Saturday, February 17, 2018

कौन बनेगा प्रधानमंत्री मोदी, राहुल या...


फ़िरदौस ख़ान
वक़्त कैसे बीतता है, पता ही नहीं चलता. कल की ही सी बात लगती है. अब फिर से आम चुनाव का मौसम आ गया. अगले ही बरस लोकसभा चुनाव होने हैं. सभी सियासी दलों ने चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं. अवाम में भी सरग़ोशियां बढ़ गई हैं. सबकी ज़ुबान पर यही सवाल है कि अगली बार किसकी सरकार आएगी. क्या भारतीय जनता पार्टी वापसी करेगी? अवाम ने जिन अच्छे दिनों की आस में भाजपा को चुना था, वो तो अभी तक नहीं आए और न ही कभी आने की उम्मीद है. ऐसे में क्या अवाम भाजपा को सबक़ सिखाएगी और देश की बागडोर एक बार फिर से कांग्रेस को सौंपेगी? अवाम कांग्रेस को चुनेगी, तो कांग्रेस की तरफ़ से प्रधानमंत्री पद का दावेदार कौन होगा. क्या पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे?

हालांकि पार्टी की तरफ़ से यही दावा किया जा रहा है कि कांग्रेस के सत्ता में आने पर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाया जाएगा. कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख और मुख्य प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला का कहना है कि मोदी का विकल्प सिर्फ़ और सिर्फ़ राहुल गांधी ही हैं. कोई और नहीं हो सकता. कांग्रेस और देश के लोग राहुल गांधी को देश का अगला प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं. पार्टी के वरिष्ठ नेता एम वीरप्पा मोइली का भी यही कहना है कि पार्टी और युवाओं की महत्वाकांक्षा राहुल गांधी को देश का प्रधानमंत्री बनते देखना है. वे कहते हैं कि राहुल गांधी अब नरेन्द्र मोदी से तुलना से परे हैं. वे एक मज़बूत व्यक्तित्व के रूप में उभरे हैं.
बेशक कांग्रेस नेता, कार्यकर्ता और पार्टी समर्थक राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं, लेकिन क्या ख़ुद राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं?

ये जगज़ाहिर है कि अपने पिता की तरह ही राहुल गांधी भी सियासत में नहीं आना चाहते थे, लेकिन उन्हें सियासत में आना पड़ा.  साल 2004 के आम चुनाव में कांग्रेस को शानदार जीत मिली थी और राहुल गांधी भी भारी मतों से चुनाव जीतकर सांसद बने थे. केन्द्र में कांग्रेस की सरकार बनी और डॊ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने. लेकिन राहुल गांधी ने सरकार में कोई ओहदा नहीं लिया. वे पार्टी संगठन से ही जुड़े रहे. इसी तरह साल 2009 के आम चुनाव में भी कांग्रेस ने जीत का परचम लहराते हुए वापसी की और राहुल गांधी ने भी अपने निर्वाचन क्षेत्र अमेठी में शानदार जीत हासिल की. क़यास लगाए जा रहे थे कि वे इस बार ज़रूर सरकार में कोई अहम ज़िम्मेदारी संभालेंगे, लेकिन इस बार भी उन्होंने सरकार में कोई ओहदा लेने से इंकार करते हुए संगठन को मज़बूत करने पर ही ज़्यादा ध्यान दिया. इसमें कोई दो राय नहीं है कि राहुल गांधी चाहते, तो वे प्रधानमंत्री बन सकते थे. आज हालात और हैं, पहले उनकी मां सोनिया गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारी संभाल रही थीं, लेकिन आज राहुल गांधी ख़ुद इस ज़िम्मेदारी को निभा रहे हैं. अब उन पर दोहरी ज़िम्मेदारी है. पहली पार्टी संगठन को मज़बूत करने की और दूसरी खोया हुआ जनाधार हासिल करके पार्टी को हुकूमत में लाने की. क्या ऐसे हालात में वे ख़ुद प्रधानमंत्री बनना चाहेंगे और पार्टी अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी किसी वरिष्ठ नेता को सौंप देंगे. या फिर ख़ुद पार्टी की ज़िम्मेदारी संभालते रहेंगे और किसी अन्य क़रीबी नेता को प्रधानमंत्री बनाने के लिए उसका नाम पेश करेंगे? पार्टी के क़रीबी सूत्रों का माना है कि राहुल गांधी अपने एक क़रीबी नेता को प्रधानमंत्री बनाना चाहेंगे. पार्टी का ये क़रीबी नेता उनके पिता राजीव गांधी का भी विश्वासपात्र रहा है. इस नेता के गांधी परिवार से गहरे रिश्ते हैं और राहुल गांधी की विदेश यात्रा में वह उनके साथ रहता है.

इसके बरअक्स अगर देश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनती है, तो प्रधानमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार नरेन्द्र मोदी ही हो सकते हैं. ये नरेन्द्र मोदी की ही चतुराई थी कि पिछले लोकसभा चुनाव में हर तरफ़ मोदी-मोदी ही हो रहा था. भले ही मोदी भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार थे, लेकिन चुनाव में भाजपा कहीं नहीं थी. ऐसा लग रहा था कि ये चुनाव कांग्रेस और नरेन्द्र मोदी के बीच है. नरेन्द्र मोदी ने ख़ुद को पार्टी से बड़ा साबित करके दिखा दिया. भाजपाई ख़ुद मोदी लहर की बात कर रहे थे, मोदी नाम की सुनामी की बात कर रहे थे. इस बारे में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का अपना ही नज़रिया है. वे मानते हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव में जो सरकार बनेगी, उसमें मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए कोई जगह नहीं होगी. वे ये भी कहते हैं कि लोकसभा चुनाव में अगर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) जीतता भी है, तो उसके सहयोगी दल नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद पर स्वीकार नहीं करेंगे. ऐसे में मौजूदा गृहमंत्री राजनाथ सिंह के प्रधानमंत्री बन सकते है. इसकी वजह ये है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के घटक द्ल नरेन्द्र मोदी से नाराज़ चल रहे हैं. ऐसे हालात में वे मोदी को फिर से मौक़ा नहीं देना चाहेंगे, हां अगर भारतीय जनता पार्टी बहुमत हासिल कर लेती है, तो फिर सहयोगी दलों का विरोध भी मोदी की राह में कोई रुकावट नहीं बन पाएगा.  क़ाबिले-ग़ौर है कि नरेन्द्र मोदी पिछले लोकसभा चुनाव से ही 2024 तक का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं. इसमें उन्हें कितनी कामयाबी मिलती है, ये तो आने वाला वक़्त ही बताएगा.

बहरहाल, इसी माह पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. त्रिपुरा में 18 फ़रवरी में मतदान होगा, जबकि मेघालय और नागालैंड में 27 फ़रवरी वोट डाले जाएंगे. तीनों राज्यों के चुनाव नतीजे 3 मार्च को आएंगे. इन तीनों ही राज्यों में विधानसभा सीटों की संख्या 60-60  है. गौरतलब है कि त्रिपुरा विधानसभा का कार्यकाल 6 मार्च को, मेघालय विधानसभा का 13 मार्च और नगालैंड विधानसभा का कार्यकाल 14 मार्च को पूरा हो रहा है. मेघालय में कांग्रेस हुकूमत में है और उसके विधायकों की संख्या 29 है. त्रिपुरा में सीपीआई (एम) 51 सीटों के साथ सत्ता में है. वह पिछले 25 साल से सत्तासीन है. नगालैंड में नगा पीपुल्स फ्रंट की सरकार है और उसके पास 45 सीटें हैं. इनके अलावा इसी साल कर्नाटक, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में भी विधानसभा चुनाव होने हैं. इन चुनावों के नतीजे आगामी लोकसभा चुनाव की राह तय करेंगे.

Wednesday, February 14, 2018

वेलेंटाइन डे और आप


कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं, जो हमें बिल्कुल भी पसंद नहीं होतीं... लेकिन हम उन्हें मिटा तो नहीं सकते, उनसे नफ़रत तो नहीं कर सकते... उन्हें बदल तो नहीं सकते... हो सकता है कि वो चीज़ें दूसरों को अच्छी लगती हों...

फ़िलहाल बात वेलेंटाइन डे की है... बहुत से लोगों को ये दिन बिल्कुल भी पसंद नहीं... इस दिन को नापसंद करने के लिए उनकी अपनी दलीलें हैं...
बहुत से लोगों को वेलेंटाइन अच्छा लगता है... वो इसे जज़्बात से जोड़ कर देखते हैं... कुछ लोगों के लिए ये दिन अपनी मुहब्बत के इक़रार करने का दिन है... कुछ लोगों के लिए ये दिन अपने परिवार के साथ कहीं बाहर घूम-फिर कर रोज़मर्रा की दुश्वारियों का तनाव दूर कर लेने का दिन है...

बहरहाल, वेलेंटाइन डे आप मनाएं या न मनाएं, या किस तरह मनाएं... आप अपने महबूब के साथ इसे मनाएं, अपने दोस्तों के साथ मनाएं, अपने वालदेन के साथ मनाएं, अपने भाई-बहनों के साथ मनाएं या फिर अपने बच्चों के साथ मनाएं... ये आपकी अपनी मर्ज़ी है...

Saturday, February 3, 2018

भाजपा की कांटों भरी राह

फ़िरदौस ख़ान
केन्द्र में सत्तारूढ़  भारतीय जनता पार्टी ने अगले साल होने वाले आमसभा चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं. वह पिछली बार की तरह 2019 के लोकसभा चुनाव में भी अच्छा प्रदर्शन करना चाहती है. इसके लिए पार्टी चुनावी रणनीति भी बना रही है, लेकिन उसके लिए आम चुनाव की राह उतनी आसान नहीं है. इसकी सबसे बड़ी वजह है भारतीय जनता पार्टी सरकार की वादा ख़िलाफ़ी. साल 2014 में भारतीय जनता पार्टी ने जो लोक लुभावन नारे दिए थे, जिनके बूते पर उसने लोकसभा चुनाव की वैतरणी पार की थी, अब जनता उनके बारे में सवाल करने लगी है. जनता पूछने लगी कि कहां हैं, वे अच्छे दिन जिसका इंद्रधनुषी सपना भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें दिखाया था. कहां हैं, वह 15 लाख रुपये, जिन्हें उनके खाते में डालने का वादा किया गया था. कहां है वह विदेशी काला धन, जिसके बारे में वादा किया गया था कि उसके स्वदेश में आने के बाद जनता के हालात सुधर जाएंगे.

भारतीय जनता पार्टी जिन वादों के सहारे सत्ता की सीढ़ियां चढ़ी थी, सत्ता की कुर्सी पाते ही उन्हें भूल गई और ठीक उनके उलट काम करने लगी. भारतीय जनता पार्टी ने महंगाई कम करने का वादा किया था, लेकिन उसके शासनकाल में महंगाई आसमान छूने लगी. भारतीय जनता पार्टी ने महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अत्याचारों पर अंकुश लगाने का वादा किया था, लेकिन आए-दिन महिला शोषण के दिल दहला देने वाले कितने ही मामले सामने आ रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी ने किसानों को राहत देने का वादा किया था, लेकिन किसानों के ख़ुदकुशी के मामले थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी ने युवाओं को रोज़गार देने का वादा किया था, लेकिन रोज़गार देना तो दूर, नोटबंदी और जीएसटी लागू करके जो उद्योग-धंधे चल रहे थे, उन्हें भी बंद करने का काम किया है. भारतीय जनता पार्टी की सरकार जो भी फ़ैसले ले रही है, उनसे सिर्फ़ बड़े उद्योगपतियों को ही फ़ायदा हो रहा है. ऑक्सफ़ेम सर्वेक्षण के हवाले से कहा गया है कि पिछले साल यानी 2017 में भारत में सृजित कुल संपदा का 73 फ़ीसद हिस्सा देश की एक फ़ीसद अमीर आबादी के पास है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से सवाल भी किया है. ग़ौरतलब है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विदेश यात्राओं और उनकी सरकार पर अमीरों के लिए काम करने और उनके कर्ज़ माफ़ करने को लेकर लगातार हमला कर रहे हैं.
दरअसल, एक तरफ़ केन्द्र सरकार अमीरों को तमाम सुविधाएं दे रही है, उन्हें करों में छूट दे रही है, उनके कर माफ़ कर रही है, उनके क़र्ज़ माफ़ कर रही है. वहीं दूसरी तरफ़ ग़रीब जनता पर आए दिन नये-नये कर लगाए जा रहे हैं, कभी स्वच्छता के नाम पर, तो कभी जीएसटी के नाम पर उनसे वसूली की जा रही है. खाद्यान्नों और रोज़मर्रा में काम आने वाली चीज़ों के दाम भी लगातार बढ़ाए जा रहे हैं. मरीज़ों के लिए इलाज कराना भी मुश्किल हो गया है. दवाओं यहां तक कि जीवन रक्षक दवाओं और ख़ून के दाम भी बहुत ज़्यादा बढ़ा दिए गए हैं. ऐसे में ग़रीब मरीज़ कैसे अपना इलाज कराएंगे, इसकी सरकार को ज़रा भी फ़िक्र नहीं है. सरकार का सारा ध्यान जनता से कर वसूली पर ही लगा हुआ है.

इतना ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी ने आम चुनाव में कांग्रेस के जिस भ्रष्टाचार को, जिस घोटाले को अपने लिए प्रचार का साधन बनाया था, उन मामलों में भी अदालत में कांग्रेस पाक-साफ़ साबित हुई है.
टू जी स्पैक्ट्रम घोटाले में केन्द्रीय जांच ब्यूरो की विशेष अदालत ने पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा और कनिमोई सहित 17 आरोपियों को सभी मामलों में बरी कर दिया. न्यायाधीश ओपी सैनी ने अपने फ़ैसले में लिखा है, "मैं ये भी बता दूं कि बीते सात साल से हर दिन- गर्मी की छुट्टियों सहित, मैं सुबह नौ बजे से शाम पांच बजे तक पूरी निष्ठा से खुली अदालत में बैठता था और इंतज़ार करता था कि कोई आए और अपने पास से कोई ऐसा सबूत दे जो क़ानूनी तौर पर मंज़ूर हो, लेकिन सब बेकार रहा. एक भी शख़्स सामने नहीं आया. इससे पता चलता है कि हर कोई अफ़वाहों, अनुमानों और गपशप से बनी आम राय के हिसाब से चल रहा था. लेकिन न्यायिक कार्यवाही में लोगों की इस राय की जगह नहीं है. "

इस फ़ैसले से यह साबित हो गया कि टू जी स्पैक्ट्रम घोटाला पूरी तरह से काल्पनिक और मनगढ़ंत था. कांग्रेस को बदनाम करके अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए बड़े लोगों को आरोपी बनाया गया था. यह फ़ैसला संयुक्त प्रगतिशाल गठबंधन के लिए राहत का सबब बना, लेकिन भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र सरकार और केन्द्रीय जांच ब्यूरो कठघरे में ज़रूर खड़े हो गए हैं. अल्पसंख्यकों और दलितों पर हो रहे लगातार हमलों को लेकर भी केन्द्र की मोदी सरकार पहले से ही सवालों के घेरे में है.

हालांकि कुछ समय पहले हुए गुजरात और हिमाचल प्रदेश चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया. भारतीय जनता पार्टी ने जहां गुजरात में अपनी सत्ता बचाई, वहीं हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस से सत्ता छीनी. इस साल देश के आठ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, जिनमें मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, त्रिपुरा, मेघालय, मिज़ोरम और नागालैंड शामिल हैं. हालांकि भारतीय जनता पार्टी इस बात को लेकर आश्वस्त है कि इन विधानसभा चुनावों में भी वह अच्छा प्रदर्शन करेगी, लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनावों में बहुत फ़र्क़ है. विधानसभा चुनाव जहां क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर लड़े जाते हैं, वहीं लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दे छाये रहते हैं. भारतीय जनता पार्टी के सांसद इस बात को लेकर परेशान हैं कि वे चुनावों में जनता को क्या मुंह दिखाएंगे. जनता जब उनसे सवाल पूछेगी, तो सिवाय बग़ले झांकने के वे कुछ नहीं कर पाएंगे.

फ़िलहाल भारतीय जनता पार्टी अपना जनाधार बढ़ाने पर ख़ासा ध्यान दे रही है. उसने मिलेनियम वोटर कैंपेन नामक एक मुहिम शुरू की है. इस मुहिम में उन दो करोड़ युवाओं को शामिल करने की कोशिश की जाएगी, जो साल 2019 में पहली बार अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे. इन युवाओं को पार्टी से जोड़ने के लिए सोशल मीडिया की मदद ली जाएगी. पिछले लोकसभा चुनाव में भी पार्टी ने ज़्यादा से ज़्यादा युवाओं को जोड़ा था और उसे युवाओं का समर्थन भी मिला था. क़ाबिले-ग़ौर है कि ’मन की बात’ के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी नये मतदाताओं पर ज़ोर देते हुए कहा था, 'हम लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए इक्कीसवीं सदी में पैदा हुए लोगों का स्वागत करते हैं, क्योंकि वे योग्य मतदाता बन जाएंगे. उनका वोट 'नये भारत का आधार' बन जाएगा.

बहरहाल, भारतीय जनता पार्टी अपनी कोशिश में कितनी कामयाब हो पाती है, यह तो आने वाला वक़्त बताएगा. लेकिन इतना ज़रूर है कि उसकी राह कांटों भरी होगी, जो उसने अपनी राह में ख़ुद बोये हैं.

Friday, January 26, 2018

राहुल गांधी की गरिमा और बढ़ गई

फ़िरदौस ख़ान
किसी भी इंसान का बर्ताव उसके संस्कारों का परिचय देता है. संस्कार विरासत में मिलते हैं, घर से मिला करते हैं. संस्कार बाज़ार में नहीं मिलते. ज़्यादा पैसा या बड़ा पद मिलने से संस्कार नहीं मिल जाते.  राहुल गांधी को देखें, वो अपने विरोधियों का नाम भी सम्मान के साथ लेते हैं, उनके नाम के साथ जी लगाते हैं, जबकि उनके विरोधी भले ही वे देश के बड़े से बड़े पद पर हों, उनके लिए ग़लत शब्दों का इस्तेमाल करते हैं.  दरअसल, किसी का अपमान करना या उसके लिए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करके इंसान सामने वाला का अपमान नहीं करता, बल्कि अपने ही संस्कारों का प्रदर्शन करता है.

और जहां तक गणतंत्र दिवस समारोह में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल को छठी क़तार में बिठाने की बात है, तो उनके विरोधियों को समझना होगा कि जो अवाम के दिलों में बसते हैं, उन्हें इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि उन्हें किस क़तार में बिठाया गया. राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष हैं, उन्हें पहली क़तार में जगह मिलनी चाहिए थी, लेकिन उन्हें छठी क़तार में जगह दी गई. उनके साथ राज्यसभा में पार्टी के नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद बैठे थे. इसी दीर्घा में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पहली क़तार में और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी दूसरी क़तार में नज़र आ रही थीं.

राहुल गांधी का कहना है कि उन्हें छठी की जगह, साठवीं क़तार में जगह दी जाए, तब भी वे समारोह में शिरकत करेंगे, क्योंकि उनके लिए राष्ट्रीय पर्व अहमियत रखता है, न कि बैठने की जगह. हालांकि कांग्रेस ने उन्हें पहली कतार में जगह नहीं दिए जाने पर सवाल उठाया था.
कांग्रेस नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने ट्विटर पर लिखा, "कांग्रेस अध्यक्ष श्री राहुल गांधी को गणतंत्र दिवस के राष्ट्रीय पर्व पर अहंकारी शासकों ने सारी परंपराओं को दरकिनार करके पहले चौथी पंक्ति और फिर छठी पंक्ति में जानबूझकर बिठाया. हमारे लिए संविधान का उत्सव ही सर्वप्रथम है."
पहले राहुल गांधी के लिए चौथी कतार में जगह दिए जाने की बात सामने आई थी, लेकिन बाद में उन्हें छठी क़तार में जगह दी गई.
दरअसल, राहुल गांधी को पीछे जगह देकर केन्द की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने अपनी ही छवि धूमिल की है. इस वाक़िये से राहुल गांधी की गरिमा और ज़्यादा बढ़ गई है.

देश को कहां ले जाएगी विरोध की ग़लत परम्परा

फ़िरदौस ख़ान
भारतीय जनता पार्टी ने देश की सियासत में कई ऐसी ग़लत परम्पराएं शुरू की हैं, जो आने वाले वक़्त में अपना क़हर ज़रूर ढहाएंगी. इनमें से एक परम्परा विरोध की है. विरोध किया जाना चाहिए, लेकिन सिर्फ़ विरोध के लिए विरोध नहीं होना चाहिए. भारतीय जनता पार्टी की तर्ज़ पर अन्य सियासी दल भी विरोध के इस तरीक़े को अपना सकते हैं. जिस तरह से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का ग़ैर ज़रूरी विरोध किया जाता है, उसे किसी भी लिहाज़ से सही नहीं कहा जा सकता. वे जहां जाते हैं, उनके ख़िलाफ़ प्रदर्शन किए जाते हैं, उनके ख़िलाफ़ अपशब्दों का इस्तेमाल किया जाता है, उनके परिवार पर मिथ्या आरोप लगाए जाते हैं, गणतंत्र दिवस समारोह में उन्हें छठी पंक्ति में बैठने की जगह दी जाती है. आख़िर ये सब किस संस्कृति का हिस्सा है.

कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के बाद जब पहली बार राहुल गांधी अपने संसदीय निर्वाचन क्षेत्र अमेठी में गए, तो पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने गुलाबों के सुर्ख़ फूलों से उनका स्वागत किया गया. उन्हें फूलों के गुलदस्ते दिए गए. वे जहां-जहां से गुज़रे, उन पर सुर्ख़ गुलाबों की पंखुड़ियां बरसाई गईं. उन्हें यक़ीन दिलाया कि कांग्रेस सत्ता में हो या विपक्ष में हर हाल में वे हमेशा कांग्रेस के साथ रहेंगे, उनके साथ रहेंगे. दरअसल, राहुल गांधी के बेहरीन जाने से पहले ही यह तय हो गया था कि वे 15 और 16 जनवरी को अमेठी में रहेंगे.  वे 8 जनवरी को बहरीन में आयोजित भारतीय अप्रवासियों के ग्लोबल ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ पीपल ऑफ़ इंडियन रीजन सम्मेलन को संबोधित करने के बाद 10 जनवरी को स्वदेश लौटे थे. राहुल गांधी का अमेठी दौरे का कार्यक्रम तय होने के साथ ही पार्टी कार्यकर्ताओं ने उनके स्वागत की तैयारियां शुरू कर दी थीं. उन्हें जहां-जहां जाना था, वहां का भी जायज़ा ले लिया गया.

अमेठी में जहां कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता राहुल गांधी के स्वागत की तैयारियों में ज़ोरशोर से जुटे थे, वहीं उनके विरोधियों में भी हलचल शुरू हो चुकी थी. दरअसल, जब से भारतीय जनता पार्टी की प्रत्याशी स्मृति ईरानी ने पिछले लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त खाई है, तब से वे राहुल गांधी के ख़िलाफ़ बहुत ज़्यादा मुखर हुई हैं. वे हमेशा राहुल गांधी के ख़िलाफ़ बयान देने के लिए आतुर रहती हैं. लेकिन राहुल गांधी ने कभी स्मृति ईरानी पर एक लफ़्ज़ भी ख़र्च नहीं किया. इतना ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय नेता भी किसी न किसी बहाने राहुल गांधी का विरोध करते रहते हैं. राहुल गांधी विदेश जाते हैं, तब भी उन पर तंज़ कसे जाते हैं, पूछा जाता है कि वे कहां गए हैं, क्यों गए हैं, कब आएंगे, वग़ैरह-वग़ैरह. इस बार उन्होंने राहुल गांधी के अमेठी दौरे को लेकर उनके विरोध की रणनीति बना डाली. राहुल गांधी अमेठी आएं तो परेशानी, न आएं तो हज़ार शिकायतें.

बहरहाल, राहुल गांधी अपने दौरे के पहले दिन रायबरेली ज़िले के सलोन गए. और वहां के लोगों से मुलाक़ात कर उनकी परेशानियां सुनीं. उन्होंने प्रधानमंत्री पर अमेठी से सौतेला बर्ताव करने का आरोप लगाते हुए कहा कि वे अमेठी में फ़ूड पार्क बना रहे थे. इससे किसानों को फ़ायदा होता, उन्हें उनकी फ़सल के वाजिब दाम मिलते, लेकिन मोदी सरकार ने इसे बंद कर दिया. नतीजतन किसानों को अपने ख़ून-पसीने से उगाई फ़सल सड़क पर फेंकनी पड़ रही है. उन्होंने कहा,”चाहे कुछ भी हो जाए, यहां फ़ूड पार्क बनेगा और मैं ये काम करूंगा. जैसे ही हमारी सरकार बनेगी हम यहां फ़ूड पार्क बनाएंगे और किसानों के उत्पाद यहां पर सही दामों में बेचे जाएंगे. मैं ये करके दिखाऊंगा.’

राहुल गांधी से मिलकर जहां किसानों के मन में कुछ उम्मीद जगी, वहीं उनके विरोधी उनके ख़िलाफ़ खड़े हो गए. सलोन में राहुल गांधी का विरोध किया गया. स्थानीय भाजपा विधायक दल बहादुर कोरी की अगुवाई में कुछ लोगों ने उन्हें काले झंडे दिखाते हुए उनके ख़िलाफ़ नारेबाज़ी की. इस दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं को खदेड़ने की कोशिश की. इस मामले को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं की पुलिस से भी तीखी नोकझोंक हुई. दूसरे दिन भी ठीक ऐसा ही हुआ. अपना रास्ता रोके जाने पर राहुल गांधी को ग़ुस्सा आ गया और वे अपनी गाड़ी से उतरकर पैदल ही गौरीगंज शहर की तरफ़ चल पड़े. उनके पैदल चलने पर विशेष सुरक्षा समूह (एसपीजी) से लेकर ज़िला प्रशासन तक में हड़कंप मच गया. उनके सभा स्थल तक पहुंचने से पहले ही भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने हंगामा शुरू कर दिया. वे सुबह से हाथों में पोस्टर लेकर राहुल गांधी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे थे. पोस्टर में लिखा था, 'राहुल गांधी लापता सांसद का स्वागत'. इससे पहले भी भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता राहुल गांधी के लापता होने के पोस्टरों से अमेठी की दीवारों को रंग चुके हैं. फिर क्या था कांग्रेस के कार्यकर्ता भी उनसे भिड़ गए. मामला बढ़ता देख, पुलिस को दख़ल देना पड़ा. पुलिस से भी उनकी झड़प हो गई. नतीजतन पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया. मामले की गंभीरता को देखते हुए राहुल गांधी ने अपना कार्यक्रम रद्द कर दिया.

अपने दो दिवसीय दौरे के दौरान जहां राहुल गांधी ने पार्टी कार्यकर्ताओं से बातचीत कर उनका मनोबल बढ़ाया, वहीं आम लोगों की समस्याएं भी सुनीं. इस बीच अमेठी के गंगागंज सखनपुर की रहने वाली किस्मतुल  अपने बेटे मोहम्मद सरवर को लेकर आई और राहुल गांधी से बेटे के इलाज के लिए मदद की गुहार लगाई. उनका बेटा पैरालाइज़्ड होने की वजह से व्हील चेयर पर चलने को मजबूर है. राहुल गांधी ने उन्हें तसल्ली देते हुए कहा, परेशान मत हो अम्मा, इसका इलाज होगा, आपका बेटा ठीक हो जाएगा. ग़ौरतलब है कि राहुल गांधी बहुत लोगों की मदद करते हैं.

अमेठी प्रवास के दौरान राहुल गांधी ने चुरावा के हनुमान मंदिर में पूजा-अर्चना कर खिचड़ी दान की और आदतन रास्ते में एक जगह रुककर नाश्ता भी किया. राहुल गांधी जहां जाते हैं, लोगों के दिल जीत लेते हैं. राहुल गांधी साल 2004 से अमेठी के सांसद हैं. अमेठी के बाशिन्दे राहुल गांधी के आगमन से ख़ुश थे, लेकिन विरोधी उनके ख़िलाफ़ माहौल बनाने में जुटे हैं. राहुल गांधी को इस तरफ़ ख़ास ध्यान देना होगा.

बहरहाल, भारतीय जनता पार्टी ने पोस्टर की जो परम्परा शुरू की है, उसका रंग दिखना शुरू हो गया है. भारतीय जनता पार्टी की तर्ज़ पर कांग्रेस के स्थानीय नेताओं ने भी पोस्टर तक छपवाकर अमेठी की दीवारों पर लगवा डाले. गौरीगंज रेलवे स्टेशन पर लगे एक पोस्टर में राहुल गांधी को भगवान राम और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रावण के तौर पर दिखाया गया है. पोस्टर में तीर-कमान लिए दिख रहे राहुल गांधी के बारे में लिखा गया है कि राहुल के रूप में भगवान राम का अवतार, 2019 में आएगा राहुल राज (रामराज). पोस्टर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दस सिर के साथ रावण के रूप में दिखाया गया हैं. बताया जा रहा है कि यह पोस्टर कांग्रेस के अभय शुक्ला उर्फ़ रिज्जू ने लगवाया है. इससे पहले भी अमेठी में राहुल गांधी के पोस्टर लगाए जा चुके हैं. ये पोस्टर अमेठी के तिलोई विधानसभाओं क्षेत्र के सिंहपुर ब्लॉक के कांग्रेस नेता अभिषेक वाजपेयी ने राहुल गांधी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने पर लगवाए थे. पोस्टर में राहुल गांधी को अर्जुन अवतार और युग पुरुष का ख़िताब दिया गया था, जबकि एक अन्य पोस्टर में राहुल गांधी को शिव भक्त, जनेऊधारी और भगवान परशुराम का वंशज बताया गया था. इतना ही नहीं, सोशल मीडिया में भी कांग्रेसी, भाजपा को टक्कर दे रहे हैं.  

Friday, January 19, 2018

राहुल गांधी ने सच ही तो कहा है

फ़िरदौस ख़ान
अच्छे लोगों के लिए पूरी दुनिया ही अपना परिवार हुआ करती है, उन्हें किसी से कोई बैर नहीं होता. वे जहां जाते हैं, वहां के लोगों को अपना बना लिया करते हैं. लेकिन बुरे लोग अपने परिवार को भी तहस-नहस कर डालते हैं. भारत के प्राचीन ग्रंथ महा उपनिषद में कहा गया है- अयं बन्धुरयं नेतिगणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥
यानी यह अपना भाई है और यह अपना भाई नहीं है, इस तरह की बात तंगदिल लोग करते हैं, बड़े दिल वाले लोगों के लिए तो पूरी दुनिया ही उनका अपना परिवार है. दरअसल, महा उपनिषद का यह श्लोक आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना उस वक़्त रहा होगा, जब इसे लिखा गया होगा. प्राचीनकाल से ही भारत की विचारधारा वसुधैव कुटुम्बकम् रही है और यही विचारधारा कांग्रेस की भी है. कांग्रेस ने हमेशा सर्वधर्म समभाव, सर्वधर्म सदभाव में यक़ीन किया है. इसीलिए कांग्रेस अपनी स्थापना काल से ही जन-जन की पार्टी रही है. कांग्रेस के शासनकाल में सभी मज़हबों के लोग मिलजुल रहते आए हैं, लेकिन पिछले कुछ बरसों से देश की हवा में सांप्रदायिकता और जातिवाद का ज़हर शामिल हो गया है.

कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने बहरीन में भारतीयों को संबोधित करते हुए यह मुद्दा उठाया. उन्होंने केंद्र की भारतीय जनता पार्टी की सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकार लोगों को जाति और धर्म के आधार पर बांट रही है. नौकरी पैदा करने में भारत पिछले आठ सालों में सबसे निचले स्तर पर आ गया है. नये निवेश के मामले में भारत पिछले 13 सालों में निचले स्तर पर पहुंच गया है. नोटबंदी के फ़ैसले की वजह से दुनिया भर के भारतीयों की कमाई पर बुरा असर पड़ा है. भारत की आर्थिक विकास की रफ़्तार थम गई है. सरकार बेरोज़गार युवाओं के ग़ुस्से को समाज में नफ़रत फैलाने में इस्तेमाल कर रही है. मैं ऐसे भारत की कल्पना भी नहीं कर सकता, जहां देश का हर नागरिक ख़ुद को देश का हिस्सा न समझे. देश में आज दलितों को पीटा जा रहा है, पत्रकारों को धमकाया जा रहा है और जजों की रहस्यमयी हालात में मौत हो रही है. मैं यहां आपको यह बताने के लिए आया हूं कि आप अपने देश के लिए कितने ख़ास हैं, कितने अहम हैं. आपके घर में गंभीर समस्या है और उसके समाधान की प्रक्रिया में आपको शामिल होना है. आज भारत को आपकी प्रतिभा, आपके कौशल और देशभक्ति की ज़रूरत है. हमें हिंसा और नफ़रत पर चल रही बातचीत को प्रगति, रोज़गार और आपसी भाईचारे की तरफ़ लाना है. हमलोग यह काम आपके कौशल के बिना नहीं कर सकते. उन्होंने कहा कि भारत के निर्माण में अनिवासी भारतीय समुदाय का अहम किरदार रहा है. देश के तीन महान नेता महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और भीमराव आंबेडकर कभी न कभी अनिवासी भारतीय रहे हैं. दक्षिण अफ़्रीका से वापस आने के बाद महात्मा गांधी ने जिस दर्शन को स्थापित किया, वह भारतीय दर्शन था. गांधी के दर्शन में जाति और धर्म के आधार पर विभेद नहीं किया गया. भारत ने लंबा सफ़र इसी दर्शन की बुनियाद पर किया है, लेकिन अब ख़तरे मंडरा रहे हैं. मैं कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष हूं और इस पार्टी का जन्म ही लोगों को साथ लाने के लिए हुआ था.

ग़ौरतलब है कि राहुल गांधी की यह पहली विदेश यात्रा है. वे ग्लोबल ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ पीपुल ऑफ़ इंडिया ओरिजिन द्वारा बहरीन में आयोजित सम्मेलन में बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए थे। उन्होंने बहरीन के क्राउन प्रिंस शेख़ सलमान बिन हमाद अल ख़लीफ़ा से मुलाक़ात की और पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा लिखी गई किताब ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ उन्हें भेंट की.

बहरीन में दिए गए राहुल गांधी के भाषण को लेकर देश में सियासत गरमा गई और आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो गया. भारतीय जनता पार्टी ने कड़ी प्रतिक्रिया ज़ाहिर करते हुए राहुल गांधी के बयान को शर्मनाक तक कह डाला. इसके जवाब में उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष राज बब्बर ने कहा कि सत्तापक्ष को आलोचना और चिंता में फ़र्क़ समझना चाहिए. राहुल गांधी ने चिंता ज़ाहिर की है. अपने लोगों के बीच में चिंता की जाती है, ताकि उसका हल निकाला जा सके. बहरीन में राहुल के कार्यक्रम में देश के सभी प्रदेशों के लोग थे. पंजाब, केरल, महाराष्ट्र, गुजरात समेत अन्य तमाम प्रदेशों के लोगों के बीच में ये कहना कि हम सबको एक मसले के हल के लिए एकजुट होना चाहिए, यह देश की आलोचना नहीं है. अगर सत्ता पक्ष को लगता है कि आलोचना है, तो फिर लगता है कि कहीं ना कहीं दाढ़ी में तिनका है.

सत्ता पक्ष के नेता, राहुल गांधी की कितनी भी बुराई करें, लेकिन इस बात को झुठलाया नहीं जा सकता कि उन्होंने बहरीन में जो भी कहा है, बिल्कुल सच कहा है. पिछले कुछ सालों में कई ऐसे वाक़ियात हुए हैं, जिन्होंने सामाजिक समरस्ता में ज़हर घोलने की कोशिश की है, सांप्रदायिक सद्भाव को चोट पहुंचाने की कोशिश की है. मज़हब के नाम पर लोगों को बांटने की कोशिश की है, जात-पांत के नाम पर एक-दूसरे को लड़ाने की कोशिश की है. देश की गरीब जनता पर नित-नये टैक्स का बोझ डाला जा रहा है. आए-दिन खाद्यान्न और रोज़मर्रा में काम आने वाली चीज़ों के दाम बढ़ाए जा रहे हैं. हालत यह है कि जनता की जमा पूंजी पर भी आंखें गड़ा ली गई हैं. बैंक नित-नये फ़रमान जारी कर ग्राहकों के खाते से पैसा काट रहे हैं. मरीज़ों को भी नहीं बख़्शा जा रहा है. दवाओं यहां तक कि जीवन रक्षक दवाओं के दाम भी बहुत ज़्यादा बढ़ा दिए गए हैं. कभी नोटबंदी तो कभी जीएसटी लागू कर लोगों के काम-धंधे बंद कर दिए गए. समाज में हाशिये पर रहने वाले तबक़ों की आवाज़ को भी कुचलने की कोशिश की जा रही है. आदिवासियों को उजाड़ा जा रहा है. जल, जंगल और ज़मीन के लिए संघर्ष करने वाले आदिवासियों को नक्सली कहकर प्रताड़ित करने का सिलसिला जारी है. दलितों पर अत्याचार बढ़ गए हैं. ज़ुल्म के ख़िलाफ़ बोलने पर दलितों को देशद्रोही कहकर सरेआम पीटा जाता है. हाल ही में महाराष्ट्र में पुणे ज़िले के भीमा-कोरेगांव मंा हुई हिंसा में दलितों पर हमले किए गए. गाय के नाम पर मुसलमान तो निशाने पर हैं ही. अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाने पर उन्हें दहशतगर्द क़रार देकर अंदर कर दिया जाता है.

अलबत्ता देश की एकता और अखंडता को बनाए रखना, देश में चैन और अमन क़ायम रखना सरकार की सबसे पहली ज़िम्मेदारी है. अगर सरकार इसमें नाकाम साबित हो रही है, तो ये विपक्ष की ज़िम्मेदारी है कि वे सरकार को आईना दिखाए और देश में चैन और अमन बनाए रखने के लिए काम करे. अगर राहुल गांधी ये काम कर रहे हैं, तो इसके लिए उनकी सराहना की जानी चाहिए, उनका साथ दिया जाना चाहिए. बहरहाल, सत्तापक्ष को आत्ममंथन की ज़रूरत है, आत्म विश्लेषण की ज़रूरत है. 

Thursday, January 18, 2018

राहुल गांधी को समर्पित एक गीत

हमने कांग्रेस पर एक गीत लिखा है. हमने ये गीत कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को समर्पित किया है.
कांग्रेस गीत
कांग्रेस कांग्रेस कांग्रेस कांग्रेस
देश की यही है आन
देश की यही है बान
देश की यही है शान
देश की यही है जान
कांग्रेस कांग्रेस कांग्रेस कांग्रेस

ये अवाम की हिताय
ये अवाम की सुखाय
ये सभी के काम आये
ये सभी के मन को भाये
कांग्रेस कांग्रेस कांग्रेस कांग्रेस
-फ़िरदौस ख़ान

Friday, January 12, 2018

कांग्रेस, कांग्रेस ही रहे तो अच्छा है

फ़िरदौस ख़ान
गले में रुद्राक्ष की माला, माथे पर चंदन का टीका और होठों पर शिव का नाम. ये है कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी का नया अवतार. हाल में हुए हिमाचल प्रदेश और गुजरात के विधानसभा चुनावों के दौरान न सिर्फ़ राहुल गांधी मंदिर गए, बल्कि उन्होंने अपने गले में रुद्राक्ष की माला भी पहनी. उन्होंने ख़ुद कहा कि वे और उनका पूरा परिवार शिवभक्त है. मगर सोमनाथ मंदिर में ग़ैर हिन्दुओं के लिए रखी गई विज़िटर्स बुक में दस्तख़्त करने पर उठे विवाद के बाद कांग्रेस ने राहुल गांधी के जनेऊ धारण किए तस्वीरंस जारी कर उनके ब्राह्मण होने का सबूत दिया. राहुल गांधी के निर्वाचन क्षेत्र अमेठी में पार्टी कार्यकर्ताओं ने उनके पोस्टर जारी कर उन्हें परशुराम का वंशज तक बता दिया.

दरअसल, भारतीय जनता पार्टी को कड़ी टक्कर देने के लिए कांग्रेस ने हिन्दुत्व की ओर क़दम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं. सियासी गलियारे में कहा जाता है कि कांग्रेस पहले से ही हिन्दुत्व की समर्थक पार्टी रही है. ये और बात है कि उसने कभी खुलकर हिन्दुत्व का कार्ड नहीं खेला. बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाना इसकी एक मिसाल है. हालांकि कांग्रेस पर तुष्टिकरण की सियासत करने के आरोप भी ख़ूब लगते रहे हैं. शाहबानो मामले में कांग्रेस की केंद्र सरकार मुस्लिम कट्टरपंथियों के सामने झुक गई थी और इसकी वजह से शाहबानो को अनेक मुसीबतों का सामना करना पड़ा था.

बहरहाल,  कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी की तर्ज़ पर हिन्दुत्व की राह पकड़ ली है. कांग्रेस को इसका सियासी फ़ायदा भी मिला है. गुजरात विधानसभा चुनाव की 85 दिन की मुहिम के दौरान कांग्रेस के स्टार प्रचारक राहुल गांधी ने 27 मंदिरों में पूजा-अर्चना की थी. उन्होंने जिन मंदिरों के दर्शन किए, उन इलाक़ों के 18 विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस ने जीत का परचम लहराया. जो सीटें कांग्रेस को मिली, उनमें से आठ पर 2012 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस ही जीती थी, लेकिन इस बार उसने 10 सीटें भारतीय जनता पार्टी को कड़ी शिकस्त देकर हासिल की हैं. इनमें दांता विधानसभा, नॉर्थ गांधीनगर विधानसभा, बेचराजी विधानसभा, गधाधा विधानसभा, पाटन विधानसभा, उंझा विधानसभा, भिलोडा विधानसभा, थारसा विधानसभा, पेटलाड विधानसभा, दाहोद विधानसभा, वंसडा विधानसभा, राधनपुर विधानसभा, कापडवंज विधानसभा, देदियापाड़ा विधानसभा,  वेव विधानसभा और चोटिला विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं. क़ाबिले-ग़ौर है कि राज्य की तक़रीबन 87 सीटों पर मंदिरों का सीधा असर पड़ता है और इनमें से आधी से ज़्यादा यानी 47 सीटें कांग्रेस को हासिल हुई हैं.

हालांकि भारतीय जनता पार्टी ने राहुल गांधी पर इल्ज़ाम लगाया था कि वे चुनावी फ़ायदे के लिए मंदिर जा रहे हैं. इसके जवाब में राहुल गांधी ने कहा था कि उन्हें जहां मौक़ा मिलता है वहां मदिर जाते हैं, वे केदारनाथ भी गए थे, क्या वो गुजरात में है. राहुल गांधी के क़रीबियों का कहना है कि वे अकसर मंदिर जाते हैं. राहुल गांधी अगस्त 2015 में दस किलोमीटर पैदल चलकर केदारनाथ मंदिर गए थे.  वे उत्तर प्रदेश के अमेठी ज़िले के गौरीगंज में दुर्गा भवानी के मंदिर में भी जाते रहते हैं.  इसके अलावा भी बहुत से ऐसे मंदिर हैं, जहां वे जाते रहते हैं, लेकिन वे इसका प्रचार बिल्कुल नहीं करते.

इस साल देश के आठ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, जिनमें मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, त्रिपुरा, मेघालय, मिज़ोरम और नागालैंड शामिल हैं. इनमें से कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है, जबकि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी सत्ता में हैं. फिर अगले ही साल लोकसभा चुनाव होना है. कांग्रेस ने चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है. माना जा रहा है कि राहुल गांधी राजस्थान के मंदिरों में भी दर्शन करने जाएंगे. वे मकर संक्रांति पर स्नान भी कर सकते हैं. अगले साल जनवरी के अर्द्ध कुंभ में भी राहुल गांधी की एक नई छवि जनता को नज़र आ सकती है. ऐसा नहीं है कि कांग्रेस पहली बार इस तरह के प्रयोग कर रही है. क़ाबिले-ग़ौर है कि सोनिया गांधी ने साल 2001 के कुंभ में संगम में स्नान करके ये साबित कर दिया था कि जन्म से विदेशी होने के बावजूद वे एक आदर्श भारतीय बहू हैं. देश की अवाम ने सोनिया गांधी को दिल से अपनाया और इस तरह भारतीय जनता पार्टी द्वारा पैदा विदेशी मूल का मुद्दा ही ख़त्म हो गया.

पिछले लोकसभा चुनाव में हुकूमत गंवाने के बाद कांग्रेस को लगने लगा था कि भारतीय जनता पार्टी हिन्दुत्व का कार्ड खेलकर ही सत्ता तक पहुंची है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एके एंटनी का कहना था कि कांग्रेस को चुनाव में अल्पसंख्यकवाद का ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा है. इस चुनाव में कांग्रेस 44 सीट तक सिमट गई थी.
दरअसल, भारतीय जनता पार्टी के पास नरेन्द्र मोदी सहित बहुत से ऐसे नेता हैं, जिनकी छवि कट्टर हिन्दुत्ववादी है. भारतीय जनता पार्टी हिन्दुत्व का कार्ड खेलने के साथ-साथ मुस्लिमों को रिझाने का भी दांव खेलना जानती है. तीन तलाक़ और हज पर बिना मेहरम के जाने वाली महिलाओं को लॊटरी में छूट देकर मोदी सरकार ने मुस्लिम महिलाओं का दिल जीतने का काम किया है.

राहुल गांधी की हिन्दुववादी छवि को लेकर कांग्रेस नेताओं में एक राय नहीं है. कई नेताओं का मानना है कि पार्टी अध्यक्ष की हिन्दुववादी छवि से कुछ राज्यों में भले ही कांग्रेस को ज़्यादा मिल जाएं, लेकिन पूर्वोत्तर के राज्यों में पार्टी को इसका नुक़सान भी झेलना पड़ सकता है. कांग्रेस की मूल छवि सर्वधर्म सदभाव की रही है. ऐसे में हिन्दुत्व की राह पर चलने से पार्टी का अल्पसंख्यक और सेकुलर वोट क्षेत्रीय दलों की झोली में जा सकता है. ऐसे में क्षेत्रीय दलों को फ़ायदा होगा. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी मुसलमानों की पसंदीदा पार्टी है. इसी तरह पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और केरल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को अल्पसंख्यकों का भरपूर समर्थन मिलता है.

बहरहाल, राहुल गांधी को सिर्फ़ मंदिरों तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, उन्हें अन्य मज़हबों के धार्मिक स्थानों पर भी जाना चाहिए, ताकि कांग्रेस की सर्वधर्म सदभाव, सर्वधर्म समभाव वाली छवि बरक़रार रहे. कांग्रेस, कांग्रेस ही बनी रहे, तो बेहतर है. देश के लिए भी, अवाम के लिए भी और ख़ुद कांग्रेस के लिए भी यही बेहतर रहेगा.

कविता संग्रह, जो वाक़ई ख़ास है

फ़िरदौस ख़ान
कविता अभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम है, जिसके द्वारा मन की भावनाओं को सुंदरता से व्यक्त किया जाता है.  आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में, हृदय की मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं. हज़ारी प्रसाद द्विवेदी के मतानुसार कविता का लोक प्रचलित अर्थ वह वाक्य है, जिसमें भावावेश हो, कल्पना हो, लालित्य हो, पद हो तथा प्रयोजन की सीमा समाप्त हो चुकी है. दरअसल, कविता में भाव तत्व की प्रधानता होती है. रस को कविता की आत्मा माना जाता है. कविता के अवयवों में आज भी इसकी जगह सबसे अहम है. प्राचीनकाल में कविता में छंद और अलंकारों को महत्वपूर्ण माना गया था, लेकिन आधुनिक काल में कविताएं छंद और अलंकारों से मुक्त हो गईं. कविताओं में छंदों और अलंकारों की अनिवार्यता ख़त्म हो गई और नई कविता का चलन शुरू हुआ. इस तरह मुक्त छंद या छंदहीन कविताओं की नदियां बहने लगीं.  मुक्तछंद कविताओं में पद की ज़रूरत नहीं होती, सिर्फ़ एक भाव प्रधान तत्व रहता है. आज की कविता में मनुष्य के मन में हिलोरें लेने वाली भावनाएं, उसके मस्तिष्क में उठने वाले विचार, कल्पनाएं और अनुभव प्रभावी हो गए और चंछ लुप्त हो गए. हां, इन कविताओं में एक लय होती है, भावों की लय, जो पाठक को बांधे रखती है.

कवि चेतन कश्यप की कविताएं भाव प्रधान कविताएं हैं. पिछले दिनों जयपुर के बोधि प्रकाशन ने उनका
काव्य संग्रह ’ख़ास तुम्हारे लिए’ प्रकाशित किया है. जितना दिलकश काव्य संग्रह का नाम है, इसमें शामिल कविताएं भी उतनी ही दिलकश हैं. 88 पृष्ठों के इस कविता संग्रह में दो खंड है. पहले खंड का नाम ’सफ़र-हमसफ़र है, जिसमें 27 कविताएं हैं. दूसरे खंड का नाम इसी पुस्तक के नाम पर है यानी ’ख़ास तुम्हारे लिए’ और इसमें 42 कविताओं को शामिल किया गया है. इन कविताओं में प्रेम है, वियोग है, मिलन की अभिलाषा है, टूटन है, बिखराव है और दरकते रिश्तों का दर्द है. और इस सबके साथ ही उम्मीद की एक ऐसी किरण भी है, जो ज़िन्दगी के अंधेरे को मिटाने देने के लिए आतुर नज़र आती है. रौशनी की एक ऐसी चाह है, जो हर तरफ़ उजाला बनकर बिखर जाना चाहती है. कविताएं प्रेयसी को संबोधित करती हैं, कवि के हृदय से निकली भावावेश की नदी में प्रेयसी को बहा ले जाना चाहती हैं. ऐसी ही एक कविता है-
साजो-सामन से
सज तो गया है
घर
तुम
आओ
रहो
तो प्राण प्रतिष्ठा भी हो जाए...

काव्य सृजन के मामले में भी काव्य संग्रह उत्कृष्ट है. कविता की भाषा में प्रवाह है, एक लय है. कवि ने कम से कम शब्दों में प्रवाहपूर्ण सारगर्भित बात कही है. कविताओं में शिल्प सौंदर्य है. कवि को अच्छे से मालूम है कि उसे अपनी भावनाओं को किन शब्दों में और किन बिम्बों के माध्यम से प्रकट करना है. और यही बिम्ब विधान पाठक को स्थायित्व प्रदान करते हैं. कविता में चिंतन और विचारों को सहज सौर सरल तरीके से पेश किया गया है, जिससे कविता का अर्थ पाठक को सहजता से समझ आ जाता है. पुस्तक का आवरण भी आकर्षक है. काव्य प्रेमियों के लिए यह एक अच्छा कविता संग्रह है.

समीक्ष्य कृति : ख़ास तुम्हारे लिए
कवि : चेतन कश्यप
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर
पेज : 88
मूल्य : 100 रुपये

Friday, January 5, 2018

ईवीएम के ख़िलाफ़ मुहिम तेज़

फ़िरदौस ख़ान
देश में इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को लेकर संशय बरक़रार है. सियासी दलों के नेताओं का मानना है कि चुनाव के दौरान ईवीएम में गड़बड़ी कर चुनाव नतीजों को प्रभावित किया गया है. ख़बरों के मुताबिक़ गुजरात के मुख्य चुनाव अधिकारी बीबी स्वैन ने माना है कि कम से कम चार मतदान केंदों पर ईवीएम और वीवीपैट की पर्चियों के मिलान में गड़बड़ी पाई गई है. उन्होंने बताया कि मतगणना के दिन वागरा, द्वारका, अंकलेश्वर और भावनगर-ग्रामीण सीट पर नये तरह का मामला सामने आया है. क़ाबिले-ग़ौर है कि चुनाव आयोग ने गुजरात और हिमाचल प्रदेश के मुख्य चुनाव अधिकारियों को हर विधानसभा क्षेत्र के कम से कम एक मतदान केंद्र की वोटर वेरीफ़ाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपैट) पर्चियों का ईवीएम में पड़े मतों से मिलान करने का निर्देश दिया था. इस प्रक्रिया में मतदान केंद्र लॊटरी के ज़रिये चुने जाने थे. दरअसल, ईवीएम में गड़बड़ी पाए जाने के बाद इसे सुरक्षित बताने वाले चुनाव आयोग के तमाम दावों की भी पोल खुल गई है. इतना ही नहीं, विपक्ष में रहते ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने वाली भारतीय जनता पार्टी भी मौन साधे हुए है.

ग़ौरतलब है कि कांग्रेस ने सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दाख़िल करके मांग की थी कि मतगणना के दौरान कम से कम 20 फ़ीसद वीवीपैट पर्चियों का ईवीएम से मिलान किया जाए. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसे ये कहते हुए ख़ारिज कर दिया था कि अदालत तब तक इस मामले में दख़ल नहीं दे सकती, जब तक कि ईवीएम-वीवीपैट पर्चियों के मिलान में कोई गड़बड़ी या फिर पक्षपात नज़र नहीं आता है.

बहरहाल, गुजरात के सूरत में लोग ईवीएम के ख़िलाफ़ सड़क पर उतर आए हैं. लोगों ने चुनाव में धांधली का आरोप लगाते हुए प्रदर्शन किया. इस दौरान वे अपने हाथ में पोस्टर भी लिए हुए थे, जिन पर ‘वोट चोरी बंद करो’ और ‘ईवीएम हटाओ लोकतंत्र बचाओ’ जैसे नारे लिखे हुए थे. हाल में उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव के दौरान भी ईवीएम में गड़बड़ी के मामले सामने आए थे. मतदाताओं का आरोप था कि ईवीएम में किसी भी पार्टी का बटन दबाने पर वोट भारतीय जनता पार्टी के खाते में जा रहा था. उनका कहना था कि हाथ के निशान और साइकिल के निशान का बटन दबाने पर कमल के निशान की बत्ती जलती थी. जब कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं को ये बात पता चली, तो उन्होंने बूथ के बाहर प्रदर्शन किया था. दोनों दलों के नेताओं ने इस बारे में प्रदेश के चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई थी. उनका यह भी कहना था कि प्रशासन भारतीय जनता पार्टी के इशारे पर काम कर रहा है. बहुजन समाज पार्टी इस मामले को लेकर अदालत पहुंच गई थी.

फ़िलहाल सियासी दल ईवीएम के ख़िलाफ़ देशभर में मुहिम चलाने की क़वायद में जुटे हैं. समाजवादी पार्टी ने सियासी दलों को एकजुट करने का फ़ैसला किया है, ताकि आगामी चुनाव ईवीएम की बजाय मतपत्र के ज़रिये कराने का दबाव बनाया जा सके. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष व उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का कहना है कि निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव को लेकर जनता के मन में विश्वास होना चाहिए. ईवीएम को लेकर तमाम तरह की शंकाएं हैं,  इसलिए मतपत्र से मतदान होना चाहिए. ईवीएम से जनता का विश्वास खंडित हुआ है. चुनावों में कई जगह ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी की शिकायतें आती रहती हैं. मतदान में कुल मतदाता संख्या और पड़े मतों में अंतर की भी काफ़ी शिकायतें होती हैं. यह स्थिति लोकतंत्र के लिए खतरे का संकेत है. उनका यह भी कहना है कि आज देश में जिस एकाधिकारी राजनीति को बढ़ावा दिया जा रहा है, वह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है.

पाटीदार आरक्षण आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल गुजरात में ईवीएम के ख़िलाफ़ मुहिम चलाए हुए हैं. उन्होंने भारतीय जनता पार्टी पर पैसे और बेईमानी से चुनाव जीतने का आरोप लगाया है. उनका कहना है कि ईवीएम के साथ छेड़छाड़ हुई है और यह हक़ीक़त है. उन्होंने कहा कि सूरत, राजकोट और अहमदाबाद में ईवीएम मशीनों में टेपरिंग हुई है, क्योंकि यहां हार और जीत का अंतर बेहद कम है. सूरत की वारछा रोड सीट पर एक लाख पटेल मतदाता हैं, लेकिन वहां रैली में इतनी भीड़ होने के बाद भी अगर हारे तो यह सवाल उठना जायज़ है कि ईवीएम में गड़बड़ी है. उनका यहां तक कहना है कि भारतीय जनता पार्टी ने इसलिए 99 सीटें जीतीं, ताकि कोई ईवीएम पर शंका न करे.उनका कहना है कि ईवीएम के ख़िलाफ़ उनका संघर्ष जारी रहेगा.  इस मुद्दे पर सभी विपक्षी दलों को एकसाथ खड़ा होना होगा.

कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला और गुजरात चुनाव के प्रभारी अशोक गहलोत ने भी चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे. उनका कहना था कि चुनाव आयोग पूरी तरह पीएम और पीएमओ के दबाव में काम कर रहा है. भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव आयोग को बंधक बना लिया है. इस मुद्दे को लेकर दिल्ली में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने चुनाव आयोग के दफ़्तर के बाहर प्रदर्शन किया था.
ग़ौरतलब है कि इस साल के शुरू में उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव के वक़्त से ही बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री मायावती भारतीय जनता पार्टी पर ईवीएम में छेड़छाड़ करने के आरोप लगा रही हैं. उनका कहना है कि भारतीय जनता पार्टी ने ईवीएम में छेड़छाड़ करके ही विधानसभा चुनाव जीता है. उन्होंने राज्यसभा में ईवीएम से मतदान को बंद करने की मांग की थी.

पूर्व केंद्रीय मंत्री व जनता दल (यू)  के नेता शरद यादव का कहना है जब ईवीएम को लेकर जनता में भ्रम की स्थिति है, तो चुनाव आयोग आख़िर क्यों इस डिब्बे को गले लगाए बैठा है. दूसरी प्रणाली से चुनाव कराने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए. इस मामले में अरविन्द केजरीवाल का कहना है कि चुनाव आयोग धृतराष्ट्र बनकर दुर्योधन को बचा रहा है. उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव में ईवीएम में गड़बड़ियों की ख़बरों को लेकर शिवसेना ने भी भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधा था. पार्टी के मुखपत्र ’सामना’ में लिखा था कि उत्तर प्रदेश में जनता का ध्यान बांटने और ईवीएम में छेड़छाड़ के अलावा भाजपा के पास कोई चारा नहीं बचा है. पार्टी का आरोप था कि भाजपा उत्तर प्रदेश में डर्टी पॉलिटिक्स कर रही है. जहां ईवीएम से छेड़छाड़ नहीं होती, वहां भाजपा कांग्रेस से पिट जाती है. चित्रकूट, मुरैना और सबलगढ़ इस बात का प्रमाण है.

बहरहाल, चुनाव आयोग ने गड़बड़ी पर सफ़ाई पेश की थी कि मशीन ख़राब है. लेकिन उसके पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि मशीन ख़राब है, तो फिर सभी वोट किसी ’विशेष दल’ के खाते में ही क्यों जाते हैं?

Saturday, December 30, 2017

राहुल गांधी जीते, रणनीतिकार हारे

फ़िरदौस ख़ान
हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभा चुनावों के नतीजे बहुत कुछ कहते हैं. इन नतीजों से बहुत से सवाल पैदा होते हैं. इन नतीजों के मद्देनज़र यह कहना क़तई ग़लत न होगा कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जीत गए, लेकिन उनके रणनीतिकार बुरी तरह हार गए. इसमें कोई शक नहीं कि राहुल गांधी ने गुजरात में ख़ूब मेहनत की, लेकिन इसके बावजूद उन्हें सत्ता के तौर मेहनत को फल नहीं मिला, जो मिलना चाहिए था या जिसके वे मुसतहक़ (अधिकारी( थे.

लेकिन इतना ज़रूर हुआ है कि राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री के गृह राज्य में जाकर यह बता दिया है कि वे अकेले दम पर पूरी सरकार से टकरा सकते हैं. कांग्रेस की तरफ़ से जहां अधिकारिक रूप से अकेले राहुल गांधी गुजरात में पार्टी की चुनाव मुहिम संभाले हुए थे, वहीं भारतीय जनता पार्टी की तरफ़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के साथ-साथ केंद्रीय मंत्री भी चुनाव प्रचार में दिन-रात जुटे हुए थे. ऐसा लग रहा था, मानो एक अकेले राहुल गांधी के ख़िलाफ़ पूरी सरकार चुनाव में उतर आई है. इतना ही नहीं, मीडिया भी राहुल गांधी के ख़िलाफ़ था. चुनाव आयोग भी पूरी तरह से सरकार के पक्ष में नज़र आ रहा था. जिस तरह चुनाव आयोग ने राहुल गांधी के साक्षात्कार को लेकर न्यूज़ चैनलों को नोटिस भेजा और भारतीय जनता पार्टी के 8  दिसम्बर पर घोषणा पत्र जारी करने, मतदान वाले दिन प्रधानमंत्री के रोड शो करने आदि मामलों में आंखें मूंद लीं, उसने चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा कर दिया है.

कांग्रेस ने साबरमती के रानिप में वोट डालने के बाद लोगों की भीड़ को खुली गाड़ी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अभिवादन को चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन बताते हुए कहा था कि चुनाव आयुक्त प्रधानमंत्री के निजी सचिव की तरह काम कर रहा है. कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला और गुजरात चुनाव के प्रभारी अशोक गहलोत का कहना था कि प्रधानमंत्री चुनाव आयोग और प्रशासन के साथ मिलकर गुजरात में रोड शो करके संविधान की धज्जियां उड़ा रहे है. रणदीप सुरजेवाला ने कहा था कि राहुल गांधी का इंटरव्यू दिखाने पर चुनाव आयोग ने टीवी चैनलों और अख़बारों पर एफ़आईआर दर्ज कराने के आदेश दिए, राहुल गांधी को नोटिस भेजा, लेकिन भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की. उन्होंने कहा, 'देश चुनाव आयोग से जानना चाहता है कि 8 दिसंबर को जब बीजेपी चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन कर अहमदाबाद में अपना घोषणा-पत्र जारी करती है, तो चुनाव आयोग मूकदर्शक क्यों बना रहता है. क्या कारण है कि वोटिंग से एक दिन पहले अहमदाबाद एयरपोर्ट जैसी सार्वजनिक संपत्ति पर अमित शाह पत्रकार गोष्ठी करते हैं. क्या कारण है कि एक केंद्रीय मंत्री (पीयूष गोयल) गुजरात को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं.' उन्होंने कहा था कहा कि चुनाव आयोग पूरी तरह पीएम और पीएमओ के दबाव में काम कर रहा है. भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव आयोग को बंधक बना लिया है. इस मुद्दे को लेकर दिल्ली में काग्रेस कार्यकर्ताओं ने चुनाव आयोग के दफ़्तर के बाहर प्रदर्शन किया था.

भले ही भारतीय जनता पार्टी गुजरात विधानसभा चुनाव जीत गई हो, लेकिन नैतिक रूप से उसकी हार ही हुई है. इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन में हुई ग़ड़बड़ी के मामले सामने आने के बाद अवाम के दिल में यह बात बैठ गई है कि चुनाव में धांधली हुई है. हार्दिक पटेल का कहना है,''बेईमानी करके जीत हासिल की है. अगर हैकिंग न हुई होती,तो बीजेपी जीत हासिल नहीं कर पाती. विपक्षी दलों को ईवीएम हैक के ख़िलाफ़ एकजुट होना चाहिए. अगर एटीएम हैक हो सकता है,तो ईवीएम क्यों हैक नहीं हो सकती.''
इसी तरह कांग्रेस नेता संजय निरुपम ने भी अपना एक पुराना ट्वीट री-ट्वीट करते हुए लिखा है, ''मैं अब भी इस ट्वीट पर क़ायम हूं. अगर ईवीएम से छेड़छाड़ न हुई होती, तो रिज़ल्ट कांग्रेस के पक्ष में होता.'' कांग्रेस कार्यकर्ताओं का आरोप है कि मतगणना में ईवीएम के साथ लगाई गई वोटर वेरीफ़ाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) पर्चियों का मिलान किया जाता, तो कांग्रेस ज़रूर जीत जाती. ग़ौरतलब है कि
कांग्रेस ने सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दाख़िल करके मांग की थी कि मतगणना के दौरान कम से कम 20 फ़ीसद वीवीपीएट पर्चियों का ईवीएम से मिलान किया जाए. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में दख़ल नहीं दे सकता. सवाल यह है कि अगर ईवीएम में गड़बड़ी नहीं हुई, तो फिर चुनाव आयोग ने मतगणना के दौरान वीवीपीएट पर्चियों का ईवीएम से मिलान क्यों नहीं किया?
सियासी गलियारों में तो यहां तक कहा जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी ने इस चुनाव में पूरी कोशिश की है नतीजा ऐसा रहे कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे, यानी भाजपा की सरकार बन जाए, और एकतरफ़ा चुनाव भी न लगे, ताकि ईवीएम में ग़ड़बड़ी का मुद्दा थम जाए.

हालांकि गुजरात में राहुल गांधी की मेहनत कुछ रंग लाई. जो भारतीय जनता पार्टी 150 सीटें जीतने का दावा कर कर थी, वह महज़ 99 सीटों तक सिमट गई. कांग्रेस ने 61 से 19 सीटों की बढ़ोतरी करते हुए 80 सीटों पर जीत दर्ज कर की है. ख़ास बात ये भी है कि राहुल गांधी ने जिन मंदिरों में जाकर पूजा-अर्चना की, उन इलाक़ों में कांग्रेस ने जीत का परचम लहराया. राज्य में 15 सीटें ऐसी हैं, जहां कांग्रेस उम्मीदवार कम वोटों के अंतर से चुनाव हारे हैं. ग्रामीण इलाक़ों में भी कांग्रेस को ख़ासा जन समर्थन हासिल हुआ है. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भारतीय जनता पार्टी की जीत पर तंज़ करते हुए कहा है कि गुजरात में भाजपा का दो अंकों में सिमट जाना उनके पतन की शुरुआत है. ये गांव, ग़रीब और ग्रामीण की उपेक्षा का नतीजा है. ये भाजपा की तथाकथित जीत है.

दरअसल, कांग्रेस समझ चुकी थी कि गुजरात और हिमाचल उनके साथ से निकल रहा है, इसलिए इन राज्यों के चुनाव नतीजे आने से दो दिन पहले ही यानी 16 दिसम्बर को राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारी सौंप दी गई. कार्यकर्ता राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष के तौर पर पाकर ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे थे. वे ख़ूब जश्न मना रहे थे, मिठाइयां बांटी जा रही थीं, लेकिन इसके दो दिन बाद आए चुनाव नतीजों ने उनकी ख़ुशी को कम कर दिया. कांगेस कार्यकर्ताओं को जीत न पाने का उतना मलाल नहीं था, जितना दुख इस बात का था कि वे जीत कर भी हार गए. उनका कहना है कि अगर अगर इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन की जगह मतपत्र से मतदान होता, तो कांग्रेस की जीत तय थी.
हालांकि राहुल गांधी ने हिम्मत नहीं हारी है. उन्होंने कहा है कि कांग्रेस गुजरात और हिमाचल प्रदेश में जनता के फ़ैसले का सम्मान करती है और नई सरकारों को शुभकामनाएं देती है, गुजरात और हिमाचल प्रदेश की अवाम ने जो प्यार दिया, उसके लिए तहे-दिल से शुक्रिया.

क़ाबिले-ग़ौर यह भी है कि कांग्रेस की नाकामी की सबसे बड़ी वजह सही रणनीति की कमी है. कांग्रेस के पास या ये कहना ज़्यादा सही होगा कि राहुल गांधी के पास ऐसे सलाहकारों की, ऐसे रणनीतिकारों की बेहद कमी है, जो उनकी जीत का मार्ग प्रशस्त कर सकें. सही रणनीति की कमी की वजह से ही कांग्रेस जीतकर भी हार जाती है. यही वजह है कि कांग्रेस डेमेज कंट्रोल भी नहीं कर पाती. कांग्रेस नेता मणिशंकर के बयान पर उन्हें बर्ख़ास्त करने के बाद भी पार्टी को कोई फ़ायदा नहीं हुआ. कांग्रेस जन हितैषी काम करके भी हार जाती है, जबकि आतंकियों को कंधार पहुंचाने वाले, बिन बुलाए पाकिस्तान जाकर बिरयानी खाने वाले नेताओं की पार्टी जीत जाती है. इसलिए राहुल गांधी को ऐसे सलाहकारों की ज़रूरत है, जो उन्हें कामयाबी की बुलंदियों तक ले जाएं.