि अमानवीयता की भी सारी हदें पार कर रहे हैं. बंद के दौरान कई जगह हिंसा की वारदातें हुईं. आगज़नी हुई, दुकानें जलाई गईं, वाहन फूंके गए, फ़ायरिंग हुई. लोग ज़ख़्मी हुए, कई लोगों की जानें चली गईं.  मरने वालों में पुलिस वाले भी शामिल थे, जो अपनी ड्यूटी कर रहे थे. जगह-जगह रेलें रोकी गईं, पटरियां उखाड़ दी गईं.  चक्का जाम किया गया. रास्ते बंद कर दिए गए. किसी को इस बात का ख़्याल भी नहीं आया कि बच्चे स्कूल से कैसे सही-सलामत घर लौटेंगे ? जो लोग सफ़र में हैं, वे कैसे अपने घरों को लौटेंगे या गंतव्य तक पहुंचेंगे? इस झुलसती गरमी में रेलों में बैठे यात्री बेहाल हो गए. बच्चे भूख-प्यास से बिलखते रहे. जो लोग बीमार थे, अस्पताल तक नहीं पहुंच पाए. अमानवीयता की हद ये रही कि बिहार के हाजीपुर में एंबुलस में बैठी महिला अपने बीमार बच्चे की ज़िन्दगी का वास्ता देती रही, प्रदर्शनकारियों के आगे हाथ जोड़ती रही, मिन्नतें करती रही, लेकिन किसी को उस पर तरस नहीं आया. किसी ने एंबुलेंस को रास्ता नहीं दिया, नतीजतन इलाज के अभाव में एक बच्चे की मौत हो गई, एक मां की गोद सूनी हो गई.

देश में बंद के दौरान हालात इतने ख़राब हो गए कि सेना बुलानी पड़ी. कई जगह कर्फ़्यू लगाया गया, जिससे रोज़मर्राह की ज़िन्दगी बुरी तरह मुतासिर हुई. आंदोलन के दौरान न सिर्फ़ सरकारी संपत्ति को नुक़सान पहुंचाया गया, बल्कि निजी संपत्तियों को भी नुक़सान पहुंचाया गया. आंदोलनकारी जिस सरकारी संपत्ति को नुक़सान पहुंचाते हैं, वे जनता की अपनी संपत्ति है. ये संपत्ति जनता से लिए गए कई तरह के करों से ही बनाई जाती है. यानी इसमें जनता की ख़ून-पसीने की कमाई शामिल होती है. सरकार इस नुक़सान को पूरा करने के लिए जनता पर करों का बोझ और बढ़ा देती है. जिन लोगों की निजी संपत्ति को नुक़सान पहुंचता है, वे ताउम्र उसकी भरपाई करने में गुज़ार देते हैं. आबाद लोग बर्बाद हो जाते हैं. ये सच है कि कोई भी आंदोलन एक न एक दिन ख़त्म हो ही जाता है.  उस आंदोलन से हुई माली नुक़सान की भरपाई भी कुछ बरसों में हो ही जाती है, लेकिन किसी की जान चली जाए, तो उसकी भरपाई कभी नहीं हो पाती.

दरअसल, देश में किसी भी तरह की हिंसा के लिए सरकार की सीधी जवाबदेही बनती है. देश में चैन-अमन क़ायम रखना, जनमानस को सुरक्षित रखना, उनके जान-माल की सुरक्षा करना सरकार की ही ज़िम्मेदारी है. सरकार के पास पुलिस है, सेना है, ताक़त है, इसके बावजूद अगर हिंसा होती है, तो इसे सरकार की नाकामी ही माना जाएगा. शासन और प्रशासन दोनों ही इस मामले में नाकारा साबित हुए हैं. केंद्र सरकार न तो दलितों के अधिकारों की रक्षा कर पा रही है और न ही क़ानून व्यवस्था को सही तरीक़े से लागू कर पा रही है. ऐसी हालत में जनता किसे पुकारे?

Saturday, April 14, 2018

देश को मज़बूत विपक्ष चाहिए

फ़िरदौस ख़ान
किसी भी देश के लिए सिर्फ़ सरकार का मज़बूत होना ही काफ़ी नहीं होता.  देश की ख़ुशहाली के लिए, उसकी तरक़्क़ी के लिए एक मज़बूत विपक्ष की भी ज़रूरत होती है. ये विपक्ष ही होता है, जो सरकार को तानाशाह होने से रोकता है, सरकार को जनविरोधी फ़ैसले लेने से रोकता है. सरकार के हर जन विरोधी क़दम का जमकर विरोध करता है. अगर सदन के अंदर उसकी सुनवाई नहीं होती है, तो वह सड़क पर विरोध ज़ाहिर करता है. जब सरकार में शामिल अवाम के नुमाइंदे सत्ता के मद में चूर हो जाते हैं और उन लोगों की अनदेखी करने लगते हैं, जिन्होंने उन्हें सत्ता की कुर्सी पर बिठाया है, तो उस वक़्त ये विपक्ष ही तो होता है, जो अवाम का प्रतिनिधित्व करता है. अवाम की आवाज़ को सरकार तक पहुंचाता है. आज देश की यही हालत है. भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार तानाशाही रवैया अख़्तियार किए हुए. सत्ता में आने के बाद जिस तरह से कथित जन विरोधी फ़ैसले लिए गए, उससे अवाम की हालत दिनोदिन बद से बदतर होती जा रही है. यह फ़ैसला नोटबंदी का हो या जीएसटी का, बिजली और रसोई गैस की क़ीमतें बढ़ाने का हो या फिर बात-बात पर कर वसूली का. इस सबने अवाम को महंगाई के बोझ तले इतना दबा दिया है कि अब उसका दम घुटने लगा है. कहीं मिनिमम बैंलेस न होने पर ग्राहकों के खाते से मनमाने पैसे काटे जा रहे हैं, तो कहीं आधार न होने के नाम पर, राशन कार्ड को आधार से न जोड़ने के नाम पर लोगों को राशन से महरूम किया जा रहा है.

देश की अवाम पिछले काफ़ी वक़्त से बुरे दौर से गुज़र रही है. जनमानस ने जिन लोगों को अपना प्रतिनिधि बनाकर संसद में, विधानसभा में भेजा था, वे अब सत्ता के नशे में हैं. उन्हें जनमानस के दुखों से, उनकी तकलीफ़ों से कोई सरोकार नहीं रह गया है. ऐसे में जनता किसके पास जाए, किसे अपने अपने दुख-दर्द बताए. ज़ाहिर है, ऐसे में जनता विपक्ष से ही उम्मीद करेगी. जनता चाहेगी कि विपक्ष उसका नेतृत्व करे. उसे इस मुसीबत से निजात दिलाए. ये विपक्ष का उत्तरदायित्व भी है कि वे जनता की आवाज़ बने, जनता की आवाज़ को मुखर करे.

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की प्रमुख व कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी  देश के हालात को बख़ूबी समझ रहे हैं. सोनिया गांधी अवाम को एक मज़बूत विपक्ष देना चाहती हैं, वे देश को एक जन हितैषी सरकार देना चाहती हैं. इसीलिए उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार के ख़िलाफ़ मुहिम शुरू कर दी है. दिल्ली में हुए कांग्रेस के महाधिवेशन में उन्होंने कहा कि पिछले चार साल में कांग्रेस को तबाह करने के लिए अहंकारी और सत्ता के नशे में मदमस्त लोगों ने कोई कसर बाक़ी नहीं रखी. साम-दाम-दंड-भेद का पूरा खेल चल रहा है, लेकिन सत्ता के अहंकार के आगे ना कांग्रेस कभी झुकी है और ना कभी झुकेगी. उन्होंने कहा कि मोदी सरकार के तानाशाही तौर तरीक़ों, संविधान की उपेक्षा, संसद का अनादर, विपक्ष पर फ़ज़्री मुक़दमों और मीडिया पर लगाम लगाने का कांग्रेस विरोध कर रही है.

राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश के उन्नाव और जम्मू कश्मीर के कठुआ में हुई बलात्कार की घटनाओं के विरोध में गुरुवार आधी रात को इंडिया गेट पर कैंडल मार्च निकाला.

ग़ौरतलब है कि पिछले दिनों सोनिया गांधी ने भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ गठजोड़ बनाने के लिए विपक्षी दलों को रात्रिभोज दिया. सोनिया गांधी के आवास 10 जनपथ पर हुए इस रात्रिभोज में विपक्षी दल के नेता शामिल हुए, जिनमें समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव, ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेइटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ़) के नेता बदरुद्दीन अजमल, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के शरद पवार और तारिक अनवर, राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव और मीसा भारती, जम्मू-कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस के उमर अब्दुल्ला, झारखंड मुक्ति मोर्चा के हेमंत सोरेन और बाबूलाल मरांडी, राष्ट्रीय जनता दल के अजित सिंह और जयंत सिंह, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के डी राजा, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मोहम्मद सलीम, द्रविड़ मुन्नेत्र कज़गम (डीएमके) के कनिमोई, बहुजन समाज पार्टी के सतीश चंद्र मिश्रा, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सुदीप बंदोपाध्याय, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतनराम मांझी, जनता दल-सेक्युलर (जेडी-एस) के कुपेंद्र रेड्डी, रेवलूशनेरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) के रामचंद्रन और केरल कांग्रेस के नेता भी शामिल हुए. कांग्रेस के नेताओं में राहुल गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गु़लाम नबी आज़ाद, अहमद पटेल,  एके एंटोनी, मल्लिकार्जुन खड़गे, रणदीप सुरजेवाला आदि नेताओं ने शिरकत की.

सोनिया गांधी बख़ूबी समझती हैं कि इस वक़्त कांग्रेस को उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है. जब भी पार्टी पर कोई मुसीबत आई है, तो सोनिया गांधी ढाल बनकर खड़ी हो गईं. देश के लिए, देश की जनता के लिए, पार्टी के लिए हमेशा उन्होंने क़ुर्बानियां दी हैं. देश का शासन उनके हाथ में था, प्रधानमंत्री का ओहदा उनके पास था, वे चाहतीं, तो प्रधानमंत्री बन सकती थीं या अपने बेटे राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बना सकती थीं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. उन्होंने डॊ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया. उनकी अगुवाई में न सिर्फ़ कांग्रेस एक मज़बूत पार्टी बनकर उभरी और सत्ता तक पहुंची, बल्कि भारत विश्व मंच पर एक बड़ी ताक़त बनकर उभरा.

राहुल गांधी को कांग्रेस की बागडौर सौंपने के बाद सोनिया गांधी आराम करना चाहती थीं. अध्यक्ष पद पर रहते हुए ही उन्होंने सियासत से दूरी बना ली थी. राहुल गांधी ही पार्टी के सभी अहम फ़ैसले कर रहे थे. लेकिन पार्टी को मुसीबत में देखकर उन्होंने सियासत में सक्रियता बढ़ा दी है. फ़िलहाल वे विपक्ष को एकजुट करने की क़वायद में जुटी हैं.  वह भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ एक मज़बूत गठजोड़ बनाना चाहती हैं.  क़ाबिले-ग़ौर है कि जब-जब कांग्रेस पर संकट के बादल मंडराये, तब-तब सोनिया गांधी ने आगे आकर पार्टी को संभाला और उसे मज़बूती दी. उन्होंने कांग्रेस की हुकूमत में वापसी के लिए देशभर में रोड शो किए थे. आख़िरकार उनकी अगुवाई में कांग्रेस ने साल 2004 और 2009  का आम चुनाव जीतकर केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार बनाई थी. उस दौरान देश के कई राज्यों में कांग्रेस सत्ता में आई. लेकिन जब से अस्वस्थता की वजह से सोनिया गांधी की सियासत में सक्रियता कम हुई है, तब से पार्टी पर संकट के बादल मंडराने लगे. साल 2014 में केंद की सत्ता से बेदख़ल होने के बाद कांग्रेस ने कई राज्यों में भी शासन खो दिया. हालांकि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में राहुल गांधी ने ख़ूब मेहनत भी की, लेकिन उन्हें वह कामयाबी नहीं मिल पाई, जिसकी उनसे उम्मीद की जा रही थी.

अगले साल आम चुनाव होने हैं. उससे पहले इसी साल मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने हैं. कांग्रेस के पास बहुत ज़्यादा वक़्त नहीं बचा है. सोनिया गांधी ने रात्रिभोज के बहाने विपक्षी द्लों को एकजुट करने की कोशिश की है. अगर सोनिया गांधी इसमें कामयाब हो जाती हैं, तो इससे जहां देश को एक मज़बूत विपक्ष मिलेगा, वहीं आम चुनाव में पार्टी की राह भी आसान हो सकती है. 

Tuesday, April 10, 2018

राहुल गांधी को समर्पित एक ग़ज़ल

भारत की मुहब्बत ही इस दिल का उजाला है
आंखों में मेरी बसता एक ख़्वाब निराला है

बेटा हूं मैं भारत का, इटली का नवासा हूं
रिश्तों को वफ़ाओं ने हर रूप में पाला है

राहों में सियासत की, ज़ंजीर है, कांटें हैं
सुख-दुख में सदा मुझको जनता ने संभाला है

धड़कन में बसा मेरी, इस देश की गरिमा का
मस्जिद कहीं, गिरजा कहीं, गुरुद्वारा, शिवाला है

बचपन से ले के अब तक ख़तरे में जां है, लेकिन
दुरवेशों की शफ़क़त का इस सर पे दुशाला है

नफ़रत, जलन, अदावत दिल में नहीं है मेरे
अख़लाक़ के सांचे में अल्लाह ने ढाला है

पतझड़ में, बहारों में, फ़िरदौस नज़ारों में
हर दौर में देखोगे राहुल ही ज़ियाला है
-फ़िरदौस ख़ान

शब्दार्थ : दुरवेश- संत,  शफ़क़त- सहानुभूति, अदावत- शत्रुता, अख़लाक़- संस्कार,  फ़िरदौस- स्वर्ग, ज़ियाला- उजाला