Friday, April 20, 2018

आंदोलन और सरकार की नाकामी

फ़िरदौस ख़ान
जनतंत्र में, लोकतंत्र में जनता को ये अधिकार होता है कि वे अपनी मांगों के समर्थन में, अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आंदोलन कर सकती है,  सरकार की ग़लत नीतियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा सकती है. लेकिन आंदोलन के दौरान, प्रदर्शन के दौरान हिंसा करने की इजाज़त किसी को भी नहीं दी जा सकती. सरकार को भी ये अधिकार नहीं है कि वे शांति से किए जा रहे आंदोलन को कुचलने के लिए किसी भी तरह के बल का इस्तेमाल करे. बल्कि सरकार की ये ज़िम्मेदारी होती है कि वह आंदोलन कर रहे प्रदर्शनकारियों को सुरक्षा मुहैया कराए. इस बात का ख़्याल रखे कि कहीं इस आंदोलन की आड़ में असामाजिक तत्व कोई हंगामा खड़ा न कर दें. अगर आंदोलन में किसी भी तरह की हिंसा होती है, तो उस पर क़ाबू पाना, उसे रोकना भी सरकार की ही ज़िम्मेदारी है. लेकिन केंद्र की  बहुमत वाली भारतीय जनता पार्टी की मज़बूत सरकार इस मामले में बेहद कमज़ोर साबित हो रही है.

हाल में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम पर सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले को लेकर पहले दलितों ने भारत बंद किया था. उसके बाद सर्वणों ने आरक्षण के ख़िलाफ़ जवाबी आंदोलन शुरू कर दिया. ग़ौरतलब है कि पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के दुरुपयोग पर चिंता ज़ाहिर करते हुए गिरफ़्तारी और आपराधिक मामला दर्ज किए जाने पर रोक लगा दी थी. क़ाबिले-ग़ौर है कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोगों के साथ होने वाले भेदभाव को ख़त्म करने और उन्हें इंसाफ़ दिलाने के लिए अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम लाया गया था. संसद द्वारा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम को 11 सितम्बर, 1989 को पारित किया था. इसे 30 जनवरी, 1990 से जम्मू कश्मीर को छोड़कर पूरे में लागू किया गया. यह अधिनियम उस हर व्यक्ति पर लागू होता हैं, जो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं हैं और वह इस तबक़े के सदस्यों का उत्पीड़न करता हैं. इस अधिनियम में पांच अध्याय और 23 धाराएं शामिल हैं.  इस क़ानून के तहत किए गए अपराध ग़ैर- ज़मानती, संज्ञेय और अशमनीय हैं. यह क़ानून अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोगों पर अत्याचार करने वालों को सज़ा देता है. यह पीड़ितों को विशेष सुरक्षा और अधिकार देता है और मामलों के जल्द निपटारे के लिए अदालतों को स्थापित करता है. इस क़ानून के तहत भारतीय दंड संहिता में शामिल क़ानूनों में ज़्यादा सज़ा दिए जाने का प्रावधान है. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों पर होने वाले अमानवीय और अपमानजनक बर्ताव को अपराध माना गया है.  इनमें उन्हें जबरन अखाद्य पदार्थ मल, मूत्र इत्यादि खिलाने, उनका सामाजिक बहिष्कार करने जैसे कृत्य अपराध की श्रेणी में शामिल किए गए हैं. अगर कोई व्यक्ति किसी अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति के सदस्य से कारोबार करने से इनकार करता है, तो इसे आर्थिक बहिष्कार माना जाएगा.  इसमें किसी अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति के सदस्य के साथ काम करने या उसे काम पर रखने/नौकरी देने से इनकार करना, इस तबक़े के लोगों को सेवा प्रदान न करना या उन्हें सेवा प्रदान नहीं करने देना आदि इसमें शामिल हैं.

लेकिन सर्वोच्च न्यालाय के फ़ैसले से दलितों पर अत्याचार करने वाले लोगों की गिरफ़्तारी बेहद मुश्किल हो जाएगी, क्योंकि सरकारी कर्मचारी या अधिकारी की गिरफ़्तारी के लिए उसके नियोक्ता की मज़ूरी लेना ज़रूरी है. अगर दोषी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी नहीं है,  तो एसएसपी स्तर के पुलिस अधिकारी की सहमति के बाद ही उसकी गिरफ़्तारी हो सकेगी. इतना ही नहीं, अदालत ने अग्रिम ज़मानत का भी प्रावधान कर दिया है और एफ़आईआर दर्ज करने से पहले शुरुआती जांच को भी ज़रूरी कर दिया है. यानी दलितों पर अत्याचार के मामले में आरोपी की गिरफ़्तारी और उन पर कोई मामला दर्ज करना बहुत ही मुश्किल हो जाएगा. ऐसी हालत में दलितों पर अत्याचार के मामलों में इज़ाफ़ा होगा, इसमें कोई दो राय नहीं है. सख़्त क़ानून होने के बावजूद आए दिन देश के किसी न किसी हिस्से से दलितों के साथ अमानवीय बर्ताव करने के मामले सामने आते रहते हैं. अब जब क़ानून ही कमज़ोर हो जाएगा, तो हालात बद से बदतर होने में देर नहीं लगेगी.  

ये भी बेहद अफ़सोस की बात है कि आंदोलन न सिर्फ़ उग्र रूप धारण कर रहे हैं, बल्कि अमानवीयता की भी सारी हदें पार कर रहे हैं. बंद के दौरान कई जगह हिंसा की वारदातें हुईं. आगज़नी हुई, दुकानें जलाई गईं, वाहन फूंके गए, फ़ायरिंग हुई. लोग ज़ख़्मी हुए, कई लोगों की जानें चली गईं.  मरने वालों में पुलिस वाले भी शामिल थे, जो अपनी ड्यूटी कर रहे थे. जगह-जगह रेलें रोकी गईं, पटरियां उखाड़ दी गईं.  चक्का जाम किया गया. रास्ते बंद कर दिए गए. किसी को इस बात का ख़्याल भी नहीं आया कि बच्चे स्कूल से कैसे सही-सलामत घर लौटेंगे ? जो लोग सफ़र में हैं, वे कैसे अपने घरों को लौटेंगे या गंतव्य तक पहुंचेंगे? इस झुलसती गरमी में रेलों में बैठे यात्री बेहाल हो गए. बच्चे भूख-प्यास से बिलखते रहे. जो लोग बीमार थे, अस्पताल तक नहीं पहुंच पाए. अमानवीयता की हद ये रही कि बिहार के हाजीपुर में एंबुलस में बैठी महिला अपने बीमार बच्चे की ज़िन्दगी का वास्ता देती रही, प्रदर्शनकारियों के आगे हाथ जोड़ती रही, मिन्नतें करती रही, लेकिन किसी को उस पर तरस नहीं आया. किसी ने एंबुलेंस को रास्ता नहीं दिया, नतीजतन इलाज के अभाव में एक बच्चे की मौत हो गई, एक मां की गोद सूनी हो गई.

देश में बंद के दौरान हालात इतने ख़राब हो गए कि सेना बुलानी पड़ी. कई जगह कर्फ़्यू लगाया गया, जिससे रोज़मर्राह की ज़िन्दगी बुरी तरह मुतासिर हुई. आंदोलन के दौरान न सिर्फ़ सरकारी संपत्ति को नुक़सान पहुंचाया गया, बल्कि निजी संपत्तियों को भी नुक़सान पहुंचाया गया. आंदोलनकारी जिस सरकारी संपत्ति को नुक़सान पहुंचाते हैं, वे जनता की अपनी संपत्ति है. ये संपत्ति जनता से लिए गए कई तरह के करों से ही बनाई जाती है. यानी इसमें जनता की ख़ून-पसीने की कमाई शामिल होती है. सरकार इस नुक़सान को पूरा करने के लिए जनता पर करों का बोझ और बढ़ा देती है. जिन लोगों की निजी संपत्ति को नुक़सान पहुंचता है, वे ताउम्र उसकी भरपाई करने में गुज़ार देते हैं. आबाद लोग बर्बाद हो जाते हैं. ये सच है कि कोई भी आंदोलन एक न एक दिन ख़त्म हो ही जाता है.  उस आंदोलन से हुई माली नुक़सान की भरपाई भी कुछ बरसों में हो ही जाती है, लेकिन किसी की जान चली जाए, तो उसकी भरपाई कभी नहीं हो पाती.

दरअसल, देश में किसी भी तरह की हिंसा के लिए सरकार की सीधी जवाबदेही बनती है. देश में चैन-अमन क़ायम रखना, जनमानस को सुरक्षित रखना, उनके जान-माल की सुरक्षा करना सरकार की ही ज़िम्मेदारी है. सरकार के पास पुलिस है, सेना है, ताक़त है, इसके बावजूद अगर हिंसा होती है, तो इसे सरकार की नाकामी ही माना जाएगा. शासन और प्रशासन दोनों ही इस मामले में नाकारा साबित हुए हैं. केंद्र सरकार न तो दलितों के अधिकारों की रक्षा कर पा रही है और न ही क़ानून व्यवस्था को सही तरीक़े से लागू कर पा रही है. ऐसी हालत में जनता किसे पुकारे?

Saturday, April 14, 2018

देश को मज़बूत विपक्ष चाहिए

फ़िरदौस ख़ान
किसी भी देश के लिए सिर्फ़ सरकार का मज़बूत होना ही काफ़ी नहीं होता.  देश की ख़ुशहाली के लिए, उसकी तरक़्क़ी के लिए एक मज़बूत विपक्ष की भी ज़रूरत होती है. ये विपक्ष ही होता है, जो सरकार को तानाशाह होने से रोकता है, सरकार को जनविरोधी फ़ैसले लेने से रोकता है. सरकार के हर जन विरोधी क़दम का जमकर विरोध करता है. अगर सदन के अंदर उसकी सुनवाई नहीं होती है, तो वह सड़क पर विरोध ज़ाहिर करता है. जब सरकार में शामिल अवाम के नुमाइंदे सत्ता के मद में चूर हो जाते हैं और उन लोगों की अनदेखी करने लगते हैं, जिन्होंने उन्हें सत्ता की कुर्सी पर बिठाया है, तो उस वक़्त ये विपक्ष ही तो होता है, जो अवाम का प्रतिनिधित्व करता है. अवाम की आवाज़ को सरकार तक पहुंचाता है. आज देश की यही हालत है. भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार तानाशाही रवैया अख़्तियार किए हुए. सत्ता में आने के बाद जिस तरह से कथित जन विरोधी फ़ैसले लिए गए, उससे अवाम की हालत दिनोदिन बद से बदतर होती जा रही है. यह फ़ैसला नोटबंदी का हो या जीएसटी का, बिजली और रसोई गैस की क़ीमतें बढ़ाने का हो या फिर बात-बात पर कर वसूली का. इस सबने अवाम को महंगाई के बोझ तले इतना दबा दिया है कि अब उसका दम घुटने लगा है. कहीं मिनिमम बैंलेस न होने पर ग्राहकों के खाते से मनमाने पैसे काटे जा रहे हैं, तो कहीं आधार न होने के नाम पर, राशन कार्ड को आधार से न जोड़ने के नाम पर लोगों को राशन से महरूम किया जा रहा है.

देश की अवाम पिछले काफ़ी वक़्त से बुरे दौर से गुज़र रही है. जनमानस ने जिन लोगों को अपना प्रतिनिधि बनाकर संसद में, विधानसभा में भेजा था, वे अब सत्ता के नशे में हैं. उन्हें जनमानस के दुखों से, उनकी तकलीफ़ों से कोई सरोकार नहीं रह गया है. ऐसे में जनता किसके पास जाए, किसे अपने अपने दुख-दर्द बताए. ज़ाहिर है, ऐसे में जनता विपक्ष से ही उम्मीद करेगी. जनता चाहेगी कि विपक्ष उसका नेतृत्व करे. उसे इस मुसीबत से निजात दिलाए. ये विपक्ष का उत्तरदायित्व भी है कि वे जनता की आवाज़ बने, जनता की आवाज़ को मुखर करे.

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की प्रमुख व कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी  देश के हालात को बख़ूबी समझ रहे हैं. सोनिया गांधी अवाम को एक मज़बूत विपक्ष देना चाहती हैं, वे देश को एक जन हितैषी सरकार देना चाहती हैं. इसीलिए उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार के ख़िलाफ़ मुहिम शुरू कर दी है. दिल्ली में हुए कांग्रेस के महाधिवेशन में उन्होंने कहा कि पिछले चार साल में कांग्रेस को तबाह करने के लिए अहंकारी और सत्ता के नशे में मदमस्त लोगों ने कोई कसर बाक़ी नहीं रखी. साम-दाम-दंड-भेद का पूरा खेल चल रहा है, लेकिन सत्ता के अहंकार के आगे ना कांग्रेस कभी झुकी है और ना कभी झुकेगी. उन्होंने कहा कि मोदी सरकार के तानाशाही तौर तरीक़ों, संविधान की उपेक्षा, संसद का अनादर, विपक्ष पर फ़ज़्री मुक़दमों और मीडिया पर लगाम लगाने का कांग्रेस विरोध कर रही है.

राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश के उन्नाव और जम्मू कश्मीर के कठुआ में हुई बलात्कार की घटनाओं के विरोध में गुरुवार आधी रात को इंडिया गेट पर कैंडल मार्च निकाला.

ग़ौरतलब है कि पिछले दिनों सोनिया गांधी ने भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ गठजोड़ बनाने के लिए विपक्षी दलों को रात्रिभोज दिया. सोनिया गांधी के आवास 10 जनपथ पर हुए इस रात्रिभोज में विपक्षी दल के नेता शामिल हुए, जिनमें समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव, ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेइटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ़) के नेता बदरुद्दीन अजमल, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के शरद पवार और तारिक अनवर, राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव और मीसा भारती, जम्मू-कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस के उमर अब्दुल्ला, झारखंड मुक्ति मोर्चा के हेमंत सोरेन और बाबूलाल मरांडी, राष्ट्रीय जनता दल के अजित सिंह और जयंत सिंह, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के डी राजा, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मोहम्मद सलीम, द्रविड़ मुन्नेत्र कज़गम (डीएमके) के कनिमोई, बहुजन समाज पार्टी के सतीश चंद्र मिश्रा, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सुदीप बंदोपाध्याय, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतनराम मांझी, जनता दल-सेक्युलर (जेडी-एस) के कुपेंद्र रेड्डी, रेवलूशनेरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) के रामचंद्रन और केरल कांग्रेस के नेता भी शामिल हुए. कांग्रेस के नेताओं में राहुल गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गु़लाम नबी आज़ाद, अहमद पटेल,  एके एंटोनी, मल्लिकार्जुन खड़गे, रणदीप सुरजेवाला आदि नेताओं ने शिरकत की.

सोनिया गांधी बख़ूबी समझती हैं कि इस वक़्त कांग्रेस को उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है. जब भी पार्टी पर कोई मुसीबत आई है, तो सोनिया गांधी ढाल बनकर खड़ी हो गईं. देश के लिए, देश की जनता के लिए, पार्टी के लिए हमेशा उन्होंने क़ुर्बानियां दी हैं. देश का शासन उनके हाथ में था, प्रधानमंत्री का ओहदा उनके पास था, वे चाहतीं, तो प्रधानमंत्री बन सकती थीं या अपने बेटे राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बना सकती थीं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. उन्होंने डॊ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया. उनकी अगुवाई में न सिर्फ़ कांग्रेस एक मज़बूत पार्टी बनकर उभरी और सत्ता तक पहुंची, बल्कि भारत विश्व मंच पर एक बड़ी ताक़त बनकर उभरा.

राहुल गांधी को कांग्रेस की बागडौर सौंपने के बाद सोनिया गांधी आराम करना चाहती थीं. अध्यक्ष पद पर रहते हुए ही उन्होंने सियासत से दूरी बना ली थी. राहुल गांधी ही पार्टी के सभी अहम फ़ैसले कर रहे थे. लेकिन पार्टी को मुसीबत में देखकर उन्होंने सियासत में सक्रियता बढ़ा दी है. फ़िलहाल वे विपक्ष को एकजुट करने की क़वायद में जुटी हैं.  वह भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ एक मज़बूत गठजोड़ बनाना चाहती हैं.  क़ाबिले-ग़ौर है कि जब-जब कांग्रेस पर संकट के बादल मंडराये, तब-तब सोनिया गांधी ने आगे आकर पार्टी को संभाला और उसे मज़बूती दी. उन्होंने कांग्रेस की हुकूमत में वापसी के लिए देशभर में रोड शो किए थे. आख़िरकार उनकी अगुवाई में कांग्रेस ने साल 2004 और 2009  का आम चुनाव जीतकर केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार बनाई थी. उस दौरान देश के कई राज्यों में कांग्रेस सत्ता में आई. लेकिन जब से अस्वस्थता की वजह से सोनिया गांधी की सियासत में सक्रियता कम हुई है, तब से पार्टी पर संकट के बादल मंडराने लगे. साल 2014 में केंद की सत्ता से बेदख़ल होने के बाद कांग्रेस ने कई राज्यों में भी शासन खो दिया. हालांकि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में राहुल गांधी ने ख़ूब मेहनत भी की, लेकिन उन्हें वह कामयाबी नहीं मिल पाई, जिसकी उनसे उम्मीद की जा रही थी.

अगले साल आम चुनाव होने हैं. उससे पहले इसी साल मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने हैं. कांग्रेस के पास बहुत ज़्यादा वक़्त नहीं बचा है. सोनिया गांधी ने रात्रिभोज के बहाने विपक्षी द्लों को एकजुट करने की कोशिश की है. अगर सोनिया गांधी इसमें कामयाब हो जाती हैं, तो इससे जहां देश को एक मज़बूत विपक्ष मिलेगा, वहीं आम चुनाव में पार्टी की राह भी आसान हो सकती है. 

Tuesday, April 10, 2018

राहुल गांधी को समर्पित एक ग़ज़ल

भारत की मुहब्बत ही इस दिल का उजाला है
आंखों में मेरी बसता एक ख़्वाब निराला है

बेटा हूं मैं भारत का, इटली का नवासा हूं
रिश्तों को वफ़ाओं ने हर रूप में पाला है

राहों में सियासत की, ज़ंजीर है, कांटें हैं
सुख-दुख में सदा मुझको जनता ने संभाला है

धड़कन में बसा मेरी, इस देश की गरिमा का
मस्जिद कहीं, गिरजा कहीं, गुरुद्वारा, शिवाला है

बचपन से ले के अब तक ख़तरे में जां है, लेकिन
दुरवेशों की शफ़क़त का इस सर पे दुशाला है

नफ़रत, जलन, अदावत दिल में नहीं है मेरे
अख़लाक़ के सांचे में अल्लाह ने ढाला है

पतझड़ में, बहारों में, फ़िरदौस नज़ारों में
हर दौर में देखोगे राहुल ही ज़ियाला है
-फ़िरदौस ख़ान

शब्दार्थ : दुरवेश- संत,  शफ़क़त- सहानुभूति, अदावत- शत्रुता, अख़लाक़- संस्कार,  फ़िरदौस- स्वर्ग, ज़ियाला- उजाला


Sunday, March 18, 2018

राहुल गांधी ने किया सबकी रक्षा का वादा

फ़िरदौस ख़ान
किसी भी देश की तरक़्क़ी के लिए, किसी भी समाज की ख़ुशहाली के लिए चैन-अमन सबसे ज़रूरी है. पिछले चार बरसों में देश में जो नफ़रत का माहौल बना है, कहीं मज़हबी झगड़े, तो कहीं जातिगत ख़ून-ख़राबा. इस ख़ौफ़ के माहौल में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अवाम को यक़ीन दिलाया है कि वे उसकी रक्षा करेंगे. उन्होंने उन लोगों की रक्षा करने की भी बात कही, जो हमेशा उनके ख़िलाफ़ रहते हैं, उनके ख़िलाफ़ दुष्प्रचार करते हैं. सच, ऐसा राहुल गांधी ही कर सकते हैं. राहुल गांधी ही वो शख़्सियत हैं, जो अपने दुश्मनों, अपने विरोधियों के बारे में भी हमेशा अच्छा ही सोचते हैं, अच्छा ही करते हैं.

देश की राजधानी दिल्ली के ताल कटोरा स्टेडियम में आयोजित कांग्रेस के महाधिवेशन को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी ने पूरे देश में डर का माहौल बना दिया है. प्रेस के लोग भी डरते हैं. जनता इंसाफ़ के लिए अदालत में जाती है. पहली बार ऐसा हुआ है कि सुप्रीम कोर्ट के चार जज इंसाफ़ के लिए जनता की तरफ़ दौड़े. ये आरएसएस का काम है. कांग्रेस पार्टी और आरएसएस में बहुत फ़र्क़ है. हम हिन्दुस्तान के इंस्टीट्यूशन की इज़्ज़त करते हैं, वो हिन्दुस्तान के इंस्टीट्यूशन को ख़त्म करना चाहते हैं. वो सिर्फ़ एक इंस्टीट्यूशन चाहते हैं, आरएसएस. और वो चाहते हैं कि हिन्दुस्तान के सब इंस्टीट्यूशन आरएसएस के नीचे काम करें. चाहे वो ज्यूडिशरी हो, चाहे वो पार्लियामेंट हो, पुलिस हो, कोई भी इंस्टीट्यूशन हो. ये सच्चाई की लड़ाई है. हम हमारे इंस्टीट्यूशन की रक्षा करेंगे. हम पीछे नहीं हटेंगे.

मीडिया के दुष्प्रचार का ज़िक्र करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि प्रेस वाले हमारे बारे में, कांग्रेस पार्टी के बारे में भी ख़राब लिखते हैं, कभी-कभी ग़लत भी लिखते हैं. लेकिन मैं आपको यक़ीन दिलाता हूं कि हम आपकी भी रक्षा करेंगे. आप जितना भी ख़राब हमारे बारे में लिखना चाहते हो, लिखो. मगर कांग्रेस पार्टी का ये हाथ आपकी रक्षा करेगा. जब आरएसएस आपको मारेगी, दबाएगी, काटेगी, ये हाथ आपकी रक्षा करेगा. हम लोग आपकी रक्षा करेंगे.

उन्होंने कहा कि ये दो विचारधाराओं की लड़ाई है. हमारी विचारधारा जीतेगी. ये गांधी जी का संगठन है. शेरों का संगठन है. हम किसी से नहीं डरेंगे. सच्चाई की लड़ाई लड़ेंगे. उन्होंने कहा कि मैं पंद्रह साल से राजनीति में हूं. ये आसान नहीं है. झटके लगते हैं, ठोकर लगती है, चोट लगती है, दर्द भी होता है. इससे हम सीखते हैं. हमसे ग़लती होती है, तो हम उसे मान लेते हैं और कहते हैं कि फिर से ग़लती नहीं करेंगे, लेकिन आरएसएस और बीजेपी वाले ग़लती मानते नहीं हैं, किसी की सुनते भी नहीं हैं. पूरी दुनिया कह देगी कि ग़लती की, तो मोदी जी आंसू बहा देंगे, लेकिन ये नहीं मानेंगे कि ग़लती की. मोदी सरकार की नीतियों की वजह से देश बर्बाद हो गया, लेकिन वो लोग ये नहीं मानते.

राहुल गांधी ने कहा कि आज देश में ग़ुस्सा फैलाया जा रहा है. देश को बांटा जा रहा है. हिन्दुस्तान के एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से लड़ाया जा रहा है. हमारा काम जोड़ना का काम है. उन्होंने कांग्रेस के निशान का ज़िक्र करते हुए कहा कि ये जो हाथ का निशान है, यही एक निशान है जो हिन्दुस्तान को जोड़ने का काम कर सकता है. यही एक निशान है, जो इस देश को आगे ले जा सकता है.  इस निशान की जो शक्ति है, वो आपके अंदर है. अगर देश को जोड़ने का काम करना है, तो हम सबको मिलकर, देश की जनता को मिलकर काम करना होगा. उन्होंने कहा कि हम भविष्य की बात कर रहे हैं, बदलाव की बात कर रहे हैं. हमारी परम्पराओं में बदलाव किया जाता है, मगर बीते हुए वक़्त को भूला नहीं जाता है. युवाओं की बात होती है, मगर मैं कहना चाहता हूं कि अगर युवा कांग्रेस पार्टी को आगे ले जाएंगे, तो हमारे अनुभवी नेताओं के बिना कांग्रेस पार्टी आगे नहीं जा सकती. मेरा काम वरिष्ठ नेताओं और युवाओं को जोड़ने का काम है. एक नई दिशा दिखाने का काम है. इसके लिए संगठन में कई बदलाव करने होंगे. पार्टी के मेहनतकश कार्यकर्ताओं को आगे लाना होगा. नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच की दीवार को तोड़ना होगा. इस दीवार के अलग-अलग रूप हैं. एक रूप होता है कि पेराशूट की तरह ऊपर से टिकट लेकर कोई व्यक्ति गिरता है. दूसरा रूप होता है, दस-पंद्रह साल कार्यकर्ता ख़ून-पसीना बहाता है और फिर टिकट से पहले उसको कहा जाता है, भईया, तुम कार्यकर्ता हो, तुम्हारे पास पैसा नहीं है, तुम्हें टिकट नहीं मिलेगा. पर मैं कहता हूं- नहीं-नहीं-, तुम कार्यकर्ता हो, तुम्हारे दिल में कांग्रेस की विचारधारा है, तुम्हें टिकट ज़रूर मिलेगा और गुजरात में हमने छोटा-सा उदाहरण दिया, बड़ा नहीं, छोटा-सा, कांग्रेस पार्टी ने कार्यकर्ताओं को टिकट दिया और नतीजा आपने देखा.

दूसरी दीवार और शायद ये और भी बड़ी दीवार है, मगर ये जो पहली दीवार है, उसे तोड़े बिना वो दूसरी दीवार नहीं तोड़ी जा सकती. वो दीवार है- हिन्दुस्तान के युवाओं और राजनीतिक सिस्टम के बीच की दीवार. युवाओं ने मोदी जी में विश्वास किया, लेकिन वे ठगे गए. नीरव मोदी, ललित मोदी और अमित शाह जी का पुत्र अमेरिका भाग गए.

उन्होंने कहा कि अगर इन दीवारों को तोड़ना है, तो इसके लिए आगे आना होगा. उन्होंने ख़ाली स्टेज की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि ये स्टेज मैंने आपके लिए ख़ाली किया है. अगर हिन्दुस्तान को बदलना है, तो हर जात, हर मज़हब के लड़कों को, लड़कियों को समझना पड़ेगा कि आप ही बदल सकते हो और कोई नहीं बदल सकता. जो लोग हिन्दुस्तान के विज़न को समझते हैं, जिनके दिल में हिन्दुस्तान की आग जलती है, मैं उनसे इस स्टेज को भरूंगा.  आपका हाथ पकड़ कर आपको यहां बिठाऊंगा. मैं सत्तर-अस्सी साल पहले वाली,  महात्मा गांधी जी, जवाहरलाल नेहरू जी, सरदार पटेल जी, मौलाना आज़ाद जी, जगजीवन राम जी वाली कांग्रेस को देखना चाहता हूं. जैसे उन दिनों कांग्रेस पार्टी हुआ करती थी, वैसी ही कांग्रेस पार्टी देखना चाहता हूं. वरिष्ठ नेता हैं, आपकी जगह है, कांग्रेस पार्टी में युवा हैं, आपकी जगह है और कांग्रेस पार्टी के बाहर करोड़ों युवा हैं, आपकी भी जगह है.
हमें मिलकर काम करना है. दुनिया में आज दो विज़न दिखाई दे रहे है. एक अमेरिका का विज़न और दूसरा चीन का विज़न है. मैं चाहता हूं कि दस साल के अंदर एक इंडिया का विज़न भी दिखाई दे जाए. पूरी दुनिया ये कहे कि ये तरीक़ा सबसे अच्छा है. भाईचारे का, अहिंसा का, प्यार का. इसके लिए युवाओं को रोज़गार देना होगा. हर ज़िले में कोई न कोई चीज़ है. उत्तर प्रदेश को लीजिए. कानपुर, मिर्ज़ापुर, मुरादाबाद, कोई भी ज़िला देख लीजिए. स्किल की हिन्दुस्तान में कोई कमी नहीं है, इंटेलिजेंस की हिन्दुस्तान में कोई कमी नहीं है ऊर्जा की कोई कमी नहीं है. कमी एक है, जिसके पास स्किल है, जिसके पास ऊर्जा है, उसके पास बैंक लोन नहीं है, उसके पास टैक्नॊलोजी नहीं है. जो हमारा स्किल का ढांचा है, हर ज़िले में, हम उसे बैंकों के पैसे से और टैक्नॊलोजी से जोड़ने का काम करेंगे.
दूसरी बात, किसान अनाज उगाता है, सब्ज़ी उगाता है. उसका ज़्यादा से ज़्यादा उत्पाद ख़राब हो जाता है. उत्तर प्रदेश की सड़कों पर आलू दिखाई देते हैं. किसान उन्हें फेंक देते हैं. कांग्रेस पार्टी पूरे देश में फ़ूड पार्कों का नेटवर्क फैलाएगी. हर ज़िले में किसान अपना अनाज, अपनी सब्ज़ी, अपना फल सीधा फ़ूड प्रोसेसिंग फ़ैक्ट्री में जाकर बेचेगा. उन्होंने किसानों को यक़ीन दिलाया कि हमारी सरकार आने पर हम आपकी रक्षा करेंगे, दिल से आपकी रक्षा करेंगे और जैसे हमने सत्तर हज़ार करोड़ रुपये का क़र्ज़ माफ़ किया था, वैसे ही ज़रूरत पड़ने पर आपकी मदद करेंगे. तीसरा सबसे बड़ा काम शिक्षा का है. आज व्यापम स्कैम पूरे देश में फैलाया जा रहा है. दिल्ली में युवा धरना दे रहे हैं. प्रश्न पत्र बिकता है. इसे ख़रीदकर परीक्षा देने वाले पूरे देश में फैल रहे हैं.  शिक्षा पर सबका हक़ है. हमारी सरकार आने पर हम देश के कोने-कोने में उच्च शिक्षा की व्यवस्था करेंगे.

उन्होंने कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच के फ़र्क़ को बताया. उन्होंने कहा कि कांग्रेस और विपक्ष में क्या फ़र्क़ है, एक सबसे बड़ा फ़र्क़ है- वो क्रोध और ग़ुस्से का प्रयोग करते हैं, हम प्यार प्रयोग करते हैं. हम भाईचारे का प्रयोग करते हैं और चाहे कुछ भी हो जाए, मैं फिर से दोहराना चाहता हूं कि ये देश हम सबका है, हर धर्म का है, हर जात का है. हर व्यक्ति का है और जो भी पार्टी करेगी, वो पूरे देश के लिए करेगी, देश के हर व्यक्ति के लिए करेगी और किसी को पीछे नहीं छोड़ेगी.

गुजरात चुनाव के दौरान राहुल गांधी के मंदिर जाने पर भारतीय जनता पार्टी ने उन पर ख़ूब तंज़ किए थे. इस बारे में राहुल गांधी ने कहा कि गुजरात का चुनाव हुआ और वहां काफ़ी लोगों ने कहा कि मैं मंदिर जाता हूं. अजीब-सी बात है, क्योंकि मैं सालों से गुजरात चुनाव के बहुत पहले से, अपने दौरों पर मंदिर जाता हूं और मैं सिर्फ़ मंदिर में नहीं जाता हूं, मैं मस्जिद में, गुरुद्वारे में, चर्च में भी जाता हूं. मुझे जब भी कोई बुलाता है, मैं जाता हूं. उन्होंने दो मंदिरों का ज़िक्र करते हुए कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच के फ़र्क़ को बताया. उन्होंने कहा कि मैं आपको दो मंदिरों की कहानी बताता हूं. अपने दौरों पर दो अलग-अलग मंदिरों के पुजारी मिले, जिसमें एक कांग्रेस समर्थक थे और दूसरे भारतीय जनता पार्टी से थे. पहले मंदिर गया, शिव का मंदिर था, पूजा हो रही थी, पंडित जी बैठे थे. पूजा ख़त्म हुई, अलग-अलग चीज़ें थीं. सवाल पूछने की आदत है, तो मैंने पंडित जी से पूछा, गुरुजी आप मुझे बताइए आपने किया क्या? आपने दूध डाला, पानी डाला, मंत्र पढ़े, आपने क्या किया ? उन्होंने कहा कि बेटा समझना चाहता हैं, तो इन सिक्योरिटी वालों को परे कर. सिक्योरिटी वालों को परे किया. उन्होंने कहा कि अच्छा इधर आ, पीछे खड़ा हो जा. मंदिर के पीछे दीवार पर माथा लगा. फिर उन्होंने कहा, तू भगवान ढूंढ रहा है न, तो तुझे भगवान कहीं भी मिल जाएगा. जहां तू देखेगा, वहीं मिल जाएगा. मंदिर में ढूंढ रहा है, तो मंदिर में मिलेगा, चर्च में मिलेगा, गुरुद्वारे में मिलेगा, पेड़-पौधों में मिलेगा, आसमान की शून्यता में मिलेगा, जहां तू देखेगा, तुझे भगवान दिखेगा. ये जो हमने किया, ये हम करते हैं, ये हमें करने दे. अगर तू भगवान ढूंढ रहा है, तो जहां भी तू देखेगा, तुझे भगवान दिखेगा. इसके बाद बिल्कुल वही हालात, वैसा ही शिव मंदिर, वही पूजा वही सवाल. मगर पंडित जी ने सवाल का जवाब देने से मना कर दिया, लेकिन मैं अड़ गया. हम बाहर आ चुके थे. पंडित जी ने कहा कि मैंने तेरे लिए पूजा कर दी है. अब तुम प्रधानमंत्री बनने जा रहे हो, वो छत देख रहे हो. ऐसा करना जब तुम प्रधानमंत्री बन जाओ, तो इस पर सोना लगा देना. मतलब एक व्यक्ति सच्चाई कहता है. हमारा भगवान मंदिर में है, मस्जिद में है, चर्च में है, गुरुद्वारे में है, सब जगह है. हम तो पहले पुजारी की तरह सच के सिपाही हैं.  

उन्होंने कहा कि बीजेपी की राजनीति में बीजेपी का जो धर्म है, वो सिर्फ़ सत्ता को पाने के लिए है. लेकिन हम जनता के लिए लड़ते हैं. हमारे लोगों ने देश के लिए अपना ख़ून दिया है. हम नफ़रत नहीं करते, हम ग़ुस्सा नहीं करते. आप हमें मारे-पीटो, हम आपसे नफ़रत नहीं करेंगे.
उन्होंने कहा कि आज देश मुश्किल में है. किसान कहते हैं कि हम जी नहीं सकते. खेती से आमदनी नहीं होती, आत्महत्या करनी पड़ती है. दूसरी तरफ़ करोड़ों युवा बेरोज़गार हैं, उन्हें रास्ता नहीं दिख रहा है. समझ नहीं आ रहा है कि क्या करें. चार साल पहले इन लोगों ने मोदी जी पर भरोसा किया था, जो अब टूट चुका है. ख़त्म हो चुका है. उन्होंने कहा कि देश में करोड़ों युवा, जो आज थके हुए हैं, जब वे मोदी जी की तरफ़ देखते हैं, तो उन्हें रास्ता दिखाई नहीं देता. उन्हें ये बात समझ नहीं आती कि उन्हें रोज़गार कहां से मिलेगा ? किसानों को उनकी फ़सल का सही दाम कब मिलेगा ? देश एक तरह से थका हुआ है, रास्ता ढूंढ रहा है और मैं दिल से कहता हूं कि देश को सिर्फ़ कांग्रेस पार्टी ही रास्ता दिखा सकती है. उन्होंने कहा कि हम साथ मिलकर काम करें, तो कांग्रेस फिर से जीत सकती है.

ग़ौरतलब है कि 16 से 18 मार्च को आयोजित कांग्रेस के 84वें महाधिवेशन में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री  मनमोहन सिंह, मोती लाल वोरा, गु़लाम नबी आज़ाद, मल्लिकार्जुन खड़गे के अलावा स्टीयरिंग कमेटी के सदस्यों, अंतर्राष्ट्रीय डेलिगेट्स, एआईसीसी सदस्यों, पीसीसी सदस्यों और देश भर से आए पार्टी कार्यकर्ताओं ने शिरकत की और अपने विचार रखे. 

Friday, March 16, 2018

अब भी वक़्त है...

फ़िरदौस ख़ान
मुद्दई सुस्त और गवाह चुस्त. ये कहावत इस वक़्त कांग्रेस के नेताओं और रणनीतिकारों पर बिल्कुल सही बैठ रही है.  पार्टी कार्यकर्ता कांग्रेस को वापस सत्ता में लाने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं. जनमानस भी कांग्रेस पर यक़ीन करना चाहता है. मेघालय में जनता ने कांग्रेस को 21 सीटें जिताकर प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनाया, लेकिन इसके बावजूद महज़ दो सीटें जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी ने सरकार बनाने के लिए दावा पेश कर दिया. यहां कांग्रेस नैतिक रूप से भले ही चुनाव जीत गई हो, लेकिन रणनीति के लिहाज़ से पार्टी की हार हुई है. भारतीय जनता पार्टी के कारनामों को देखा जाए, तो उसके लिए नैतिकता कोई मायने नहीं रखती. वह सिर्फ़ जीतना चाहती है, भले ही उसके लिए उसे तमाम क़ायदे-क़ानून ताक़ पर ही क्यों न रखने पड़ें. एक कहावत भी है कि मुहब्बत और जंग में सब जायज़ है. ये सियासी जंग है, जिसे वही जीत सकता है, जिसमें जीतने की ख़्वाहिश हो, जीतने का जज़्बा हो. और ये ख़्वाहिश और ये जज़्बा इस वक़्त भारतीय जनता पार्टी में कूट-कूट कर भरा हुआ है.

ऐसा नहीं है कि राहुल गांधी मेहनत नहीं करते हैं. वे भी दिन-रात मेहनत करते हैं. मीलों पैदल चलते हैं, जनसभाएं करते हैं. ट्वीट कर प्रधानमंत्री से सवाल करते हैं. लेकिन उन्हें मालूम होना चाहिए कि चुनाव जीतने के लिए सिर्फ़ यही काफ़ी नहीं होता. इसके लिए जनता का समर्थन जुटाना होता है. जनसभाओं और रैलियों में महज़ भीड़ इकट्ठी करना ही काफ़ी नहीं है. इस भीड़ को वोटों में भी बदले जाने की ज़रूरत होती है. पिछ्ले कुछ सालों में देश के हालात काफ़ी ख़राब हुए हैं. लगातार बढ़ती महंगाई, नोटबंदी और जीएसटी ने लोगों के काम-धंधे चौपट कर दिए. एक तो पहले ही बेरोज़गारी कम नहीं थी, ऊपर से जो लोग काम में लगे थे, वे भी घर बैठ गए. सांप्रदायिक और जातिगत संघर्ष ने भी माहौल को ख़राब करने का काम किया. इतना ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी जिन वादों के बूते सत्ता में आई थी, उसे भी उसने तिलांजली दे दी. ऐसे में कांग्रेस के पास मुद्दों की कमी नहीं है. कांग्रेस को देशभर में एक जन आंदोलन चलाना चाहिए. इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के मामले में भी कांग्रेस ख़ामोशी अख़्तियार किए हुए है.  कांग्रेस जिस तरह घोटालों का विरोध कर रही है, उसे इसी तरह महंगाई व अन्य मुद्दों को लेकर जनता के बीच बने रहना चाहिए.

चुनाव में बहुमत न मिले, तो सरकार बनाने के लिए गठबंधन की ज़रूरत होती है. चुनाव से पहले ही इसके लिए तैयारी कर लेनी चाहिए. सियासत में एक-एक पल बेशक़ीमती हुआ करता है, इसलिए बहुत ही चौकस रहने की ज़रूरत होती है. जब मुक़ाबला किसी भारतीय जनता पार्टी से हो, तो और भी होशियार रहने की ज़रूरत होती है. राहुल गांधी अच्छे से जानते हैं कि उनका मुक़ाबला किससे है. उन्होंने ख़ुद कहा है कि भारतीय जनता पार्टी मणिपुर और गोवा की तरह मेघालय में जनादेश को अनदेखा करते हुए ग़लत तरीक़े से सरकार बना रही है. महज़ दो सीटों के साथ भारतीय जनता पार्टी ने परोक्ष ढंग से मेघालय में सत्ता हथिया ली. भारतीय जनता पार्टी का यह रवैया लोगों के जनादेश के प्रति घोर असम्मान दिखाता है. भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता हथियाने की भूख और अवसरवादी गठबंधन बनाने के लिए धन का इस्तेमाल किया है.

सियासी लिहाज़ से ऐसे नाज़ुक वक़्त में राहुल गांधी अपनी नानी के घर चले गए. बेहतर होता कि वे कुछ दिन बाद इटली जाते. वे यहीं रहकर पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ, पार्टी समर्थकों के साथ होली का त्यौहार मनाते और हर सियासी उठापटक़ पर नज़र रखते. मेघालय में सही रणनीति बनाई गई होती, गठबंधन किया होता, तो पार्टी की सरकार बन सकती थी. कांग्रेस ने जीत के बाद मणिपुर और गोवा की सत्ता गंवाने के बाद भी सबक़ नहीं लिया. ऐसे वक़्त में राहुल गांधी का कार्यकर्ताओं के बीच होना बेहद ज़रूरी था, ताकि कार्यकर्ताओं का मनोबल कमज़ोर न पड़े.

त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय की हार सिर्फ़ राहुल गांधी की ही शिकस्त नहीं है, बल्कि यह पूरी पार्टी की हार है, ख़ासकर कांग्रेस के रणनीतिकारों की हार है. कांग्रेस के पास या यूं कहें कि राहुल गांधी को ऐसे रणनीतिकारों की बेहद ज़रूरत है, जो हालात पर पैनी नज़र रख सकें. जो जनमानस के बीच कांग्रेस को मज़बूत करने का काम कर सकें, जो भीड़ को वोटों में बदलने के फ़न में माहिर हों, जो विरोधियों की हर चाल को समझ सकें और उसे मात दे सकें. लोकसभा चुनाव को बहुत ज़्यादा वक़्त नहीं बचा है. इस साल के आख़िर में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में चुनाव होने हैं. अगर कांग्रेस अब भी पूरी ताक़त झोंक दे, तो कामयाबी उसके क़दम चूम सकती है.

बेशक, राहुल गांधी एक अच्छे इंसान हैं. वे लोगों से मिलते हैं, उनके सुख-दुख में शरीक होते हैं. मंदिरों में पूजा-पाठ करते हैं, मज़ारों पर चादरें चढ़ाते हैं. वे हर काम चुनावी फ़ायदे के लिए नहीं करते. लोगों से मिलना-जुलना और उनके सुख-दुख में शामिल होना, उसके स्वभाव में शामिल है. ये कांग्रेस के लिए फ़क्र की बात है कि उन्हें एक सच्चा नेता मिला है, लेकिन सियासत में सच्चाई और अच्छाई के साथ सही रणनीति की भी ज़रूरत होती है. ये बात कांग्रेस ख़ासकर राहुल गांधी को समझनी होगी.

Thursday, March 15, 2018

सीलिंग का क़हर बरपा

फ़िरदौस ख़ान
देश की राजधानी दिल्ली में जिस तेज़ी से आबादी बढ़ रही है, उस हिसाब से बुनियादी सुविधाओं को जुटाना कोई आसान काम नहीं है. इस आबादी में देश के अन्य राज्यों से आए लोगों की भी एक बड़ी संख्या है. आबादी को रहने के लिए घर चाहिए, रोज़गार चाहिए, बिजली-पानी चाहिए, शैक्षिक, स्वास्थ्य व परिवहन की सुविधाएं चाहिएं. यानी घर-परिवार के लिए सभी बुनियादी सुविधाएं चाहिएं. जनता को ये सब सुविधाएं मुहैया कराने की ज़िम्मेदारी सरकार की है, प्रशासन की है. इसके लिए एक योजना की ज़रूरत होती है, एक मास्टर प्लान की ज़रूरत होती है. किसी भी शहर के सतत योजनाबद्ध विकास का मार्गदर्शन करने के लिए एक योजना होती है. इस मास्टर प्लान को बनाते वक़्त इस बात का ख़्याल रखा जाता है कि जिस समयावधि के लिए यह बनाया जा रहा है, उस वक़्त शहर की आबादी कितनी होगी और उसकी ज़रूरतें क्या-क्या होंगी.  मास्टर प्लान 2021 भी एक ऐसी ही योजना है, जिसके मुताबिक़ दिल्ली को एक ऐसा विश्वस्तरीय शहर बनाना है, जिसमें यहां के बाशिन्दों को तमाम सुविधाएं मुहैया हो सकें.

ग़ौरतलब है कि देश की राजधानी दिल्ली पिछले दिसम्बर माह से सीलिंग के साये में है. सुप्रीम कोर्ट की मॉनिटरिंग कमेटी के आदेश पर राजधानी में सीलिंग का काम चल रहा है. इस सीलिंग की वजह यही मास्टर प्लान 2021 है.  ये मास्टर प्लान साल 2001 में आ जाना चाहिए था, लेकिन वह छह साल बाद 2007 में आया. दिल्ली विकास प्राधिकरण के मुताबिक़ हर पांच साल के बाद इस प्लान की समीक्षा की जानी थी. इसके तहत साल 2012 के शुरू माह जनवरी में इसमें बदलाव के लिए जनता से सुझाव मांगे गए थे. इस सुझावों के हिसाब से मैनेजमेंट एक्शन कमेटी का भी गठन किया गया. सुझावों को अमल में लाने के लिहाज़ से इनका विश्लेषण किया गया. इसी के आधार पर मास्टर प्लान में बदलाव किया गया. इसे दिल्ली विकास प्राधिकरण ने पास भी कर दिया. दिल्ली विकास प्राधिकरण के इस मास्टर प्लान में 18 क्षेत्रों पर ध्यान केन्द्रित किया गया है, जिनमें भू-नीति, सार्वजनिक भागीदारी और योजना के कार्यान्वयन, पुनर्विकास, आश्रय, ग़रीबों के लिए आवास, पर्यावरण, अनधिकृत कॉलोनियों, मिश्रित उपयोग विकास, व्यापार और वाणिज्य, अनौपचारिक क्षेत्र, उद्योग, विरासत का संरक्षण, परिवहन, स्वास्थ्य, शैक्षणिक व खेल सुविधाएं, आपदा प्रबंधन आदि शामिल हैं.

दिल्ली विकास प्राधिकरण के मुताबि़क साल 2021 तक दिल्ली की आबादी 225 लाख तक पहुंच जाएगी.  मास्टर प्लान के हिसाब से इसे 220 लाख से कम रखने की कोशिश की जाएगी. यह योजना इस आबादी को घर बनाने के लिए  एक तीन-आयामी रणनीति को अपनाने पर ज़ोर देती है. इसके तहत लोगों को उपनगरों में स्थानांतरित करने के लिए प्रोत्साहित करना, शहर की सीमा का विस्तार और मौजूदा क्षेत्रों की आबादी-धारण क्षमता को बढ़ाकर उनका पुनर्विकास किया जाएगा. इसके अलावा सरकार के मालिकाना हक़ वाली ख़ाली ज़मीनों का इस्तेमाल किया जाएगा. साल साल 2021 तक 60 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों की तादाद 24 लाख से ज़्यादा होने की उम्मीद है और वह कुल आबादी का 10.7 फ़ीसद हिस्सा होगा.  ऐसे में उनके लिए भी विशेष सुविधाओं की ज़रूरत होगी.  ग़ौरतलब है कि जब 2005 में सार्वजनिक सुझावों को आमंत्रित करने के लिए ड्राफ़्ट को अधिसूचित किया गया था, तब उसे सात हज़ार आपत्तियां और सुझाव मिले थे, जबकि 611 लोगों और संगठनों को इस पर व्यक्तिगत सुनवाई दी गई थी. केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने साल 2007 में इस योजना के मौजूदा रूप को मंज़ूरी दे दी थी.  इलाक़ों के विकास के लिए नियम शहर के अन्य इलाक़ों से अलग होंगे. इसके मुताबिक़ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में कोई नया केंद्रीय और सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम कार्यालय नहीं बनाया जाएगा. दिल्ली में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की समस्या आबादी में बढ़ोतरी, शहरीकरण, जीवन शैली और उपभोग के तरीक़े और यहां से निकलने वाले कचरे से निपटने के लिए लैंडफ़िल की स्थापना का प्रस्ताव भी किया गया है. आवास के लिए बने इलाक़ों में ग़ैर-रिशायशी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए, योजनाओं में एक मिश्रित उपयोग नीति की परिकल्पना की गई है, जो दिल्ली को बेहतर शहर बनाने में मदद करेगी. हालांकि लुटियन के बंगला ज़ोन, सिविल लाइंस बंगला ज़ोन, सरकारी आवास, सार्वजनिक और निजी एजेंसियों की संस्थागत, स्टाफ़ आवास और विरासत संरक्षण समिति द्वारा सूचीबद्ध इमारतों, परिसरों में मिश्रित उपयोग की अनुमति नहीं दी गई है.

सीलिंग को लेकर राजधानी में क़हर बरपा है. भारतीय जनता पार्टी और सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के नेता एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं. आम आदमी पार्टी के विधायक सौरभ भारद्वाज का कहना है कि सीलिंग की एक वजह फ़्लोर एरिया रेशियो भी है, जिसे मास्टर प्लान-2021 में संशोधन करके बढ़ाया जा सकता है और सीलिंग को रोका जा सकता है. चूंकि मास्टर प्लान-2021 दिल्ली विकास प्राधिकरण का है, इसीलिए वही इसमें संशोधन कर सकता है. दिल्ली विकास प्राधिकरण भारतीय जनता पार्टी शासित केंद्र सरकार के अधीन आता है और उपराज्यपाल ही इसकी अध्यक्षता करते हैं. इसका दिल्ली सरकार के शहरी विकास विभाग से कोई लेना-देना नहीं है.
दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का आरोप है कि सीलिंग अभियान के ज़रिये भारतीय जनता पार्टी दिल्ली में खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ़डीआई) के लिए रास्ता बनाना चाहती है.
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का कहना है कि दिल्ली में सीलिंग के मुद्दे पर आरोप-प्रत्यारोप का नाटक बंद कर देना चाहिए. भारतीय जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी की मिलीभगत और फ़र्ज़ी लड़ाई में व्यापारियों को बहुत नुक़सान हो रहा है. दोनों पार्टियों को राजनीतिक रोटी सेंकने के बजाय इस समस्या का जल्द से जल्द समाधान निकालना चाहिए.

केंद्रीय आवास एवं शहरी विकास मंत्री हरदीप सिंह पुरी का कहना है कि सीलिंग का हल ढूंढ लिया गया है. इस बाबत जल्द ही सर्वोच्च न्यायालय में एक हल्फ़नामा दाख़िल किया जाएगा. इसमें मास्टर प्लान में संशोधन के क़ानूनी अधिकारों का का इस्तेमाल किया गया है. अगर सर्वोच्च न्यायालय मान जाता है, तो सीलिंग का मसला हल हो सकता है. इसके साथ ही दिल्ली सरकार द्वारा मिक्स लैंड यूज़ वाली 351 सड़कें भी जल्द ही अधिसूचित कर दी जाएंगी. ख़ैर, सीलिंग रोकने की नूराकुश्ती जारी है, लेकिन यह इतना आसान नहीं है.

बहरहाल, सीलिंग की वजह से काराबोर ठप होकर रह गया है. बड़े व्यापारियों का तो नुक़सान हो ही रहा है, वहीं सड़क के किनारे बैठकर सामान बेचने वाले लोग भी परेशान हैं. दुकानों पर काम करने वाले लोग भी ख़ाली घूम रहे हैं. उनके समक्ष रोज़ी-रोटी का संकट अपिदा हो गया है. कंफ़ेडरेशन ऑफ़ ऑल इंडिया ट्रेडर्स ने दिल्ली बाज़ार बंद का आह्वान किया था. इसके अलावा एक अन्य कारोबारी संगठन चैंबर ऑफ़ ट्रेड एंड इंडस्ट्री ने भी अलग से बाज़ार बंद की घोषणा की थी.

क़ाबिले-ग़ौर है कि व्यापारियों के सामने सीलिंग की आज जो सबसे बड़ी समस्या पैदा हो गई है, उसके लिए पूरी तरह से सरकार ही ज़िम्मेदार है. साल 1962 में राजधानी के लिए एक मास्टर प्लान बनाया गया था, लेकिन उस पर सहे तरीक़े से अमल नहीं किया गया. इसलिए लोगों को जहां जगह मिली, वे वहां मकान और दुकानें बनाते चले गए. यह काम कोई एक दिन में तो हुआ नहीं है, इसमें बरसों लग गए. दिल्ली नगर निगम और दिल्ली विकास प्राधिकरण की नाकामी की वजह से उतने व्यापारिक परिसर नहीं बन पाए, जितने बनने चाहिए थे. मास्टर प्लान 1962 पूरा हो नहीं पाया था कि उसके बाद मास्टर प्लान 1981 आ गया, जो नौ साल बाद 1990 में अमल में आया. फिर एक लम्बी जद्दो-जहद के बाद मास्टर प्लान 1921 आया. आज इसी मास्टर प्लान की वजह से दिल्ली के व्यापारिक प्रतिष्ठान सीलिंग के साये में हैं.

Sunday, March 11, 2018

ऐसी बानी बोलिए

फ़िरदौस ख़ान
कहते हैं, ज़बान शीरी, तो मुल्कगिरी यानी जिसकी ज़बान में मिठास होती है, वो मुल्क पर हुकूमत करता है. भाषा का दरख़्त दिल में उगता है और ज़ुबान से फल देता है. जैसा दरख़्त होगा, वैसे ही उसके फल होंगे.  इंसान की पहचान ग़ुस्से की हालत में ही होती है यानी ग़ुस्से में वह सब कह देता है, बोल देता है, जो उसके दिल में होता है, ग़ुस्से में इंसान का अपने दिमाग़ पर क़ाबू नहीं होता. किसी भी इंसान की भाषा उसके किरदार का आईना हुआ करती है. उसकी भाषा से, उसके शब्दों से न सिर्फ़ उसके विचारों का पता चलता है, बल्कि उसके संस्कार भी प्रदर्शित हो जाते हैं. अच्छे लोग, संस्कारी लोग ग़ुस्से में भी अपशब्दों को इस्तेमाल नहीं करते. 

दरअसल, भाषा एक आग है. वह सभ्यता की बुनियाद है, तो बर्बादी की जड़ भी है. भाषा बहता शीतल जल भी है, जो वीरानों को आबाद कर देता है, उनमें फूल खिला देता है. भाषा सैलाब भी है, जो अपने साथ न जाने कितनी आबादियां बहा ले जाता है. ख़ुशहाल बस्तियों को वीरानियों में बदल देता है. ये इंसान के अपने हाथ में है कि वह भाषा रूपी इस आग का, इस पानी का किस तरह इस्तेमाल करता है. ये भाषा ही तो है, जो दोस्तों को दुश्मन बना देती है और दुश्मनों को दोस्त बना लेती है. ये भाषा ही तो है, जिसके ज़ख़्म कभी नहीं भरते, हमेशा हरे रहते हैं, जबकि बड़े से बड़े ज़ख़्म भर जाते हैं, तीर-तलवार के ज़ख़्म भी वक़्त के साथ कभी न कभी भर जाया करते हैं.

भारत जैसे देश में जहां पत्थर तक को पूजा जाता है, तिलक लगाकर उसका अभिनंदन किया जाता है,  जहां कण-कण में ईश्वर के अस्तित्व को माना जाता है, वहां अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल हज़ारों बरसों की संस्कृति पर कुठाराघात करता है. बेशक हमारा भारत एक लोकतांत्रिक देश है. और किसी भी लोकतांत्रिक देश में, प्रजातांत्रिक देश में सबको अपनी बात कहने की आज़ादी होती है, अपने विचारों को व्यक्त करने की स्वतंत्रता होती है. लोकतंत्र के नाम पर, प्रजातंत्र के नाम पर, अभिव्यक्ति के नाम पर क्या किसी व्यक्ति को किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में अपशब्द बोलने की आज़ादी दी जा सकती है ? क़तई नहीं, क्योंकि ऐसा करना सामाजिक अपराध माना जाएगा. अपशब्दों के ज़रिये किसी का चरित्र हनन करना, किसी के मान-सम्मान को चोट पहुंचाना, किसी भी सूरत में सही नहीं कहा जा सकता. इस बारे में कोई भी दलील काम नहीं करेगी. ठीक है, आपको किसी से शिकायत है, किसी से नाराज़गी है, आप किसी से ग़ुस्सा हैं, तो आप सभ्य भाषा में भी अपनी बात रख सकते हैं. 

यह बेहद अफ़सोस और शर्म की बात है कि भारतीय राजनीति में अमर्यादा का समावेश होता जा रहा है. जहां सत्ता हासिल करने के लिए राजनेता साम-दाम-दंड-भेद का इस्तेमाल कर रहे हैं, वहीं भाषा के मामले भी रसातल में जा रहे हैं. राजनेताओं की भाषा दिनोदिन अमर्यादित होती जा रही है. ताज़ा मिसाल भारतीय जनता पार्टी में देखने को मिली है. हुआ यूं कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जब पंजाब नेशनल बैंक के घोटाले पर सवाल दाग़े, तो भारतीय जनता पार्टी के सांसद ब्रज भूषण शरण ने उनके बारे में विवादित बयान दिया. उन्होंने राहुल गांधी के बारे में न सिर्फ़ विवादित बयान दिया, बल्कि अपशब्दों का इस्तेमाल तक कर डाला. इससे पहले इसी पार्टी की केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने अमर्यादित शब्दों का इस्तेमाल किया था. ख़बरों के मुताबिक़  मेनका गांधी ने बहेड़ी में जनता दरबार लगाया था.  इस दौरान वह आग बबूला हो गईं और उन्होंने अधिकारियों को जनता के सामने ही डांट-फटकार लगाई. वह यहीं नहीं रुकीं, उन्होंने एक इंस्पेक्टर से उसके मोटापे पर अभद्र टिप्पणी करते हुए कहा कि उसकी कोई इज़्ज़त नहीं है. वह एक बुरा आदमी है और उसकी आमदनी से ज़्यादा संपत्ति की जांच कराई जाएगी.

यह कोई पहला मामला नहीं है, जब चाल, चरित्र और चेहरे की बात करने वाली भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने इस तरह अमर्यादित व्यवहार किया है. ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ़ भारतीय जनता पार्टी के नेता ही अमर्यादित और विवादित बयान देते हैं, इस मामले में इस मामले में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी आदि के नेता भी पीछे नहीं हैं. कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी में फ़र्क़ ये है कि कांग्रेस का कोई नेता विवादित बयान देता है, तो पार्टी उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करती है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में विवादित बयान दिया, तो कांग्रेस ने उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया. हालांकि मणिशंकर अय्यर ने इसके लिए माफ़ी भी मांग ली थी और कहा था कि उनका ऐसा कोई इरादा नहीं था. अनुवाद की ग़लती की वजह से ऐसा हुआ. राहुल गांधी कहते हैं कि कांग्रेस के संस्कार ऐसे नहीं हैं कि वह किसी के बारे में अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करे. हम कांग्रेसी हैं और किसी भी हालत में अपने संस्कार नहीं छोड़ सकते. 

इसके बरअक्स भारतीय जनता पार्टी के नेता हैं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक हैं, जो आए-दिन विवादित और अमर्यादित बयान देते रहते हैं. बयानों पर हंगामा होने के बाद माफ़ी मांगना तो दूर की बात है, वे कुतर्कों से अपने बयानों को सही ठहराने में जुट जाते हैं. पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने भारतीय सेना के बारे में विवादित बयान दिया था. इससे पहले भी वह इस तरह के विवादित बयान देते रहे हैं. विवादित बयानो के मामले में भारतीय जनता पार्टी से जुड़े साधु-संत भी पीछे नहीं हैं. इस मामले में साध्वियां भी कम नहीं हैं. उनके विवादित बयान भी सुर्ख़ियों में रहते हैं.

आख़िर क्यों कोई अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करता है. क्या सहनशीलता नाम की कोई चीज़ बाक़ी नहीं रह गई है कि लोग अपनी ज़रा सी आलोचना भी सहन नहीं कर पाते. जीवन में सबकुछ अपनी मर्ज़ी का तो नहीं हो सकता. सृष्टि की तरह ही जीवन के भी दो पहलू हैं, दो पक्ष हैं. हमारी संस्कृति में तो निंदक नियरे रखने की बात कही गई है. संत कबीर कहते हैं-
निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय 
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय
यानी जो हमारी निंदा करता है, उसे अपने ज़्यादा से ज़्यादा करीब रखना चाहिए. वह तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बताकर हमारे स्वभाव को साफ़ करता है.

यह बेहद चिंता का विषय है कि सियासत में भाषाई मर्यादा ख़त्म होने लगी है. देश के प्रधानमंत्री से लेकर कार्यकर्ता तक सब ऐसी भाषा इस्तेमाल करने लगे हैं, जिसे किसी भी हाल में सभ्य नहीं कहा जा सकता. देश में ऊंचे ओहदों पर बैठे लोगों को कम से कम अपने ओहदे का ही ख़्याल कर लेना चाहिए.  
शायद ऐसे ही लोगों के लिए संत कबीर कह गए हैं-
ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय 
औरन को शीतल करै, आपहु शीतल होय

Friday, February 23, 2018

उप चुनाव बताएंगे हवा का रुख़

फ़िरदौस ख़ान
उत्तर प्रदेश और बिहार में लोकसभा और विधानसभा के उपचुनावों को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज़ हो गई हैं. उत्तर प्रदेश की गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा और बिहार की अररिया लोकसभा सीटों के लिए 11 मार्च को मतदान होना है. इसी दिन बिहार की जहानाबाद और भभुआ विधानसभा सीटों के लिए भी वोट डाले जाएंगे. चुनाव नतीजे 14 मार्च को आएंगे. सियासी दलों ने इन चुनावों में जीत हासिल करने के लिए कमर कस ली है. ये उप चुनाव जहां प्रतिष्ठा का सवाल बने हुए हैं, वहीं अगले साल होने वाले आम चुनाव के लिहाज़ से भी अहम माने जा रहे हैं. सियासी दलों का मानना है कि ये चुनाव साल 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव का रुख़ तय करेंगे.

उत्तर प्रदेश की गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटें पहले भारतीय जनता पार्टी के पास थीं. भारतीय जनता पार्टी की पूरी कोशिश है कि वह अपनी इन सीटों पर दबदबा बनाए रखे. भारतीय जनता पार्टी के लिए गोरखपुर सीट जीतना इसलिए भी ज़रूरी है, क्योंकि यह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सीट रही है. उन्होंने साल 1998 से लगातार पांच बार भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीता है. इससे पहले उनके गुरु व गोरखनाथ मंदिर के पूर्व महंत अवैद्यनाथ मंहत यहां से तीन बार लोकसभा का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. यह सीट जीतकर वह पांच बार संसद तक पहुंचे हैं. इतना ही नहीं, किसी सत्ताधारी पार्टी के लिए वह सीट प्रतिष्ठा का सवाल बन जाती है, जो उसके शासक के पास रही हो.

कांग्रेस के लिए भी ये उप चुनाव बहुत अहम है. फूलपुर लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस का पुराना और गहरा रिश्ता रहा है. देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू साल 1952 में इसी सीट से चुनाव जीतकर संसद में पहुंचे थे. उन्होंने साल 1952, 1957 और 1962 में लगातार तीन बार इस सीट पर जीत का परचम लहराया. पंडित जवाहर लाल नेहरू का जलवा यह था कि साल 1962 में समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने कांग्रेस को हराने के लिए यहां से ख़ुद चुनाव लड़ा और शिकस्त खाई.  पंडित जवाहर लाल नेहरू की वजह से ही यह सीट बेहद ख़ास हो गई. पंडित जवाहरलाल नेहरू की मौत के बाद उनकी बहन विजय लक्ष्मी पंडित यहां से साल 1964 का उपचुनाव जीतकर सांसद बनीं. उन्होंने साल 1967 में यहां से जीत दर्ज की. संयुक्त राष्ट्र में प्रतिनिधि बनने के बाद साल 1969 में उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया. यहां हुए उपचुनाव में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार जनेश्वर मिश्र ने जीत हासिल की. इसके बाद साल 1971 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के विश्वनाथ प्रताप सिंह ने यहां से चुनाव जीता. साल 1977 के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी की उम्मीदवार कमला बहुगुणा ने जीत हासिल की, जो बाद में कांग्रेस में शामिल हो गईं. साल 1980 के चुनाव में लोकदल के उम्मीदवार बीडी सिंह ने यहां से चुनाव जीता. साल 1984 के आम चुनाव में कांग्रेस के रामपूजन पटेल ने यहां से जीत दर्ज की. बाद में वह जनता दल में चले गए और साल 1989 और 1991 में भी उन्होंने जीत हासिल की. साल 1996 और 1998 के आम चुनाव में समाजवादी पार्टी के जंग बहादुर ने यहां से चुनाव जीता. साल 1999 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के ही धर्मराज पटेल और साल 2004 के आम चुनाव में बाहुबली अतीक़ अहमद ने यहां से जीत का परचम लहराया. साल 2009 के लोकसभा चुनाव में यह सीट बहुजन समाज पार्टी के खाते में चली गई. यहां से बहुजन समाज पार्टी के कपिल मुनि करवरिया ने जीत दर्ज की. यह जीत बहुजन समाज के लिए इसलिए भी बहुत ख़ास थी, क्योंकि पार्टी के संस्थापक कांशीराम यह सीट हार गए थे. कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाले फूलपुर लोकसभा क्षेत्र में पहली बार साल 2014 में केशव प्रसाद मौर्य ने जीत हासिल करके इसे भारतीय जनता पार्टी की झोली में डाल दिया.

समाजवादी पार्टी भी इन सीटों को हासिल करने के लिए जी जान लगा देना चाहती है. ऐसा करके वह विधानसभा में मिली हार के ज़ख़्म पर कुछ मल्हम लगाना चाहती है. भारतीय जनता पार्टी ने समाजवादी पार्टी से ही राज्य की सत्ता छीनी थी. समाजवादी पार्टी चाहती है कि अगर ये सीटें उसकी झोली में आ गईं, तो इससे पार्टी में एक नई जान आ जाएगी. इस जीत से पार्टी कार्यकर्ताओं में भी जोश पैदा होगा. उप चुनाव में समाजवादी पार्टी एकला चलो की राह पर चल रही है. समाजवादी पार्टी के विधानसभा में विपक्ष के नेता राम गोविंद चौधरी ने किसी भी दल के साथ गठबंधन से इंकार करते हुए कहा है कि दोनों सीटों पर उनके उम्मीदवार पार्टी के चुनाव निशान पर ही मैदान में उतरेंगे.

गौरतलब है कि गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के इस्तीफ़ा देने की वजह से ख़ाली हुई हैं. योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य अपनी-अपनी सीटों से इस्तीफ़ा देकर उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य बन गए हैं. उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्रिमंडल में रहने के लिए प्रदेश की विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य होना ज़रूरी है. इस चुनाव में इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन भी मुद्दा बनी हुई है. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने चुनाव आयोग से ईवीएम की बजाय मतपत्रों से मतदान कराए जाने की मांग की है.

उधर, बिहार में भी उपचुनाव को लेकर माहौल गरमाया हुआ है. बिहार में सत्तारूढ़ जनता दल यूनाइटेड ने उपचुनाव से दूरी बना ली है. पार्टी का कहना है कि उसका कोई उम्मीदवार इस चुनाव में खड़ा नहीं होगा. सियासी गलियारे में कहा जा रहा है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का घटक दल यानी जनता दल यूनाइटेड ने भारतीय जनता पार्टी के दबाव में आकर उप चुनाव से किनारा किया है. भारतीय जनता पार्टी अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र उप चुनाव जीतकर यह संदेश देना चाहती है कि जनता में उसकी पैठ अभी भी बनी हुई है.

बहरहाल,  कांग्रेस राजस्थान में हुए उप चुनाव में मिली जीत से उत्साहित है. कांग्रेस ने अलवर, अजमेर और मांडलगढ़ विधानसभा क्षेत्रों में हुए उप चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को करारी शिकस्त दी थी. इसके अलावा कांग्रेस, समाजवादी पार्टी व अन्य विपक्षी दलों का यह भी मानना है कि जनता वादा ख़िलाफ़ी के लिए भारतीय जनता पार्टी को सबक़ सिखाएगी. हालांकि भारतीय जनता पार्टी के नेता सभी सीटों पर जीत के दावे कर रहे हैं. अलबत्ता, सियासी दलों की जीत और हार जनता के हाथ में है.

Saturday, February 17, 2018

कौन बनेगा प्रधानमंत्री मोदी, राहुल या...


फ़िरदौस ख़ान
वक़्त कैसे बीतता है, पता ही नहीं चलता. कल की ही सी बात लगती है. अब फिर से आम चुनाव का मौसम आ गया. अगले ही बरस लोकसभा चुनाव होने हैं. सभी सियासी दलों ने चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं. अवाम में भी सरग़ोशियां बढ़ गई हैं. सबकी ज़ुबान पर यही सवाल है कि अगली बार किसकी सरकार आएगी. क्या भारतीय जनता पार्टी वापसी करेगी? अवाम ने जिन अच्छे दिनों की आस में भाजपा को चुना था, वो तो अभी तक नहीं आए और न ही कभी आने की उम्मीद है. ऐसे में क्या अवाम भाजपा को सबक़ सिखाएगी और देश की बागडोर एक बार फिर से कांग्रेस को सौंपेगी? अवाम कांग्रेस को चुनेगी, तो कांग्रेस की तरफ़ से प्रधानमंत्री पद का दावेदार कौन होगा. क्या पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे?

हालांकि पार्टी की तरफ़ से यही दावा किया जा रहा है कि कांग्रेस के सत्ता में आने पर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाया जाएगा. कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख और मुख्य प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला का कहना है कि मोदी का विकल्प सिर्फ़ और सिर्फ़ राहुल गांधी ही हैं. कोई और नहीं हो सकता. कांग्रेस और देश के लोग राहुल गांधी को देश का अगला प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं. पार्टी के वरिष्ठ नेता एम वीरप्पा मोइली का भी यही कहना है कि पार्टी और युवाओं की महत्वाकांक्षा राहुल गांधी को देश का प्रधानमंत्री बनते देखना है. वे कहते हैं कि राहुल गांधी अब नरेन्द्र मोदी से तुलना से परे हैं. वे एक मज़बूत व्यक्तित्व के रूप में उभरे हैं.
बेशक कांग्रेस नेता, कार्यकर्ता और पार्टी समर्थक राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं, लेकिन क्या ख़ुद राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं?

ये जगज़ाहिर है कि अपने पिता की तरह ही राहुल गांधी भी सियासत में नहीं आना चाहते थे, लेकिन उन्हें सियासत में आना पड़ा.  साल 2004 के आम चुनाव में कांग्रेस को शानदार जीत मिली थी और राहुल गांधी भी भारी मतों से चुनाव जीतकर सांसद बने थे. केन्द्र में कांग्रेस की सरकार बनी और डॊ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने. लेकिन राहुल गांधी ने सरकार में कोई ओहदा नहीं लिया. वे पार्टी संगठन से ही जुड़े रहे. इसी तरह साल 2009 के आम चुनाव में भी कांग्रेस ने जीत का परचम लहराते हुए वापसी की और राहुल गांधी ने भी अपने निर्वाचन क्षेत्र अमेठी में शानदार जीत हासिल की. क़यास लगाए जा रहे थे कि वे इस बार ज़रूर सरकार में कोई अहम ज़िम्मेदारी संभालेंगे, लेकिन इस बार भी उन्होंने सरकार में कोई ओहदा लेने से इंकार करते हुए संगठन को मज़बूत करने पर ही ज़्यादा ध्यान दिया. इसमें कोई दो राय नहीं है कि राहुल गांधी चाहते, तो वे प्रधानमंत्री बन सकते थे. आज हालात और हैं, पहले उनकी मां सोनिया गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारी संभाल रही थीं, लेकिन आज राहुल गांधी ख़ुद इस ज़िम्मेदारी को निभा रहे हैं. अब उन पर दोहरी ज़िम्मेदारी है. पहली पार्टी संगठन को मज़बूत करने की और दूसरी खोया हुआ जनाधार हासिल करके पार्टी को हुकूमत में लाने की. क्या ऐसे हालात में वे ख़ुद प्रधानमंत्री बनना चाहेंगे और पार्टी अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी किसी वरिष्ठ नेता को सौंप देंगे. या फिर ख़ुद पार्टी की ज़िम्मेदारी संभालते रहेंगे और किसी अन्य क़रीबी नेता को प्रधानमंत्री बनाने के लिए उसका नाम पेश करेंगे? पार्टी के क़रीबी सूत्रों का माना है कि राहुल गांधी अपने एक क़रीबी नेता को प्रधानमंत्री बनाना चाहेंगे. पार्टी का ये क़रीबी नेता उनके पिता राजीव गांधी का भी विश्वासपात्र रहा है. इस नेता के गांधी परिवार से गहरे रिश्ते हैं और राहुल गांधी की विदेश यात्रा में वह उनके साथ रहता है.

इसके बरअक्स अगर देश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनती है, तो प्रधानमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार नरेन्द्र मोदी ही हो सकते हैं. ये नरेन्द्र मोदी की ही चतुराई थी कि पिछले लोकसभा चुनाव में हर तरफ़ मोदी-मोदी ही हो रहा था. भले ही मोदी भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार थे, लेकिन चुनाव में भाजपा कहीं नहीं थी. ऐसा लग रहा था कि ये चुनाव कांग्रेस और नरेन्द्र मोदी के बीच है. नरेन्द्र मोदी ने ख़ुद को पार्टी से बड़ा साबित करके दिखा दिया. भाजपाई ख़ुद मोदी लहर की बात कर रहे थे, मोदी नाम की सुनामी की बात कर रहे थे. इस बारे में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का अपना ही नज़रिया है. वे मानते हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव में जो सरकार बनेगी, उसमें मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए कोई जगह नहीं होगी. वे ये भी कहते हैं कि लोकसभा चुनाव में अगर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) जीतता भी है, तो उसके सहयोगी दल नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद पर स्वीकार नहीं करेंगे. ऐसे में मौजूदा गृहमंत्री राजनाथ सिंह के प्रधानमंत्री बन सकते है. इसकी वजह ये है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के घटक द्ल नरेन्द्र मोदी से नाराज़ चल रहे हैं. ऐसे हालात में वे मोदी को फिर से मौक़ा नहीं देना चाहेंगे, हां अगर भारतीय जनता पार्टी बहुमत हासिल कर लेती है, तो फिर सहयोगी दलों का विरोध भी मोदी की राह में कोई रुकावट नहीं बन पाएगा.  क़ाबिले-ग़ौर है कि नरेन्द्र मोदी पिछले लोकसभा चुनाव से ही 2024 तक का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं. इसमें उन्हें कितनी कामयाबी मिलती है, ये तो आने वाला वक़्त ही बताएगा.

बहरहाल, इसी माह पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. त्रिपुरा में 18 फ़रवरी में मतदान होगा, जबकि मेघालय और नागालैंड में 27 फ़रवरी वोट डाले जाएंगे. तीनों राज्यों के चुनाव नतीजे 3 मार्च को आएंगे. इन तीनों ही राज्यों में विधानसभा सीटों की संख्या 60-60  है. गौरतलब है कि त्रिपुरा विधानसभा का कार्यकाल 6 मार्च को, मेघालय विधानसभा का 13 मार्च और नगालैंड विधानसभा का कार्यकाल 14 मार्च को पूरा हो रहा है. मेघालय में कांग्रेस हुकूमत में है और उसके विधायकों की संख्या 29 है. त्रिपुरा में सीपीआई (एम) 51 सीटों के साथ सत्ता में है. वह पिछले 25 साल से सत्तासीन है. नगालैंड में नगा पीपुल्स फ्रंट की सरकार है और उसके पास 45 सीटें हैं. इनके अलावा इसी साल कर्नाटक, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में भी विधानसभा चुनाव होने हैं. इन चुनावों के नतीजे आगामी लोकसभा चुनाव की राह तय करेंगे.

Wednesday, February 14, 2018

वेलेंटाइन डे और आप


कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं, जो हमें बिल्कुल भी पसंद नहीं होतीं... लेकिन हम उन्हें मिटा तो नहीं सकते, उनसे नफ़रत तो नहीं कर सकते... उन्हें बदल तो नहीं सकते... हो सकता है कि वो चीज़ें दूसरों को अच्छी लगती हों...

फ़िलहाल बात वेलेंटाइन डे की है... बहुत से लोगों को ये दिन बिल्कुल भी पसंद नहीं... इस दिन को नापसंद करने के लिए उनकी अपनी दलीलें हैं...
बहुत से लोगों को वेलेंटाइन अच्छा लगता है... वो इसे जज़्बात से जोड़ कर देखते हैं... कुछ लोगों के लिए ये दिन अपनी मुहब्बत के इक़रार करने का दिन है... कुछ लोगों के लिए ये दिन अपने परिवार के साथ कहीं बाहर घूम-फिर कर रोज़मर्रा की दुश्वारियों का तनाव दूर कर लेने का दिन है...

बहरहाल, वेलेंटाइन डे आप मनाएं या न मनाएं, या किस तरह मनाएं... आप अपने महबूब के साथ इसे मनाएं, अपने दोस्तों के साथ मनाएं, अपने वालदेन के साथ मनाएं, अपने भाई-बहनों के साथ मनाएं या फिर अपने बच्चों के साथ मनाएं... ये आपकी अपनी मर्ज़ी है...

Saturday, February 3, 2018

भाजपा की कांटों भरी राह

फ़िरदौस ख़ान
केन्द्र में सत्तारूढ़  भारतीय जनता पार्टी ने अगले साल होने वाले आमसभा चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं. वह पिछली बार की तरह 2019 के लोकसभा चुनाव में भी अच्छा प्रदर्शन करना चाहती है. इसके लिए पार्टी चुनावी रणनीति भी बना रही है, लेकिन उसके लिए आम चुनाव की राह उतनी आसान नहीं है. इसकी सबसे बड़ी वजह है भारतीय जनता पार्टी सरकार की वादा ख़िलाफ़ी. साल 2014 में भारतीय जनता पार्टी ने जो लोक लुभावन नारे दिए थे, जिनके बूते पर उसने लोकसभा चुनाव की वैतरणी पार की थी, अब जनता उनके बारे में सवाल करने लगी है. जनता पूछने लगी कि कहां हैं, वे अच्छे दिन जिसका इंद्रधनुषी सपना भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें दिखाया था. कहां हैं, वह 15 लाख रुपये, जिन्हें उनके खाते में डालने का वादा किया गया था. कहां है वह विदेशी काला धन, जिसके बारे में वादा किया गया था कि उसके स्वदेश में आने के बाद जनता के हालात सुधर जाएंगे.

भारतीय जनता पार्टी जिन वादों के सहारे सत्ता की सीढ़ियां चढ़ी थी, सत्ता की कुर्सी पाते ही उन्हें भूल गई और ठीक उनके उलट काम करने लगी. भारतीय जनता पार्टी ने महंगाई कम करने का वादा किया था, लेकिन उसके शासनकाल में महंगाई आसमान छूने लगी. भारतीय जनता पार्टी ने महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अत्याचारों पर अंकुश लगाने का वादा किया था, लेकिन आए-दिन महिला शोषण के दिल दहला देने वाले कितने ही मामले सामने आ रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी ने किसानों को राहत देने का वादा किया था, लेकिन किसानों के ख़ुदकुशी के मामले थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी ने युवाओं को रोज़गार देने का वादा किया था, लेकिन रोज़गार देना तो दूर, नोटबंदी और जीएसटी लागू करके जो उद्योग-धंधे चल रहे थे, उन्हें भी बंद करने का काम किया है. भारतीय जनता पार्टी की सरकार जो भी फ़ैसले ले रही है, उनसे सिर्फ़ बड़े उद्योगपतियों को ही फ़ायदा हो रहा है. ऑक्सफ़ेम सर्वेक्षण के हवाले से कहा गया है कि पिछले साल यानी 2017 में भारत में सृजित कुल संपदा का 73 फ़ीसद हिस्सा देश की एक फ़ीसद अमीर आबादी के पास है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से सवाल भी किया है. ग़ौरतलब है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विदेश यात्राओं और उनकी सरकार पर अमीरों के लिए काम करने और उनके कर्ज़ माफ़ करने को लेकर लगातार हमला कर रहे हैं.
दरअसल, एक तरफ़ केन्द्र सरकार अमीरों को तमाम सुविधाएं दे रही है, उन्हें करों में छूट दे रही है, उनके कर माफ़ कर रही है, उनके क़र्ज़ माफ़ कर रही है. वहीं दूसरी तरफ़ ग़रीब जनता पर आए दिन नये-नये कर लगाए जा रहे हैं, कभी स्वच्छता के नाम पर, तो कभी जीएसटी के नाम पर उनसे वसूली की जा रही है. खाद्यान्नों और रोज़मर्रा में काम आने वाली चीज़ों के दाम भी लगातार बढ़ाए जा रहे हैं. मरीज़ों के लिए इलाज कराना भी मुश्किल हो गया है. दवाओं यहां तक कि जीवन रक्षक दवाओं और ख़ून के दाम भी बहुत ज़्यादा बढ़ा दिए गए हैं. ऐसे में ग़रीब मरीज़ कैसे अपना इलाज कराएंगे, इसकी सरकार को ज़रा भी फ़िक्र नहीं है. सरकार का सारा ध्यान जनता से कर वसूली पर ही लगा हुआ है.

इतना ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी ने आम चुनाव में कांग्रेस के जिस भ्रष्टाचार को, जिस घोटाले को अपने लिए प्रचार का साधन बनाया था, उन मामलों में भी अदालत में कांग्रेस पाक-साफ़ साबित हुई है.
टू जी स्पैक्ट्रम घोटाले में केन्द्रीय जांच ब्यूरो की विशेष अदालत ने पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा और कनिमोई सहित 17 आरोपियों को सभी मामलों में बरी कर दिया. न्यायाधीश ओपी सैनी ने अपने फ़ैसले में लिखा है, "मैं ये भी बता दूं कि बीते सात साल से हर दिन- गर्मी की छुट्टियों सहित, मैं सुबह नौ बजे से शाम पांच बजे तक पूरी निष्ठा से खुली अदालत में बैठता था और इंतज़ार करता था कि कोई आए और अपने पास से कोई ऐसा सबूत दे जो क़ानूनी तौर पर मंज़ूर हो, लेकिन सब बेकार रहा. एक भी शख़्स सामने नहीं आया. इससे पता चलता है कि हर कोई अफ़वाहों, अनुमानों और गपशप से बनी आम राय के हिसाब से चल रहा था. लेकिन न्यायिक कार्यवाही में लोगों की इस राय की जगह नहीं है. "

इस फ़ैसले से यह साबित हो गया कि टू जी स्पैक्ट्रम घोटाला पूरी तरह से काल्पनिक और मनगढ़ंत था. कांग्रेस को बदनाम करके अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए बड़े लोगों को आरोपी बनाया गया था. यह फ़ैसला संयुक्त प्रगतिशाल गठबंधन के लिए राहत का सबब बना, लेकिन भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र सरकार और केन्द्रीय जांच ब्यूरो कठघरे में ज़रूर खड़े हो गए हैं. अल्पसंख्यकों और दलितों पर हो रहे लगातार हमलों को लेकर भी केन्द्र की मोदी सरकार पहले से ही सवालों के घेरे में है.

हालांकि कुछ समय पहले हुए गुजरात और हिमाचल प्रदेश चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया. भारतीय जनता पार्टी ने जहां गुजरात में अपनी सत्ता बचाई, वहीं हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस से सत्ता छीनी. इस साल देश के आठ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, जिनमें मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, त्रिपुरा, मेघालय, मिज़ोरम और नागालैंड शामिल हैं. हालांकि भारतीय जनता पार्टी इस बात को लेकर आश्वस्त है कि इन विधानसभा चुनावों में भी वह अच्छा प्रदर्शन करेगी, लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनावों में बहुत फ़र्क़ है. विधानसभा चुनाव जहां क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर लड़े जाते हैं, वहीं लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दे छाये रहते हैं. भारतीय जनता पार्टी के सांसद इस बात को लेकर परेशान हैं कि वे चुनावों में जनता को क्या मुंह दिखाएंगे. जनता जब उनसे सवाल पूछेगी, तो सिवाय बग़ले झांकने के वे कुछ नहीं कर पाएंगे.

फ़िलहाल भारतीय जनता पार्टी अपना जनाधार बढ़ाने पर ख़ासा ध्यान दे रही है. उसने मिलेनियम वोटर कैंपेन नामक एक मुहिम शुरू की है. इस मुहिम में उन दो करोड़ युवाओं को शामिल करने की कोशिश की जाएगी, जो साल 2019 में पहली बार अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे. इन युवाओं को पार्टी से जोड़ने के लिए सोशल मीडिया की मदद ली जाएगी. पिछले लोकसभा चुनाव में भी पार्टी ने ज़्यादा से ज़्यादा युवाओं को जोड़ा था और उसे युवाओं का समर्थन भी मिला था. क़ाबिले-ग़ौर है कि ’मन की बात’ के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी नये मतदाताओं पर ज़ोर देते हुए कहा था, 'हम लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए इक्कीसवीं सदी में पैदा हुए लोगों का स्वागत करते हैं, क्योंकि वे योग्य मतदाता बन जाएंगे. उनका वोट 'नये भारत का आधार' बन जाएगा.

बहरहाल, भारतीय जनता पार्टी अपनी कोशिश में कितनी कामयाब हो पाती है, यह तो आने वाला वक़्त बताएगा. लेकिन इतना ज़रूर है कि उसकी राह कांटों भरी होगी, जो उसने अपनी राह में ख़ुद बोये हैं.